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Uttarakhand

आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी की याचिका से हलकान सरकार

देहरादून। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले चर्चित आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी की याचिका से केंद्र सरकार के साथ ही उत्तराखण्ड सरकार भी परेशानी में आ गई है। चतुर्वेदी ने भारतीय प्रशासनिक सेवा में केंद्र सरकार की लिटरल एंट्री यानी सीधी नियुक्ति योजना को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर चुनौती दी है। जिस पर हाईकोर्ट ने केंद्र और उत्तराखण्ड सरकार सहित संघ लोक सेवा आयोग को भी जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। इससे पूर्व संजीव चतुर्वेदी ने लोकपाल में अपनी प्रतिनियुक्ति दिए जाने के लिए केंद्र और उत्तराखण्ड सरकार को आदेश देने के लिए कैट में याचिका दाखिल की थी जिस पर कैट ने दोनों ही सरकारों से जवाब मांगा है।

 

2002 बैच के आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी उत्तराखण्ड कैडर के अधिकारी हैं। वर्तमान में चतुर्वेदी उत्तराखण्ड के हल्द्वानी में मुख्य वन संरक्षक अनुसंधान में तैनात हैं। दिल्ली एम्स में अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के मामलां को सबसे पहले उजागर कर चर्चित हुए थे चतुर्वेदी। इसके बाद उनका स्थानांतरण हरियाणा में कर दिया गया। उत्तराखण्ड कैडर के होने के चलते उनको गृह प्रदेश भेजा दिया गया। लेकिन कुछ समय तक सरकार ने चतुर्वेदी को बगैर काम के ही शासन में बनाए रखा, बाद में उन्हें हल्द्वानी में मुख्य वन संरक्षक अनुसंधान के पद पर तैनात कर दिया गया।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत की भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति के चलते माना जा रहा था कि प्रदेश सरकार संजीव चतुर्वेदी को उनकी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी गई लड़ाई के अनुभवों के आधार पर शासन में कोई बड़ा पद दे सकती है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और मुख्य वन संरक्षक अनुसंधान में तैनात कर दिया गया। हालांकि यहां भी चतुर्वेदी ने अपना बेहतर काम किया और वन विभाग में हो रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच में चम्पावत के डीएफओ के अलावा कई अन्य जांच की और दोषियों के खिलाफ कार्यवाही करने की संस्तुति की।

 

लोकपाल में अपनी प्रतिनियुक्ति के लिए संजीव चतुर्वेदी केंद्र और राज्य सरकार को प्रतिनियुक्ति करने का आवेदन दिया जिस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया तो चतुर्वेदी ने कैट में याचिका दाखिल की जिस पर सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्य सरकार दोनों को अपना जवाब देने को कहा गया है। माना जा रहा हे कि उत्तराखण्ड सरकार किसी भी सूरत में संजीव चतुर्वेदी को लोकपाल में प्रतिनियुक्ति पर नहीं भेजना चाहती है। इसी तरह केंद्र सरकार भी नहीं चाहती कि लोकपाल के पद पर संजीव चतुर्वेदी जैसे ईमानदार अधिकारी की तैनाती हो। दोनों ही सरकारें इससे बचना चाह रही हैं। कैट के निर्णय के बाद ही स्थिति साफ होगी कि संजीव चतुर्वेदी लोकपाल में प्रतिनियुक्ति पाते हैं या नहीं।

संजीव चतुर्वेदी ने इलाहबाद हाईकोर्ट में केंद्र सरकार द्वारा सीधी नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती दी है। हाईकोर्ट में दी गई याचिका में वर्ष 2015 में तीन सौ 60 डिग्री चयन व्यवस्था को भी समाप्त करने की मांग की है। याचिका के अनुसार 2017 में संयुक्त संसदीय समिति ने भी इस व्यवस्था को अपारदर्शी, बगैर किसी नियम पर आधारित होना, इस व्यवस्था को दोषपूर्ण बताया गया है। सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक संयुक्त सचिव के खाली पदों के सापेक्ष में 145 अधिकारी सूचीबद्ध हैं और 18 इच्छुक अधिकारी भी उपलब्ध हैं। सीधी नियुक्ति के नौ विशेषज्ञों की तैनाती में भी मामलों की अनदेखी की गई है।

 

इलाहबाद हाईकोर्ट ने संजीव चतुर्वेदी की याचिका पर उत्तराखण्ड सरकार और संघ लोक सेवा आयोग को जवाब देने का आदेश दिया है। केंद्र सरकार ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा है। इसकी अगली सुनवाई अब 3 सितंबर को होगी। प्रदेश के एक अधिकारी की याचिकाओं से उत्तराखण्ड सरकार हलकान है। अब देखना है कि सरकार कैट और इलाहाबाद हाईकोर्ट में क्या जवाब दाखिल करती है और संजीव चतुर्वेदी के विषय में क्या निर्णय आता है। कुल मिलाकर संजीव चतुर्वेदी फिर से चर्चाओं में आ चुके हैं।

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