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भाजपा के सारे नेता और आनुसंगिक संगठन पार्टी प्रत्याशी को जितवाने में जुटे रहे। दूसरी ओर नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश कांग्रेस के लिए अकेले जूझती रहीं। पार्टी के अंदरूनी मतभेद सुमितहृदयेश की हार का कारण बने

देहरादून के बाद प्रदेश में दूसरे बड़े नगर निगम हल्द्वानी की प्रतिष्ठापूर्ण लड़ाई में कांग्रेस के सुमित हृदयेश भारतीय जनता पार्टी के जोगेंद्र रौतेला से पराजित हो गए। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष डॉ इंदिरा हृदयेश के लिए ये प्रतिष्ठा का चुनाव था क्योंकि यहां पर उनके पुत्र सुमित हृदयेश चुनाव मैदान में थे। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक सुमित की हार को इंदिरा हृदयेश की प्रतिष्ठा से जोड़कर अवश्य देखा जा रहा है, लेकिन जिस तरह से निगम का नया परिसीमन हुआ उससे यही नतीजे आने की संभावना थी। दरअसल, 25 वार्डों वाला नगर निगम इस बार विस्तारित होकर 60 वार्डों का हो गया है। इन बड़े 35 वार्डों में भारतीय जनता पार्टी का जनाधार अच्छा माना जाता है। इस लिहाज से अगर जीत को देखा जाए तो दस हजार का अंतर भारतीय जनता पार्टी के लिए सिर्फ सुकून देने वाला ही रहा। फिर भी हल्द्वानी नगर निगम के परिणाम जहां कांग्रेस खासकर डॉ इंदिरा हृदयेश के लिए निराशाजनक रहे क्योंकि हल्द्वानी में कांग्रेस की राजनीति उन्हीं के ईद-गिर्द ही घूमती है, वहीं भारतीय जनता पार्टी एवं पूर्व में कांग्रेसी रहे वर्तमान सरकार के परिवहन एवं समाज कल्याण मंत्री यशपाल आर्य को सुकून देने वाले हैं। यहां भाजपा ने आर्य को ही सीट जितवाने की जिम्मेदारी सौंपी थी। अगर भाजपा प्रत्याशी यहां हारता तो हार का ठीकरा उनके ही सिर फूटता। भारतीय जनता पार्टी की जीत में स्वयं जोगेंद्र सिंह रौतेला का व्यक्तित्व व पार्टी के हर कैडर का सहयोग शामिल रहा। उनको टिकट मिलने के बाद विरोध के स्वरों को सबने अपने स्तर से शांत करवा दिया। पार्टी का हर कार्यकर्ता चुनाव लड़ाने में जुट गया। कुछ हल्का भितरघात हुआ भी होगा तो उसका असर कहीं दिखाई नहीं दिया। कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य, विधायक बंशीधर भगत व प्रदेश महामंत्री गजराज बिष्ट के क्षेत्रों में भाजपा को अच्छी बढ़त मिली और जोगेंद्र पाल सिंह रौतेला 10854 मतों के अंतर से विजयी हुए। भारतीय जनता पार्टी के लिए मंत्री, विधायक, संगठन के प्रदेश एवं स्थानीय स्तर के पदाधिकारी और भाजपा के आनुसांगिक संगठन अपने-अपने स्तर पर सक्रिय रहे।

जहां तक कांग्रेस का प्रश्न है हल्द्वानी नगर निगम के चुनाव में कांग्रेस की तरफ से पूरी कमान नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश ने संभाली थी। उनके पुत्र सुमित हृदयेश के चुनाव मैदान में होने के कारण ये चुनाव उनके लिए प्रतिष्ठापूर्ण होने के साथ ही चुनौतीपूर्ण भी था। कांग्रेस की हल्द्वानी नगर निगम के मेयर पद पर हार के बाद इंदिरा हृदयेश के समक्ष चुनौतियां और बढ़ गई हैं। हल्द्वानी नगर निगम के चुनाव को इंदिरा हृदयेश ही अकेले लड़ती दिखीं। इस लड़ाई में स्वयं को कांग्रेस का कहने वाले नदारद थे। जिला एवं महानगर स्तर के पदाधिकारियों को छोड़ दें तो कांग्रेसी इस चुनाव से नदारद थे। मतलब छात्र संघ चुनावों में अचानक सक्रिय हो जाने वाली एनएसयूआई, युवा कांग्रेस, महिला कांग्रेस जैसे संगठन कागजों में जरूर होंगे पर धरातल पर वो कहीं नहीं थे, इसका पता इन चुनावों में चला। भाजपा में जहां फ्रंट संगठन से लेकर आनुसांगिक संगठन सक्रिय थे, वहीं कांग्रेस में इनकी उपस्थिति नगण्य थी। खासकर हल्द्वानी नगर निगम में नये जुड़े 35 वार्डों में कांग्रेस का सागठनिक ढांचा सुस्त रहा। जहां भाजपा का सांगठनिक ढांचा चुनावों के इतर भी हमेशा सक्रिय रहता है वहीं कांग्रेस का संगठन निचले स्तर पर भी स्वयं को सक्रिय नहीं कर पाया। जिसका परिणाम कांग्रेस की पराजय के रूप में सामने आया। कांग्रेस की हार के पीछे कांग्रेस के अंदर अंतर्विरोध, नेताओं का अहंकार एवं निपटा देने की मंशा जैसे कई कारण रहे।

हल्द्वानी में हर मोर्चे पर इंदिरा हृदयेश स्वयं जूझती रहीं। कोई बड़ा नेता यहां नजर नहीं आया। हरीश रावत खटीमा, रुद्रपुर, काशीपुर होते हुए पौड़ी को निकल गये तो हल्द्वानी में निवास करने वाले पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल एवं राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा हल्द्वानी में कहीं नजर नहीं आए। कहीं पर एक विधायक कहते सुने गये हल्द्वानी जाएंगे जरूर पर गट्ठा डालने। सुमित हृदयेश की हार के कई कारण रहे हों, लेकिन इन कारणों के विश्लेषण की शुरूआत कांग्रेस इंदिरा हृदयेश एवं सुमित हृदयेश को अंदर से ही करनी होगी। अपने मजबूत गढ़ों से पीछे रह जाना ये आने वाले समय के लिए चेतावनी है। ये नाराजी तात्कालिक है या फिर भविष्य के प्रति चेतावनी। भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस को उसके कई गढ़ों में मात देने में सफल रही। समाजवादी पार्टी को कम करके आंकना भी कांग्रेस के लिए उल्टा पड़ गया। सभासद चुनावों में पार्टी प्रत्याशी को सिंबल आवंटित न करने की रणनीति ने भी कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया। कांग्रेस का जिला पंचायत अध्यक्ष, ब्लॉक प्रमुख होने के बावजूद वह भाजपा का किला नहीं भेद पाई।

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