[gtranslate]
Uttarakhand

मुंबई से कम हलकान नहीं हल्द्वानी

उत्तराखण्ड के विकास की हकीकत यहां की आर्थिक राजधानी हल्द्वानी बयां कर देती है। शहर में जल निकासी की समुचित सुविधा तक नहीं है। एक हल्की सी बरसात में ही पूरा शहर जलमग्न हो जाता है। इस बार तो नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश को भी अपना घर छोड़कर होटल में शरण लेनी पड़ी। कांग्रेस और भाजपा समस्या को लेकर एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा देते हैं। लेकिन समस्यओं से निपटने के लिए दीर्घकालीन योजनाएं क्यों नहीं बनती, इस सवाल का जवाब कोई नहीं देना चाहता

हल्द्वानी शहर के लिए ‘कुमाऊं का प्रवेश द्वार’, ‘उत्तराखण्ड की आर्थिक राजधानी’ जैसी उपमाएं जेहन में एक ऐसे शहर का सपना जगाती हैं जिसमें बेहतरी के सिवाय कुछ नहीं होगा। शहर की मुख्य सड़क नैनीताल रोड के लिए कभी लोक निर्माण विभाग के एक अधिशासी अभियंता ने कहा था ये सड़क, निर्माण के बाद उत्तराखण्ड की खूबसूरत सड़कों में से एक होगी। लेकिन इस सड़क की खूबसूरती की पोल एक बरसात ने उस वक्त खोल दी, जब नेता प्रतिपक्ष के घर में बरसात का पानी बेतरतीब तरीके से घुस गया। डॉ ़ इंदिरा हृदयेश को इस अव्यवस्था के चलते एक होटल में शरण लेनी पड़ी। हल्द्वानी शहर की त्रासदी है कि एक बरसात में ही इस शहर की मुख्य सड़कें जलभराव का शिकार हो जाती हैं। फिर वो नैनीताल रोड हो, कालाढूंगी रोड़ हो या फिर शहर के नगर निगम के अंतर्गत आने वाली अन्य सड़कें। महानगर का रूप लेता हल्द्वानी बढ़ती जनसंख्या के चलते विस्तरित तो हुआ, कंक्रीट के जंगलों में भी तब्दील हुआ, मगर अनियोजित विकास के चलते बरसाती पानी की समुचित निकासी व्यवस्था न होने के कारण मानसून के आते ही सड़कों का जलमग्न हो जाना आम बात हो गई है। जलभराव की यह समस्या नई नहीं है। मानसून के दौरान सड़कों का जलमग्न हो जाना वर्षों से चला आ रहा है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई जैसे हालात उत्तराखण्ड की आर्थिक राजधानी हल्द्वानी के बन जाते हैं। समस्या से निपटने के लिए कुछ तात्कालिक उपाय कर नगर निगम अपना पल्ला झाड़ लेता है, लेकिन इस समस्या के निस्तारण के लिए सरकारी विभागों खासकर नगर निगम ने दीर्घकालिक उपायों की कोई ठोस नीति नहीं बनाई। जबकि विस्तृत योजना की आवश्यकता है। जब सिर्फ पैसा खर्च करने की जद्दोजहद हो, लेकिन नियोजन की कोई परिकल्पना न हो तो हाल नैनीताल रोड जैसा होता है जहां लोक निर्माण विभाग ने सड़क निर्माण और सौंदर्योंकरण के लिए 28 करोड़ खर्च कर दिए। सौन्दर्यीकरण के नाम पर नालियों को कवर कर उसके ऊपर फुटपाथ बना दिए, लेकिन ये ध्यान नहीं रखा कि अगर नालियां बरसात में चोक हो जाएंगी तो उनकी सफाई कैसे होगी। कहीं पर भी मेनहोल छोड़े ही नहीं गये। जब इस बार जलभराव की समस्या से हल्द्वानी फिर रूबरू हुआ तो लोकनिर्माण विभाग को इन्हें सुधारने की याद आई।


जल निकासी व्यवस्था के नियोजित तरीके से काम न करने व विभागों में आपसी तालमेल की कमी ने इस समस्या को और जटिल किया है। एक समय हद्वानी में सिंचाई नहरों का जाल था। शहरीकरण के चलते हुए अतिक्रमण ने नहरों व सिंचाई गूलों का अस्तित्व ही खत्म कर दिया है। पहले इन नहरों व गूलों से जो बरसात का पानी बहकर निकल जाता था, अब वह सड़कों में बह रहा है।

इस सबके लिए हल्द्वानी नगर निगम भी कम जिम्मेदार नहीं है। शहर के अंदर जल निकासी की व्यवस्था को देखना इसकी ही जिम्मेदारी है। ये पहली बार है जब इस वर्ष नगर निगम ने नालों व नालियों की सफाई बरसात से पहले नहीं करवाई जिसका खामियाजा शहरवासियों को भुगतान पड़ा। खास बात ये है कि नेता प्रतिपक्ष डॉ इंदिरा हृदयेश के घर में पानी तो घुसा ही साथ ही स्टेडियम के पीछे सरकारी अधिकारियों के आवास वाली सड़क भी जलमग्न रही, लेकिन जन प्रतिनिधि और सरकारी मशीनरी बस मूकदर्शक बनी रही। नगर निगम के अंतर्गत जब मुख्य इलाकें का ये हाल है तो नगर निगम के सुदूर वार्डों की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य के आवास का क्षेत्र नया नगर निगम में शामिल हुआ है। वहां पर बहने वाले रकसिया नाले की सफाई करना नगर निगम को उचित नहीं लगा, लेकिन जब मूसलाधार बारिश के चलते उस चोक नाले के कारण आस-पास की कॉलोनियों के घरों में पानी भर गया तब नगर निगम जागा।

जैसे आम तौर पर होता है अधिकारी दावे और आश्वासनों की डोज देते हैं और जनप्रतिनिधि अपनी मुंहजबानी खर्च कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं। बयानबाजी के इस दौर में नेता प्रतिपक्ष डॉ इंदिरा हृदयेश ने जहां मेयर डॉ जोगेंद्र रौतेला पर पहले नगर निगम को डुबाने और अब हल्द्वानी को डुबाने की तोहमत मढ़ दी तो मेयर रौतेला ने पलटवार करते हुए इस पूरी स्थिति के लिए नेता प्रतिपक्ष डॉ ़ इंदिरा हृदयेश को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। भाजपाई तो इतने खफा हो गए कि उन्होंने नेता प्रतिपक्ष का पुतला तक फूंक दिया। लेकिन क्षेत्र में जाकर जनता की समस्या दर्द को बांटने की कोशिश किसी ने भी नहीं की।

डॉ जोगेंद्र रौतेला का मेयर पद पर ये दूसरा कार्यकाल है। 7 मार्च 2017 से आज तक प्रदेश में उनके दल की ही सरकार है। 2017 से पूर्व वो कांग्रेस सरकार द्वारा कार्य न करने देने के आरोप लगाकर बच सकते थे, लेकिन अब केंद्र राज्य से लेकर स्थानीय नगर निगम तक उनके दल की ही सरकार है। ऐसे में वे दूसरों पर दोष मढ़कर अपने दायित्व से बच नहीं सकते, क्योंकि सड़कों पर जलभराव की समस्या अभी तत्काल पैदा नहीं हुई है। हल्द्वानी हर बरसात में इसका सामना करता है। जब आपसे पहले वालों ने कुछ नहीं किया तभी जनता ने आप पर दूसरी बार विश्वास जताया है। जनप्रतिनिधियों को लगता है वो सिर्फ बयान देकर जनता का दर्द बांट लेंगे, लेकिन क्या जनता इन बयानों से ही संतुष्ट रहे।

प्रकृति के सामने लाचारी तो समझ आती है, लेकिन जनप्रतिनिधियों-अफसरानों की जवाबदेही और जिम्मेदारी का क्या? बिना क्षेत्र में निकले वातानुकूलित कमरों में बैठकर उन परिस्थतियों का अंदाजा न जनप्रतिनिधि लगा सकते हैं न ही अधिकारी। सड़कों के जलभराव व पानी निकासी की समस्या के लिए जब तक ठोस योजना नहीं बनती तब तक सड़कों व गलियों को यूं ही तालाब बनते देखने रहने हल्द्वानी की नियति रहेगी।

 

एक्शन में जिलाधिकारी

नैनीताल में प्रशासनिक जड़ता को तोड़ते हुए नए जिलाधिकारी सबिन बंसल पहले दिन से ही एक्शन में दिखे। कार्यभार संभालते ही उन्हें नैनीताल नगर पालिका के सभासदों के आंदोलन से रूबरू होना पड़ा। सभासदों की नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी रोहिताश शर्मा के कार्यकाल की कथित अनियमितताओं की जांच एवं उनके स्थानांतरण की मांग को गंभीरता से लेते हुए उनके समय के सभी कार्यों की पत्रावलियां मांग ली। लेकिन अधिशासी अधिकारी बिना अनुमति के चिकित्सा अवकाश लेकर छुट्टी पर चले गए। जिलाधिकारी ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए शासन को रिपोर्ट भेजी जिस पर शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक के खासमखास रोहिताश शर्मा को जाना पड़ा। नैनीझाल में नालों की सफाई दो बार कराने के आदेश पर अब वहां नियमित सफाई हो रही है। हल्द्वानी में जलभराव की समस्या पर उन्होंने जिमम्ेदार विभागों के अधिकारियों को एक हफ्ते के भीतर नालों व गूलों की सफाई के आदेश देते हुए अमल न होने पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी। खुद फील्ड में जाकर कार्य करने वाले सबिन बंसल ने अधिकारियों को कार्यालय से निकल कर क्षेत्र में जाकर जनता की समस्याओं को जानने व उनके निस्तारण के निर्देश दिए। अल्मोड़ा के जिधिकारी के कार्यकाल में सबिन बंसल ने अपनी कार्यशैली से अमिट छाप छोड़ी थी, परंतु राज्यमंत्री रेखा आर्य के पति गिरधारी लाल साहू के कुछ मामलों के चलते रेखा आर्य व उनके मध्य हुए विवाद के चलते उनका स्थानांतरण शासन ने देहरादून सचिवालय में कर दिया था।

 

बात अपनी-अपनी

नगर निगम, सिंचाई विभाग व लोक निर्माण विभाग को एक हफ्ते के अंतर्गत उनके क्षेत्र की नालियों, गूलों व नहरों की सफाई के निर्देश दिए हैं। एक हफ्ते के अंदर सफाई न मिलने पर जिम्मेदार अधिकारियों व कर्मचरियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
सबिन बंसल, जिलाधिकारी नैनीता

वॉल्कवे मॉल के पास नाली की निकासी बाधित होने से सारा पानी सड़कों पर आ जाता है, जबकि पहले ये गौला में निकल जाता था। जल निकासी की समस्या के निजात के लिए मुख्यमंत्री से वार्ता हुई है। उन्होंने हल्द्वानी और रुद्रपुर के लिए सिंचाई विभाग के एक अधिकारी को नोडल अधिकारी नियुक्त कर विस्तृत योजना बनाने को कहा है। उम्मीद है इस योजना के बन जाने पर जल निकासी की समस्या काफी हद तक सुलझ जाएगी।
डॉ. इंदिरा हृदयेश, नेता प्रतिपक्ष

सड़कों पर जलभराव के मुख्य चार कारण हैं। वॉल्कवे मॉल के पास एक कलवर्ट जो कि पीडब्ल्यूडी के अधीन है, उसका पानी पहले गौला में चला जाता था। लेकिन अब उसे नहर में डाइवर्ट कर दिया गया। जहां से उसका पानी गौला को जाता था उस पर अतिक्रमण हो गया है। उचित निकासी न होने के कारण बरसात में पानी सड़क पर बहने लगता है। दूसरा सौरव होटल क­­­­े पास बहने वाली नहर को कवर कर उसके ऊपर पार्क बना दिया गया है जिस कारण नहर के नीचे कूड़ा इकट्ठा हो जाने के कारण चोक हुई नहर से पानी ओवरफ्लो होकर सड़कों पर बह रहा है। डीएम कैम्प ऑफिस के निकट बहने वाली नहर में पानी के संयोजन के पाइपों और बीएसएनएल के तारों का जाल है जिस कारण वहां पर नहर चोक हो जाती है। साथ ही मैं कहना चाहूंगा कि घर-घर से कूड़ा उठाने की व्यवस्था होने के बावजूद भी लोग कूड़ा खुली नहरों में डाल रहे हैं जो नहरों को चोक कर देता है। हम इन समस्याओं के निदान के लिए लगे हैं।
डॉ. जोगेंद्र रौतेला, मेयर हल्द्वानी­

You may also like