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Uttarakhand

कैसे बचेंगी बेटियां…? आखिर क्यों नवरात्र कन्या पूजन में तलाशी जाती है बेटियां…

बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ समेत अनेक अभियान ऐसे चल रहे हैं जिससे बेटियां को बचाया जा सके, कुछ करने योग्य बनाया जा सके, लेकिन इन दावों की हक़ीक़त क्या है? साल में दो बार नवरात्र आते हैं। अष्टमी नवमी में कन्याओं का भोज भी अनेको लोग करवाते हैं, कन्याओं की संख्या इतनी कम है की लोग दिन भर गिनी चुनी कन्याओं की तलाश में भटकते रहते हैं, लेकिन इन दो दिनों के बाद फिर कन्याओं के गिरते अनुपात पर कोई चिंतित क्यों नही होता ? आखिर बेटियाँ पैदा ही नही होंगी तो कन्या भोज कैसे सम्भव होगा, क्या कोख में बेटियों को मार देना पाप नही है। काश इस पर कोई खास औऱ कड़े कदम उठाए जाते। घर में बेटियां होने पर ऐतराज है लेकिन नवरात्र पर भोज के लिये 9 बेटियों की तलाश है। यह कहावत अब उत्तराखण्ड में सही साबित होने जा रही है, नवरात्र में हर बार कन्याओं को भोज कराया जाता है, लेकिन कन्याओं की संख्या इतनी कम है की कई गली, मोहल्लों, कॉलोनियों से इकट्ठी की गई गिनी चुनी कन्यायों की तलाश में लोग टकटकी लगाए रहते हैं। माता को खुश करने कन्याओं को भोज जो कराना है, लेकिन अपने घर मे बेटी नही चाहिए, बेटा चाहिए, अब यह कैसे सम्भव हो, लेकिन हक़ीक़त यही है की बेटियों के जन्म का प्रतिशत दिन प्रतिदिन घट रहा है, महिला आयोग की पूर्व उपाध्यक्ष अमिता लोहनी कहती हैं की कही ऐसा ना हो की हरियाणा राज्य जैसे हालात उत्तराखण्ड में पैदा ना हो जाये की बाहर से बेटियों को खरीदकर लड़को की शादियां करवाई जाती रही हैं, इस लिहाज़ से उत्तराखंड के अंदर जन जागरूकता अभियान चलाना बहुत जरूरी है, खासकर यहां की महिलाओं को इस दिशा में जागरूक करने की जरूरत है कि जब बेटियां पैदा होंगी तभी तो वंश आगे बढ़ेगा वरना आगे कुछ नहीं हो पाएगा। इसके चलते तमाम अल्ट्रासाउंड सेंटर और वीमेन ट्रैफिकिंग जैसे मामलों पर खासा नजर रखने की जरूरत है। अगर कहीं से भ्रूण हत्या जैसे मामलों की जानकारी आती है तो वहां तुरंत कार्यवाही करने की आवश्यकता है। इस मामले में राज्य सरकार को खासा ध्यान देने की जरूरत भी है और अगर हम किसी भी योजना के जरिए बेटियों को बचाने में सक्षम हो पाते हैं तो कन्याओं की सच्ची पूजा यही होगी। उत्तराखंड में लिंगानुपात अभी 1000 बेटों पर 938 बेटियां है, जबकि 2019 के आकड़ो के मुताबिक नैनीताल जिले में 1000 बेटो पर 940  बेटियां हैं। महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास मंत्री रेखा आर्य के मुताबिक मामला चिंताजनक है लेकिन भयावह नहीं है। सामाजिक कार्यकर्ता भी लड़कियों की गिरते आंकड़ों से बेहद चिंतित हैं। मीनू अग्रवाल बिष्ट एवं उषा मुकेश के मुताबिक यह पुराने समय से चली आ रही परंपरा है कि बेटों को ज्यादा तवज्जो दी जाती है और बेटियों को उनके मुकाबले बेहद कम आज की भी स्थिति यही है की बेटी के पैदा होने में जश्न का माहौल होता है और बेटियों के पैदा होने में लोग बेहद निराश हो जाते हैं लिहाजा कुछ ऐसे कड़े कदम उठाने की जरूरत है जिससे बेटियों को बचाया जा सके, दरअसल भ्रूण हत्या गर्भपात जैसे गंभीर मामले शिक्षित समाज से ही सामने आते हैं। बेटियां बड़ी हो गई तो दहेज उत्पीड़न और दहेज हत्या जैसे मामले सामने आ रहे हैं, लिहाजा यह बहुत ही चिंता का विषय है इस मामले में ठोस और कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है। साथ ही कुछ छात्राएं भी मानती है कि घर में वह भी समानता के अधिकार से बंचित रहती है। इस बार की नवरात्रि में भी अष्टमी और नवमी का दिन हमारे सामने है, लिहाजा एक बार फिर घर में कन्या भोज कराने के लिए नौ देवियों की तलाश फिर से शुरू होने वाली लगी है। हर गली मोहल्ले के सैकड़ों परिवार नौ देवियों की तलाश में पूरे दिन टकटकी लगाए बैठेंगे और हर जगह कन्याओं की तलाश करेंगे, लेकिन सवाल यही है कि क्या कन्याओं की तलाश सिर्फ दूसरे घर से ही की जानी चाहिए और अपने घर में बेटियों के पैदा होने पर एतराज क्यो ?…

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