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Uttarakhand

इतिहास देवताओं की बसासत का… 

उत्तराखण्ड की पहचान देवभूमि के रूप में रही है। मंदिरों के रूप में यहां देवताओं की वैभवशाली बसासत है। चारों ओर मंदिरों की भरमार है। जब से यहां मानव बस्ती बसनी शुरू हुई तो हर एक बसासत में आधे दर्जन से अधिक मंदिर स्थापित होते चले गये। जहां तक मंदिर निर्माण के इतिहास का सवाल है तो यहां 8वीं व 9वीं सदी से लेकर 16वीं सदी के बीच अधिकांश मंदिरों का निर्माण हुआ। वैसे कत्यूरी व चंद शासनकाल में मंदिरों को स्थापना का इतिहास बेहद समृद्धशाली रहा। इन दोनों राजवंशों ने मंदिरों का निर्माण ही नहीं कराया बल्कि स्थापत्य की दृष्टि से इन्हें वैभवता भी प्रदान की। आज प्रदेश में श्वर नामांतक वाले सैकड़ों मंदिर स्थापत्य व वास्तुकला के बेजोड़ नमूने हैं जो शिव अपराधना केंद्र के रूप में प्रसिद्ध हैं। उत्तराखण्ड की स्थापत्य कला में कत्यूरी शासकों का खासा प्रभाव दिखाई देता है। लेकिन आधुनिक समय में बन रहे मंदिरों में न तो इस तरह का शिल्प नजर आता है न ही इसे आकार देने वाले शिल्पकार ही मौजूद हैं। सीमेंट व सरिया से बनने वाले ढांचे इन बेजोड़ ऐतिहासिक शिल्पकला के सामने कहीं नहीं ठहरते।

यूं तो कुछ इतिहासकार प्रदेश में मंदिर निर्माण का उद्भव काल 5वीं से छठी शताब्दी का मानते हैं। बर्मन शासनकाल में मंदिर बनाने के लिए ईंटों का इस्तेमाल होता था। गंगोलीहाट के दुगईआगर में सूर्य मंदिर व काशीपुर के द्रोण सागर इसके उदाहरण हैं। इतिहासकार बताते हैं कि बाद में मंदिर निर्माण में ‘थान’ शैली प्रयोग में आई। इसमें दो पत्थर दाएं-बाएं, एक पीछे तथा एक पटालनुमा पत्थर को ऊपर रखकर छत बना दी जाती थी। अल्मोड़ा के लखुउड़ियार के पास नारायणकाली मंदिर कत्यूरी राजवंश के साथ ही प्रस्तर शैली का नमूना है। पहले जिस देवी-देवता का मंदिर बनता था उसे उससे जोड़ा जाता था। जैसे शिव मंदिरों का निर्माण नाथ संप्रदाय ने किया तो उन जगहों को जागनाथ, जागेश्वर, बागनाथ, बागेश्वर नाम से जाना जाने लगा। अमरनाथ (जम्मू-कश्मीर), केदारनाथ, तुगनाथ (गढ़वाल) विश्वनाथ (अल्मोड़ा) पशुपति नाथ (नेपाल) ये नाम नाथ संप्रदाय को अपने से जोड़ते हैं। बाद में उत्तराखण्ड में गंगनाथ, भोलानाथ, गालनाथ यहां के ‘ईष्टदेव’ के रूप में प्रतिस्थापित हुए लेकिन उनका नामांतक भी नाथ ही रहा। इसे गुरु गोरखनाथ संप्रदाय की देन माना जाता है। बाद में गुरु शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में ‘नाथ’ के स्थान पर ‘ईश्वर’ शब्द का श्रीगणेश किया। 8वीं शताब्दी के बाद ईश्वर नामांतक आया। पहले बौद्ध मठों की तर्ज पर देवालय बने। फिर दूसरी व तीसरी सदी में कुणिंद शासनकाल में विशिष्ट स्थापत्य कला वाले मंदिरों के अलंकरण की शैली प्रयोग में आई। पहले खुले में पूजा का विधान था। फिर देवालय बने। 7वीं व 8वीं सदी के पास उत्तराखण्ड में मंदिर निर्माण का श्रेय कार्तिकेयपुर राजवंश को जाता है। बाद में कत्यूर राजाओं ने उत्तराखण्ड शैली में सुन्दर मंदिर बनावाये। कहते हैं कि बौद्ध बिहारों से प्रेरित होकर गुप्तकाल में मंदिर निर्माण शुरू हुआ था।

वर्षों पुराने बने मंदिर आज भी स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूनों के रूप में प्रसिद्ध हैं। प्रदेश में कई मंदिर राजस्थानी शैली, मुगल शैली, शिखर शैली, छत्ररेखा प्रसाद शैली में बने हैं। उत्तरकाशी में यमुनोत्री एवं गंगोत्री, रुद्रप्रयाग में तुंगनाथ, चमोली में अनुसूइया देवी का मंदिर कत्यूरी शैली में बना है। अल्मोड़ा का कटारमल सूर्य मंदिर, देहरादून के लाखामंडल स्थित शिव मंदिर व पौड़ी गढ़वाल का केशवराय मठ उत्तराखण्ड शैली में समर्पित है। गोपेश्वर का गोपीनाथ मंदिर व बागेश्वर में स्थत बैजनाथ व बागनाथ मंदिर नागर शैली में निर्मित है। चकराता का महासू मंदिर हूण शैली में बना हैं, रुद्रप्रयाग में स्थित केदारनाथ मंदिर/कत्यूरी व पांडव शैली में बना है। चमोली स्थित बद्रीनाथ मंदिर व ऊधमसिंह नगर के काशीपुर में स्थित बाला सुंदरी मंदिर मुगल शैली में तो पिथौरागढ़ का चंडिका मंदिर बल्लभी नागर शैली व कोटली शिव मंदिर दक्षिण भारतीय शैली में बना है। चंपावत का बागेश्वर मंदिर शिखर शैली मंें निर्मित है। टिहरी का रघुनाथ मंदिर व हरिद्वार का मकरवाहिनी गंगा मंदिर द्रविड़ शैली में निर्मित है।

अल्मोड़ा का प्रसिद्ध जागेश्वर मंदिर केदारनाथ शैली में बना हुआ है। टिहरी का पलेठी सूर्य मंदिर व पौड़ी का पैठाणी स्थित सूर्य मंदिर के साथ ही अल्मोड़ा का महारुद्रेश्वर मंदिर समूह फांसणा शैली में निर्मित है। रुद्रप्रयाग का मदमहेश्वर मंदिर पंडित शैली व द्वाराहाट का गजरदेव मंदिर पंचायण शैली में निर्मित है। गोपेश्वर का रुद्रमहल मध्य हिमाद्री शैली व टिहरी का पनाड़ शिव मंदिर नागर शैली में निर्मित है। अल्मोड़ा का नंदा देवी मंदिर कुमाऊंनी शैली में निर्मित है। अद्भुत शिल्पकला के इन एतिहासिक धरोहरों को अब संरक्षण की जरूरत है ताकि अगली पीढ़ियों तक यह बनी रहे और बताती रहें कि शिल्पकला में उत्तराखण्डी कितने माहिर थे।

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