Uttarakhand

सरकार का आर्थिक सुस्साहस

उत्तराखण्ड की त्रिवेंद्र रावत सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवास, स्टाफ और सुरक्षा जैसी सुविट्टााएं देने का निर्णय दो कारणों से लिया है। पहला हाईकोर्ट के आदेश के चलते अपने चार मुख्यमंत्रियों की करोड़ों की देनदारी को रफा-दफा करना और दूसरा केंद्रीय एचआरडी मंत्री निशंक के नामांकन में दिए शपथ पत्र पर उठ रहे सवालों को दबाना। अपने निहित स्वार्थों के कारण सरकार खरबों के कर्ज में दबे राज्य को इस दलदल से उबारने के बजाय और संकट में डाल रही है

 

उत्तराखण्ड की त्रिवेंद्र रावत सरकार ने हाईकोर्ट के निर्णय को दरकिनार कर एक अध्यादेश के जरिए पूर्व मुख्यमंत्रियों को दी जा रही आवासीय एवं स्टाफ इत्यादि की सुविधाएं बहाल करने का निर्णय लिया है। राज्यपाल की स्वीकøति मिलने के बाद इस अध्यादेश को लागू कर त्रिवेंद्र सरकार अपने पूर्व मुख्यमंत्रियों को आर्थिक राहत देने के साथ-साथ वर्तमान में मोदी सरकार के कद्दावर मंत्री डाॅ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को भी बचाने का काम करती नजर आ रही है। निशंक के हाथों चुनाव में पराजित उम्मीदवार का आरोप है कि निशंक ने गलत शपथ पत्र निर्वाचन आयोग को दिया है। बहरहाल यह अलग मुद्दा है। अभी बात करते हैं त्रिवेंद्र सरकार के इस अध्यादेश की।

दरअसल, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी सुविधाओं के नाम पर विगत 18 वर्षों से करोड़ों रुपए सरकारी खजाने से खर्च लिए जा रहे थे। इसमें सरकारी आवास, वाहन, चालक, ईंधन खर्च के अलावा तीन चार स्टाफ और सुरक्षाकर्मी शामिल थे। यही नहीं पेयजल और विद्युत के अलावा आवासों का रख-रखाव और मरम्मत भी सरकारी खजाने से की जा रही थी। इन सब पर प्रति वर्ष करोड़ांे का खर्च सरकार कर रही थी।

जनता से करों द्वारा जुटाए गए धन को इस तरह से लुटाए जाने पर ‘रूरल’ संस्था के अध्यक्ष अवधेश कौशल ने नैनीताल हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की। जिस पर हाईकोर्ट ने लंबी सुनवाई के बाद पूर्व मुख्यमंत्रियों को दी जाने वाली सभी सरकारी सुविधाओं पर रोक लगा दी। तब से लेकर रोक बरकरार है, लेकिन अब राज्य सरकार 13 अगस्त को हुई कैबिनेट की बैठक में बड़े ही गुपचुप तरीके से पूर्व मुख्यमंत्री आवासीय एवं अन्य सुविधाएं अध्यादेश 2019 को मंजूर कर चुकी है। इस अध्यादेश को सरकार राज्यपाल को अनुमोदन के लिए भेज चुकी है। अगर राज्यपाल इस अध्यादेश को अनुमोदन करते हंै तो सरकार पूर्व मुख्यमंत्रियों को फिर से सभी प्रकार की सुविधाएं दे सकेगी। हालांकि राज्यपाल के अनुमोदन के बाद विधानसभा से भी सरकार को इस अध्यादेश को पास करवाना होगा जिसमें सरकार को कोई परेशानी नहीं होना वाली। सरकार का यह निर्णय किसी के गले नहीं उतर रहा है। जानकारों की मानें तो इसके पीछे भाजपा के मुख्यमंत्रियों की करोड़ांे की सरकारी देनदारी और चुनाव में दिए गए शपथ पत्र असल कारण हैं।

अगर पूर्व मुख्यमत्रियों की बात करें तो राज्य बनने के इन 18 वर्षों में सबसे ज्यादा मुख्यमंत्री भाजपा के ही रहे हैं। कांग्रेस के तीन ओैर भाजपा के चार मुख्यमंत्री रहे हंै। इनमें कंाग्रेस के नारायण दत्त तिवारी और भाजपा के नित्यानंद स्वामी का निधन हो चुका है। कांग्रेस के विजय बहुगुणा कांग्रेस छोड़कर अब भाजपा के बड़े नेता बन चुके हैं। इस तरह से भाजपा के पास अब फिर से चार पूर्व मुख्यमंत्री हो चुके हैं। जबकि कांग्रेस के एक मात्र हरीश रावत ही पूर्व मुख्यमंत्री हंै। इन सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों पर करीब 13 करोड़ 3 लाख से भी ज्यादा का खर्च राज्य सरकार अब तक कर चुकी है।

पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी पर राज्य सरकार वर्ष 2002 से 2016 तक कुल 14 वर्षों में 3 करोड़ 70 लाख के लगभग खर्च कर चुकी है। पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी पर सरकारी खजाने से 2010 से 2017 कुल 7 वर्षों में 2 करोड़ 39 लाख 62 हजार का खर्च किया गया है। इसी तरह से बीसी खण्डूड़ी पर 2 करोड़ 81 लाख, रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ पर 2 करोड़ 17 लाख और विजय बहुगुणा पर 1 करोड़ 91 लाख 11 हजार का खर्च किया गया है। मात्र हरीश रावत ही एक मात्र ऐसे पूर्व मुख्यमंत्री हैं जिनके ऊपर राज्य सरकार द्वारा पूर्व मुख्यमत्री होने के नाम पर महज सुरक्षा के अलावा कोई भी अन्य खर्च नहीं किया गया। मुख्यमंत्री पद से हटने के कुछ ही समय के बाद हरीश रावत ने सरकारी आवास ओैर सुविधाएं छोड़ दी थी। जिसके चलते उनके ऊपर किसी प्रकार की सरकारी देनदारी नहीं है।

अवधेश कौशल ने नैनीताल हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की जिस पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को दी जा रही सरकारी सुविधाओं पर रोक लगा दी थी। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद सभी पूर्व मुख्यमंत्रियांे से सभी प्रकार की सुविधाएं वापस ले ली गई ओैर उनको सरकारी आवास खाली करने का आदेश जारी कर दिया गया। हैरानी इस बात की है कि सरकारी आवासों का बाजारी दर से किराया लिए जाने का भी आदेश जारी होने के बावजूद किसी मुख्यमंत्री ने किराया जमा नहीं किया।

असल में भाजपा केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ द्वारा लोकसभा चुनाव के दौरान दिए गए शपथ पत्र को लेकर चिंतित है। हरिद्वार से वर्तमान सांसद और केंद्र सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ पर 41 लाख 64 हजार का सरकारी आवास का किराया शेष है जिसे निश्ंाक द्वारा सरकार को जमा नहीं किया गया है। यह सबसे बड़ा पेंच है जिसको दूर करने के लिए प्रदेश सरकार हाईकोर्ट के आदेश को पलटने के लिए अध्यादेश लेकर आई है।

दरअसल, रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ इस वर्ष लोकसभा चुनाव में हरिद्वार संसदीय सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े और भारी मतों से जीत हासिल करके केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। लेकिन लोकसभा चुनाव के दौरान नामांकन पत्र में निशंक ने सरकारी बकाया होने के बावजूद उस तथ्य का नामांकन पत्र में उल्लेख नहीं किया। नामांकन पत्र के साथ दिए गए शपथ पत्र में सरकारी देय बकाया को ‘लागू नहीं होता है’, लिखा गया। हैरानी की बात यह है कि इस पूरे प्रकरण में सरकार द्वारा हाईकोर्ट में पूर्व मुख्यमंत्रियों के ऊपर लाखों का किराया बकाया होने का हलफनामा देने के बावजूद निशंक को कोई बकाया न होने का प्रमाण पत्र तक जारी कर दिया गया।

इस मामले को लेकर निर्दलीय उम्मीदवार मनीष वर्मा हाईकोर्ट गए। उन्होंने निश्ंाक के नामांकन पत्र में जानकारी छुपाने का आरोप लगाते हुए नामांकन पत्र निरस्त करने की मांग की। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार कोे इस मामले में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया तो सरकार ने 12 फरावरी 2019 को हाईकोर्ट में शपथ पत्र देकर जवाब दिया। जिसमें स्वयं सरकार के अतिरिक्त सचिव ने जवाब दिया है कि पूर्व मुख्यमंत्रियों के आवासों का बाजार भाव से किराया तय कर लिया गया है जिसके आधार पर पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निंशक’ पर 41 लाख 64 हजार 389 रुपए किराए का बकाया है। इसी तरह से पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद खण्डूड़ी पर कुल 48 लाख 49 हजार 816 रुपए किराए का बाकी है।

पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा पर कुल किराया 37 लाख 90 हजार 78 रुपए बकाया होने का उल्लेख किया गया है। इसी तरह से पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी पर 47 लाख 57 हजार 758 आवास के किराए का बकाया बताया गया है। इसी तरह से राज्य के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी पर भी 1 करोड़ 12 लाख 98 हजार आवास का किराया बकाया होने का उल्लेख किया गया है।

इस शपथ पत्र के बाद यह तो साफ हो जाता है कि पूर्व मुख्यमंत्रियों के ऊपर आवास के किराए की दरंे राज्य सरकार द्वारा ही तय की गई हैं और जिनका भुगतान चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को चुनाव नामांकन से पूर्व जमा करना आवश्यक था। पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खण्डूड़ी, भगत सिंह कोश्यारी और विजय बहुगुणा लोकसभा चुनाव चुनाव नहीं लड़े इसलिए उनके ऊपर नामांकन शपथपत्र की कोई आवश्यकता ही नहीं रह गई। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ हरिद्वार सीट से चुनाव लड़े और उनके द्वारा नामांकन पत्र में दिए गए शपथ पत्र मंे 41 लाख 64 हजार 389 रुपए आवास किराया मद में बकाया होने का उल्लेख नहीं किया गया।

जब इस मामले का खुलासा हुआ तो निर्वाचन अधिकारी को इसकी शिकायत की गई। इस पर नामांकन पत्रों की जांच के दौरान सरकार के राज्य संपति विभाग के अपर सचिव बंशीधर तिवारी द्वारा निशंक को कोई देयता नहीं होने का प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया। जिसकी बिना पर निर्वाचन अधिकारी ने निशंक के नामांकन पत्र पर तथ्यों को छुपाने के आरोपों को खारिज कर दिया और सभी आपत्तियों को निपटारा करते हुए निश्ंाक के नामांकन पत्र को पूरी तरह से वैध करार दे दिया गया।

राज्य संपति विभाग के अपर सचिव बंशीधर तिवारी ने दिनांक 19 मार्च 2019 में यह स्पष्ट किया कि डाॅ रमेश पोखरियाल द्वारा सामान्य दर से किराया राजकोष में जमा करवा दिया गया है। उक्त याचिका में बाजार दर पर किराया आंकलित करते हुए लिए जाने से संबधित प्रकरण माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है। अब इस पूरे प्रकरण में यह बात गोैर करने वाली है कि हाईकोर्ट द्वारा राज्य सरकार को सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों से बाजार दर पर किराया वसूल लिए जाने का आदेश जारी कर दिया गया। हाईकोर्ट के आदेश के बाद पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी और विजय बहुगुणा ने हाईकोर्ट में पुनर्विचार के लिए याचिका दखिल की। जिसमें उन्होंने कोर्ट से मांग की कि वे बाजार भाव से किराया देने में पूरी तरह से असमर्थ हैं। इसलिए उनको सामान्य दर पर किराया लिए जाने या उनका किराया माफ किए जाने पर विचार किया जाए। लेकिन हाईकोर्ट ने दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों की याचिका को खारिज कर दिया। इससे सरकार पर अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्रियों से बाजार दर पर आवासीय किराया वसूलने का दबाब बन चुका था। हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार को किराया वसूलने का नोटिस तक जारी करना पड़ गया था। जो कि सरकार के गले की हड्डी बन चुका था।

सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों पर आवास का किराया 2 करोड़ 88 लाख 60 हजार 223 बाकी है। अगर सरकार अपने पूर्व मुख्यमंत्रियों जिसमें से एक पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निंशक’ केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री के पद पर हंै, किराया वसूली में बचाती तो सरकार की फजीहत होना तय मना जा रहा था। इससे बचने के लिए सरकार ने अध्यादेश लाकर सभी को बड़ी राहत दी ही है। साथ ही आने वाले समय में सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को समस्त सरकारी सुविधाएं फिर से प्रदान करने का भी रास्ता बना दिया है।

हैरत की बात यह है कि अध्यादेश के अनुसार अगर पूर्व मुख्यमंत्रियों को पेंशन आदि मिल रही है, तो उसका असर सरकार द्वारा दी जा रही सुविधा पर नहीं पड़ेगा यानी वे राज्य सरकार द्वारा दी जा रही सरकारी सुविधाओं के साथ-साथ पेंशन पाने के भी अधिकारी रहेंगे। मात्र बिजली, पानी और सीवर जैसे अन्य देयों को स्वयं मुख्यमंत्रियों को ही विभागों को देना होगा। माना जा रहा है कि राज्यपाल द्वारा अगर अध्यादेश को लौटाया भी जाता है तो सरकार दोेबारा अध्यादेश को राजभवन भेजकर उसे मंजूर करवा सकती है।

You may also like