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Uttarakhand

जनता पर भारी पीपीपी की हिस्सेदारी

त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार के कार्यकाल में हुए कुछ जनविरोधी फैसलों का खामियाजा आज भी उत्तराखण्ड की जनता भुगत रही है। ऐसे ही एक फैसले में सरकारी अस्पतालों को पीपीपी मोड यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप पर आदेश जारी किए गए थे। तब दावा किया गया था कि इससे सरकारी चिकित्सकों की दिशा और दशा बदल जाएगी। प्रदेश के कई अस्पतालों के साथ ही देहरादून के डोईवाला में राजकीय सामुदायिक केंद्र को भी पीपीपी मोड के दायरे में लाया गया था। तब से यह अस्पताल रेफर सेंटर बनकर रह गया है। जिसका फायदा हिमालयन अस्पताल को हो रहा है। पीपीपी मोड का अनुबंध खत्म होने के बाद भी स्थानीय विधायक अनुबंध जारी रखने की राजनीति कर रहे हैं तो स्थानीय लोग आंदोलन कर रहे हैं

स्वा मी राम हिमालयन मेडिकल कॉलेज द्वारा पीपीपी मोड में संचालित डोईवाला के राजकीय सामुदायिक केंद्र का मामला फिर से गरमा गया है। अस्पताल में मरीजों के इलाज के नाम पर जिस तरह से खानापूर्ति हो रही है उसके चलते अनुबंध को समाप्त करने के लिए प्रदेश की पूरी मशीनरी पहली बार एक स्वर में काम कर रही है। लेकिन भाजपा के स्थानीय विधायक पर आरोप हैं कि वे हिमालयन अस्पताल के साथ किए गए अनुबंध को न सिर्फ बनाए रखना चाहते हैं, साथ ही इसे पांच वर्ष के लिए और बढ़ाए जाने की सिफारिश भी कर रहे हैं। हैरत की बात यह है कि उक्रांद और कांग्रेस के अलावा कुछ स्थानीय भाजपा नेता भी अनुबंध को समाप्त करने को लेकर दो माह से आंदोलनरत हैं।

दरअसल, पूर्ववर्ती भाजपा की त्रिवेंद्र रावत सरकार द्वारा 29 जुलाई 2019 को डोईवाला के राजकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को स्वामी राम हिमालय मेडिकल कॉलेज प्रो ़बोनो सर्विस एग्रीमेंट के तहत पांच वर्षों के अनुबंध के तहत संचालन के लिए दिया था। अनुबंध में सभी तरह की अति आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं और उच्च तकनीक वाले चिकित्सीय उपकरणों और विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती तथा पैरामेडिकल स्टॉफ और तकनीकी विशेषज्ञों की तैनाती की शर्तों के साथ अनुबंध किया गया था। इसके संचालन के लिए सीएमसी यानी सेंट्रल मैनेजमेंट कमेटी जिसमें जिलाधिकारी देहरादून, मुख्य चिकित्सा अधिकारी देहरादून, स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि, अधीक्षक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तथा राज्य सरकार द्वारा नामित प्रतिनिधि को रखा गया।

इसी तरह से एमएससी (हॉस्पिटल मैनेजमेंट कमेटी) भी बनाई गई जिसमें मुख्य विकास अधिकारी, अधीक्षक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि और पदेन वित्त नियंत्रक/चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण द्वारा नामित परियोजना समन्वयक अधिकारी रखे गए। डोईवाला के राजकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को पीपीपी मोड में दिए जाने बाद इस अस्पताल को बेहतर हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा आज तक नहीं हुआ है। स्थानीय लोगों को आरोप है कि जब से इस अस्पताल को हिमालयन मेडिकल कॉलेज को सौंपा गया है तब से इसके हालात और भी खराब हो चुके हैं। मरीजों को समय पर न तो इलाज मिल पा रहा है। यहां तक कि आपातकाल में भी मरीजों का उपचार तक नहीं मिल पा रहा है। आरोप है कि हिमालय अस्पताल का सबसे ज्यादा जोर मरीजों को अपने अस्पताल में उपचार के लिए रेफर करने में ही रहता है जिसके चलते इस अस्पताल में कोई विशेष चिकित्सा नहीं दी जा रहा है। यहां तक कि आज तक इसमें किसी विशेषज्ञ चिकित्सक की तैनाती तक नहीं की गई है।

वरिष्ठ पत्रकार और उक्रांद नेता शिव प्रसाद सेमवाल ने स्वास्थ्य मंत्री धनसिंह रावत को 16 दिसंबर 2021 को एक ज्ञापन सौंपा जिसमें उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा है कि पूर्व में इस अस्पताल में मरीजों का इलाज निःशुल्क होता था और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल रही थी लेकिन जब से इस अस्पताल को हिमालय मेडिकल कॉलेज को सौंपा गया है तब से मरीजों को सामान्य बीमारियों में भी रेफर किया जा रहा है। जिसमें हिमालयन अस्पताल में मरीजों का इलाज के लिए जाना पड़ रहा है और भारी-भरकम खर्च वहन करना पड़ रहा है।

सेमवाल ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि अनुबंध की किसी भी शर्तों का अनुपालन तक नहीं किया जा रहा है और संचालन के लिए बनाई गई सीएमसी और एचएमसी कमेटियों ने इसके लिए एक बार भी बैठक नहीं की और न ही शर्तों का अनुपालन न होने पर कोई कार्यवाही नहीं की। स्वास्थ्य मंत्री धनसिंह रावत ने इस ज्ञापन को स्वास्थ्य सचिव को अंकित करते हुए कार्यवाही करने के लिए लिखा। स्वास्थ्य सचिव ने चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण महानिदेशक को इस मामले में आवश्यक कार्यवाही करने का निर्देश जारी कर दिया। स्वास्थ्य महानिदेशक द्वारा अस्पताल का निरीक्षण करवाया गया। जिसमें कई तरह की खामियां पाई गई और अस्पताल का अनुबंध खत्म करने के लिए अपनी संस्तुति सचिव स्वास्थ्य को भेज दी।

स्वास्थ्य महानिदेशक तृप्ति बहुगुणा द्वारा भेजी गई संस्तुति में साफ तौर पर उल्लेख किया गया है कि डोईवाला सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में सप्ताह में मात्र तीन दिन ही अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे किए जाते हैं। रात्रि के समय प्रसव और इमरजेंसी के मरीजों को रेफर कर दिया जाता है। साथ ही स्वास्थ्य विभाग द्वारा संचालित और हिमालयन मेडिकल कॉलेज द्वारा संचालित अवधि का तुलनात्मक विवरण का भी उल्लेख किया है जिसमें मेजर ऑपरेशन और कंपलीकेटेड डिलीवरी केसों की संख्या शून्य बताई है। यानी साफ है कि अनुबंध की अवधि में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में गंभीर शल्य चिकित्सा और अति गंभीर प्रसव का इलाज इस अस्पताल में किए ही नहीं गए। इसके अलावा प्रो ़बोनो सर्विस एग्रीमेंट के तहत किसी विशेषज्ञ चिकित्सकों की भी तैनाती नहीं करने का भी उल्लेख किया है। स्वास्थ्य महानिदेशक की संस्तुति पत्र पर सचिव स्वास्थ्य अमित नेगी द्वारा हिमालयन मेडिकल कॉलेज का अनुबंध समाप्त करने की कार्यवाही को आरंभ करने के लिए स्वास्थ्य महानिदेशक को आदेश जारी कर दिया।

पीपीपी अनुबंध को रद्द करने का आदेश 

अनुबंध निरस्त करने के आदेश को पांच महीने का समय हो चुका है लेकिन अभी तक अनुबंध समाप्त नहीं हो पाया है जबकि इसके लिए निरंतर आंदोलन और धरना-प्रदर्शन किया जा रहा है। सूत्रों की मानें तो हिमालयन अस्पताल के साथ किए गए अनुबंध को स्थानीय विधायक समाप्त नहीं करवाना चाहते हैं और वे इसके लिए शासन और स्वास्थ्य विभाग पर दबाव बना रहे हैं। शिव प्रसाद सेमवाल का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों की माने तो विधायक अनुबंध को बनाए रखने की बात कह रहे हैं।

गौरतलब है कि यह सामुदायिक केन्द्र समस्त डोईवाला क्षेत्र के निवासियों के लिए एक वरदान से कम नहीं रहा है लेकिन इस अस्पताल को जानबूझकर एक साजिश के तहत बर्बाद किया जाता रहा है। इसमें चिकित्सकों की भारी कमी स्टॉफ और अन्य तकनीकी स्टॉफ को भी तैनात न करने के पीछे भी साजिश की जाती रही है। स्थानीय जनता का मानना है कि निजी क्षेत्र का विख्यात स्वामी राम हिमालयन मेडिकल कॉलेज और अस्पताल इस स्वास्थ्य केंद्र से महज तीन किमी दूर है। जिसमें अति आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं हैं। यही सबसे बड़ा कारण रहा है कि राज्य बनने के बाद भी इस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को बेहतर नहीं किया गया।

2014 में मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा डोईवाला क्षेत्र से उपचुनाव लड़ने की खबरों के चलते शासन-प्रशासन द्वारा जनता की वर्षों की मांग को अचानक सहमति देते हुए उच्चीकरण को प्रस्ताव पास कर दिया। लेकिन उपचुनाव में हरीश रावत के धारचुला से चुनाव लड़ने के बाद अचानक ही शासन ने उच्चीकरण के प्रस्ताव को यह कह कर निरस्त कर दिया कि महज दो किलोमीटर दूर अति आधुनिक हिमालयन अस्पताल के होने से डोईवाला सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के उच्चीकरण की आवश्यकता नहीं है। डोईवाला से उपचुनाव जीत कर विधायक बने हीरा सिंह बिष्ट ने इसके लिए फिर से प्रयास जरूर किए लेकिन सरकार और शासन में हिमालयन अस्पताल के हितों को सुरक्षित रखने के चलते वे अपनी ही सरकार पर दबाव नहीं बना पाए। बिष्ट ने तब अपनी ही सरकार पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।

गौर करने वाली बात यह है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत हीरा सिंह बिष्ट से उपचुनाव में हार गए थे और वे इस अस्पताल के उच्चीकरण के लिए तमाम तरह के वादे कर रहे थे। 2017 के चुनाव में भी त्रिवेंद्र रावत से वादा किया था कि अगर भाजपा की सरकार बनी तो इस अस्पताल को बेहतर बनाएंगे और इसके उच्चीकरण भी करवाएंगे। 2017 में त्रिवेंद्र रावत सिर्फ चुनाव जीते साथ ही वे राज्य के मुख्यमंत्री भी बने। बावजूद इसके त्रिवेंद्र रावत अपनी ही बात से पलटी मार गए और इस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को ही स्वामी राम हिमालयन मेडिकल कॉलेज को ही संचालन के लिए सौंप दिया। गौर करने वाली बात यह भी है कि तब त्रिवेंद्र रावत राज्य के स्वास्थ्य मंत्री भी थे और प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएं उनके ही कंधों पर थी।
2022 के चुनाव में त्रिवेंद्र रावत डोईवाला से चुनाव नहीं लड़े लेकिन अपने खास समर्थक और भाजपा के नेता बृज भूषण गैरोला को चुनाव में टिकट दिलवाने में सफल रहे। गैरौला भारी मतों से चुनाव जीते लेकिन अब उन पर आरोप है कि जनता द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन के बावजूद वे हिमालयन मेडिकल कॉलेज के साथ अनुबंध को खत्म न करने के लिए दबाव बना रहे हैं। साथ ही अनुबंध को बढ़ाए जाने का भी दबाव बना रहे हैं। स्थानीय स्तर पर आरोप लग रहा है कि विधायक गैरोला पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के ही इशारों पर अनुबंध को खत्म न करने के लिए दबाव बना रहे हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि सरकार अपने स्वास्थ्य सचिव, स्वास्थ्य महानिदेशक और मुख्य चिकित्सा अधिकारी देहरादून के अलावा शासन के सभी संबंधित अधिकारियों द्वारा अनुबंध को खत्म करने के लिए की गई संस्तुति को मानती है या फिर अपने विधायक के दबाव में आती है।

बात अपनी-अपनी
मैंने फाइल मंगवा ली है। दो-चार दिन में इस पर फैसला हो जाएगा।
धन सिंह रावत, स्वास्थ्य मंत्री उत्तराखण्ड

आरोप तो कोई भी लगा सकता है। शिव प्रसाद सेमवाल मेरे विरोधी हैं तो वह आरोप तो लगाऐंगे ही। यह विरोधियों का काम होता है। मैंने भी पच्चीस-तीस साल पत्रकारिता की है। ऐसे कोई भी स्वास्थ्य विभाग का अधिकारी बोल सकता हे कि विधायक रोक रहा है। अगस्त तक अनुबंध है अगस्त के बाद समीक्षा होगी तब समीक्षा में जो भी निकल कर आएगा उसी के हिसाब से कार्यवाही होगी। अगर समीक्षा कर ली गई है तो क्यों नहीं निरस्त किया गया? कौन रोक रहा है? मेरा और हमारी सरकार का उदेश्य है कि आम जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिलना। इसी के हिसाब से हम काम कर रहे हैं।
बृज भूषण गैरोला, विधायक डोईवाला

एमओयू निरस्त क्यों नहीं हुआ यह तो शासन और स्वास्थ्य विभाग ही बता सकता है। जैसे पहले चल रहा था वैसे ही एमओयू के बाद चल रहा है। हमारे यहां सभी सुविधाएं वैसे ही मिल रही थी जैसे हिमालयन अस्पताल से हुए एमओयू से पहले मिल रही थी। बस यहां ऑपरेशन नहीं हो पा रहे हैं और अल्ट्रासांउड की कमी है। सभी उपकरण हमारे ही है, बस डॉक्टर हिमालयन अस्पताल के हैं।
कुंवर सिंह भंडारी, मुख्य चिकित्साधिकारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र डोईवाला

त्रिवेंद्र रावत ने अपने कार्यकाल में स्वामी राम हिमालयन अस्पताल को इस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को दिया था। जबकि चुनाव में उनका वादा था कि वे भाजपा की सरकार बनने के बाद इस अस्पताल को अति आधुनिक स्वास्थ्य केंद्र बनाएंगे। लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी सारी संवेदना जनता की बजाय हिमालयन अस्पताल के प्रति हो गई और तमाम विरोध के बावजूद हिमालयन अस्पताल को यह सीएचसी सौंप दी गई। हमारे आंदोलन और शिकायत पर स्वास्थ्य मंत्री धनसिंह रावत ने मामले में कार्यवाही करने का आदेश दिया जिस पर पहली बार स्वास्थ्य सचिव, स्वास्थ्य महानिदेशक और सीएमओ ने अनुबंध को निरस्त करने की संस्तुति दी है लेकिन डोईवाला के विधायक इस पर अपनी टांग अड़ा रहे हैं। हमने जब विभाग से पता किया तो हमें बताया गया कि स्थानीय विधायक अनुबंध को खत्म न करने का दबाव बना रहे हैं। स्थानीय विधायक त्रिवेंद्र रावत के खास समर्थक हैं और वे उनके ही इशारों पर हिमालयन अस्पताल के हितों के लिए काम कर रहे हैं। अगर सरकार ने अनुबंध निरस्त नहीं किया तो क्षेत्र में बड़ा भारी आंदोलन किया जाएगा।
शिव प्रसाद सेमवाल, वरिष्ठ पत्रकार

 

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