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Uttarakhand

गोलमाल है भाई सब गोलमाल है

राज्य बने उन्नीस बरस हो गए। इस दौरान दो अंतरिम और 6 पूर्णकालिक मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड की आवाम को मिले। दो बार कांग्रेस तो तीन बार भाजपा सत्ता में रही। दो पूर्व सीएम दिवंगत हो गए तो कांग्रेसी पृष्ठभूमि के एक पूर्व सीएम बहुगुणा भाजपाई हो लिये। राजनेताओं ने सत्ता के लिए अपनी विचारधारा त्यागी, देवभूमि से देवताओं ने पलायन शुरू किया, केदारनाथ आपदा से राज्य दहला। यानी बहुत कुछ इन 19 बरसों में बदल गया। नहीं बदली तो नेताओं और नौकरशाहों की भ्रष्ट कार्यशैली। हालात इस कदर खराब हैं कि दशकों पहले हुए घोटालों की जांच आज भी जारी है तो कई जांच रिपोर्टें सरकार के पास मौजूद ही नहीं हैं। सूचना के अधिकार से ‘दि संडे पोस्ट’ को हासिल हुई जानकारियां राज्य की दशा और दिशा का आईना बन उभरी हैं

 

आज से 18 साल पहले जब उत्तराखण्ड राज्य की नींव पड़ी तो तब कहा गया कि अब न्याय के लिए लखनऊ नहीं दौड़ना पड़ेगा। उत्तराखण्ड में भ्रष्टाचार का अस्तित्व नहीं रहेगा और हर काम पारदर्शिता से होगा। लेकिन हुआ एकदम इसके उल्टा। नए राज्य में अधिकारियों कर्मचारियों से लेकर नेता तक सब मंझे हुए खिलाड़ी निकले। उम्मीद के मुताबिक भ्रष्टाचार पर लगाम लगने के बजाए सभी बेलगाम हो गए। नौकरशाही सबसे ज्यादा बेलगाम हुई। जो मन में आया वही किया। फलस्वरूप प्रदेश में घपलों- घोटालों की बाढ़ सी आ गई। कभी जल, जंगल, जमीन और खनिज सम्पदा में समृद्ध उत्तराखण्ड ‘लूट प्रदेश’ बन गया। जिसने भी चाहा जी भर के लूटा। वर्ष 2002 में प्रदेश में जब नारायण दत्त तिवारी पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री बने तो लुटेरे इतने हावी हो गए कि आए दिन नित नए घपले-घोटाले होने लगे। हालात यह हुए कि तिवारी के लचर रवैये, रेबड़ियां बांटने की प्रवृत्ति ने प्रदेश में महज 5 साल के कार्यकाल में ही 18 घोटाले करा डाले।

चांकाने वाली बात यह है कि राज्य में हमेशा घोटालों पर पर्दा डालने की कोशिशें होती आ रही हैं। हालत यह है कि आज से 16 साल पहले जो घपले-घोटाले हुए उनकी सूचना अधिकार अधिनियम (2005) के तहत जानकारी लेने पर गोलमाल जवाब दिए गए। यहां तक कि जानकारी देने के लिए आवेदक से धनराशि भी जमा करा ली जाती है। लेकिन बाद में मामले में यह कहकर पेच डाल दिया जाता है कि जानकारी नहीं दी जा सकती है। यहां तक कि प्रदेश के मुख्य सचिव के आदेशों पर भी सतर्कता विभाग सक्रिय नहीं हुआ और घोटालों की जांच के आदेश 16 साल बाद भी फाइलों में बंद होकर रह गए हैं।

सिडकुल घोटाला : सात साल बाद भी जांच का अता-पता नहीं 


आरटीआई के बाद जागी सरकार, विजिलेंस से पूछा कहां है रिपोर्ट। 9 वर्ष पहले हुआ था जांच का आदेश

 

दि संडे पोस्ट’ की ओर से उत्तराखण्ड के सचिव (औद्योगिक) से सूचना मांगी गई। जिसमें पूछा गया कि वर्ष 2002 से लेकर वर्ष 2018 तक रुद्रपुर के साथ ही हरिद्वार और सितारगंज स्थित सिडकुल से संबंधित कितनी जांच चल रही हैं। सभी का पूरा ब्यौरा दें और साथ ही जांच की प्रगति रिपोर्ट दें। 3 मई 2019 को औद्योगिक विभाग के अपर सचिव उमेश नारायण पाण्डेय ने इस मामले में अपने पत्र द्वारा अजीबोगरीब उत्तर दे डाला। सीधे देने के लिए शायद उनके पास कोई जवाब था ही नहीं। लिहाजा उन्होंने 5 मार्च 2015 के एक पत्र का हवाला दिया। 5 मार्च 2015 के इस पत्र को प्रदेश के औद्योगिक विभाग के तत्कालीन प्रमुख सचिव राकेश शर्मा ने लिखा था। जिसमें उन्होंने राज्य के विजिलेंस विभाग को आदेश दिया था कि एकीकृत औद्योगिक आस्थान पंतनगर फेज- वन एवं फेज- टू में हुए अवस्थापना विकास के कार्यों, फार्मासिटी सेलाकुई, देहरादून एवं औद्योगिक क्षेत्र सितारगंज के अवस्थापना के कार्यों एवं आईटी पार्क देहरादून के निर्माण कार्य में की गई अनियमितताओं की जांच कर दोषी अधिकारियों को चिन्हित किया जाए। इसी के साथ दोषी पाए जाने पर उनके विरुद्ध दण्डानात्मक कार्यवाही करने के भी आदेश दिए गए। इसी के साथ 9 दिसंबर 2011 को उत्तराखण्ड शासन के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में की गई बैठक में यह निर्णय लिया गया था। यही नहीं बल्कि इस प्रकरण की सतर्कता जांच कराते हुए जांच आख्या उपलब्ध कराने के लिए भी प्रमुख सचिव राकेश शर्मा द्वारा कहा गया। राकेश शर्मा द्वारा जांच कराने का यह पत्र उत्तराखण्ड शासन के सतर्कता विभाग के तत्कालीन अपर सचिव अरविंद सिंह हयांकी को आदेशित करते हुए लिखा गया।

लेकिन इस मामले में ट्विस्ट तब आता है जब औद्योगिक विकास के अपर सचिव उमेश नारायण पाण्डेय ने 3 मई 2019 को अपने लिखे हुए पत्र में उपरोक्त 5 मई 2012 की जांच का हवाला देते हुए कहा कि ‘‘इतनी दीर्घ अवधि (7 साल) से लंबित जांच से संबंधित सूचनाएं मांगने वाले लोग मायूस हो रहे हैं। समय-समय पर सूचना अधिकार अधिनियम के तहत इस प्रकरण पर जांच संबंधी सूचनाएं मांगी जाती रही हैं। लेकिन जांच उपलब्ध नहीं होने की वजह से वह सूचनाएं नहीं दे पा रहे हैं।’’ इसके साथ ही एक बार फिर औद्योगिक विकास विभाग के अपर सचिव उमेश नारायण पाण्डेय ने सतर्कता विभाग को निर्देशित करते हुए कहा कि जांच की प्रगति से तत्काल इस विभाग को अवगत कराएं। साथ ही ‘दि संडे पोस्ट’ की आरटीआई सर्तकता विभाग को भी भेज डाली।
एक तरफ तो प्रदेश का औद्योगिक विकास विभाग सिडकुल से संबंधित जांच के आदेशों का विवरण देते हुए स्पष्ट करता है कि सात साल पहले ही प्रदेश के प्रमुख सचिव के द्वारा जांच के आदेश दिए जा चुके हैं तथा वर्तमान में भी विभाग के अपर सचिव उमेश नारायण पाण्डेय चल रही जांच की प्रगति रिपोर्ट से तत्काल अवगत कराने को कहते हैं। लेकिन दूसरी तरफ उत्तराखण्ड शासन के कार्मिक एवं सतर्कता विभाग के लोकसूचना अधिकारी और अनुसचिव अजीत सिंह ने 19 जून 2019 को लिखे पत्र में सूचना देने में आनाकानी कर दी है। उन्होंने मामले को घुमाते हुए कहा कि उत्तराखण्ड विभाग के सतर्कता विभाग पर सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 24 की उपधारा (4) के अंतर्गत सूचना नहीं दी जा सकती है। इस तरह सतर्कता विभाग ने अपनी कमी पर पर्दा डालने का काम किया है।

कम्प्यूटर खरीद घोटाला : जांच चालू आहे…

सूचना अधिकार अधिनियम (2005) के तहत उत्तराखण्ड सरकार के सचिव (प्रौद्योगिकी) से तीन सवाल पूछे गए जिनमें पहले सवाल में पूछा गया कि प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में सरकारी विभागों के लिए हुई कम्प्यूटर खरीद की टेंडर प्रक्रिया का पूरा विवरण दीजिए। प्रश्न नंबर दो के तहत पूछा गया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में कप्यूटर खरीद मामले में क्या अनियमितता हुई? अगर हां, तो इसका पूरा विवरण दीजिए। प्रश्न तीन के अनुसार यह पूछा गया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में सरकारी विभागों के लिए कम्प्यूटर खरीदने के लिए की गई खरीद में कथित घोटाले के लिए हुई जांच की प्रति उपलब्ध कराएं।

इस संबंध में उत्तराखण्ड शासन के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग ने संबंधित जांच आख्या के कुल 324 पृष्ठ बताते हुए कहा कि यह सूचना आपको नियम अनुसार उपलब्ध कराई जा रही है। जिसके लिए 3 रुपया प्रति पृष्ठ की दर से कुल 648 रुपया जमा कराने की बात कही। इसके बाद सूचना मांगने के लिए 648 रुपया जमा कराने की प्रक्रिया पूरी कर दी गई। लेकिन इसके बाद विभाग सूचना उपलब्ध कराने के वादे से मुकर गया। विभाग ने पलटी मारते हुए कह डाला कि सूचना का अधिकार, अधिनियम 2005 की धारा 8(ज) के अनुसार प्रकरण में जांच प्रावधीन है यानी कि उसमें जांच चल रही है और उसमें एफआईआर नहीं लगी है। इस तरह प्रदेश के सूचना एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने 16 साल बाद भी जांच में अंतिम निर्णय न होने की बात कहकर सूचना उपलब्ध कराए जाने से मना कर दिया। चौंकाने वाली बात यह है कि जो विभाग तीन माह पूर्व सूचना के पृष्ठ 324 बताकर सूचनाएं उपलब्ध कराने की बात कर रहा था। इस बाबत ही विभाग ने 324 पृष्ठ के दो रुपया प्रति प्रतिलिपि के हिसाब से आवेदक से 648 रुपया जमा भी करा लिए थे, लेकिन इसके बाद भी सूचना अधिनियम 2005 की धारा 8(ज) का बहाना लेकर सूचनाएं देने से साफ इंकार कर दिया गया। यह विभाग का दोहरा रूप उजागर करता है।

इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि जब आवेदक ने सूचना मांगने वाला पत्र सूचना एवं प्रौद्योगिकी विभाग को भेजा तो सरकार ने अपनी नोडल एजेंसी हिल्ट्रान को यह पत्र 13 जून 2019 को जवाब हेतु भेज डाला। हिल्ट्रान के लोकसूचना धारित अधिकारी एसके विश्नोई ने आवेदक को लिखे पत्र में कहा कि इस संबंध में निगम में कोई सूचना घटित नहीं है। प्रदेश की दिशा और दशा तय करने वाले शासन की कारगुजारियों का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सूचना एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने 13 जून 2019 को ही एक पत्र सूचना मांगने वाले आवेदक को लिखा। जिसमें उन्होंने 324 पृष्ठों की सूचना देने की बात कही और इस एवज में 648 रुपया जमा कराने के लिए कहा। जबकि 13 जून 2019 को ही एक पत्र हिल्ट्रान (यूपी हिल इलेक्ट्रॉनिक्स कारपोरेशन लिमिटेड) को लिखा कि वह संबंधित जांच रिपोर्ट आवेदक को दे। हिल्ट्रॉन ने ऐसे किभी भी घोटाले की जानकारी से ही साफ इंकार कर डाला है।

दारोगा भर्ती घोटाला : सरकार बहादुर को कोई जानकारी नहीं

उत्तराखण्ड के पुलिस महानिदेशक से सूचना अधिकार अधिनियम (2005) के तहत सूचना मांगी गई कि प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में उत्तराखण्ड पुलिस की दारोगा भर्तियों में क्या अनियमिताएं पाई गई? यदि हां, तो तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में हुई दारोगा भर्तियों में गड़बड़ी की बाबत हुई जांच की रिपोर्ट उपलब्ध कराएं। इसके जवाब में 3 जुलाई 2019 को मुख्यालय पुलिस महानिदेशक के पत्र संख्या 113/2019 में जो सूचना दी गई है उसके अनुसार लोक सूचना अधिकारी एवं पुलिस महानिरीक्षक एनएस नपलच्याल ने कहा कि उप निरीक्षक सीधी भर्ती वर्ष 2002 में हुई अनियमितताओं के संबंध में सीबीआई द्वारा जांच की गई है, लेकिन साथ ही यह कहकर हाथ खड़े कर दिए कि सीबीआई जांच की प्रति पुलिस मुख्यालय में उपलब्ध नहीं है। पुलिस विभाग पर सवाल खड़े हो रहे हैं कि 17 साल पहले हुए दारोगा भर्ती घोटाले की सीबीआई जांच की प्रति पुलिस मुख्यालय में उपलब्ध नहीं है। यानी राज्य का निजाम नहीं जानता कि सीबीआई जांच रिपोर्ट में किसे दोषी बताया गया और क्या कार्यवाही हुई।

पटवारी भर्ती घोटाला

वर्ष 2002-03 में जब प्रदेश में नारायण दत्त तिवारी की सरकार थी तब पटवारी भर्ती घोटाला हुआ था। इस मामले से संबंधित सूचना मांगने के लिए सूचना अधिकार अधिनियम (2005) के तहत तीन बिन्दुओं पर जानकारी मांगी गई। बिन्दु संख्या एक में पूछा गया कि प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में कुल कितने पदों पर पटवारी भर्ती की गई तथा पटवारी भर्ती के लिए क्या नियम शर्तें लागू की गई। दूसरे बिन्दु में पूछा गया कि नारायण दत्त तिवारी सरकार में पटवारी भर्ती में अगर अनियमितता हुई तो उसकी जांच की प्रतिलिपि उपलब्ध कराएं, जबकि तीसरे बिन्दु में पूछा गया कि नारायण दत्त तिवारी सरकार के कार्यकाल के दौरान पटवारी भर्ती मामले में आईएएस ऑफिसर के साथ ही एक मंत्री पर अनियमितता के आरोप लगे थे, उन पर क्या जांच हुई। जांच की प्रतिलिपि दीजिए और साथ ही यह भी बताएं कि उन पर क्या कार्यवाही हुई? इसके उत्तर में उत्तराखण्ड के राजस्व परिषद के लोक सूचना अधिकारी एवं सहायक राजस्व आयुक्त केके डिमरी ने गोलमाल जवाब दे दिए, लेकिन सूचना नहीं दी। डिमरी ने कहा कि आवेदन पत्र के तीनों बिन्दुओं की सूचना परिषद स्तर पर उपलब्ध नहीं है। इसी के साथ उन्होंने इस भर्ती प्रकरण का सारा मामला जिलाधिकारी कार्यालय के मत्थे जड़ दिया और कहा कि पटवारी की भर्ती की कार्यवाही जिलाधिकारी स्तर पर की जाती है। जबकि यह संभव नहीं है कि प्रदेश के राजस्व परिषद को इसका पता न हो। क्योंकि भर्ती संबंधित जानकारी राजस्व परिषद को मुहैया कराई जानी आवश्यक है। कारण यह है कि जिस विभाग में पटवरी भर्ती की गई है उसका प्रदेश मुख्यालय राजस्व परिषद देहरादून होता है।

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