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Uttarakhand

स्वास्थ्य मंत्रालय के नाकाम मुखिया

उत्तराखण्ड का स्वास्थ्य विभाग अपनी नाकामी और भ्रष्टाचार को लेकर शुरू से ही चर्चाओं में रहा है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इस विभाग का दायित्व खुद अपने हाथों में रखा तो लोगों को आस जगी कि अब इसके हालात सुट्टारेंगे, लेकिन हुआ एकदम उलट। मुख्यमंत्री विभाग का दायित्व संभालने में बुरी तरह नाकामयाब साबित हुए। नतीजा यह है कि डेंगू ने देहरादून से लेकर पर्वतीय क्षेत्रों में दहशत फैला दी। अस्पतालों में डाॅक्टरों, स्टाफ और स्वास्थ्य सुविट्टााओं की कमी विकराल रूप ट्टाारण कर चुकी है। सर्दियों के सीजन में स्वाइन फ्लू की आशंका अलग से डरा रही है। इसके बावजूद मुख्यमंत्री के गैरजिम्मेदाराना बयान राज्य के लोगों की चिंता बढ़ा रहे हैं

 

उत्तराखण्ड के राजनीतिक इतिहास में स्वास्थ्य विभाग हमेशा चर्चाओं में रहा है। राज्य बनने के बाद भ्रष्टाचार और अनियमिताओं के साथ-साथ चहेतों के लिए नियम कानूनांे को ताक पर रखने वाला स्वास्थ्य विभाग अक्सर विवादों में रहा है। टैक्सी बिल घोटाला, दावा घोटाला और अस्पतालों के निर्माण में भी भ्रष्टाचार के मामले सामने आते रहे हंै। इसके अलावा चिकित्सा सुविधाओं की भारी कमी एवं स्टाफ के सैकड़ों रिक्त पदांे के साथ-साथ अधिकारियों की काहिलता के चलते चिकित्सकीय उपकरणों और एम्बुलेंसों की बर्बादी भी स्वास्थ्य विभाग के खाते में दर्ज हो चुकी है। भ्रष्टाचार स्वास्थ्य विभाग में अपनी गहरी पैठ बना चुका है, तो राजनीतिक बरदहस्त भी इस विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों को मिलता रहा है। एक स्वास्थ्य महानिदेशक के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले स्पष्ट होने के बावजूद तब तक कोई कार्यवाही नहीं हो पाई, जब तक कि वह सेवानिवृत न हो गया। हालांकि सेवानिवृति के बाद कार्यवाही के नाम पर ढोंग जरूर किया गया, लेकिन उक्त अधिकारी को सजा मिलना अभी दूर की कौड़ी ही समझी जा रही है।

यह भी गौर करने वाली बात है कि राज्य बनने के बाद स्वास्थ्य विभाग किसी न किसी मंत्री के पास रहा है। भाजपा की निंशक सरकार के समय जरूर तत्कलीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्रालय तथा चिकित्सा शिक्षा विभाग अपने पास ही रखा था। इसका कारण यह माना जाता है कि खण्डूड़ी सरकार के समय में निशंक के पास स्वास्थ्य मंत्रालय का जिम्मा था जिसके चलते मुख्यमंत्री बनने के बाद निशंक ने अपने पास दोनांे मंत्रालय रखे थे। कांग्रेस की विजय बहुगुणा और हरीश रावत सरकार के समय में भी स्वास्थ्य विभाग स्वतंत्र मंत्री के जिम्मे था। लेकिन वर्तमान भाजपा की त्रिवेंद्र रावत सरकार के समय स्वास्थ्य मंत्रालय स्वयं मुख्यमंत्री ने अपने पास रखा हुआ है।

मुख्यमंत्री जिस विभाग के विभागाध्यक्ष मंत्री हों, उस विभाग को तो सबसे बेहतर काम करने वाला विभाग माना जाना चाहिए। लेकिन हो इसके उलट रहा है। आज सबसे नाकारा अगर किसी विभाग को माना जा रहा है तो वह स्वास्थ्य विभाग ही है। विगत ढाई वर्ष से स्वास्थ्य विभाग हर मोर्चे पर फेल रहा है। यहां तक कि बीमारियों के सीजन में भी स्वास्थ्य विभाग कागजों और बैठकांे से कुछ ज्यादा नहीं कर पाया है।

डेंगू ने खोली पोल: विगत एक माह से भी अधिक समय से प्रदेश में डेंगू जैसी बीमारी का प्रकोप फैला हुआ है। स्वयं विभाग द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में डेंगू के मरीजांे की संख्या अब तक 3016 हो चुकी है। इसमें सबसे ज्यादा 1866 मरीज तो सिर्फ देहरादून में ही हैं। ऐसा नहीं है कि देहरादून में पहली बार डेंगू के मामले सामने आए हों। लगातार तीन वर्ष से डेंगू का मच्छर यहां घर बना चुका है। पिछले वर्ष भी देहरादून के एक ही क्षेत्र में एक साथ सैकड़ों लोगों को डंेगू हुआ था तब भी स्वास्थ्य विभाग गहरी नींद में ही सोया हुआ था। इस बार भी ऐसा ही देखने को मिला है जिसके चलते देहरादून में डेंगू के मामलों में बड़ी तेजी देखने का मिली है।


पूर्व में गंभीर बीमारियों के सीजन में मार्च माह से ही रोकथाम के लिए प्रयास किए जाते थे, लेकिन इस बार ऐसे प्रयास देखने को नहीं मिले। हालांकि विभाग द्वारा यह बताया जाता रहा है कि मार्च से ही विभाग द्वारा नगर में मच्छरांे के नियंत्रण के लिए दवा का छिड़काव और जन जागरूकता अभियान की शुरुआत कर दी गई थी। लेकिन जिस तरह से देहरादून में ही 18 सौ से भी अधिक लोगों को डेंगू हो चुका हैे उससे स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर साफ तौर पर सवाल खड़े होते हैं ओैर यह साफ हो गया है कि कागजों ओैर बैठकों तक ही डेंगू पर नियंत्रण किया जाता रहा है।

स्वास्थ्य विभाग की नाकामी के चलते आज डेंगू से पूरे प्रदेश में हाहाकार मचा हुआ है। कोई भी ऐसा स्थान नहीं है जहां डेंगू ने अपनी दस्तक न दी हो। यहां तक कि पर्वतीय क्षेत्रों में भी डेंगू का विस्तार हो चुका है। रुद्रप्रयाग, चमोली और उत्तरकाशी जिलांे में भी डेंगू के मामले सुनाई देने लगे हैं। कुमाऊं के नैनीताल, ऊधमसिंह नगर और अब तो पर्वतीय क्षेत्रों के जिलों में भी डेंगू के मामले सामने आने लगे हैं।

प्रदेश में 102 पुलिसकर्मियों तक को डंेगू हो चुका है। ऋषिकेश कोतवाली के हालात तो सबसे बुरे हंै। यहां 5 दरोगा और 18 सिपाहियों को डेंगू होने की पुष्टि हो चुकी है। देहरादून में भी यही हालात हैं। सचिवालय, विधानसभा और सरकारी अस्पतालों स्टाफ को भी डेंगू होने की पुष्टि हो चुकी है। यानी जिनके कांधांे पर डेंगू से निपटने का जिम्मा है वही अब इस बीमारी की चपेट में आ चुके हैं।

स्वास्थ्य विभाग औेर सरकार डेंगू के मामलों में केवल आंकड़ेबाजी करती दिखाई दे रही है। पहले तो स्वास्थ्य विभाग देहरादून के डेंगू मामलों को ही प्रदेश भर के मामलों से जोड़कर महज 14 सौ डेंगू के मरीजांे की संख्या बताता रहा। लेकिन जब अन्य सरकारी अस्पतालों के आंकड़े सामने आए तो ज्ञात हुआ कि राज्य में 3 हजार से अधिक डेंगू मरीजों की संख्या पहुंच चुकी है। इसी तरह डंेगू सेे हो रही मौतांे पर भी स्थिति सही नहीं बताई जा रही है। विभाग आज भी महज 5 मौतें बताकर मामले को बेहद हल्के में ले रहा है, जबकि डंेगू से हुई मौतों की संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है। पिछले सप्ताह भी यह चर्चा थी कि डेंगू से 8 मरीजों की मौत हुई है लेकिन विभाग महज तीन मोैतों की बात कहता रहा है।

नीति पर नहीं फोकसः विगत ढाई सालों में मुख्यमंत्री का यह विभाग पूरी तरह से नकाम ही साबित हुआ है। ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ मौेजूदा सरकार के समय में ही स्वास्थ्य विभाग पर ध्यान नहीं दिया गया हो, पूर्ववर्ती सरकारों के समय में भी यह विभाग चहेतों और खास लोगों के लिए एक सबसे बड़ा माध्यम बना रहा। स्वास्थ्य महानिदेशक पद पर स्थानांतरण की राजनीति शुरू से ही प्रदेश में हावी रही है। एक माह से भी कम समय मंे महानिदेशक का स्थानांतरण होता रहा है। इसकी बानगी आंकड़े से समझी जा सकती है। डाॅ आरके पंत वर्ष 2013 में महज 8 दिनों तक ही महानिदेशक के पद पर रहे। इसके बाद डाॅ वाईसी शर्मा महानिदेशक बने तो उनको भी महज 6 माह में चलता कर दिया गया। शर्मा के बाद डाॅ जीएस जोशी महानिदेशक बने तो उनको भी तीन माह में हटा दिया गया।

इसी तरह से डाॅ जीएस पंागती 4 माह, डाॅ जीएस जोशी फिर से डीजी बने तो भी महज 3 माह तक ही दोबारा इस पर रह पाए। डाॅ आरपी भट्ट 8 माह, डाॅ कुसुम नरियाल 11 माह, डाॅ डीएस 7 माह, डाॅ अर्चना श्रीवास्तव 10 माह, डाॅ टीसी पंत 8 माह, डाॅ रबिन्द्र थपलियाल कुल 5 माह ही स्वास्थ्य महानिदेशक के पद पर रहे हैं। जनवरी 2013 से लेकर जुलाई 2019 के महज छह वर्षों में 11 स्वास्थ्य महानिदेशक स्वास्थ्य विभाग को मिले हैं जिसमें सबसे लंबा रिकाॅर्ड कार्यकाल डाॅ कुसुम नरियाल का ही रहा है जो इस पद पर 11 माह तक रही। वर्तमान सरकार के महज ढाई साल के कार्यकाल में 5 स्वास्थ्य महानिदेशकों के स्थानांतरण हो चुके हैं।

इस तरह लगातार एक के बाद एक महानिदेशकांे के स्थानांतरण होने से विभाग की नीतियों और योजनाओं के क्रियान्वयन पर बुरा असर पड़ता रहा है। चिकित्सकों की कमी को पूरा करने के लिए न तो किसी डीजी के पास कोई समय था और न ही स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने के लिए सरकार के पास योजना रही। अगर कोई काम हुआ भी तो डीजी बदल दिए गए जिससे सब काम ठप्प होते चले गए।

महानिदेशकों के स्थानांतरण से राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं के हालात किस तरह बदतर होते हैं, यह एम्बुलेंसों के मामले में भी देखने को मिला है। करोड़ांे की एम्बुलेंस विभाग में खड़े-खड़े जंक खा चुकी हैं, लेकिन इस पर अभी तक कोई ठोस योजना नहीं बनी, जबकि दावे जल्द ही इन एम्बुलेेंसों को सड़कांे पर उतारने के होते रहे हैं। विभागीय सूत्रों की मानें तो इसके पीछे स्वास्थ महानिदेशकांे का स्थानांतरण सबसे बड़ा कारण रहा है।

घोषणाओं पर काम नहीं: मुख्यमंत्री द्वारा राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने के लिए तमाम तरह की घोषणाएं की गई हंै। लेकिन इनमें कोई ठोस प्रगति होती दिखाई नहीं दी है। प्रदेश के कई जिला अस्पतालों को पीपीपी मोड में देने के लिए सरकार ने त्वरित निर्णय लिए, लेकिन इन अस्पतालों की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है। नई टिहरी के जिला अस्पताल को हिमालयन हाॅस्पिटल जौली ग्रांट को पीपीपी मोड में देने का निर्णय सरकार ने लिया, लेकिन आज भी यह अस्पताल उसी हालात में है जैसा कि सरकारी नियंत्रण में कभी था।

टिहरी के प्रताप नगर में दस स्कूली बच्चांे की वाहन दुर्घटना के समय जिला अस्पताल की पूरी हकीकत सामने आ गई जब घायल मासूम बच्चों का उपचार तक जिला अस्पताल में नहीं हो पाया और घायलों को रेफर करना पड़ा। जिसके चलते ऋषिकेश के एम्स में उनका इलाज करना पड़ा। दो बच्चांे की मौत समय पर इलाज न मिलने से हुई।

गौर करने वाली बात यह है कि डोईवाला के संयुक्त चिकित्सालय को भी हिमालय अस्पताल को पीपीपी मोड पर देने के लिए मौजूदा सरकार ने आदेश जारी करवा दिया, जबकि पूर्व में हरीश रावत सरकार द्वारा लिए गए निर्णय का विरोध स्वयं त्रिवेंद्र रावत कर रहे थे। जैेसे ही त्रिवेंद्र मुख्यमंत्री बने तो सचिवालय में लंबित फाइल पर तत्काल ही पंख लगे और बड़ी तेजी से डोईवाला अस्पताल को हिमालयन अस्पताल के नियंत्रण में देने का काम आरंभ हुआ। जबकि इसका डोईवाला क्षेत्र में भारी विरोध तक हुआ, लेकिन मुख्यमंत्री की इच्छा को ही सर्वोपरि माना गया।

आज हालात यहां तक हो चले हैं कि पर्वतीय क्षेत्र मंे अल्मोड़ा के एक मात्र हार्ट सेंटर को सरकार चला नहीं पाई और अब यह हार्ट सेंटर बंद हो चुका है। बाताया जाता हैे कि सरकार अब इस हार्ट सेंटर के लिए धन नहीं देना चाहती। चर्चा है कि अब किसी बड़े स्वास्थ्य संस्थान को इस हार्ट सेंटर को दिए जाने की गुपचुप तैयारी हो रही है। जिस तरह से कोरोनेशन अस्पताल के एक हिस्से को फोर्टिस अस्पताल को दिया गया है उसी तरह से अब अल्मोड़ा हार्ट सेंटर को भी दिया जा सकता है।

मुख्यमंत्री ने विगत वर्ष राज्य में टेली पैथोलाॅजी योजना को लागू करने की घोषणा की थी, लेकिन आज तक इस योजना पर कार्य आरंभ नहीं हो पाया है। इसके लिए विदेश से विशेषज्ञों के साथ बैठक भी हो चुकी है, लेकिन अभी तक इसमें कोई प्रगति नहीं हुई है। माना जा रहा हैे कि राज्य के खास तौर पर पर्वतीय क्षेत्रों के लिए टेली पैथोलाॅजी योजना एक बरदान साबित हो सकती है। जहां मरीजों के लिए जांच की सुविधा नहीं है उन क्षेत्रांे में कम से कम मरीज को जांच के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। साथ ही जांच रिपोर्ट के लिए भी चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। लेकिन मुख्यमंत्री की बड़ी योजना की घोषणा एक साल से ही आरंभ नहीं हो पाई हो तो समझा जा सकता है कि अन्य स्वास्थ्य संबंधी घोषणाओं ओैर योजनाओं के क्या हाल होंगे?

सरकार के दावों और बयानों की हकीकत भी डंेगू के मामले मंे सामने आ चुकी है। डंेगू के हाहाकार को देखते हुए सरकार ने निजी पैथोलाॅजी केंद्रों पर डंेगू की जांच 500 रुपए में करवाने की बात कही, लेकिन अगले ही दिन प्राइवेट जांच लैब ने सरकार को साफ मना कर दिया कि वे कम से कम 800 रुपए प्रति जांच से कम नहीं कर सकते, जबकि सरकार ने इसे बहुत प्रचार किया और डेंगू के मरीजांे को राहत देने वाला कदम बताया।

स्वास्थ्य सेवाओं का आलम यह है कि राज्य में प्राइवेट अस्पतालों मंे लूट-खसोट रोकने के लिए सरकार द्वारा क्लीनिकल ऐस्टेेब्लिस एक्ट बनाया हुआ है लेकिन आज तक राज्य में इस कानून को लागू करने की हिम्मत सरकार नहीं कर पाई है। जबकि दो वर्ष से सरकार द्वारा कहा जा रहा है कि जल्द ही राज्य में क्लीनिकल ऐस्टेेब्लिस एक्ट मिलेगा।

दून अस्पताल के बदतर होते हालात: राज्य बनने से पूर्व दून अस्पताल देहरादून सहित कई क्षेत्रों का एक मात्र सहारा था। लेकिन जैसे ही कांग्रेस सरकार ने इस अस्पताल को दून मेडिकल काॅलेज बनाया तब से इसके बुरे दिन आरंभ हो गए। आज सबसे ज्यादा बुरी स्थिति में अगर कोई अस्पताल हैे तो यह दून अस्पताल ही है। मरीजांे को संभालने में इस मेडिकल काॅलेज के हाथ-पांव फूल जाते हैं। जांच में गड़बड़ी, रोक के बावजूद बाहर की दवाइयां लिखना, यहां तक कि बच्चा चोरी की घटनाएं और अस्पताल के बाथरूम में बच्चे के प्रसव की घटनाएं इस अस्पताल में हो चुकी हैं।

हैरानी की बात यह है कि इस अस्पताल में हमेशा से ही जांच के लिए रखे गए उपकरण खराब हो जाते हैं। रेडियोलाॅजी विभाग की अल्ट्रासांउड मशीन, सिटी स्कैन मशीन और ईएमआरआई मशीन कई-कई महीनों तक खराब रहती है। स्वास्थ्य विभाग ने इस कमी को दूर करने के लिए पीपीपी मोड का पैटर्न बनाया है औेर जल्द ही दून अस्पताल के अलावा अन्य अस्पतालों में यह सेवाएं पीपीपी मोड पर चलाए जाने के आदेश जारी कर दिए गए हंै। देहरादून के दून अस्पताल का आईसीयू वार्ड भी पीक सीजन में बंद करना पड़ा है। वार्ड में पानी घुसने ओैर कंरट दौड़ने के चलते ऐसा करना पड़ा। यह हाल तब है जब देहरादून में सरकार पूरे लाव-लश्कर के साथ बैठती है। इससे समझा जा सकता है कि राज्य के अन्य अस्पतालों के हालात क्या होंगे?

चिकित्सकों के हजारों पद खाली: सूचना के अधिकार से मिली जानकारी के आंकड़ांे को देखंे तो वास्तव में सरकार स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के प्रति कतई गंभीर नहीं दिखाई दे रही है। आज सैकड़ों चिकित्सकों के पद रिक्त चल रहे हंै जिसके चलते स्वास्थ्य सेवाओं पर बुरा असर पड़ रहा है।

विभागीय आंकड़ों को देखें तो उत्तराखण्ड के सरकारी अस्पतालों में केवल ऐलोपैथिक चिकित्सकों के 1459 पद रिक्त चल रहे हैं, जबकि कुल 2735 चिकित्सकों के पद स्वीकृत हैं। महज 1276 पदों पर चिकित्सक कार्यरत हैं। इसमें भी महज 1044 चिकित्सक ही नियमित यानी सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं और 926 चिकित्सक संविदा पर काम कर रहे हैं।

इसी तरह से सर्जन के 134 पद स्वीकøत हैं, लेकिन सिर्फ 35 पदों पर ही चिकित्सक कार्यरत हैं, जबकि 99 रिक्त पड़े हैं। इसके अलावा फिजीशियन के 131 पद स्वीकøत हैं जिसमें 29 पदों पर चिकित्सक तैनात किया जा सके हैं, जबकि 102 पद रिक्त हैं।

आॅथोपैडिक्स के 101 पद हैं जिनमें महज 40 पर ही डाॅक्टर कार्यरत हैं और 61 पद रिक्त चल रहे हैं। नेत्र सर्जन के 75 पदांे में से 32 रिक्त हंै। इसी तरह एनेस्थिैटिक के 146 पदों में से महज 53 कार्यरत हैं, जबकि 93 पद रिक्त बताए जा रहे हैं। रेडियोलाॅजिस्ट के 137 पदों में केवल 37 पर की डाॅक्टर कार्यरत हैं और 100 पद रिक्त चल रहे हंै। पैथोलाॅजिस्ट के 74 पदांे में से 46 रिक्त हंै तो ईएनटी विभाग के 48 पदों में से कुल 29 रिक्त हैं। बाल रोग विशेषज्ञ के 140 मंे से सिर्फ 60 पदांे पर डाॅक्टर कार्यरत हैं, जबकि 80 पद रिक्त हैं।

गाईनोलाॅजिस्ट के 171 पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें महज 48 पद पर ही डाॅक्टर कार्यरत हैं, जबकि 123 पद रिक्त चल रहे हंै। इसी तरह से कार्डियोलाॅजिस्ट के 42 मंे से केवल दो पद ही कार्यरत हंै ओैर 40 पद रिक्त हंै। यही हाल चर्मरोग विशेषज्ञों के पदों पर भी देखने को मिल रहा है। इसमें 35 पद स्वीकृत हंै, लेकिन सिर्फ 5 डाॅक्टर कार्यरत हैं, जबकि 30 पर रिक्त बताए जा रहे हंै। न्यूरो सर्जन के 4 में से 2 पद रिक्त हैं तो प्लास्टिक सर्जन के 3 पद स्वीकøत हंै, लेकिन तीनों ही पद रिक्त चल रहे हैं। इसी प्रकार यूरोलाॅजिस्ट के 3 पद स्वीकøत हैं जिसमें तीनों ही रिक्त चल रहंे हंै। यही हाल मनोरोग विशषज्ञ के पद पर भी है जिसमें से 6 पद स्वीकृत हैं लेकिन 4 पद रिक्त हंै।

गौर करने वाली बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग ने सूचना के अधिकार में यह जानकारी केवल राजकीय ऐलोपैथिक चिकिसकों के बारे में ही दी है, जबकि राज्य में आयुर्वेदिक, यूनानी तथा होम्योपैथिक के भी कई पद हंै जो कि रिक्त चल रहे हैं। उसकी जानकारी अभी स्वास्थ्य विभाग से प्राप्त नहीं हुई है। इससे समझा जा सकता है कि मुख्यमंत्री स्वास्थ्य विभाग को संभालने में पूरी तरह से नाकाम रहे हैं।

बयानों में नहीं संजीदगी: राज्य में डेंगू के मरीजांे की बढ़ती तादाद के बावजूद मुख्यमंत्री ने अभी तक कोई आपात तो क्या सामान्य बैठक तक नहीं की है। इससे भी बड़ा आश्चर्य यह है कि मुसीबत की घड़ी में मुख्यमंत्री सरकार पर डेंगू की रोकथाम न करने के आरोप लगाने वाली कांग्रेस पर मजाकिया बयान देने में पीछे नहीं रहे।

मुख्यमंत्री ने कांग्रेस के आरोपों के जबाब में कहा किआरोप लगाने का क्या है, वे भी आरोप लगा सकते हैं कि कांग्रेस ने एक षड्यंत्र के तहत राज्य में डेंगू के मच्छर छोड़े हैं। मुख्यमंत्री के इस बयान से सभी हक्के-बक्के रह गए।

इसके अलावा मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार के घर में डेंगू का मच्छर पैदा नहीं होता, जबकि स्वयं सरकार के सबसे बड़े घर सचिवालय जहां सरकार अपने सभी अंगों के साथ बैठती है, के कई कर्मचारियों को डेंगू हो चुका है। सचिवालय में भी डेंगू मच्छर का लार्वा मिल चुका है। इसी तरह से विधानसभा और अन्य सरकारी विभागों में भी डेंगू के मामले सामने आ चुके हैं। राज्य की कानून व्यवस्था संभालने वाला पुलिस विभाग भी डेंगू की चपेट में आ चुका है। अभी तक राज्य के 102 पुलिसकर्मियों को डेंगू होने की पुष्टि हो चुकी है। जिसमें कई विभाग के उच्चाधिकारी तक शमिल हैं। सबसे बुरे हालात तो ऋषिकेश कोतवाली के हैं जहां 5 दारोगा के साथ-साथ 18 सिपाही डेंगू से पीड़ित बताए जा रहे हैं।

जानकारों के मुताबिक अब आने वाले समय में प्रदेश को स्वाइन फ्लू से भी जूझना पड़ सकता है। राज्य में पहले ही स्वाइन फ्लू अपना कहर दिखा चुका है। सर्दी के सीजन में प्रदेश में स्वाइन फ्लू के मामले सामने आ चुके हैं। पिछले वर्ष 548 मामले सामने आए थे। जिसमें 519 अकेले देहरादून में थे। हरिद्वार में 26 मामले थे। इसमें 38 लोगों की मौत हुई है। इससे पूर्व 2017 में कर्णपय्राग के विधायक की भी स्वाइन फ्लू से मौत हुई थी। गौर करने वाली बात यह हेै कि विधायक की मोैत के बाद ही उनकी जांच रिपोर्ट आई जिसमें स्वाइन फ्लू से मौत होने की पुष्टि हुई थी। अब देखना यह है कि आने वाले समय में राज्य का स्वास्थ्य विभाग स्वाइन फ्लू से कैेसे निपटता है और कैसे विभागीय मंत्री जो कि मुख्यमंत्री ही हैं, अपने विभाग को आने वाले खतरे से निपटने के लिए तैयार करते हैं। डेंगू के मामले में तो राज्य का स्वास्थ्य विभाग और विभागीय मंत्री पूरी तरह से नाकाम ही साबित हुए हैं।

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