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Uttarakhand

सरकार ने सुलगाया पहाड़-मैदान विवाद

देहरादून की अवैट्टा मलिन बस्तियों के पुनर्वास के लिए त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने अध्यादेश लाकर जो तत्परता दिखाई है, उससे पहाड़ के लोग बेहद खफा हैं। सवाल उठ रहे हैं कि पहाड़ के जो 400 गांव संवेदनशील हैं, उनकी सुध कौन लेगा? उनका पुनर्वास किसकी जिम्मेदारी है? क्या आपदा में अपना सब कुछ गंवा देने वालों के बजाए सरकार अवैट्टा कब्जा करने वालों को सहूलियतें देंगी? जनता के बीच सुलगते ये सवाल त्रिवेंद्र सरकार के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं। सरकार के इस कदम ने पहाड़ और मैदान के बीच खाई भी पैदा कर डाली है

रुद्रप्रयाग जिले के तिलवाड़ा में देवरानी-जेठानी बारिश से बचने के लिए एक चाय की दुकान में गई। बारिश रुकने की इंतजार करती इन महिलाओं की बातचीत कुछ यूं शुरू हुई। ‘भुलि सरूली, यू खैरासैंण कु सूरज कख चमकणु च। द दीदी, यू निर्भैं त दून मां चमकणु च/सुणि नी तुमन सबी धाणी देहरादून। अपणा नेगी जी त कई साल पैलि ही समझ गै छां। हम त मूरख छां, अब बी नी समझणां छा।’’ मतलब कि सरूली। ये खैरासैंण का सूरज कहां चमक रहा है। दीदी, ये सूरज दून में चमक रहा है। आपने सुना नहीं, सब कुछ देहरादून। अपने नरेंद्र सिंह नेगी जी तो कई साल पहले ही समझ गए थे। हम तो मूर्ख थे। अभी भी नहीं समझ रहे हैं।

देवरानी-जेठानी के बीच हुए इस वार्तालाप का जिक्र करते हुए स्थानीय निवासी ललित डिमरी कहते हैं कि एक ओर पहाड़ है और दूसरी और मैदान। मैं मैदान और पहाड़ में खाई का पक्षधर नहीं हूं लेकिन जनता को यह तो समझना होगा कि मैदान में जो मलिन बस्तियां हैं वह क्यों और कैसे बसी? देहरादून में मलिन बस्ती बसाने वाले भाजपा के चारों विधायक इन बस्तियों के पक्ष में इसलिए हैं कि वह उनका वोट बैंक है। लेकिन सवाल उठता है कि पहाड़ के विधायकों को लकवा क्यों मार गया कि उन्होंने पहाड़ों की बस्तियों का मुद्दा नहीं उठाया। सेमी गांव के विस्थापन की चार साल में कोई कवायद नहीं हुई। यहां के लोग आसमान में बादल देखते ही थरथरा उठते हैं। रुद्रप्रयाग और पिथौरागढ़ के कई गांव आपदा की दृष्टि से संवेदनशील हैं। इन गांवों का पुनर्वास आज तक नहीं हो पाया है। उत्तराकाशी और चमोली जिले के इको सेंसिटिव जोन के 280 गांव उन भाजपा विधायकों को नजर नहीं आते जो विकास की डगर में सबसे पीछे हाशिए पर हैं। पहाड़ के 35 विधायक इस बार भी चुप रहे और किसी ने सरकार के अध्यादेश को लेकर कोई सवाल नहीं उठाया। पूरे पहाड़ की एक भी विधानसभा सीट ऐसी नहीं है जहां एक साल में 5 करोड़ के भी विकास कार्य हुए हैं। लेकिन मलिन बस्तियों के मसीहा उमेश शर्मा ‘काऊ’ के क्षेत्र में एक अरब रुपये की योजनाओं पर काम चल रहा है।

मोहित डिमरी पहाड़ के एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो भाजपा सरकार द्वारा देहरादून की मलिन बस्तियों के लिए जारी किए गए अध्यादेश से खिन्न हैं। डिमरी ही नहीं ऐसे बहुत से लोग हैं जो सरकार से बेहद खफा हैं। दरअसल हाल में 26 जुलाई को भाजपा सरकार ने कैबिनेट में एक प्रस्ताव पास कराया है। नगर निकायों एवं प्राधिकरणों के लिए विशेष प्रावधान, अध्यादेश 2018 के लागू होते ही प्रदेश में एक बार फिर पहाड़ बनाम मैदानवाद का जिन्न बाहर आ गया है।

नैनीताल हाईकोर्ट ने देहरादून शहर का अतिक्रमण चार सप्ताह में ध्वस्त करने के आदेश दिए थे। 26 जून को हाईकोर्ट के आदेश की कॉपी मिलते ही अतिक्रमण हटाओ टास्क फोर्स ने 28 जून से अभियान शुरू किया। 26 जुलाई को हाईकोर्ट द्वारा दिया गया चार सप्ताह का समय समाप्त हो गया। इस दौरान देहरादून में टास्क फोर्स ने अतिक्रमण ध्वस्त किए। लेकिन जैसे ही अतिक्रमण हटाओ टास्क फोर्स का बुल्डोजर मलिन बस्तियों की तरफ घूमा तो देहरादून के चार विधायक इसके विरोध में खड़े हुए। मलिन बस्तियों को किसी भी सूरत में टूटने से बचाने के लिए विधायकों ने अपनी ही सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति के तहत मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की घेराबंदी कर दी। आगामी निकाय चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर वोट बैंक की नजर से दिखने वाली मलिन बस्तियों पर आनन -फानन में ही अध्यादेश लाया गया। इस अध्यादेश को कैबिनेट और राज्यपाल से पास कराया गया। अध्यादेश में स्पष्ट किया गया कि आगामी तीन साल तक मलिन बस्तियों को नहीं उजाड़ा जाएगा। यही नहीं, बल्कि अध्यादेश में यह भी स्पष्ट किया गया कि मलिन बस्तियों का विस्थापन भी किया जाएगा। तय हुआ कि बस्ती के लाखों लोगों को बसाने के लिए जल्द ही खाली पड़ी सरकारी जमीन चिÐत की जाएगी। सरकार का स्पष्ट कहना है कि 2020 तक मलिन बस्तियों के वाशिंदों को हर हालत में आवास मुहैया कराए जायेंगे। अकेले देहरादून में ही 129 मलिन बस्तियां हैं जो रिस्पना और बिंदाल नदियों के किनारों पर स्थित हैं। इन बस्तियों में निवास करने वाले करीब दो लाख वोटरों पर भाजपा की नजर है। मलिन बस्तियों को बचाने और बसाने की सरकार की इस कार्यवाही के बाद पहाड़ के आपदा पीड़ित लोगों में त्रिवेंद्र सिंह रावत और उनके उन चार विधायकों के खिलाफ आक्रोश पनप गया जो देहरादून में विस्थापन के लिए पैरवी कर रहे थे। यह चार विधायक हैं गणेश जोशी, उमेश शर्मा ‘काऊ’, खजान दास और हरबंस कपूर।

पहाड़ के करीब 400 गांव आज भी ऐसे हैं जो संवेदनशील और अति संवेदनशील के दायरे में हैं। कुछ तो ऐसे हैं जहां लोग आपदा की मार से अपना सब कुछ लुटा बैठे हैं। जान माल का नुकसान होने के बाद भी वह मौत के साए में जिंदगी बसर करने को मजबूर हैं। खुद सरकारी विभागों के सर्वे में इन गांवों को रहने के लिए असुरक्षित माना गया है। बावजूद इसके इन गांवों के विस्थापन की कोई ठोस योजना नहीं बन पाई है। ऐसा नहीं है कि गांवों को मैदान के सुरक्षित इलाकों में विस्थापित कराने के लिए कोई प्लान न बना हो, बल्कि योजनाएं खूब बनीं लेकिन यह कार्यवाही महज कागजों तक सीमित रह गई। नीति आयोग की बैठकों में भी इन गांवों के मुद्दे लगातार उठते रहे हैं। राज्य सरकार का तर्क है कि पहाड़ के लोगों के पुनर्वास एवं विस्थापन के लिए करीब 10 हजार करोड़ के पैकेज की जरूरत है। राज्य सरकार अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति और जमीन की कमी का बहाना बनाकर इससे बचती रही है। यही नहीं बल्कि आर्थिक संसाधनों की कमी बताकर बार-बार गेंद केंद्र के पाले में डाली जाती रही है। राज्य सरकार हमेशा कहती रही है कि केंद्र में विरोधी पार्टी की सरकार होने के चलते राज्य को आर्थिक पैकेज नहीं दिए जा रहे। केंद्र सरकार उनके साथ सौतेला व्यवहार कर रही है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। डबल इंजन की सरकार के पास फिलवक्त ऐसी कोई बहानेबाजी का मौका भी नहीं रह जाता है। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कहा था कि केंद्र और राज्य में भी हमारी सरकार रहेगी तो डबल इंजन मिलकर पहाड़ का विकास करेंगे।

पिथौरागढ़ निवासी मनोज बिष्ट की मानें तो देहरादून का मलिन बस्ती अध्यादेश सरकार के लिए सिरदर्द बन गया है। एक ऐसे समय में जब पहाड़ के सैकड़ों गांवों में आपदा आने पर भी राहत कार्य सुचारू नहीं हो रहे हैं। आपदा पीड़ितों को रहने के लिए टेंट तक की व्यवस्था नहीं हो पा रही है। पीड़ित लोग बरसात के मौसम में दूसरे लोगों के घरों में पनाह लिए हुए हैं। वहीं दूसरी तरफ देहरादून जैसे अवैध मलिन बस्ती मामले में सरकार की अध्यादेश लाने की आतुरता से पहाड़ के लोगों में नाराजगी के भाव पैदा हो गए हैं। बिष्ट इस मामले में 2013 की आपदा का जिक्र करते हुए कहते हैं कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी सरकार को समर्थन कर रहे पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की कुर्सी भी इसी आपदा की भेंट चढ़ गई थी। ऐसा कहीं त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ ना हो जाए।

मैदान की ओर पलायन करते नेता

जनसभाओं में जब माईक हाथ में आ जाता है तो पलायन पर भाषणबाजी शुरू हो जाती है। लोगों को पलायन से होने वाले नुकसान का विस्तृत ब्यौरा दिया जाता है और अंत में पहाड़ों से पलायन जैसी गंभीर समस्या को विरोधी पार्टी के पाले में डाल दिया जाता है। यह वही नेता हैं जिन्हें लोग अपना जनप्रतिनिधि चुनते हैं। ग्रामसभा से लेकर लोकसभा तक का चुनाव लड़ने वाले यही नेता मतदाताओं को पलायन पर रोक की घुट्टी पिलाते हैं। तब लगता है कि चुनाव जीतने के बाद अब ये पहाड़ों में पलायन पर रोक लगा देंगे। लेकिन नेताओं का ही सबसे पहले पहाड़ से पलायन होता है। उनका सीधा ब्रेक मैदान में लगता है। आज पहाड़ के सूनेपन का ठीकरा नेता बेशक जनता के सिर पर फोड़ते हैं लेकिन इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार जनता के जनप्रतिनिधि ही होते हैं। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने 2012 का विधानसभा उपचुनाव सीमांत और दुर्गम इलाके धारचूला, मुन्स्यारी से लड़ा तो उनकी प्रसंशा हुई। लेकिन 2017 में उन्होंने पहाड़ के लोगों की भावनाओं के विपरीत मैदान की हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा से चुनाव लड़ा। इसी तरह पूर्व मुख्यमंत्री डॉ ़ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ कर्णप्रयाग एवं थलीसैंण से चुनाव लड़ते रहे, लेकिन बाद में डोईवाला और फिर हरिद्वार चले गए। मूलतः पौड़ी निवासी वर्तमान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत डोईवाला से विधायक हैं। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने सहसपुर से चुनाव लड़ा। पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने पहले खुद और बाद में अपने पुत्र सौरव बहुगुणा को सितारगंज से चुनाव लड़ाया। कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य पूर्व में धारी से चुनाव लड़े तो 2012 में वह पहाड़ से नीचे उतरकर बाजपुर में आ गए। यही नहीं बल्कि नेताओं के आशियाने भी पहाड़ की बजाय मैदान में बन चुके हैं। आज प्रदेश के अधिकतर नेता हल्द्वानी, देहरादून, कोटद्वार, रुद्रपुर, हरिद्वार, रुड़की और रामनगर के साथ ही खटीमा से निवास करने लगे हैं।

 

बात अपनी-अपनी

देहरादून का मामला अतिक्रमण से जुड़ा है जबकि पहाड़ का मामला आपदा का है। आपदा के लिए हमें बहुत बड़ी जमीन चाहिए। भूमि की कमी के कारण यह अभी संभव नहीं है। हालांकि आपदा से प्रभावित 400 गांवों को बसाने के लिए जमीन की तलाश की जा रही है। देहरादून में 129 मलिन बस्तियां हैं। जिन्हें कोर्ट ने हटाने के लिए कहा। ऐसे में लोग सड़क पर आ जाते। इसलिए हमारी सरकार ने एक्ट पास किया है।
अजय भट्ट, प्रदेश अध्यक्ष भाजपा

अकेले रानीखेत के चार गांव आपदा की जद में हैं। कभी भी उन गांवों के वाशिंदों पर आपदा का कहर टूट सकता है। केदारघाटी के पीड़ितों के लिए अभी तक भूमि की व्यवस्था नहीं की गई है। टिहरी के पूरे लोग अभी तक विस्थापित नहीं हो सके हैं। हालांकि मैं मलिन बस्तियों का विरोध नहीं कर रहा हूं। लेकिन उजड़ते पहाड़ों को भी बसाना चाहिए।
करण माहरा, उपनेता प्रतिपक्ष

विस्थापन का पहला हक तो पहाड़ के लोगों का बनता है। यह लोग दशकों से आपदा की मार से जूझ रहे हैं। भय और मौत के साए में जी रहे पहाड़ के लोगों को पुनर्वासित करना जरूरी था। देहरादून की मलिन बस्तियों के लिए जो सरकार अध्यादेश लाई है वह भी ठीक है।
बच्ची सिंह रावत, पूर्व सांसद

इस पर पहले कांग्रेस सरकार प्रस्ताव तैयार कर चुकी थी। लेकिन वह सिर्फ दर्जन भर परिवारों के लिए था। हमारी सरकार ने मलिन बस्तियों में रहने वाले सभी गरीब और बेसहारा लोगों का पुनर्वास किया है। पहाड़ के लोगों को भी जल्द विस्थापित किया जाएगा।
पुष्कर धामी, विधायक खटीमा

हमारी सरकार जो कर रही है वह ठीक है। सरकार पहाड़ की कोई उपेक्षा नहीं कर रही है। फिलहाल प्राथमिकता मलिन बस्तियों को दी गई है क्योंकि उन पर कोर्ट की तलवार लटकी हुई थी।
सुरेंद्र सिंह जीना, विधायक सल्ट

सरकार जिस तरह आनन-फानन में देहरादून की मलिन बस्तियों के लिए अध्यादेश लाई है उसी तरह से पहाड़ के आपदा प्रभावित 400 गांवों के लिए भी अध्यादेश लाकर उन्हें विस्थापित करना चाहिए।
मदन बिष्ट, पूर्व विधायक

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