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Uttarakhand

पहाड की उडनपरी के जख्मों पर मरहम नही लगा पाई सरकार

13 अगस्त 2018 को मुख्यमंत्री तिर्वेंद्र सिंह रावत ने अपनी फेसबुक पर लिखा है ‘अभी कुछ दिन पहले की ही बात थी । चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान लिए एक बच्ची से मुलाकात हुई थी । नाम था गरिमा जोशी ।

चेहरे पर जितनी सौम्यता, उतना मजबूत जज्बा। 10 किलोमीटर दौड़ में स्टेट चैंपियन बनने के बाद नेशनल चैंपियन बनने का सपना संजोए थी । मुझसे बोली, मदद चाहिए. मैनें पूछा कितनी चाहिए? वो बोली 10 हजार रुपये। बहरहाल मैनें 25 हजार की मदद की घोषणा की । गरिमा ने नाम के मुताबिक प्रदर्शन किया और 11 हजार बच्चों में छठां स्थान हासिल किया । गरिमा उत्तराखंड का गौरव बनने निकली थी । मगर दो दिन पहले इस खबर को पाकर स्तब्ध हो गया कि गरिमा को स्पाइनल इंजुरी हुई है । दो बेटियों का पिता होने के नाते एक पिता के दर्द को महसूस कर रह था, सोचा एक पिता दूसरे पिता का सहारा बन जाए।

गरिमा के पिता से बात करके भरोसा दिलाया कि हम सब आपके साथ खड़े हैं । आज गरिमा को दवा और दुआ दोनों की जरूरत है. गरिमा तुम्हें जल्दी ठीक होना है । अपने खेल के लिए, इस राज्य के लिए । परिवार के चेहरे पर मुस्कान लौटाने के लिए. आइए हम सब प्रार्थना करें कि गरिमा जल्द स्वस्थ हो.’ उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जब यह पोस्ट लिखी तो हर किसी को एक उम्मीद जगी कि अब पहाड की उडन परी अपने पैरों पर दौड सकेगी ।

हालांकि इसके बाद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने 13 लाख 10 हजार की आर्थिक मदद गरिमा के परिजनों को देते हुए उन्हें हर तरह का आश्वासन दिया । साथ ही उन्होंने कहा कि गरिमा की बीमार पड़ी मां को भी इलाज कराने के लिए मदद करेंगे । इसके बाद गरिमा को बेंगलुरु से दिल्ली लाया गया । दिल्ली के हॉस्पिटल में गरिमा का इलाज चला गरिमा पूरी तरह स्वस्थ तो हो नहीं पाई , लेकिन उसका बिस्तर पर पड़े रहने से बेड सोल हो गया । इसके बाद गरिमा के पिता पूरन जोशी ने सरकार से मदद की गुहार की । लेकिन सरकार ने हाथ खड़े कर दिए । साथ ही यह भी कहा कि वह तो 2 लाख तक की आर्थिक मदद देते हैं लेकिन गरिमा के लिए उन्होने 13 लाख दे दिए वह कम नहीं है । गरिमा के पिता पूरन जोशी अपना दुख व्यक्त करते हुए बताते हैं कि जब से सरकार ने गरिमा का इलाज कराने की बात कही है लोगों ने आर्थिक सहायता भी बंद कर दी है । इस के चक्कर में वह अपनी पत्नी की बीमारी का भी इलाज नहीं करा पाए और वह सफदरजंग हॉस्पिटल में पैसे के अभाव में दम तोड़ गई । जबकि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बेंगलुरु में गरिमा के समक्ष कहा था कि वह मां और बेटी दोनों का इलाज कराएंगे । पूरन जोशी कहते हैं कि उत्तराखंड सरकार ने मुझे अपंग बना दिया । उनके कारण ही मेरी पत्नी की मौत हो गई । सरकार की घोषणा बाजी उन पर भारी पडी । जिसके चलते ही लोगों ने पैसे देने से मुंह फेर लिया । हालांकि अब गरिमा के इलाज के लिए हंस कल्चरल सेंटर सामने आया है । मंगला माता ने गरिमा के इलाज के लिए 2 लाख रुपये की मदद की है । लेकिन उसी के साथ गरिमा के पिता कहते हैं कि गरिमा के इलाज के लिए 18 लाख के बिल हो गए थे जिसमें से सरकार ने सिर्फ 13 लाख 10000 ही दिए । जबकि बेंगलुरु के जो इलाज का खर्च था वह अभी भी नहीं दिया गया है । वह बताते हैं कि सरकार ने बैंगलोर के कोई भी बिल पास नहीं किए । पहले गरिमा कस्तूरबा हॉस्पिटल मणिपाल कर्नाटक में रही उसके बाद साईं माला हॉस्पिटल बेंगलुरु में इलाज कराया गया जहां उसका 60,000 का बिल अभी तक सरकार ने भुगतान नहीं किया है । इसी के साथ साथ गरिमा को दो बार एयर एंबुलेंस के जरिए दिल्ली लाया गया, जिसमें 96000 का खर्चा हुआ । वह बिल भी सरकार ने नहीं चुकाया । उत्तराखंड के खेल मंत्री अरविंद पांडे ने गरिमा के बैंक अकाउंट में सिर्फ 71000 रुपये डालें । जबकि केंद्र सरकार के स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने भी 5 लाख की मदद की है । दो से ढाई लाख रुपए लोगों ने मदद की । जिसमें संजय जोशी और उत्थान समिति के लोगों ने दो लाख का चेक दिया जबकि समाजसेवी हीरा सिंह अधिकारी ने भी 50,000 की मदद की । फिलहाल सरकार की लापरवाही का आलम यह है कि अब उसके सचिव से लेकर विधायक तक फोन नहीं उठाते हैं । गरीमा के पिता पूरन जोशी कहते हैं कि रानीखेत के पूर्व विधायक अजय भट्ट ने पीसी नैनवाल और भगत सिंह कोश्यारी के साथ मिलकर 2 लाख की मदद की थी । लेकिन द्वाराहाट के विधायक महेश नेगी जो उनके कभी खास हुआ करते थे उन्होंने उनके फोन उठाना ही बंद कर दिए । इन सब से खफा होकर फिलहाल गरिमा जोशी ने उत्तराखंड के लिए नही खेलने का प्रण लिया है । गरिमा कहती है कि वह अब उत्तराखंड सरकार की तरफ से नहीं खेलेगी , बल्कि जो राज्य सरकार उसका खर्च उठाएगी वह उसके लिए ही खेलेगी। सवाल यह भी हैं कि आर्थिक मदद देते समय उत्तराखंड सरकार के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने गरिमा और उसकी माँ के पूर्ण इलाज का वादा किया था वह उससे पीछे क्यो हट गये । क्या जो अहसास उन्हे गरिमा से बेंगलूर में मिलते वक्त हुआ था जिसका उन्होने सोशल मीडिया पर भी जिक्र किया उनकी वह भावनाएं वह संवेदनाए सूख चुकी हैं ? जिस पहाड की उडन परी के भविष्य को उज्जवल बनाने और एक एथलीट को उसके पैरो पर चलाने के वादे मुख्यमंत्री ने किए थे वह पूरे क्यों नही हो पा रहे है । क्या मुख्यमंत्री का पिछले साल गरिमा से मिलने बैंगलोर जाना और हर तरह की आर्थिक मदद करने का आश्वासन देना सिर्फ मीडिया कवरेज पाना था ?

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