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Uttarakhand

वेंटिलेटर पर स्वास्थ्य सेवाएं

उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक राजधानी अल्मोड़ा ने राजनीति, ज्ञान-विज्ञान, शासन-प्रशासन जैसे विभिन्न क्षेत्रों की एक से बढ़कर एक प्रतिभाओं को जन्म दिया है। इसी अल्मोड़ा जिले में स्वास्थ्य सेवाएं दम तोड़ रही हैं। स्थिति यह है कि जिला महिला अस्पताल में नाॅर्मल डिलीवरी के बावजूद महिलाएं आकाल मृत्यु की शिकार हो जाती हैं। बेस अस्पताल में डाॅक्टरों के 32 पद स्वीकृत हैं, लेकिन कार्यरत सिर्फ 17 हैं। अस्पतालों में टेक्निशियन न होने के कारण सीटी स्कैन जैसी मशीनें बारह वर्षों से जंक खा रही हैं। जब जिला चिकित्सालय में ही बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं और मेडिकल स्टाफ की कमी है, तो दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों का हाल बयां करना व्यर्थ है

स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोल / भाग-चार

 

भारती पाण्डे, प्रशिक्षु संवाददाता

बीस बरस के उत्तराखण्ड में एक तरफ स्वास्थ्य विभाग का बजट तो साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है, लेकिन दूसरी तरफ स्वास्थ्य सुविधाओं का टोटा भी हो रहा है। हालात इतने दयनीय हैं कि ग्रामीण इलाकों के साथ-साथ राज्य के जिला अस्पताल भी वेंटिलेटर पर सांस लेते नजर आ रहे हैं। प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी अल्मोड़ा में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली राज्य सरकार के दावों की पोल खोल देती है।

अल्मोड़ा जिले के भैसियाछाना ब्लाॅक के शेराघाट में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्थित है। जहां पर ओपीडी जैसी आम सुविधाएं तो उपलब्ध हैं। पानी की उचित व्यवस्था के साथ-साथ आवश्यक सुविधाएं और कार्यक्रम संचालित भी किए जा रहे हैं, परंतु आम नागरिक सरकारी अस्पताल आना नहीं चाहता है। कई बार जागरूकता की कमी और कई बार व्यवस्था की खामियों की वजह से जनता के लिए सरकारी अस्पताल दूसरा या अंतिम विकल्प बनते जा रहे हैं। रोगी या मरीज सर्वप्रथम घरेलू उपचार या फिर प्राइवेट क्लीनिक के उपचारों को अधिक प्राथमिकता प्रदान कर रहे हैं। अस्पताल स्टाफ ने बताया कि जननी सुरक्षा योजना के अंतर्गत गर्भवती महिलाओं को मिलने वाले लाभ के प्रति लोगों को जागरूक किया जाता है, परंतु फिर भी कई बार अज्ञानता के चलते महिलाएं टीके नहीं ले पाती। गर्भवती महिलाओं की नाॅर्मल डिलीवरी वहां की जा रही है, परंतु कई गंभीर केस रैफर किए जाते हैं और कई बार गर्भवती महिलाएं अस्पताल नहीं पहुंच पाती क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में मार्ग की समस्या है। शेराघाट में एक महिला ने बताया कि कुछ माह पूर्व उसने एक बच्चे को जन्म दिया है, परंतु वो प्रसव पीड़ा के दौरान चाहकर भी अस्पताल नहीं आ पाई, क्योंकि रात्रि के समय गांव में अस्पताल जाने की कोई व्यवस्था नहीं हो पाई और असहनीय दर्द के बाद भी उसकी होम डिलीवरी की गई।

अस्पताल कर्मियों ने बताया कि सामान्य केस तो अस्पताल में हैंडल कर लिये जाते हैं परंतु गंभीर केस रेफर करना ही होता है। 108 की एक गाड़ी पुरानी हो जाने की वजह से खराब पड़ी है और जो नई गाड़ी मंगवाई गई है वो भी तकनीकी समस्या के चलते बंद पड़ी है। ऐसे में किसी गंभीर केस को रैफर करने में परेशानियंा आ रही हैं। कई बार गांव से किसी दुर्घटना का कोई गंभीर केस या गर्भवती महिला की गंभीर स्थिति की वजह से उन्हें 108 उपलब्ध न होने पर या तो निजी वाहन (बुकिंग) के माध्यम से अल्मोड़ा जाना पड़ता है या फिर पिथौरागढ़ जिले के बेरीनाग में स्थित 108 मंगवानी पड़ती है और वहां से 108 शेराघाट पहुंचने तक सामान्यतः डेढ़-दो घंटे का समय नष्ट हो जाता है। ऐसे में मरीज की हालत कई बार और अधिक गंभीर हो जाती है। एएनएम कार्यकर्ता ऊषा ने बताया कि सरकार नई भर्तियां नहीं दे रही जिस वजह से उन्हें ही कई क्षेत्रों को संभालना पड़ रहा है और ऐसे में कई बार असुविधाएं भी हो जाती हैं। परिवार नियोजन की योजनाओं के विषय में बात करते हुए वे बताती हैं कि स्वास्थ्य विभाग की तरफ से परिवार नियोजन की अस्थाई सुविधाएं तो अस्पताल में हैं, परंतु स्थाई सुविधा लगभग दो सालों से इस स्तर पर नहीं हैं। नसबंदी के लिए ब्लाॅक स्तरीय कैंप का आयोजन किया जाता है, परंतु उसमें लोगों की प्रतिभागिता कम ही हो पा रही है। कोविड-19 की वजह से कैंप भी नहीं लग पाए और परिवार नियोजन पर बुहरा प्रभाव पड़ा। पितृसत्तात्मक सोच कहें या पिछड़ापन लेकिन परिवार नियोजन के उपायों को अपनाने में पुरुषों का स्तर महिलाओं की तुलना में बेहद कम रहा है जो चिंता का विषय है। उनका कहना है कि सरकार को व्यवस्थाएं और अधिक दुरुस्त करने की जरूरत है।

भैसियाछाना ब्लाॅक में ही धौलछीना में एक सरकारी अस्पताल है जिसे आम जनता सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र समझती है, अस्पताल का भवन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के नाम से ही बना हुआ है। असपताल के भवन पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लिखा गया है। लेकिन सुविधाएं इस स्तर की नहीं हैं। अस्पताल में वर्तमान में दो फिजिशियन हैं। स्टाफ ने बताया कि अभी अस्पताल में सीएमओ की तरफ से एक एम्बुलेंस उपलब्ध कराई गई है और साथ ही संविदा के तहत कुछ कर्मियों की नियुक्ति हुई है। मशीनें भी अस्पताल में रखी जा चुकी हैं। डाॅक्टर ने बताया कि कई बार लोग इलाज के लिए शेराघाट प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से रेफर किए जाने पर अल्मोड़ा न जाकर धौलछीना अस्पताल में आ जाते हैं। प्रसव पीड़ा के समय गर्भवती महिलाएं शेराघाट अस्पताल से अल्मोड़ा रैफर किए जाने पर अल्मोड़ा न जाकर निजी वाहन से धौलछीना में आ रही हैं और रैफर से संबंधित कोई जानकारी अस्पताल को नहीं दे रही हैं। ऐसे में कई बार हानि की संभावनाएं बनी रहती हैं। हालांकि अभी तक कोई अनिष्ट नहीं हुआ है।

डाॅक्टर का कहना है कि समस्या तब होगी जब एक ही समय पर दो या दो से अधिक प्रसव केस आ जाएं। ऐसे में टीम की कमी होने के कारण स्टाफ और गर्भवती महिला दोनों को समस्या होने की अत्यधिक आशंका है। उम्मीद है कि शीघ्र ही ये अस्पताल कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में परिवर्तित हो जाएगा तब जनता को काफी सुविधाएं मिल पाएंगी। अस्पताल में मौजूद एएनएम बताती हैं कि कई मामलों में व्यवस्थाएं इतनी लचर हैं। प्रेगनेंसी टेस्ट किट्स भी अस्पताल में उपलब्ध नहीं हो पाती। ऐसे में आजकल बाहर से निजी खर्चे में प्रेगनेंसी टेस्ट किट्स मंगवानी पड़ रही हैं। उन्होंने बताया कि पिछली बार यही टेस्ट किट अत्यधिक संख्या में उपलब्ध करा दी गई थीं जो प्रयोग में न आने और समय अवधिपूर्ण हो जाने की वजह से अंततः कूड़ेदान में फेंक देनी पड़ी थी, लेकिन इस वर्ष इनकी कोई सप्लाई नहीं की गई है।

इस अस्पताल को निम्न स्तर का अस्पताल होने के बावजूद कई मशीनें और जांच सुविधाएं उपलब्ध कराकर आगे रखा गया है जिससे मरीज को खून जांच, यूरिन जांच, टीबी जांच, शुगर जांच आदि के लिए अल्मोड़ा नहीं जाना पड़ता। ये सुविधाएं कोविड-19 के समय में इस अस्पताल को उपलब्ध कराई गईं। इससे पूर्व लोगों को इन जांचों के लिए अल्मोड़ा जाना पड़ता था, जो कठिन था। अल्मोड़ा जिले के समस्त सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से जो भी केस रेफर किए जाते हैं वो सर्वप्रथम जिला पुरुष अस्पताल में भेजे जाते हैं, परंतु इस अस्पताल की स्थिति कई मामलों में अत्यधिक दयनीय है। जिला अस्पताल होने के बावजूद यहां आईसीयू, आईसीसीयू, सीटी स्कैन, पोस्टमार्टम की सुविधा तो बहुत दूर, बल्कि अस्पताल में स्किन और वीडी ओपीडी भी नहीं है। इस अस्पताल में एडमिट कुछ मरीजों से बात करने पर उन्होंने बताया कि अस्पताल में जांच सुविधाओं की कमी है और अस्पताल में भीड़ इतनी है कि रिपोर्ट मिलने में ही लंबा समय लग जाता है। गंभीर केस को प्राथमिक उपचार देकर बेस अस्पताल अल्मोड़ा अथवा सुशीला तिवारी अस्पताल हल्द्वानी भेज दिया जाता है। कई बार रैफर की वजह से अस्पताल पहुंचने से पहले ही व्यक्ति की मौत हो जाती है। इसके अलावा अस्पताल प्रशासन के मुताबिक कोविड-19 के चलते इस अस्पताल की 108 सुविधा लंबे समय से बेस अस्पताल अल्मोड़ा को प्रदान की गई है जिसके कारण रैफर करने में समस्याएं हैं। लोगों को निजी वाहन के जरिए मरीज को ले जाना पड़ता है।

अल्मोड़ा स्थित जिला महिला अस्पताल की स्थितियां भी दिन-प्रतिदिन बदतर ही होती जा रही हैं आए दिन सामान्य डिलीवरी के बाद भी महिलाओं की मृत्यु हो रही है जो एक गंभीर और चिंता का विषय बन रहा है। महिला अस्पताल में इन दिनों डाॅक्टर्स की कमी है। संविदा के तहत कार्यरत दो डाॅक्टर्स का कार्यकाल समाप्त होने के बाद सीएमएस समेत केवल दो ही डाॅक्टर्स शेष हैं। प्रशासनिक कार्यों की वजह से कई बार प्रसव और ओपीडी दोनों ही एकमात्र डाॅक्टर के भरोसे चल रहे हैं। अस्पताल मं जांच के लिए पहुंची गर्भवती महिलाओं ने बताया कि वो जांच के लिए प्रातः 10 बजे से लाइन पर हैं, डाॅक्टर्स की कमी के चलते दो घंटों के बाद भी उनका नंबर नहीं आया। जिला महिला अस्पताल में डिलीवरी के दौरान गर्भवती महिलाओं की मृत्यु की संख्या लगातार बढ़ रही है। हाल में ही सोमेश्वर तहसील की निवासी दुर्गा (25) को प्रसव पीड़ा के चलते सोमेश्वर अस्पताल से जिला महिला अस्पताल के लिए रेफर किया गया था। जिला महिला अस्पताल में नाॅर्मल डिलीवरी के जरिए एक स्वस्थ बच्ची को जन्म देने के आधे घंटे पश्चात दुर्गा की मृत्यु हो गई। डाॅक्टर्स का कहना है कि जन्म देने के बाद महिला की स्थिति बिगड़ गई थी जिस कारण मृत्यु हुई। दुर्गा ही नहीं ऐसी बहुत सी महिलाएं हैं जिन्होंने जिला महिला अस्पताल में नाॅर्मल डिलीवरी के पश्चात अपनी जान गंवा दी। कुछ माह पूर्व ही एक गर्भवती महिला की नाॅर्मल डिलीवरी के बाद मृत्यु हुई और तब अस्पताल में सिवाय एक नर्स के और कोई मौजूद नहीं था। इसके पश्चात अस्पताल ने अपनी सफाई में महिला की मौत का कारण हाई ब्लड प्रेशर बता दिया। कई महिलाओं की मौत तब हुई जब उन्हें अस्पताल लाया जा रहा था या एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल रैफर किया जा रहा था। ग्रामीण महिलाओं के पास प्रसव पीड़ा के बेहद भयानक अनुभव रहे हैं। और इन अनुभवों के लिए वो सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं की कमी को ही नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्थाओं को दोषी मानती हैं। भैसियाछाना ब्लाॅक की एक निवासी कमला बताती हैं कि गांव में सड़क न होने के कारण उन्हें सड़क तक पहुंचने में काफी परेशानियां उठानी पड़ी और इसके बावजूद 108 या एम्बुलेंस की कोई सुविधा उन्हें समय पर नहीं मिल पाई जिस कारण उनकी जान पर भी बन आई थी। गांवों में लगभग हर दूसरी या तीसरी महिला के पास आज के इस आधुनिक युग में भी ऐसे किस्से हैं जो सोचने पर विवश कर ही देते हैं। कई महिलाएं ऐसी भी हैं जिन्हें प्रसव पीड़ा के दौरान लगातार अगले अस्पतालों में रैफर किया गया और अंततः वाहनों में उन्होंने बच्चों को जन्म दिया।

जिला महिला अस्पताल के प्रशासन से बात करने के दौरान उन्होंने बताया कि अस्पताल में पैथोलाॅजी और एक्स-रे की सुविधा भी नहीं है इसके लिए महिलाओं को जिला पुरुष अस्पताल जाना होता है। अस्पताल में लैप्र्रोस्कोपिक एब्डाॅमिनल ट्यूबेक्टमी और नाॅन स्कैल्पल वासेक्टमी भी उपलब्ध नहीं है। परिवार नियोजन के तहत अस्पताल में केवल महिलाओं की नसबंदी की जाती है। कोविड-19 के चलते अस्पताल में एचआईवी जांच को 15 महीने तक बंद रखा गया था जो सबसे चैंकाने वाली बात है और लोगों के मन में एक डर पैदा कर रही है। अस्पताल में आई हुई महिलाओं और परिवारों का कहना है कि अस्पताल की व्यवस्थाएं दुरुस्त करने के साथ-साथ गांवों और घरों में सड़कों की सुविधा बेहद जरूरी है शासन-प्रशासन को इस पर कार्य करने की सख्त जरूरत है। ताकि गर्भवती महिलाएं बेमौत न मारी जाएं।

अल्मोड़ा जिला महिला अस्पताल की स्थितियां दिन-प्रतिदिन बदतर होती जा रही हैं। आए दिन सामान्य डिलीवरी के बाद भी महिलाओं की मृत्यु हो रही है जो एक गंभीर चिंता का विषय बन रहा है। महिला अस्पताल में डाॅक्टर्स की कमी है। संविदा के तहत कार्यरत दो डाॅक्टर्स का कार्यकाल समाप्त होने के बाद सीएमएस समेत केवल दो ही डाॅक्टर्स शेष हैं। प्रशासनिक कार्यों की वजह से कई बार प्रसव और ओपीडी दोनों ही एकमात्र डाॅक्टर के भरोसे चलते हैं। कई गर्भवती महिलाओं ने बताया कि वो जांच के लिए प्रातः 10 बजे से लाइन पर हैं, पर डाॅक्टर्स के अभाव में दो घंटों के बाद भी उनका नंबर नहीं आया। जिला महिला अस्पताल में डिलीवरी के दौरान गर्भवती महिलाओं की मृत्यु की संख्या लगातार बढ़ रही है। हाल ही में सोमेश्वर तहसील की निवासी दुर्गा (25) को प्रसव पीड़ा के चलते सोमेश्वर अस्पताल से जिला महिला अस्पताल के लिए रेफर किया गया था। जिला महिला अस्पताल में नाॅर्मल डिलीवरी के जरिए एक स्वस्थ बच्ची को जन्म देने के आधा घंटे बाद दुर्गा की मृत्यु हो गई थी

बेस अस्पताल अल्मोड़ा की स्थितियां भी दयनीय हैं। अस्पताल में डाॅक्टर्स के कुल 32 पद स्वीकृत हैं जिनमें से 18 पद रिक्त हैं और कार्यरत केवल 17 पद हैं। बेस अस्पताल में मेडिकल काॅलेज बन चुका है जिसके माध्यम से अस्पताल में सुविधाएं बढ़ने की उम्मीद है, परंतु मेडिकल काॅलेज की भर्तियां भी सरकार ने चालाकी से ठेकेदारों के हाथों में दे दी जिसके कारण उत्तराखण्ड के योग्य युवाओं को वंचित रखा गया। बेस अस्पताल में शौचालयों की स्थिति बेहद बुरी है। अस्पताल में जो नए भवन बनाए गए हैं, उनमें तो शौचालय स्वच्छ रखे गए हैं, परंतु जो पुरानी बिल्डिंग हैं अर्थात् जनरल वार्ड, जहां मरीज भर्ती रहते हैं वहां शौचालयों में खासकर महिला प्रसाधन में न सफाई की गई है और न ही पानी की कोई उचित व्यवस्था है। जिस कारण भर्ती मरीज और तीमारदार परेशान रहते हैं। अस्पताल में भर्ती एक महिला ने बताया कि अस्पताल में शौचालय का प्रयोग करने से उसे यूरिन इंफेक्शन हो गया, क्योंकि वहां न सफाई थी और न ही पानी की व्यवस्था। अस्पताल प्रशासन ने इस बारे में बात करते हुए कहा कि अस्पताल में सफाई कर्मी ठेके पर रखे गए हैं जिनकी कुल संख्या 18 है। उनका मानदेय बहुत कम है। इस वजह से सफाई नहीं हो पा रही है। बेस अस्पताल में सीटी स्कैन की मशीन लगभग 12 सालों से उपलब्ध होने के बावजूद आज तक एक बार भी प्रयोग नहीं की गई है जिसका कारण यह है कि सीटी स्कैन के लिए कोई टेक्नीशियन नियुक्त नहीं किया गया। यही हाल मेमोग्राफी का भी है। मशीन उपलब्ध है, परंतु कोई टेक्नीशियन नहीं है। जिस वजह से जांच नहीं हो पाती है और मरीजों को कई बार रेफर करना पड़ता है। अस्पताल में कार्डियोलाॅजी, न्यूरोलाॅजी, प्लास्टिक सर्जरी उपलब्ध नहीं है परंतु अन्य कई जांचें और कुछ रैपिड टेस्ट उपलब्ध हैं। बेस अस्पताल में बाल चिकित्सा ओपीडी, साइकिएट्रिक ओपीडी और स्किन स्पेशलिस्ट और गायनेकोलाॅजिस्ट भी उपलब्ध नहीं हैं। अस्पताल में आईसीयू है, परंतु आईसीसीयू उपलब्ध नहीं है। अस्पताल में राष्ट्रीय कार्यक्रमों को लागू कर मरीजों और रोगियों को लाभ प्रदान किए जा रहे हैं। मेडिको लीगल सुविधा पुलिस केस, दुर्घटना के केस और प्राइवेट केस के लिए उपलब्ध है। अस्पताल में डायलिसिस की मशीन आ चुकी है जो वर्तमान में सप्ताह में दो दिन बुधवार और शनिवार को प्रयोग की जाती है। थायराॅयड जांच की मशीन मेडिकल काॅलेज के माध्यम से अस्पताल में आ गई है जो शीघ्र ही प्रयोग में लाई जाएगी। इसके अलावा हार्मोनल टेस्ट मशीन भी प्रयोग में है। अस्पताल में कोविड-19 के दौरान वेंटिलेटर लाए तो गए हैं, परंतु उनका कुछ खास लाभ लोगों को मिला नहीं।

अस्पताल प्रशासन ने बताया कि महिला विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हैं जिसके कारण समस्याएं उपलब्ध हो रही हैं। विशेषज्ञों की कमी का कारण सरकार की लापरवाही के साथ-साथ भी यह भी बताया गया कि विशेषज्ञ योग्यता के आधार पर शीघ्र ही प्रशासनिक अधिकारी के पदों पर नियुक्त कर दिए जाते हैं जिस कारण डाॅक्टर्स की कमी बनी रहती है। अस्पताल में 108 और एम्बुलेंस सुविधाओं की कमी है जिसमें सुधार की आवश्यकता है। अस्पताल के कुछ कर्मचारियों ने बताया कि कागजों के हिसाब से अगर सुविधाएं लागू हो जाएं तो कई जानें तो आसानी से बच जाएंगी। बेस अस्पताल में भर्ती एक घायल महिला का सुझाव है कि प्रत्येक गांव-घर तक सड़क हो और प्रत्येक ग्राम पंचायत को सरकार एक एम्बुलेंस उपलब्ध कराए ताकि घायल व्यक्ति, मरीज और गर्भवती महिलाएं इस तरह बेवजह मौत के शिकार न बनें।

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