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By Bhupender Rawat

कोरोना से मौत का डर नही है। अब डर है तो भूख, प्यास से मरने का, रहने को छत ना हो, सोने को बिस्तर ना हो तो कोई बात नही, लेकिन दरकार रोटी की है, 1-1 माह के दुधमुहे बच्चे हैं जिनकी भूख केवल दूध से ही मिटेगी लेकिन दूध लॉक डाउन में कब, कैसे कहाँ से मिलेेगा पता नही, हल्द्वानी के श्रमिकों के सवाल अनेक है… लेकिन जबाब नही, ना काम मिलेगा और ना ही पैसा, बस सोचते हैं अपने घर चले जायें लेकिन यह सोच भी सपना बनकर रह गयी है, पैदल घर जाने की कोशिश की लेकिन लालकुआं से पुलिस ने लौटा दिया, जब से लॉक डाउन हुआ प्रशासन से केवल 2 बार कच्चा राशन बांटा , हालांकि बीच बीच में स्वयं सेवी संस्थाओं ने तैयार खाने के पैकेट इन लोगों तक पहुंचाए जो नाकाफी थे। लेकिन भूख है साहब, 2 जून की रोटी चाहिये, कोई हमे मदद कर घर भेज दे….. ये गुहार लगाते वे मजदूर हैं

जो उत्तरप्रदेश के अनेक जिलो से खनन मजदूरी करने गौला नदी की तरफ आ गये, ‘गौला नदी प्रदेश को सबसे अधिक राजश्व देने वाली नदी और 4 लाख लोगों की प्यास बुझाने वाली जीवनदायिनी है’ लेकिन लॉक डाउन में गौला नदी ने भी साथ छोड़ दिया, होली मनाकर घर से काम की तलाश में निकले तो आंखों में उम्मीद थी कुछ अच्छा कमा लेंगे, लेकिन अचानक लॉक डाउन हुआ तो सपने जैसे चकनाचूर हो गये, किसी को अलीगढ़ जाना है, तो किसी को कासगंज, बरेली,बलिया लेकिन कैसे, प्रशासन है की सुनता नही, गौला नदी किनारे उत्तरप्रदेश के अलग अलग जिलों के सैकड़ों परिवार झोपड़ियों में रह रहे हैं,

खाने के संकट के चलते इन लोगों ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों का दरवाजा खटखटाया तो कुछ मदद मिली लेकिन उससे कहाँ कुछ पूरा होने वाला था, अब सवाल एक ही है की क्या प्रशासन इन गरीब मजदूरों को इस संकट की घड़ी में इनके घर पहुंचाने के लिये कोई कदम उठाएगा ,या धरती का सीना चीर हाड़तोड़ मेहनत करने वाले मजदूर यूँ ही हाथ जोड़कर प्रशासन से गुहार लगाते रहेंगे ।

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