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  • कुमार गुंजन

 

‘डबल इंजन की सरकार’ से त्रस्त उत्तराखण्ड की जनता अब कुछ ही समय बाद अपनी नई सरकार चुनने जा रही है। ‘दि संडे पोस्ट-आईएमआईएस’ द्वारा राज्य विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कराए गए सर्वेक्षण में सरकार के प्रति खासा आक्रोश सामने आया है। 51 प्रतिशत जनता सत्ता परिवर्तन की बात कर रही है। यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी पर आंख मूंद भरोसा कर विगत चुनाव में भाजपा को 57 सीटों वाला प्रचंड बहुमत देने वाली जनता पीएम पर वादाखिलाफी का आरोप लगा रही है। भाजपा के लिए खुशखबरी यही है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत से उपजी जनता की नाराजगी को मात्र पांच महीनों में ही वर्तमान सीएम पुष्कर सिंह धामी से खासा कम कर डाला है। बतौर मुख्यमंत्री हरीश रावत इस सर्वेक्षण में जनता की पहली पसंद बन उभरे जरूर हैं लेकिन पुष्कर सिंह धामी अपनी लोकप्रियता तेजी से बढ़ाने में सफल होते नजर आ रहे हैं। क्षेत्रीय दल इस बार पूरी तरह हाशिए पर हैं तो आम आदमी पार्टी का ग्राफ थोड़ा बढ़ा है

उत्तर प्रदेश और पंजाब सहित पांच राज्य चुनावी मोड में है। इसमें पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड भी शामिल है। इन राज्यों में बहुत जल्द विधानसभा चुनाव की घोषणा होने वाली है। चुनाव की घोषणा होते ही मतदाताओं को ‘खेला होबे’ के तर्ज पर लुभाने का सिलसिला और जोर पकड़ेगा। हालांकि खेला कई महीनों से जारी है। सत्ताधारी दल रोजाना नई-नई परियोजनाओं का शिलान्यास कर खुद को ‘कर्मयोगी’ दिखाने में लगा है। वहीं विपक्षी दल बड़े-बड़े वादे कर खुद को जनता का ‘हितैषी’ दिखा रहा है। मतदाता ‘कर्मयोगी’ पर भरोसा जताती है या ‘हितैषी’ पर, यह तो चुनाव बाद ही पता चल पाएगा। लेकिन उत्तराखण्ड में सबसे महत्वपूर्ण देखना यह होगा कि जनता डबल इंजन की सरकार पर भरोसा जताती है या नहीं। यहां मोदी-शाह के प्रयोग (तीन मुख्यमंत्री बदलना) की भी अग्निपरीक्षा है। यदि वे अग्निपरीक्षा में पास होते हैं तो भाजपाई मुख्यमंत्रियों के गले पर हमेशा मोदी-शाह की तलवार सटी रहेगी। यदि वे इसमें फेल होते हैं तो भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी राहत की सांस ले रहे होंगे।

 


2017 में उत्तराखण्ड की जनता को डबल इंजन सरकार की संकल्पना बेहद अच्छी लगी। इसलिए उन्होंने यहां दो- तिहाई बहुमत की भाजपा सरकार बना दी। पांच साल होने वाले हैं। इसलिए डबल इंजन का कार्यकाल रूपी ईंधन खत्म होने वाला है। अब आकलन हो रहा है। जांचा और परखा जा रहा है कि डबल इंजन दमदार रहा या नहीं। इस जांच-परख के बीच फिर नई संकल्पना गढ़ी जाएगी। इसलिए विपक्ष मतदाताओं को होशियार और चौकन्ना रहने को कह रहा है। क्योंकि पिछले पांच सालों में न पलायन रुका, न शिक्षक और डॉक्टर पहाड़ चढ़े, न विकास पहाड़ चढ़ा, न ही युवाओं को रोजगार मिल सका। पहाड़ की पानी और जवानी दोनों गंगा, अलकनंदा, भागीरथी समेत अन्य पहाड़ी नदियों के साथ बहकर पलायन करने को मजबूर दिखे। सरकार इन दोनों को रोक पाने में नाकाम रही है। हालांकि इसके लिए सरकार को दोष देना, उनके साथ ज्यादती ही माना जाएगा, क्योंकि धामी को तो बतौर मुख्यमंत्री मात्र पांच माह का समय मिला है। कप्तान बदलने का समय अब खत्म हो गया है। अब मार्किंग का समय आ गया है। चुनाव में मतदाता अपने मतों से सरकार की फाइनल मार्किंग करेंगे। लेकिन लोकशाही में फाइनल मार्किंग से पहले जनता के मन- मिजाज को टटोलना भी महत्वपूर्ण माना गया है। यह सरकार को आईना दिखाता है तो विपक्ष को एक ठोस रणनीति बनाने में भी मदद करता है।
चुनाव पूर्व उत्तराखण्डवासियों का मन- मिजाज टटोलने (सर्वेक्षण) की कोशिश ‘दि संडे पोस्ट’ और ‘आईएमआईएस’ ने की है।

 

यह सर्वेक्षण 10 दिसंबर 2021 से 3 जनवरी 2022 के बीच प्रदेश के सभी सत्तर विधानसभा सीटों पर कराया गया। आचार संहिता लगने से ऐन पहले कराया गया, यह सर्वेक्षण सत्ताधारी भाजपा और मुख्य विपक्षी कांग्रेस के साथ-साथ यहां अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही आम आदमी पार्टी को कई संदेश दे रहा है। राज्य आंदोलन से जन्मीं उत्तराखण्ड क्रांति दल (उक्रांद) को इस सर्वे रिपोर्ट से फिर निराशा ही हाथ आने वाली है। पिछले चार चुनावों में वह कभी भाजपा- कांग्रेस का विकल्प बनने का प्रयास करती नहीं दिखी। इस बार भी उनके प्रति लोगों का आकलन पहले जैसा ही नजर आ रहा है। उक्रांद समेत राज्य के अन्य क्षेत्रीय दलों के लिए यह बेहद चिंताजनक है कि दिल्ली से बाहर निकलकर आम आदमी पार्टी उत्तराखण्ड में उनसे बेहतर करती दिख रही है। वह यहां सत्ताधारी भाजपा से लड़ते और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस से मुकाबला करते हुए खुद को दिखा रही है। सर्वेक्षण से भी यह बात स्पष्ट उभर कर सामने आई है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आम आदमी पार्टी के लिए यहां सब कुछ अच्छा ही अच्छा है।

 

 

हां, यह जरूर है कि आम आदमी पार्टी पहाड़ी क्षेत्रों में उक्रांद को और तराई एवं मैदानी क्षेत्रों में बसपा को पीछे धकेलकर आगे हो रही है। लेकिन वह अभी भी मुख्य मुकाबले में कहीं नजर नहीं आ रही है। यानी उसे भाजपा और कांग्रेस को रिप्लेस करने के लिए अभी काफी मेहनत करनी पड़ेगी। सर्वेक्षण में लगभग सभी सीटों पर मुख्य मुकाबला भाजपा-कांग्रेस के बीच ही होता दिख रहा है। इसलिए टीम केजरीवाल को नई रणनीति बनाने की जरूरत है। जबकि टीम केजरीवाल ‘मुफ्तकाल’ के नाम पर सत्ता की सीढ़ी चढ़ना चाहती है। कम से कम सर्वेक्षण में जनता ने उनके ‘मुफ्तकाल’ को सिरे से नकार दिया है। शायद इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि पिछले पांच साल आम आदमी पार्टी प्रदेश में कहीं नहीं दिखी। चुनाव से ऐन पहले अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जैसे नेता देहरादून और ऊधमसिंह नगर में घूम-घूमकर मुफ्त वाले वादे करने लगे। आम आदमी पार्टी को सबसे ज्यादा तराई और मैदानी क्षेत्र के सीटों से उम्मीद है। लेकिन इन्हें यहां भी निराशा ही हाथ लग सकता है। केजरीवाल की पार्टी को सबसे ज्यादा तराई के लोगों ने ही नकारा है। तराई यानी ऊधमसिंह नगर के सभी 9 सीटों के सर्वे में 62 फीसदी लोगों ने पार्टी को भाजपा -कांग्रेस के विकल्प के तौर पर अस्वीकार किया है। हालांकि 28 फीसदी लोग इसे विकल्प के रूप में स्वीकार भी कर रहे हैं। 10 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो अभी भी असमंजस की स्थिति में हैं।

 

वहीं मैदानी क्षेत्र (हरिद्वार के 11 और देहरादून के 8 विधानसभा सीट) की सर्वे रिपोर्ट को देखें तो 56 फीसदी लोगों ने आम आदमी पार्टी को नकारा है। यहां 29 फीसदी लोग इन्हें भाजपा कांग्रेस का विकल्प मानते हैं। जबकि 15 फीसदी लोग यहां अभी असमंजस में हैं। पूरे प्रदेश की तस्वीर देखें तो 58 फीसदी लोगों को लगता है कि आम आदमी पार्टी भाजपा-कांग्रेस का विकल्प नहीं हो सकती। समग्रता में 26 फीसदी लोग इन्हें विकल्प मानते हैं तो 16 फीसदी लोग आज भी इस सवाल पर अपना मन-मिजाज नहीं बना पाए हैं। पार्टी के लिए सुखद यही है कि तीन माह पूर्व के सर्वे में 23 फीसदी लोग इन्हें विकल्प मानते थे। इसमें सितंबर, 2021 के सर्वे की अपेक्षा तीन फीसदी का इजाफा हुआ है। हालांकि पार्टी अभी भी मार्च 2021 के आंकड़े से पीछे है। उस वक्त के सर्वे में इस पार्टी को 30 फीसदी लोग भाजपा-कांग्रेस का विकल्प मान रहे थे। पार्टी के लिए एक खुशखबरी यह भी है कि उनका यहां खाता खुल सकता है। मुख्यमंत्री उम्मीदवार कर्नल कोठियाल गंगोत्री सीट से बाजी मार सकते हैं। पिछले किसी सर्वे में वे जीतते हुए नहीं दिख रहे थे। लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। आम आदमी पार्टी के लिए अभी भी चिंता की बात यह बनी हुई है कि मतदाता उन्हें वोट करने से पीछे हट रहे हैं। यानी केजरीवाल के प्रति उत्तराखण्ड के लोगों में विश्वास नहीं बन पाया है। इसलिए जब बात पार्टी को वोट करने की बात आती है तो केवल 9 फीसदी लोगों का ही जवाब होता है कि वे आम आदमी पार्टी को वोट करेंगे।

 

इस सर्वेक्षण में लोगों से सीधा और सपाट प्रश्न किये गए थे जिसका उन्हें सीधा जवाब देना था। उन्होंने अपने-अपने आकलन के मुताबिक सपाट जवाब दिया भी। उनके मिले जवाब से लगता है कि प्रदेश की दोनों प्रमुख पार्टियों के लिए आगामी चुनाव आसान नहीं है। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला कड़ा है। जो भी पार्टी इसे आसान समझकर आत्ममुग्ध होगा, उसे जोर का झटका धीरे से लगना तय है। चाहे दो तिहाई विधायकों के साथ सत्तासीन भाजपा हो या हर पांच साल पर सत्ता परिवर्तन की उम्मीद पाले कांग्रेस, दोनों में से किसी के लिए मुकाबला आसान नहीं है। सर्वे में मतदाताओं से सीधा सवाल किया गया, ‘क्या 2022 में राज्य में सत्ता परिवर्तन चाह रहे हैं?’ इसका जवाब भाजपा को आत्मचिंतन के लिए मजबूर कर सकता है। क्योंकि आधे से अधिक लोगों की इच्छा है कि राज्य में सत्ता परिवर्तन होना चाहिए। 51 फीसदी लोग आगामी चुनाव में परिवर्तन चाह रहे हैं। वहीं 40 फीसदी लोगों का मानना है कि राज्य में सत्ता परिवर्तन की जरूरत नहीं है। इसके अलावा 9 फीसदी लोग ऐसे भी हैं, जिसने अभी तक इस पर कोई राय नहीं बनाई है। यानी चुनाव आते-आते यह किसी भी पक्ष में जा सकते हैं। तीन माह पहले कराए गए सर्वेक्षण से इसकी तुलना करें तो इसमें अभी कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। उस समय भी 9 फीसदी लोगों ने कोई राय नहीं बनाई थी। इस तीन महीने में भाजपा- कांग्रेस में से अभी तक कोई इन्हें अपने पक्ष में नहीं कर पाया है।

 

 

 

अब दोनों पार्टियों ने अपने चुनाव प्रचार को तेज कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देहरादून और हल्द्वानी में एक-एक रैली कर चुके हैं। कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी की भी एक रैली देहरादून में हो चुकी है। चुनाव की घोषणा के बाद चुनाव प्रचार के साथ उठापटक और तेज होगी। ऐसे में कांग्रेस को भाजपा के आक्रामक चुनाव प्रचार से मुकाबला करना होगा। उन्हें सही रणनीति और सटीक पलटवार करना होगा। तभी वह भाजपा से मुकाबला कर पाएगा। पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस भीतर गुटबाजी चरम पर पहुंच गई है। पहले वह सत्ता के गलियारों में
सरगोशियां भर बनती थी। अब सड़कों पर मारपीट से लेकर सोशल मीडिया पर वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी सार्वजनिक होने लगी है। नेताओं की आपसी गुटबाजी यहां तक पहुंच गया कि पार्टी के वरिष्ठ नेता, चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को निराश होकर अपना दर्द ट्विटर पर लोगों से साझा करना पड़ा। 22 दिसंबर को उन्होंने एक के बाद एक तीन ट्वीट किया- ‘है न अजीब सी बात, चुनाव रूपी समुद्र को तैरना है, सहयोग के लिए संगठन का ढांचा अधिकांश स्थानों पर सहयोग का हाथ आगे बढ़ाने के बजाय या तो मुंह फेर करके खड़ा हो जा रहा है या नकारात्मक भूमिका निभा रहा है। जिस समुद्र में तैरना है, सत्ता ने वहां कई मगरमच्छ छोड़ रखे हैं। जिनके आदेश पर तैरना है, उनके नुमाइंदे मेरे हाथ-पांव बांध रहे हैं। मन में बहुत बार विचार आ रहा है कि हरीश रावत अब बहुत हो गया, बहुत तैर लिए, अब विश्राम का समय है!’

 

 

 

‘फिर चुपके से मन के एक कोने से आवाज उठ रही है, ‘न दैन्यं न पलायनम्।’ बड़ी उपापोह की स्थिति में हूं, नया वर्ष शायद रास्ता दिखा दे। मुझे विश्वास है कि भगवान केदारनाथ जी इस स्थिति में मेरा मार्गदर्शन करेंगे।’ वरिष्ठ नेता का यह दर्द पार्टी के लिए ही ठीक नहीं है। क्योंकि सत्ता चलकर खुद नहीं आती है। उसके लिए पूरी पार्टी को एकजुट होकर लड़ना पड़ता है। ऐसे भी अब की भाजपा अटल-आडवाणी वाली भाजपा नहीं है। यह मोदी-शाह वाली भाजपा है। जो हमेशा चुनावी मोड में ही रहती है। इसलिए उत्तराखण्ड कांग्रेस को मुकाबले में रहना है तो उसे अपनी गुटबाजी से बाहर निकलना होगा। एकजुट होना होगा। अनुशासित होना पड़ेगा। तभी वे सत्ता परिवर्तन चाहने वाले 51 फीसदी लोगों में न केवल अपना विश्वास जगा पाएंगे बल्कि इस आंकड़े को बढ़ा सकेंगे।

 

 

सर्वेक्षण में एक सवाल आगामी मुख्यमंत्री को लेकर किया गया था। भाजपा वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर धामी के चेहरे पर चुनाव में जाने को तैयार है, जबकि कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं दिया है। वरिष्ठ नेता हरीश रावत चाहते थे कि पार्टी उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करें, लेकिन पार्टी आलाकमान ने ऐसा कुछ नहीं किया। फिर भी कांग्रेस की ओर से पूरे प्रदेश में सबसे लोकप्रिय नेता हरीश रावत ही हैं। इसलिए सर्वेक्षण का सवाल- ‘2022 में किसे मुख्यमंत्री देखना चाहेंगे?’ इसमें कांग्रेस की ओर से हरीश रावत तो भाजपा की ओर से पुष्कर धामी का नाम विकल्प के तौर पर दिया गया था। यहां मुकाबला कड़ा देखने को मिल रहा है। हरीश रावत को 42 फीसदी लोग अगले मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। वहीं वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर धामी इनसे ज्यादा पीछे नहीं हैं। उन्हें 41 फीसदी लोग अगले मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। यहां तीसरा विकल्प अन्य या कोई नहीं का दिया गया था। इस विकल्प को 17 फीसदी लोगों ने चुना है। यानी ये लोग इन दोनों को छोड़ किसी अन्य नेता को मुख्यमंत्री देखना चाहते हैं।

 

यदि इस सवाल का जवाब क्षेत्रवार देखें तो हरीश रावत गढ़वाल में तो पुष्कर धामी कुमाऊं में कम लोकप्रिय हैं। सर्वेक्षण रिपोर्ट में प्रदेश को चार क्षेत्रों में बांटा गया है। गढ़वाल, कुमाऊं, तराई और मैदान में। हरीश रावत को क्षेत्रवार क्रमशः 38, 47, 49 और 45 फीसदी लोग मुख्यमंत्री देखना चाहते हैं। वहीं पुष्कर धामी को क्रमशः 43, 38, 41 और 38 फीसदी लोग मुख्यमंत्री देखना चाहते हैं। यहां दोनों नेताओं की लोकप्रियता में ज्यादा का अंतर नहीं है। हरीश रावत दशकों से पूरे प्रदेश में लोकप्रिय हैं। वहीं पुष्कर धामी अभी तक अपने हाईकमान के भरोसे पर खरे उतर रहे हैं। पिछले सर्वे में भी पुष्कर धामी अपनी पार्टी के अन्य नेताओं से बहुत आगे थे। उस समय भी वे ही भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री के रूप में जनता की पहली पसंद थे।

अब बात करते हैं सर्वे के सबसे महत्वपूर्ण सवाल की। चुनाव से पहले हर कोई यही जानने को उत्सुक रहता है कि प्रदेश में किसकी सरकार बनने वाली है। यही इस सर्वेक्षण का भी सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। शुरू में जब लोगों से पूछा गया था कि 2022 में आप सत्ता परिवर्तन चाहते हैं तो आधे से अधिक लोगों ने ‘हां’ में जवाब दिया था। वहीं जब विधायक चुनने की बारी आई तो कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बज गई। शायद कांग्रेस अभी भी इस खुशफहमी में है कि सत्ता परिवर्तन की चाहत रखने वाले लोग सीधे उन्हें वोट करेंगे। जबकि ऐसा नहीं है। पार्टी को इसके लिए लड़ना होगा। मेहनत करनी होगी। एक-दूसरे का टांग खींचने से जीत नहीं मिलने वाली है, क्योंकि सर्वेक्षण स्पष्ट संकेत दे रहा है कि सरकार के प्रति नाराजगी के बावजूद कांग्रेस के लिए सत्ता की कुर्सी तक पहुंचना आसान नहीं है। प्रदेश में 51 फीसदी लोग सत्ता परिवर्तन चाहते हैं। लेकिन जब उनसे पूछा जाता है कि- ‘किस पार्टी के प्रत्याशी को आप इस बार अपना विधायक चुनेंगे?’ तो सत्ता परिवर्तन चाहने वाले 51 फीसदी लोगों में से केवल 38 फीसदी लोग ही कांग्रेस का विधायक चुनने को तैयार हैं। यहां सत्तारूढ़ भाजपा उनसे आगे है। भाजपा का विधायक चुनने के लिए 39 फीसदी लोग तैयार हैं। यानी सर्वेक्षण के नतीजे यही बतलाते हैं कि भाजपा और कांग्रेस में इस बार टक्कर जबरदस्त है।

 

उक्रांद और आप को क्रमशः 4 और 9 फीसदी वोट मिलते दिख रहे हैं। वहीं 10 फीसदी लोग अन्य को वोट कर सकते हैं। सर्वे इस बात को स्पष्टता से रेखांकित कर रहा है कि भाजपा अपने समर्थकों को मजबूती से अपने साथ जोड़े हुए है क्योंकि 40 फीसदी लोग राज्य में सत्ता परिवर्तन नहीं चाहते हैं। और 39 फीसदी लोग भाजपा को वोट करने की बात कर रहे हैं। जबकि कांग्रेस सरकार से नाराज लोगों को अपने साथ जोड़ने में नाकाम दिख रही है। इसलिए सत्ता से नाराज लोग और कांग्रेस को मिलने वाले वोट में 13 फीसदी का अंतर है। यह 13 फीसदी वोट उक्रांद और आम आदमी पार्टी को जाता नजर आ रहा है। कांग्रेस के लिए अभी उम्मीद खत्म नहीं हुई है। उन्हें अपनी घोषणाओं को आमजन से बताना होगा। उन्हें भरोसा दिलाना होगा, ताकि सत्ता विरोधी वोट कम से कम बंट सके। उसे अपने पाले में करने के लिए ईमानदार और एकजुट प्रयास करनाहोगा।

 

हालांकि सर्वेक्षण इस ओर भी इशारा करता है कि नेताओं की कमी के बावजूद कांग्रेसभाजपा के सामने बड़ी चुनौती पेश कर रही है। सर्वेक्षण में कांग्रेस 38 फीसदी वोटों के साथ 34 सीट पर जीत दर्ज कर सकती है। वहीं भाजपा को एक फीसदी ज्यादा वोट (39 फीसदी) मिलने के बावजूद उसे कम सीटों पर जीत मिलती दिख रही है। भाजपा इस बार 32 सीटें जीत सकती है। इस तरह भाजपा को सीधे-सीधे 25 सीटों का नुकसान होता दिख रहा है। एक सीट ऐसी है, जिस पर भाजपा और कांग्रेस को बराबर वोट मिला है। इस पर कोई भी बाजी मार सकता है। उक्रांद और आम आदमी पार्टी को इस बार एक-एक सीट मिल सकती है। कुमाऊं मंडल के 29 सीटों में से कांग्रेस 18 तो भाजपा 10 सीट पर विजयी पताका लहरा रही है। यहां एक सीट अन्य के खाते में जाती दिख रही है। इस बार तराई और मैदानी सीट का भी अलग आंकड़ा निकाला गया है। हालांकि तराई के सभी सीट कुमाऊं के आंकड़ों में भी शामिल किया हुआ है। उसी प्रकार हरिद्वार के सभी 11 सीट और देहरादून के 8 सीटों को मैदानी क्षेत्र मानते हुए इसके भी अलग आंकड़े निकाले गए हैं। यह सीट गढ़वाल के आंकड़ों में शामिल है। तराई में कांग्रेस 7 तो भाजपा 2 सीटों पर आगे है, जबकि मैदानी क्षेत्र के 19 सीटों में से भाजपा और कांग्रेस दोनों को 9-9 सीट मिल रहे हैं। एक सीट पर दोनों के बीच मुकाबला टाई है।

 

पिछले सर्वे से तुलना करें तो कांग्रेस सितंबर से अब तक तीन महीने में 3 फीसदी वोट गवां चुकी है। वहीं भाजपा का वोट अभी भी स्थिर है। कांग्रेस को तीन फीसदी वोट गंवाने से 2 सीट का नुकसान हो रहा है। मुकाबला कांटे का है। वोट प्रतिशत और सीटों में ज्यादा का अंतर नहीं है। किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। चुनाव की घोषणा होनी अभी बाकी है। संभवतः अगले सप्ताह तारीखों की घोषणा हो जाए। जब सभी पार्टियां अपने-अपने उम्मीदवार को मैदान में उतारेगी और प्रचार जोर पकड़ेगा, तब तस्वीर और साफ होगी। इतना जरुर है कि चुनाव जीतने के लिए सभी पार्टियां हर संभव प्रयास करेगी। इसमें जो अपनी बात मजबूती से जनता के बीच पहुंचाने में कामयाब होगा, वहीं चुनावी वैतरणी को सफलतापूर्वक पार कर पाएगा।

 

 

सर्वेक्षण के मुख्य नतीजे

 

 

  • भाजपा और कांग्रेस में कांटे की टक्कर है। किसी को पूर्ण बहुमत मिलता नहीं दिख रहा।

 

  • कांग्रेस को 34, भाजपा को 32, आम आदमी पार्टी को एक, उक्रांद को एक और अन्य को भी एक सीट मिल सकती है। इसके अलावा एक सीट पर भाजपा-कांग्रेस टाई में हैं।

 

  • पुष्कर धामी कैबिनेट के चार मंत्रियों की सीट खतरे में है।
  • गढ़वाल क्षेत्र में भाजपा मजबूत तो कुमाऊं में कांग्रेस है मजबूत।
  • गढ़वाल में भाजपा को 41 में से 22 सीट मिल सकती है। कांग्रेस को यहां 16 सीट मिलती नजर आ रही है।
  • इस क्षेत्र में उक्रांद और आम आदमी पार्टी को एक-एक सीट मिल सकती है। वहीं एक सीट पर भाजपा-कांग्रेस के बीच मुकाबला टाई है।
  • कुमाऊं मंडल के 29 सीटों में से कांग्रेस 18 तो भाजपा 10 सीट पर आगे है। एक सीट अन्य के खाते में जाती दिख रही है।
  • ऊधमसिंह नगर के सभी 9 सीटों को तराई क्षेत्र मानते हुए इसका अलग रिपोर्ट तैयार किया गया है। यहां कांग्रेस 7 तो भाजपा 2 सीटों पर आगे है।

 

  • उसी प्रकार हरिद्वार जिले की सभी 11 और देहरादून के 8 सीटों को मैदानी क्षेत्र मानते हुए इसे अलग किया गया है। यहां के 19 सीटों में से भाजपा और कांग्रेस दोनों को 9-9 सीट मिल रहे हैं। एक सीट पर दोनों के बीच मुकाबला टाई है।
  • हरिद्वार जनपद की 11 सीटों में से चार (रानीपुर, भगवानपुर, रुड़की और हरिद्वार) पर भाजपा कांग्रेस के बीच टक्कर कांटे की है। इनमें दो पर भाजपा और दो पर ही कांग्रेस अभी बढ़त बनाये हुए है। लक्सर में मुकाबला टाई है।
  • हरिद्वार ग्रामीण सीट पर कैबिनेट मंत्री यतीश्वरानंद कांग्रेस से पिछड़ रहे हैं।

 

  • देहरादून जिले के 10 सीटों में से एक धर्मपुर सीट पर मुकाबला कड़ा है।

 

  • चकराता में कांग्रेस के दिग्गज नेता, नेता प्रतिपक्ष एवं पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह की सीट खतरे में दिख रही है।
  • पौड़ी जनपद के श्रीनगर से विधायक एवं कैबिनेट मंत्री धन सिंह रावत की सीट खतरे में है। यहां उक्रांद मुकाबले को त्रिकोणीय बना रहा है।

 

  • वहीं एक और कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज की सीट चौबट्टाखाल में भी मुकाबला त्रिकोणीय है। यहां आम आदमी पार्टी मुकाबले को दिलचस्प बना रही है।

 

  • चमोली जिले की थराली सीट पर भाजपा-कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला है। यहां दोनों दलों के बीच केवल दो फीसदी से भी कम वोट का अंतर है।

 

  • रुद्रप्रयाग के दोनों सीटों पर भाजपा-कांग्रेस के बीच मुकाबला कड़ा है। दोनों में दो फीसदी वोटों का अंतर है।

 

  • यहां के दोनों सीट पर उक्रांद और आम आदमी पार्टी भी मुकाबले में है।
  • देवप्रयाग सीट से इस बार उक्रांद का खाता खुल सकता है।
  • गंगोत्री सीट से आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार कर्नल कोठियाल बाजी मार सकते हैं।

 

  • यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया है कि आम आदमी पार्टी के मजबूत होने से यहां कांग्रेस खत्म होती दिख रही है। यानी आम आदमी पार्टी कांग्रेस का वोट झटक रही है। आप जितना मजबूत होगी कांग्रेस को उतना नुकसान होना तय है।

 

  • रुद्रपुर और जसपुर में कड़े मुकाबले के बीच कांग्रेस आगे है। यहां भाजपा-कांग्रेस के बीच एक फीसदी से भी कम वोट का अंतर है। यानी चुनाव में कुछ भी हो सकता है।

 

  • आम आदमी पार्टी को तराई से ही सबसे ज्यादा उम्मीद है लेकिन यहां वह अभी पैठ नहीं बना पाई है।

 

  • नैनीताल, हल्द्वानी और कालाढूंगी में भाजपा-कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर है। नैनीताल में भाजपा आगे हैं तो हल्द्वानी-कालाढूंगी में कांग्रेस।

 

  • कालाढुंगी में कैबिनेट मंत्री बंशीधर भगत की सीट भी खतरे में है।

 

  • अल्मोड़ा की जागेश्वर सीट पर कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता गोविंद सिंह कुंजवाल भाजपा से पीछे हैं।

 

  • सोमेश्वर विधानसभा सीट पर जनता भाजपा-कांग्रेस को खारिज कर अन्य को वोट करती दिख रही है।

 

  • यहां कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य को नुकसान हो रहा है।

 

  • मुफ्त की रेवड़ियां बांटने की घोषणा कर आम आदमी पार्टी जिस जोर-शोर से प्रदेश के चुनावी मैदान में उतरी है, उस तरह के नतीजे उन्हें नहीं मिल रहे हैं। प्रदेश के मतदाता अभी भी आम आदमी पार्टी को भाजपा-कांग्रेस का विकल्प नहीं मानते हैं।
टूटा मोदी से भरोसा

 

पिछले चुनाव के दौरान अधिकतर राज्यों में भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यही वादे कर रहे थे कि केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी (डबल इंजन) की सरकार बनने पर विकास तेजी से परवान चढ़ेगा। यही वादा उत्तराखण्ड में भी किया गया था। राज्य के लोगों ने प्रधानमंत्री की बातों पर भरोसा जताया। अलग राज्य बने दो दशक बाद भी राज्य के लोग विकास की तलाश में भटक रहे हैं। गांव से कस्बे, कस्बे से शहर और शहर से दूसरे प्रदेश में पलायन कर रहे हैं। लोगों को लगा कि प्रधानमंत्री वादा कर रहे हैं तो उस पर खरा भी उतरेंगे, इसलिए लोगों ने भाजपा की दो तिहाई सीटों से सरकार बना दी। इस उम्मीद के साथ कि पहाड़ के किसी युवा को पलायन नहीं करना पड़ेगा। सुदूर गांवों तक शिक्षक और डॉक्टर पहुंच जाएंगे। ताकि बच्चों को शिक्षा और रोगियों का इलाज गांवों में ही हो जाया करेगा। पांच साल बीत गए, लेकिन गांव वापसी तो दूर युवाओं का पलायन लगातार जारी रहा। एक छोटी सी बीमारी के इलाज के लिए कई-कई किलोमीटर लोगों को पैदल चलना पड़ता है। प्रधानमंत्री ने यहां मुख्यमंत्री तो बदले लेकिन राज्य की सूरत बदलने में पूरी तरह विफल रहे। इसलिए अब लोगों का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर से भरोसा टूटने लगा है। वर्तमान सर्वेक्षण तो इसी ओर इशारा कर रहा है। तीन माह पहले के सर्वेक्षण में जहां 57 फीसदी उत्तराखण्ड के लोग प्रधानमंत्री के कामकाज को बढ़िया या बहुत बढ़िया मानते थे। तब 63 फीसदी लोग उन्हें अच्छा या बहुत अच्छा प्रधानमंत्री मानते थे।

इस बार के सर्वेक्षण में यहां किये उनके वादे पर एक सवाल पूछा गया। इसका जो जवाब मिला, उससे लगने लगा है कि उत्तराखण्ड में मोदी का जादू दरकने लगा है। सवाल सीधा सा था-‘पीएम मोदी ने 2017 में डबल इंजन की सरकार राज्य में बनाने पर विकास की गंगा बहाने का वायदा किया था। क्या वह वायदा पूरा हुआ?’ इसके जवाब में केवल 39 फीसदी लोगों ने कहा कि वायदा पूरा हुआ। जबकि लगभग आधे लोगों ने वायदा पूरा होने की बात नहीं कही। ऐसा जवाब 49 फीसदी लोगों ने दिया। हालांकि 12 फीसदी लोगों ने इस पर कोई राय व्यक्त नहीं किया है।
यह तस्वीर भाजपा खासकर प्रधानमंत्री के लिए अच्छे संकेत नहीं देती। क्योंकि इस बार भी प्रधानमंत्री उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव में पार्टी के स्टार प्रचारक होंगे। वे प्रचार के दौरान फिर से लोगों से वादे करेंगे। लेकिन इस बार उनके वादे पर कम लोग ही भरोसा करेंगे। यदि ऐसा होता है तो यह भाजपा के लिए शुभ संकेत नहीं है। क्योंकि 2022 के बाद 2024 में आम चुनाव होंगे। अभी प्रदेश के सभी पांचों लोकसभा सीट पर भाजपा का कब्जा है। यदि प्रधानमंत्री पर से लोगों का भरोसा टूटा तो इसका नुकसान विधानसभा के साथ-साथ लोकसभा में भी भाजपा को उठाना पड़ेगा।

 

 

 

 

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