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Uttarakhand

विलुप्ति की तरफ हिमालयी कल्प वृक्ष

सेंटर फॉर इकोलॉजी डेवलपमेंट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट देहरादून की एक शोध रिपोर्ट कहती है कि बांज के घने जंगलों में 22 प्रतिशत कमी आई है जबकि बांज के नीचे जैव विविधता का अपार संसार बसता है। ऐसे में बांज वृक्ष के विलुप्त होने की तरफ बढ़ना जैव विविधता के संसार के लिए भी खतरा है

उत्तराखण्ड में विकास योजनाओं के लिए अब बांज के पेड़ों की बलि नहीं चढ़ेगी। बांज के जंगल वाली जमीनें भी परियोजनाओं के लिए अब हस्तांतरित नहीं हो पाएंगी। हाल ही में यह फैसला केंद्रीय वन भूमि हस्तांतरण एवं वन विभाग के अधिकारियों ने लिया था। अब कहा जा रहा है कि अगर बांज के पेड़ कटे भी तो उतनी ही संख्या में बांज के पौधों का पौधारोपण होना चाहिए। प्रदेश के जंगलों में 13 प्रतिशत क्षेत्र में बांज हैं जबकि चीड़ 16 प्रतिशत में पहुंच चुका है। प्रदेश में बांज के जंगल लगातार कम हो रहे हैं। चीड़ बांज को खा रहा है। अकेले कुमाऊं में 80 प्रतिशत क्षेत्र में चीड़ के जंगल फैल चुके हैं तो वहीं अब 3 प्रतिशत ही बांज की जंगल बचे हैं। कई जगह जहां पहले बांज के जंगल फैले थे वह पूरी तरह खत्म हो गए हैं तो कई खत्म होने के कगार में हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बांज के पेड़ को पूरी तरह विकसित होने में 100 वर्ष लग जाते हैं। दुखद यह है कि प्रदेश में नए एवं अविकसित बांज के पेड़ों पर भी कुल्हाड़ी चल रही है। सेंटर फॉर इकोलॉजी डेवलपमेंट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट देहरादून की एक शोध रिपोर्ट कहती है कि बांज के घने जंगलों में 22 प्रतिशत कमी आई है जबकि बांज के नीचे जैव विविधता का अपार संसार बसता है।

ऐसे में बांज वृक्ष के विलुप्त होने की तरफ बढना़ जैव विविधता के संसार के लिए भी खतरा है। बांज वृक्ष एवं इसकी प्रजातियां जल संरक्षण और पारिस्थितिकीय महत्व के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि इन्हें पर्वतीय क्षेत्रों में कल्प वृक्ष को हरा सोना के नाम से जाना जाता है। लेकिन अब यह तेजी से विलुप्त हो रहा है। इसकी गिनती सदानीरा नदियों के प्रमुख स्रोतों के रूप में भी की जाती है। बांज का वृक्ष औसतन हर वर्ष साढ़े सात हजार लीटर पानी का अपने इर्द-गिर्द संचय करता है। शिक्षाविद् डॉ ़जेएस रावत ने अपने अध्ययन में पाया कि बांज के जंगलों से 23 प्रतिशत जल संग्रह होता है। इसकी हरी पत्तियां चारे के रूप में प्रयोग में लाई जाती हैं तो सूखी पत्तियां गौशालाओं में बिछाने एवं जैविक खाद बनाने के काम आती है। यह भी देखा गया है जिस क्षेत्र में बांज के वृक्ष पाए जाते हैं वहां पेयजल की कोई कमी नहीं होती। लेकिन सड़कों के निर्माण एवं अन्य विकास कार्यों के नाम पर अब तक हजारों पेड़ों की बलि चढ़ चुकी है। यूं तो उत्तराखण्ड में बांज की कई प्रजातियां पाई जाती हैं। जिनमें फलियांट, फनियाट, हरिन्ज बांज, रियॉज, सॉज बांज, तिलन्ज, मोरु, तिलोंज बांज, खरसू, खरु बांज आदि हैं। इस पेड़ की विशेषता यह है कि यह सदाबहार है। वर्ष भर हरा-भरा रहने की वजह से चारे की दृष्टि से यह अति महत्वपूर्ण माना जाता है। यह भूमि में नमी रखता है। जल संसाधनों की पूर्ति करता है। मिट्टी के कटाव को रोकता है।

यह पर्वतीय समाज की आर्थिकी एवं उसके दैनिक जीवन में ईंधन की आवश्यकताओं से भी जुड़ा हुआ है। इसमें विषम जलवायु में भी उगने की क्षमता होती है। इसकी लंबी एवं फैली हुई जड़ें भूमि कटाव को रोकने में मदद करती है। यह मनुष्य के लिए स्वास्थ्यवर्धक वातावरण तैयार करता है। इसे प्रकृति का बहुमूल्य प्राकृतिक वरदान माना गया है। यह कई प्रकार के विशिष्ट वनस्पति प्रजातियों को फलने-फूलने के लिए उचित वातावरण भी प्रदान करता है। यह मनुष्य की दैनिक गतिविधियों, पशुओं के भोजन, कृषि यंत्रों, मकान निर्माण, ईंधन आदि के उपयोग में काम आता है। इमारती लकड़ी के रूप में इसका उपयोग होता है। इसकी लकड़ी टिकाऊ एवं मजबूत होती है, इसमें कीड़ा नहीं लगता। कृषि एवं अन्य औजारों का निर्माण भी इससे होता है। कृषि काम में आने वाले नसूड़ा (हल), बीन, मूंठ या सुल्याठ, लाठी, डंडे, ठंगरे और घेरबसड़ आदि में इसका प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा खेतों में गुड़ाई-निराई एवं खेतों को समतल करने के लिए इससे मैई, पाटा, दन्याली आदि यंत्र बनाए जाते हैं। पकी हरी पत्तियां चारे के रूप में तो सूखी पत्तियां गौशालाओं में बिछाने के काम आती है। इससे जैविक खाद भी तैयार होती है। लकड़ियां जलाने के काम आती है। आज इस वृक्ष का संरक्षण बेहद जरूरी है। यह समुद्र तल से 1200 मीटर से 2500 मी की ऊंचाई पर यह पाया जाता है।

वनस्पति विज्ञानी डॉ भुवनचंद्र पाण्डेय कहते हैं कि बांज पर कुल्हाड़ी चलाना किसी अभिशाप से कम नहीं है। यह हिमालय का कल्प वृक्ष है। यह अपने इर्द-गिर्द हजारों लीटर पानी का संचय करता है। यह पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसकी जड़े वर्षा के जल को अवशोषित करती हैं, उन्हें भूमिगत करने में मदद प्रदान करती है, जिससे जमीन में नमी बनी रहती है। जल स्रोत रिचार्ज होते हैं। इसकी विशाल जडं़े मिट्टी को पकड़े रखती हैं जिससे भू-कटाव नहीं होता। वृक्ष छायादार है। हवा ठंडी एवं शीतल तो पानी शुद्ध होता है। लकड़ी अन्य की अपेक्षा अधिक ताप और ऊर्जा वाली होती है। इसीलिए इसका संरक्षण बेहद जरूरी है।

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