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Uttarakhand

विवादित भूखण्ड में फंसा सरकारी धन

आज से 34 बरस पहले कुमाऊं मंडल विकास निगम ने हल्द्वानी की कैनाल रोड स्थित एक विवादित जमीन को खरीदने का फैसला लिया। तब अविभाजित उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री एनडी तिवारी इस जमीन पर एक सरकारी होटल बनाना चाहते थे। लेकिन केएमवीएन ने जमीन की कानूनी स्थिति को बगैर जांचे-परखे जमीन खरीद ली। नतीजा 34 बरस बीत जाने के बाद भी उसे इस जमीन का कब्जा नहीं मिल पाया है। हैरानी की बात यह है कि इन 34 बरसों में निगम ने इसे पाने का कोई खास प्रयास भी नहीं किया। कुछ अर्सा पहले इस जमीन पर अदालती फैसला आया जिसके चलते मामला और उलझ गया है। जमीन की कीमत करोड़ों में होने के चलते शहर के कुछ रसूखदारों की नजर इस पर गड़ चुकी है जिसके चलते विवाद और गहरा गया है। ‘दि संडे पोस्ट’ ने पूरे मामले की पड़ताल की तो इसमें सत्तारूढ़ भाजपा के एक नेता का नाम सामने आया है जो एक पक्ष के साथ मिलकर सत्ता-बल के सहारे जमीन की बाउंड्री कराने लगे हैं। इससे कानून व्यवस्था पर पड़ रहे असर की आशंका गहरा रही है। फिलहाल प्रशासन ने बाउंड्री बनाने का काम तो रुकवा दिया है लेकिन अदालत के फैसले के बाद भी जमीन पर कब्जा न तो केएमवीएन को मिल पाया है, न ही मुकदमा जीते पक्षकार को

यह कहानी है हल्द्वानी की कैनाल रोड़ स्थित 37 बीघा बेशकीमती जमीन की। इस जमीन पर पैतृक विवाद है। विवाद भी आज का नहीं बल्कि 45 साल पुराना। विवाद की मुख्य वजह इस जमीन के मालिक गणेश सिंह का निःसंतान होना रहा। गणेश सिंह की कोई औलाद होती तो शायद आज तक यह जमीनी विवाद कोर्ट-कचहरी से होते हुए सड़कों पर न आता। इस मामले में 45 साल बाद जब फैसला आया तो तमाम तरह की चर्चाएं शुरू हुई। जमीन पर अधिकार जता रहा एक पक्ष प्रशासन पर आरोप लगा रहा है कि उसने फैसला निष्पक्ष नहीं किया। गत् 3 फरवरी 2021 को हल्द्वानी के तत्कालीन उपजिलाधिकारी ने इस मामले पर फैसला राधा देवी के बच्चों के नाम सुना। दूसरे पक्ष हीरा देवी का नाम उक्त भूमि से निरस्त कर दिया है। जबकि कुमाऊं मंडल विकास निगम को स्टे दे दिया गया है। हालांकि इस फैसले के खिलाफ दूसरा पक्ष कमिश्नर के यहां अपील कर चुका है। अब करोड़ों की हो चुकी इस जमीन विवाद को समझने के लिए इसमें शामिल मुख्य किरदारों से परिचित होना जरूरी है। मुख्य रूप से इसमें पांच किरदार हैं:

गणेश सिंह: हल्द्वानी के गोरखपुर मल्ला निवासी थे। कैनाल रोड़ पर हीरा विहार में इनके नाम 37 बीघा जमीन थी। उनकी दो शादियां हुई। लेकिन दोनों से कोई संतान नहीं हुई। सन् 1950 में उनकी मौत हो गई। इसके बाद उनकी 37 बीघा जमीन पर मालिकाना हक को लेकर विवाद हुआ। 1975 से यह मामला न्यायालय में चला गया। 45 साल बाद इस जमीनी विवाद का निराकरण हुआ।

अमृता देवी: गणेश सिंह की पहली पत्नी हैं। 1967 में इनकी मौत हो गई। 1950 में इनके पति गणेश की मौत होने के बाद उनकी जमीन का एक हिस्सा इनके नाम पर आ गया था। अपनी मौत से पहले इन्होंने अपनी जमीन अपने पति की बहन राधा शाही देवी के नाम कर दिया था। इन्होंने 1955 में वसीयत राधा देवी के नाम की। लेकिन जमीन का दाखिल खारिज नहीं करा सके।

हीरा देवी: गणेश सिंह की दूसरी पत्नी हैं। इनको भी कोई संतान नहीं हुई। पति की मौत के बाद इन्होंने प्रेम सिंह नामक व्यक्ति से दूसरी शादी कर ली थी। इसके बाद प्रेम सिंह से इनकी तीन संतान हुई। हीरा देवी की तीन संतानों में दीवान, मोहन और तारा आदि है। हीरा देवी ने अपने हिस्से की जमीन अपने दूसरे पति की संतानों के नाम कर दी।
प्रेम सिंह: गणेश सिंह की मौत के बाद उनकी पत्नी हीरा देवी ने प्रेम सिंह से शादी की थी।
राधा देवी: गणेश सिंह की इकलौती बहन थी। गणेश सिंह की मौत के बाद उनकी पहली पत्नी अमृता सिंह ने अपनी वसीयत गणेश सिंह की बहन राधा देवी के नाम की। राधा देवी की चार संतानें थी। इंदु बहादुर, कृष्ण बहादुर, पृथ्वी पाल और कृपाल सिंह।

मामला अदालत पहुंचा
राधा देवी के बच्चों ने जमीन पर अपना अधिकार जताते हुए कोर्ट में मामला दाखिल किया। राधा देवी के पुत्र इंदु बहादुर ने इस मामले में 1975 में 229 बी/209 के तहत हीरा देवी और उनके पुत्रों को पार्टी बनाया।

अखबार में इश्तहार
बरेली से प्रकाशित ‘दैनिक जागरण’ समाचार पत्र में इंदु बहादुर और किशन बहादुर ने 27 जून 1984 को प्रकाशित कराया कि उक्त जमीन न्यायालय में विचाराधीन है कोई भी इस पर खरीद-फरोख्त न करे। अगर कोई जमीन खरीदता है तो तो खरीददार खुद हर्जे-खर्चे के दावेदार होंगे। यहां यह भी बताना जरूरी है कि यह मामला पूर्व में हाईकोर्ट इलाहाबाद में भी चला था। इसके बाद उत्तर प्रदेश से पृथक राज्य उत्तराखण्ड बनने के बाद यह मामला उच्च न्यायालय नैनीताल में पहुंचा। यहां 16 सितंबर 2010 को न्यायधीश तरुण अग्रवाल ने इस मामले को लोअर कोर्ट में भेजते हुए कहा कि यह मामला यूपी जेड ए एंड एलआर एक्ट (यूपी जमींदारी विनाश और भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950) के तहत 229बी/209 में चलाया जाए। पिछले 11 साल से मामला हल्द्वानी की एसडीएम कोर्ट में चल रहा था।
केएमवीएन की एंट्री
जमीन का मामला अदालत में विचाराधीन होने के बावजूद कुमाऊं मंडल विकास निगम के पर्यटन विभाग ने 22 बीघा जमीन हीरा देवी से खरीद ली। 1987 में इस जमीन पर अविभाजित उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी कुमाऊं मंडल विकास निगम का होटल बनाना चाहते थे। तब जमीन की रजिस्ट्री होने के बाद राधा देवी के बच्चों ने इस पर आपत्ति लगा दी। इसके बाद जमीन का दाखिल खारिज नहीं हो सका। केएमवीएन ने तब 20 बीघा जमीन 34 लाख हजार में खरीदी थी। बिना जांच पड़ताल किए ही केएमवीएन ने यह जमीन हीरा देवी से खरीदी। हालांकि बाद में केएमवीएन को अपने साथ हुए धोखे का पता चला तो विभाग के द्वारा एक जून 1995 को विक्रेता के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई। 34 साल बाद भी न तो केएमवीएन इस पर कब्जा ले सका है और न ही पैसे वापस हो सके है। फिलहाल केएमवीएन को इस जमीन पर स्टे मिला हुआ है।

हल्द्वानी के ग्राम गोरखपुर के मल्ला तहसील स्थित खाता संख्या-382 के खसरा संख्या – 14, 15, 16, 17, 18, 29, 36, 38, 51, 52 के कुल रकबा 2 ़083 है। इस जमीन पर पूर्व में खातेदार हीरा देवी बेवा गणेश सिंह दर्ज थी। सात माह पूर्व आए हल्द्वानी एसडीएम के फैसले के बाद ही हीरा देवी बेवा गणेश देवी के स्थान पर गणेश सिंह के वारिस चंदन सिंह, कैलाश सिंह पुत्रगण इंदु बहादुर सिंह, हरीश सिंह, अर्जन सिंह, नरेंद्र सिंह, विरेंद्र सिंह, पुत्रगण कृष्ण बहादुर सिंह, कमलाचंद्र पत्नी बृजमोहन पुत्र पृथ्वी पाल सिंह, तुकाचंद्र पुत्र बृजमोहन, पुत्रगण पृथ्वीपाल सिंह का नाम दर्ज किया गया है। लेकिन फैसला आने के सात माह बाद भी अभी तक मामला जस का तस है। जिन लोगों के पक्ष में फैसला सुनाया जा चुका है वह जमीन पर कब्जा लेने को दर-दर भटक रहे हैं।

पूर्व में इस जमीन पर अपना नाम दर्ज करा चुकी हीरा देवी और उनके बच्चों के नाम इस आधार पर हटाए गए है कि 1955 में गणेश सिंह की पहली पत्नी अमृता सिंह ने अपने पति की बहन राधा देवी के पक्ष में एक वसीयत की थी। न्यायालय ने गणेश सिंह की दूसरी पत्नी हीरा देवी का नाम मालिकाना हक से इसलिए खारिज कर दिया कि उन्होंने प्रेम सिंह नामक व्यक्ति के साथ दूसरी शादी कर ली थी। बताया गया कि सरकारी कागजों में हीरा देवी द्वारा अपने पति का नाम गणेश सिंह के बजाय प्रेम सिंह दर्शाया गया था। इस फैसले पर हीरा देवी के पक्ष द्वारा आपत्ति जताते हुए मामला कमिश्नर के यहां ले जाया गया है। वहां उनके पक्ष ने अपील करते हुए कहा है कि हीरा देवी की शादी का मामला सिविल न्यायालय में तय होना चाहिए था।

यह मामला उस समय मीडिया की सुर्खियां बना जब फैसले के बाद उक्त जमीन पर चारदीवारी को लेकर दोनों पक्ष भिड़ गए। दोनों पक्षों में पथराव हुआ। हालांकि स्थानीय पुलिस ने बीच-बचाव करके मामला शांत कर दिया। लेकिन इसके साथ ही यह भी चर्चा जोरों से चली कि इस मामले में एक पक्ष को सत्ता के रसूखदार लोगों का समर्थन मिल रहा है। उनके द्वारा इस जमीन पर खरीद-फरोख्त किए जाने की भी चर्चा है। अब यह मामला प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के दरबार में पहुंचा चुका है। खटीमा की निवासी महिला कमला चंद इस मामले को लेकर देहरादून में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मिली। इस मामले में मुख्यमंत्री के एक करीबी पदाधिकारी का नाम भी सामने आ रहा है। बताया जा रहा है कि वह सत्ता बल के सहारे इस मामले को प्रभावित करना चाह रहे हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस प्रकरण पर शुरुआत में तत्परता दिखाई। अब कमला चंद्र का आरोप है कि 6 माह पूर्व ही उनको न्यायालय से 45 साल में न्याय मिला लेकिन अभी भी जमीन उनके कब्जे में नहीं आ रही है। शुरुआत में उन्हें मुख्यमंत्री से आश्वासन मिला था लेकिन अब वह कुछ नहीं कर रहे हैं।

 

बात अपनी-अपनी

तीन फरवरी 2021 को इस मामले में पीठासीन अधिकारी के यहां से फैसला आ चुका है। फिलहाल एक पक्ष के द्वारा आयुक्त महोदय के यहां अपील की गई है।
मनीष सिंह, उपजिलाधिकारी हल्द्वानी

इस मामले में न्यायिक फैसला आ चुका है। अब मैं कुछ नहीं कहूंगा।
विवेक राय, आयुक्त नगर निगम काशीपुर

कुमाऊं मंडल विकास निगम का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि यहां कोई अधिकारी परमानेंट नहीं रहता। अधिकारी आते और जाते रहते है। कुछ अधिकारी गलत काम करके चले जाते हैं तो अगले जब आते हैं तो वह मामले को उजागर करने की बजाय दबा देते हैं। यही वजह है कि यह मामला भी 30 साल से अधिक समय तक फाइलों में ही दबा रहा। अब जब इस पर फैसला आ गया है तो निगम को चाहिए कि वह न्यायालय के स्टे को हटवाकर फाइनल जजमेंट कराए।
केदार जोशी, पूर्व चेयरमैन कुमाऊं मंडल विकास निगम

दो माह पहले जब चारदीवारी निर्माण को लेकर दोनों पक्ष आपस में भिड़ गए थे। सुरक्षा व्यवस्था कायम करने का जिम्मा हमारा है। तब हमने शांति व्यवस्था कायम करने के उद्देश्य से निर्माण रूकवाया था।
ऋचा सिंह, सिटी मजिस्टेªट हल्द्वानी

मुझे इस मामले की ज्यादा जानकारी नहीं है। मैं संबंधित अधिकारी से बात करके ही कुछ बता सकता हूं।
नरेंद्र सिंह भंडारी, एमडी कुमाऊं मंडल विकास निगम

1970 में गणेश सिंह की पत्नी हीरा देवी ने सरकारी जमीन का 20 गुणा अधिक लगान देकर कब्जा किया था। गणेश सिंह ने दो शादियां की थी। दूसरी पत्नी का नाम अमृता सिंह था। कमला चंद्र खुद को अमृता के परिवार की मानती है। फिलहाल जमीन पर स्टे लगा है। हमने न्यायालय में मीडिया ट्रायल रोकने के लिए भी अपील की है।
कुंवर नृपेन्द्र सिंह रौतेला, हीरा देवी के अधिवक्ता

हम अब कमिश्नर के यहां एप्लीकेशन डालेंगे। जिसमें कहेंगे कि हमारी जमीन से स्टे हटाए और जमीन खाली कराएं। साथ ही उन लोगों से रिकवरी कराएं जिन्होंने कुमाऊं मंडल विकास निगम को अवैध तरीके से जमीन बेची हैं। 45 साल बाद अब हमारे पक्ष में फैसला हो चुका है, हमें अपनी जमीन चाहिए।
विकास कुमार, कमलाचंद के अधिवक्ता

इस मुकदमे को लड़ने वाली मैं तीसरी पीढ़ी हूं। मेरे पति हाईकोर्ट इलाहाबाद जाते थे। उनकी मौत के बाद फिर मैंने न्याय की लड़ाई लड़ी। हम 45 साल बाद केस को जीतकर भी अपनी जमीन पर कब्जा नहीं ले पा रहे हैं। इस संबंध में मैं अपने सीएम पुष्कर सिंह धामी से मिली थी। उन्होंने कब्जा दिलाने का आश्वासन भी दिया। लेकिन वह अपने वादे पर पूरा नहीं उतरे हैं।
कमलाचंद, निवासी खटीमा

 

 

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