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उत्तराखण्ड सरकार की लचर कार्यशैली पर न तो जनता को विश्वास रहा और न अधिकारी ही इससे संतुष्ट हैं। नतीजा यह है कि आम लोगों से लेकर उच्च अधिकारी तक अपने हित प्रभावित होने पर हाईकोर्ट की शरण में जाने को विवश हैं। त्रिवेंद्र रावत सरकार के महज तीन वर्षीय कार्यकाल के दौरान सरकारी निर्णयों के खिलाफ 19 हजार 614 याचिकाएं दायर हुई हैं। इनमें से 574 जनहित याचिकाएं हैं। इतनी बड़ी संख्या में दाखिल याचिकाओं से साफ है कि राज्य सरकार हर मोर्चे पर असफल साबित हो रही है। अब तो लोग यहां तक कह रहे हैं कि जब सब कुछ हाईकोर्ट जाने पर ही होना है तो ऐसी सरकार की भला क्या जरूरत

 

लोकतंत्र के चार स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका तथा मीडिया माने गए हैं। इन चारों स्तंभों के स्वतंत्र और सही काम करने से ही देश एवं किसी प्रदेश में लोकतंत्र जीवित रह सकता है। अगर इनमें से किसी भी एक पर सवाल खड़े होने लगें तो स्थिति बेहद गंभीर हो जाती है। कुछ इसी तरह से उत्तराखण्ड में भी हो रहा है। राज्य में लोकतंत्र के दो स्तंभों विधायिका और कार्यपालिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सवाल भी इसलिए कि मौजूदा त्रिवेंद्र रावत सरकार के महज पौने तीन साल के कार्यकाल में ही 19 हजार 614 याचिकाएं न्यायालयों में दाखिल हो चुकी हैं। सरकार के निर्णयों के खिलाफ इस तरह से याचिकाएं दाखिल होने से साफ है कि जनता और खुद सरकारी अधिकारियों में सरकार के निर्णयों के खिलाफ भारी असंतोष है। अपने अधिकारों के लिए उन्हें न्यायालय की शरण में जाने को मजबूर होना पड़ रहा है।

त्रिवेंद्र राज में 574 जनहित याचिकाएं दायर हुई हैं। जैसे कि पूर्ववर्ती भाजपा की रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ सरकार के कार्यकाल में भी राज्य की जलविद्युत परियोजनाओं के आंवटन और सिटूर्जिया भूमि मामले में जनहित याचिकाएं हाईकोर्ट में दाखिल की गई थी। हाईकोर्ट ने इनका निस्तारण भी किया था।

एमएस यानी मिसलेनियस सर्विस, व्यक्तिगत तौर पर दाखिल होने वाली याचिकाएं होती हैं। जेसे कि हाल ही में निजी आयुर्वेद मेडिकल कॉलेजों की फीस वृद्धि के मामले में छात्रों को लगा कि उनके साथ अन्यास हो रहा है तो उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। जिस पर हाईकोर्ट के द्वारा निर्णय आया है। माजूदा समय में इस श्रेणी में दाखिल होने वाली याचिकाओं की संख्या 6998 तक जा पहुंची है।

एसएस यानी सर्विस सिंगल, इस श्रेणी में सरकारी कर्मचारियों ने अपने-अपने विभागों के निर्देशों और आदेशों के खिलाफ तीन वर्ष में 10284 याचिकाएं दाखिल की हैं। एसबी यानी सर्विस ब्रांच श्रेणी में सरकारी अधिकारियों के द्वारा अपने स्थानांतरण और अपने सेवाकाल के दौरान के लाभ और अधिकार के लिए हाईकोर्ट में 1758 याचिकाएं दाखिल की हैं। सबसे चर्चित मामला भरतीय वन सेवा के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी का लिया जा सकता है जिसमें उन्होंने अपने सर्विस अधिकारों के लिए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।

वर्तमान सरकार के महज तीन वर्षीय कार्यकाल में 574 जनहित याचिकाएं राज्य के न्यायालएं में दखिल हुई हैं। वर्ष 2017 में 172, 2018 में 232 तथा 2019 में 170 जनहित याचिकाएं दाखिल हुई हैं। जाहिर है कि सरकार के कई ऐसे निर्णय रहे हैं जिनसे कहीं न कही जनहित प्रभावित होने की आशंकाएं पैदा हुई हैं। सरकार की हठधर्मिता के चलते लोग न्यायालय से न्याय पाने को विवश हुए।

एमएस सर्विस श्रेणी के तहत वर्ष 2017 में 2207, 2018 में 2621 तो वर्ष 2019 में 2170 याचिकाएं दाखिल हुई हैं। तीन वर्ष में इस श्रेणी की याचिकाओं की संख्या 6998 हो चुकी है। इसी तरह से एसएस यानी सर्विस सिंगल श्रेणी के तहत वर्ष 2017 में 3663, वर्ष 2018 में 4304 तथा वर्ष 2019 में 2317 याचिकाएं हाईकोर्ट में दाखिल हुई। महज तीन वर्ष में इस श्रेणी की याचिकाओं की संख्या 10284 तक हो चुकी है जो कि सभी प्रकार की श्रेणियों में सबसे ज्यादा है। इन आंकड़ों से समझा जा सकता है कि सरकार के निर्णयों से स्वयं उसके ही कर्मचारी संतुष्ट नहीं हैं। वे अपने अधिकारों के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा रहे हैं। एसबी यानी सर्विस ब्रांच श्रेणी में भी तीन वर्ष के दौरान बड़े पैमाने पर हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई हैं जो अपने आप में बेहद गंभीर है। वर्ष 2017 में 558 याचिकाएं हाईकोर्ट में दाखिल की गई थी, तो 2018 में इनकी संख्या बढ़कर 683 तक पहुंच गई। वर्ष 2019 में अभी तक 477 याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं। जाहिर है कि वर्तमान सरकार के कई ऐसे निर्णय समाने आए हैं जिनसे प्रदेश की नौकरशाही असंतुष्ट है और उनके अधिकारां पर सरकार चोट कर रही है। ऐसे में राज्य सरकार के शासन पर सवाल खड़े होना कोई बड़ी बात नहीं है।

महज तीन वर्ष के कार्यकाल में ही 19 हजार 614 याचिकाएं दाखिल होना कई सवाल खड़े करने के लिए काफी है। जनता के द्वारा जनता के लिए चुनी गई सरकार के सिद्धांत को यह आंकड़े तार-तार करने के लिए पर्याप्त हैं। इसमें सबसे पहली बात तो यही मिल रही है कि सरकार जनता की भवनाओं के अनुरूप काम नहीं कर रही है। सरकार के निर्णय जनहित में कम और सरकार के हित में ज्यादा दिखाई दे रहे हैं।

आश्चर्य की बात यह है कि अधिकतर मामलों में सरकार को हाईकोर्ट से मिले आदेशों के बाद पीछे हटना पड़ता रहा है। बावजूद इसके सरकार कोई ऐसी ठोस नीति नहीं बना पाई है जिसमें किसी भी विवाद और मतभेद की गुंजाइश न हो। पूर्व में दिये गये ऐसे फैसलों की बहुत बड़ी तादात रही है। इसके बावजूद वर्तमान सरकार अपने निर्णय जबरन थोप रही है जिसके चलते जनता को हाईकोर्ट से न्याय पाने के प्रयास करने पड़ रहे हैं। इसमें सबसे ज्यादा सवाल कार्यपालिका और विधायिका पर ही उठ रहे हैं जो कि लोकतंत्र में किसी भी चुनी हुई सरकार के लिए बहुत गंभीर है।

एमएस यानी मिसलेनियस सर्विस में दाखिल 6998 मामले हाईकोर्ट में सिर्फ इसलिए पहुंचे हैं कि वर्तमान सरकार और उसके विभाग सही तरीके से काम नहीं कर रहे हैं। यह सरकार और उसके शासन के लिए बेहद गंभीर विषय है। यह भी गौर करने वाली बात है कि सरकार को इस श्रेणी में दाखिल की गई याचिकाओं के निस्तारण में हाईकोर्ट के द्वारा दिये गये आदेशां का भी पालन करवाने में भी रुचि नहीं रही है। हाल ही में प्राइवेट आयुर्वेद कॉलेजां के छात्रों द्वारा दाखिल की गई याचिका पर हाईकोर्ट द्वारा दिए गए आदेशां का पालन करवाने में सरकार नाकाम रही है। 50 दिनों तक सरकार हाईकोर्ट के आदेशों का पालन नहीं करवा पाई और जब मामला हाईकोर्ट की आवमानना तक जा पहुंचा तो अचानक सरकार अपने बचाव के लिए कोर्ट के आदेश का पालन करवाने के लिए आदेश जारी करने में मजबूर हो जाती है।

किसी सरकार के बेहतर कामकाज की दृष्टि से सरकारी कर्मचारियों की कार्यशैली और उससे जनता को मिलने वाला लाभ महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन वर्तमान सरकार के कार्यकाल में एसएस यानी सर्विस सिंगल के मामले में 10284 याचिकाएं दाखिल होने से स्पष्ट है कि सरकारी कर्मचारी सरकार के निर्णयों से नाखुश हैं। उनको लगता है कि सरकार सेवाकाल में उनके लाभ और अधिकारों का सरकार हनन कर रही है। इसके चलते वे हाईकोर्ट के दरवाजे पर पहुंच रहे हैं। उनको सरकार के बजाये न्यायालय से न्याय मिल रहा है।

वर्तमान सरकार के तीन वर्षीय कार्यकाल में यह देखा जा रहा है कि वेतन वृद्धि, पेंशन तथा स्थानांतरण के मामलों में सबसे ज्यादा कर्मचारी प्रभावित हो रहे हैं, जबकि सरकार इन मामलां को आसनी से सुलझा सकती है। यहां तक कि किसी कर्मचारी के भ्रष्टाचार के मामलों में सरकार द्वारा की जा रही कार्यवाही पर भी याचिकाएं दाखिल हो रही हैं। सरकार अपनी ताकत और इकबाल का सही तौर पर उपयोग करने से पीछे रही है।

आश्चर्यजनक है कि याचिकाओं के संबंध में आए आदेशों या स्थगन आदेशों के मामलों में भी सरकार लचर रुख बनाए हुए हैं। कई मामलां में तो सरकार सुनवाई में भी पीछे रही है जिसके चलते ऐसे मामले जिनमें त्वरित कार्यवाही हो सकती है, वे लंबे समय से न्यायालयों में लंबित हैं।

शासन को सुचारू तौर पर चलाने के लिए नौकरशाही के कामकाज को देखा जाता है। हालांकि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में राज्य की नौकरशाही के बेलगाम होने के मामले सबसे ज्यादा सुनाई पड़ते हैं, लेकिन उसी नौकरशाही के अधिकार और हितां पर सवाल उठने के मामले भी हाईकोर्ट में चल रहे हैं। यह राज्य के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं।

कुछ माह पूर्व राज्य में सरकार की नीति के चलते आईएएस और पीसीएस अधिकारियों के बीच विवाद सामने आ चुका है। जिसमें कैडर को लेकर भी विवाद सामने आया था यहां तक कि विभागों में तैनाती को लेकर सबसे ज्यादा विवाद सामने आया था। आरेप लगाया गया कि आईएएस अधिकारियों को सबसे ज्यादा तवज्जो दी जा रही है, जबकि पीसीएस अधिकारियों को खाली बैठा दिया जा रहा है। इसके विपरीत आईएएस अधिकारियों का आरोप था कि जिन पदां पर आईएएस होते हैं उनमें सरकार पीसीएस अधिकारियों को तैनात कर रही है। इस तरह के विवाद याचिकाओं के तौर पर हाईकोर्ट पहुंच जाते हैं और इससे सरकार का कामकाज तो प्रभावित होता ही है साथ ही जनता को भी इससे दो-चार होना पड़ता है। इसके अलावा आजकल प्रमोशन पर आरक्षण के मामले में भी हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल किए जाने की चर्चाएं सामने आ रही हैं। सरकार अपने हित के लिए ऐसे निर्णयों को सामने ला रही है जिससे विवाद बढ़े और मामले हाईकोर्ट के दरवाजे तक पहुंचे। महज तीन वर्ष में ही 19 हजार 614 याचिकाएं दाखिल होने से स्पष्ट हे कि सरकार के सभी अंग जनता, कर्मचारी और अधिकारी कहीं न कहीं उसकी कार्यशैली से बुरी तरह से प्रभावित हो रहे हैं। मजबूरी में वे हाईकोर्ट जा रहे हैं।

 

बात अपनी-अपनी

सरकार बहुत बेहतर और ऐफिशियेंट काम कर रही है। रही बात याचिकाएं दाखिल होने की तो इसे दो प्रकार से देखा जाना चाहिए। कई बार ऐसा होता है कि लोगों की अपेक्षाऐ बहुत होती हैं जिस कारण ऐसा होता है। कुछ लेगों के पर्सनल मैटर होते हैं जिसमें सिनियरिटी प्रमुख कारण होता है। और भी कारण होते हैं। तीसरी बात यह है कि कई मामलों में कानूनी जानकारी नहीं होती। जानकारी के अभाव में लोग याचिका तो दाखिल कर देते हैं, लेकिन उनका कोई आधार नहीं होता। मेरे सामने कई ऐसे मामले आए हैं। जैसे कि कोई पद निकला और उसमें कोई निरस्त हो गया या उसका चयन नहीं हुआ है, तो वह कोर्ट चला गया। लेकिन उस पद के लिए उसकी योग्यता नहीं थी। बाद में जब याचिका खारिज हो जाती है तो तब पता चलता हे।

मुन्ना सिंह चौहान, प्रदेश प्रवक्ता भाजपा

हालांकि पहले भी याचिकाएं दाखिल होती रही हैं, लेकिन वर्तमान सरकार के महज तीन वर्ष के कार्यकाल में तो हद ही हो गई। 19 हजार 614 याचिकाएं कोर्ट में दाखिल हुई हैं, तो स्थिति बहुत गंभीर बनती है। इससे यह स्पष्ट है कि सरकार कोई भी काम सही नहीं कर रही है। सरकार अपने ही उद्देश्य को भूल चुकी है। जब सरकार के बजाय न्यायालय ही काम करेगा तो फिर सरकार की जरूरत क्या है। प्रदेश की भी जरूरत नहीं है। अब समय आ चुका है कि उत्तराखण्ड राज्य के भविष्य के लिए बड़े पैमाने पर सोचा जाए। इसे अब केंद्र शासित राज्य बना देना चाहिए। आप देखिए कि हर काम के लिए जनता को हाईकोर्ट की शरण में जाना पड़ रहा है। जन सुविधाएं नहीं हैं तो हाईकोर्ट के आदेश से सुविधाएं जोड़ी जा रही हैं। कर्मचारियों के हितों पर सरकार चोट कर रही है तो उन्हें भी हाईकोर्ट से ही न्याय मिल रहा है। कर्मचारियों के पेंशन का मामला हो तो वह भी हाईकोर्ट के आदेश से हो रहा है तो फिर सरकार कहां है। बुनियादी मामलों में भी हाईकोर्ट जाना साफ करता है कि सरकार पूरी तरह से फेल है।
रघुनाथ सिंह नेगी, अध्यक्ष जनसंघर्ष मोर्चा

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