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Uttarakhand

सालभर सवालों में रही सरकार

यह अलग बात है कि 2019 में भाजपा राज्य में हर चुनाव जीतती रही, लेकिन त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार के कामकाज से जनता बेहद हताश और निराश है। हर मोर्चे पर विफल रही सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार की पोल कैग ने भी खोली है। अपराधों से जनता त्रस्त रही। जहरीली शराब ने लोगों की जानें ली और सरकार तीर्थस्थलों में भी शराब के ठेके खुलवाने के लिए बेचैन रही। आम लोग ही नहीं, बल्कि खुद सरकार के कर्मचारी उसकी नीतियों और निर्णयों से खफा होकर न्यायालयों में गए। हिलटॉप, श्राइन बोर्ड और आयुष कॉलेजों में फीस वृद्धि के विवाद प्रदेशभर में चर्चित रहे। मुख्यमंत्री और सरकारी विभागों के भ्रष्टाचार को लेकर स्टिंग ऑपरेशन भी खूब सुर्खियां बटोरते रहे

 

वर्ष 2019 उत्तराखण्ड प्रदेश के लिए कई कड़वे और मीठे अनुभवों वाला रहा है। राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों के अलावा अपराधों के नए स्वरूप को लेकर भी राज्य खूब चर्चाओं में रहा है। खनन, शराब के करोबार, प्रदेश पर बढ़ता कर्ज का बोझ, पत्रकारिता पर अकुश के मामलां के अलावा अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम लगाये जाने जैसे मामले भी उत्तराखण्ड में खूब सुनाई दिए। सरकार के खिलाफ नाराजगी की खबरें अखबारां की सुर्खियों में बनी रही तो इस वर्ष तकरीबन हर चुनाव में सरकारी की बम्पर जीत का भी माहौल देखने को मिलता रहा। केंद्र सरकार द्वारा प्रदेश को जमकर सौगतें देना और वर्षों से लंबित जमरानी बांध के लिये अनुमति और करोड़ों की स्वीकृति जैसे मामले भी इस वर्ष के खाते में दर्ज हो चुके हैं। पूरे वर्ष सरकार के कामकाज को लेकर भी बड़े-बड़े विवाद सामने आते रहे हैं। सरकार की नीतियों और उनके क्रियान्वयन को लेकर जनता में सरकार के खिलाफ आवाजें उठती रही हैं। इन सभी मामलों को एक के बाद एक देखा जाए तो इस वर्ष सरकार की साख पर सवाल उठते रहे और उसे कई चुनौतियों से जूझना पड़ा है।

भ्रष्टाचार और अनियमितताएं : पूरे साल प्रदेश में भ्रष्टाचार को लेकर खासा हंगामा बना रहा। सदन से लेकर सड़कों पर सरकार के खिलाफ विपक्ष हमलावर होता रहा, लेकिन सरकार विपक्ष के आरोपां को खारिज करती रही। जबकि इस दौरान स्वयं मुख्यमंत्री कार्यालय और मुख्यमंत्री के नजदीकी मित्रों के स्टिंग ऑपरेशनां की गूंज पूरे वर्ष भर सुनाई देती रही। स्टिंग के प्रकरण का मामला हाईकोर्ट की दहलीज तक जा पहुंचा और इससे सरकार की फजीहत भी हुई।

दिसम्बर माह में विधानसभा सत्र के दौरान कैग की रिपोर्ट सदन में रखी गई जिसमें कई मामलो में अनियमितताओं के मामलां का केग ने खुलासा किया है। यहां तक कि एक ही वित्तीय वर्ष में राज्य को दो हजार 231 करोड़ का भारी नुकसान सरकार के विभागों की गंभीर लापरवाही और अकर्मण्यता के चलते होने की बात कैग रिपोर्ट में सामने आ चुकी है।

इसके अलावा रायपुर में निर्माणाधीन दो फलाई ओवरां के निर्माण में भी भारी अनियमितताओं के मामले सामने आए जिस पर स्वयं मुख्यमंत्री द्वारा संज्ञान लिया गया और संबंधित अधिकारियों पर कार्यवाही की गई, जबकि राज्य के इतिहास में संभवतया पहली बार लोक निर्माण विभाग के 41 इंजीनियरों के खिलाफ भ्रष्ट आचरण और अनियमितताओं के आरोपों पर पदावनत करने का निर्णय भी लिया गया है।

स्टिंग ऑपरेशनों का दंशः वर्ष 2019 प्रदेश में स्टिंग वर्ष कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। समाचार प्लस न्यूज चैनल के सीईओ और पत्रकार उमेश शर्मा के खिलाफ ब्लैकमेलिंग के आरोपों में पुलिस द्वारा की गई कार्यवाही से सरकार और पत्रकारिता पर कई सवाल खड़े होते रहे। उमेश शर्मा के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा बड़ी कार्यवाहीयां की गई यहां तक कि उमेश को राजद्रोह के मामले में भी आरोपी बनाया गया। हालांकि उमेश शर्मा को जमानत मिल चुकी है और यह मामला न्यायालय में लंबित चल रहा है। उमेश शर्मा ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के खिलाफ भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगाते हुए सोशल मीडिया में कई वीडियो जारी किए। यहां तक कि मुख्यमंत्री सहायता पोर्टल पर भी शिकायतें दर्ज करवाई। इसी कड़ी में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की सरकार के दौरान सामने आए स्टिंग ऑरपरेशन के मामले में सीबीआई द्वारा मुदकमा दर्ज किया गया जिसमें हरीश रावत और वर्तमान कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत को भी आरोपी बनाया गया है।

नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश के द्वारा सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों के स्टिंग ऑपरेशनां को सार्वजनिक करने की धमकी तक दी गई हालांकि इंदिरा हृदयेश ने आज तक वे स्टिंग ऑपरेशन सार्वजनिक नहीं किए हैं।

इसी तरह से आबकारी विभाग और खनन तथा शराब कारोबार से जुड़े मामलां के कई वीडियो सोशल मीडिया में खूब छाये रहे। इनमें एक आबकरी विभाग के अधिकारी के वीडियो के सामने आने के बाद विभाग द्वारा विभागीय कार्यवाही तक की जा चुकी है।

शराब और नशा : 2019 में शराब और नशे के करोबार को लेकर खूब चर्चाएं रही। अवैध शराब के तीन मामले राज्य में सामने आ चुके हैं। मार्च 2019 से लेकर अक्टूबर 2019 तक राज्य में अवैध शराब के करोबार से दर्जनों मौतें तक हुई हैं। मार्च माह में हरिद्वार जिले के रुड़की तहसील के उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे गांवों में जहरीली शराब के करोबार और उसके सेवन से 40 लोगों की मौतें हुई हैं। टिहरी जिले में इसी तरह से जहरीली शराब के चलते तीन मौतें और राजधानी देहरादून में 7 मोतें हुई हैं।
इन सभी मौतां के पीछे प्रदेश में अवैध शराब के करोबार का कारण बताया जाता है। इस करोबार को पुलिस और आबकारी विभाग के अलावा प्रदेश की राजनीति द्वारा भी सरंक्षण दिए जाने के आरोप लगते रहे हैं। देहरादून में हुए जहरीली शराब कांड का मुख्य आरोपी भाजपा से जुड़ा नेता बताया जाता है, जबकि पहले भी राजनीतिक संरक्षण के चलते मुख्य आरोपी अजय सोनकर अपना अवैध शराब के करोबार को खड़ा करता रहा है। कांग्रेस और भाजपा में राजनीतिक घुसपैठ के चलते आसानी से इस तरह का कारोबार पनता रहा।

हिलटाप प्रकरणः सरकार की सबसे ज्यादा फजीहत शराब के करोबार को बढ़ावा देने पर ही हुई है। कुंभ क्षेत्र में शामिल किए गए देवप्रयाग के समीप राज्य सरकार द्वारा शराब के बॉटलिंग कारखाने की इजाजत दिए जाने के बाद पूरे प्रदेश में आंदोलन तक हुए हैं। इसके अलावा कई अन्य स्थानों में शराब के कारखाने खोले जाने की भी सरकार द्वारा इजाजत देने के चलते जनता के अलावा धार्मिक और संत जगत से भी सरकार के खिलाफ आक्रोश बढ़ता रहा। हालांकि अब यह मामला उतना नहीं रहा जितना शुरुआती दौर में देखा जा रहा था, लेकिन आज भी संत समाज इसको लेकर मुखर है। स्वयं भाजपा की फयरब्रांड नेता उमा भारती भी सरकार की इस मामले में निंदा कर चुकी हैं।

गौर करने वाली बात यह हे कि सत्ता में काबिज होते ही मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने बयान जारी कर के कहा था कि उत्तराखण्ड को धीरे-धीरे शराब मुक्त प्रदेश बनाया जाएगा, लेकिन इसके तुरंत बाद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के हाईवे से 500 मीटर के दायरे में शराब के ठेकों को बंद करने के आदेश की काट में कई राष्ट्रीय राजमार्गों को जिला मार्ग में तब्दील कर दिया ताकि प्रदेश में शराब के करोबार को कोई समस्या न आ सके। यही नहीं राज्य में कई ऐसे स्थानां में नए-नए शराब के ठेके खोले गए जहां पूर्व में शराब के ठेके नहीं थे। कुंभ मेला क्षेत्र तक सरकार ने शराब के ठेके खुलवा दिए गए हैं।

श्राइन बोर्ड विवादः प्रदेश के धार्मिक स्थलों और मंदिरां के बेहतर संचालन के लिए सरकार ने श्राइन बोर्ड बनाए जाने का निर्णय लिया। विधानसभा में उत्तराखण्ड चारधाम देवस्थानम व्यवस्था बोर्ड के नाम से विधेयक भी पास करवा लिया गया। इस विधेयक के पास होने से पहले ही पूरे प्रदेश में इसका भारी विरोध होने लगा। यहां तक कि स्वयं सरकार के चारधाम विकास परिषद के उपाध्यक्ष शिव प्रसाद पैन्यूली ने इसके विरोध में अपना त्याग पत्र तक दे दिया।

निजी आयुष मेडिकल कॉलेज फीस बृद्धि विवादः प्राइवेट आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजां के द्वारा फीस वृद्धि के मामले में छात्रों के आंदोलन की गूंज सबसे ज्यादा चर्चाओं में रही। सरकार पर प्राइवेट कॉलेजों से मिलीभगत के आरोप तक लगे। सरकार इस मामले में पूरी तरह से सवालों के घेरे में घिरी रही। यहां तक कि हाईकार्ट द्वारा छात्रां की फीस वृद्धि के लिए सरकार के द्वारा जारी किए गए शासनादेश को तक रद्द किया गया। साथ ही छात्रां से बढ़ी फीस वापस करने के आदेश जारी किए गए। बावजूद इसके प्राइवेट कॉलेजों द्वारा न तो सरकार के आदेश माने गए और न ही सरकार इस मामले में हाईकोर्ट के आदेशों का पालन करवा पाई।

सरकार बनाम न्यायालयः इस वर्ष सरकार के कई निर्णयों के खिलाफ न्यायालयों के आदेशां के चलते सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े। स्थानांतरण, खनन, शराब और बुनियादी सुविधाओं के अलावा कई अन्य मामलां में सरकार को कोर्ट से फटकार तक लग चुकी है। पंचायत चुनाव में भी सरकार के संशोधन को झटका लग चुका है।

सरकार के निर्णयों के खिलाफ हाईकोर्ट में महज पांच वर्ष में ही 30 हजार से भी ज्यादा मामले हो गए हैं। मौजूदा सरकार के कार्यकाल में महज पौने तीन वर्ष के कार्यकाल में ही 19 हजार से ज्यादा याचिकाएं हाईकोर्ट में दाखिल हुई हैं। 2019 की बात करें तो सरकार के निर्णयों के खिलाफ इस वर्ष 170 जनहित याचिकाएं हाईकोर्ट नैनीताल में दाखिल हो चुकी हैं। साथ ही 4964 अन्य श्रेणियों की याचिकाएं भी वर्ष 2019 में हाईकोर्ट में दाखिल हुई हैं। इस से यह साफ होता है कि सरकार की नीतियां और आदेशों पर किसी को भरोसा नहीं रहा है।

डेंगू का डंकः वर्ष 2019 प्रदेश की बिगड़ती स्वास्थ्य सेवाओं का वर्ष माना जा सकता है। पृथक उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद इन 19 वर्षों में पहली बार प्रदेश में डेंगू बुखार के मामले बेहताशा बढ़े हैं। गैर सरकारी अनुमान के मुताबिक राज्य में तकरीबन 50 हजार मरीजां को डेंगू के डंक से त्रस्त होना पड़ा लेकिन सरकारी आंकड़े इस से बहुत ही कम बताए जा रहे हैं। हालांकि देहरादून में ही 5 हजार डेंगू के मामले सामने आ चुके हैं और यह आंकड़े सरकार के द्वारा जारी किए गए हैं।

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