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Uttarakhand

मोर्चे पर कर्नल से जनरल तक

पौड़ी गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र में पूर्व सैनिक मतदाताओं की बहुत बड़ी तादात है। अतीत में बीसी खण्डूड़ी और टीपीएस रावत को इन मतदाताओं का भरपूर समर्थन मिला। इसी को भांपकर सैनिक पृष्ठभूमि के अधिकारी और उनके परिजन इस सीट से चुनाव लड़ने को उत्सुक रहते हैं। आगामी लोकसभा चुनाव की दृष्टि से रक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के पुत्र शौर्य डोभाल और कर्नल अजय कोठियाल इस क्षेत्र में खासतौर पर सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। दोनों की सक्रियता उनकी दावेदारी को प्रकट करती है। सेवानिवृत्ति के बाद जनरल विपिन रावत भी इस सीट से भाग्य आजमाने के मूड में बताए जाते हैं। ऐसे में सतपाल महाराज के लिए चुनौती है कि वे अपनी पत्नी अमृता रावत को कैसे टिकट दिलवा पाते हैं? रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के लिए दिक्कत है कि हरिद्वार के बाद वे किस अन्य सीट को विकल्प के तौर पर चुनें। प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत के सामने अपना वजूद बचाए रखने का अहम प्रश्न है
कभी उत्तराखण्ड के लिए ‘खण्डूड़ी हैं, जरूरी’ का नारा देने वाली भाजपा के लिए अब प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खण्डूड़ी गैर जरूरी लगने लगे हैं। एक तो उम्र का तकाजा और दूसरे स्वास्थ्य कारणों के चलते वह आगामी 2019 का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ पायेंगे। जीवन के आठ दशक पूरे कर चुके सेवानिवृत्त मेजर जनरल बीसी खण्डूड़ी के आड़े भाजपा का ‘75 पार पर ब्रेक’ का फॉर्मूला आ रहा है। इसके चलते पौड़ी गढ़वाल लोकसभा सीट का चार बार प्रतिनिधित्व कर चुके खण्डूड़ी अब पांचवीं बार शायद ही पौड़ी फतह करने को उतरें। ऐसे में सवाल यह है कि खण्डूड़ी की जगह पौड़ी-गढ़वाल से भाजपा का उम्मीदवार कौन होगा, जो सैनिक बाहुल्य इस सीट पर मतदाताओं की मनपसंद बन सके? केंद्र और राज्य में सत्तासीन भाजपा के भीतर पौड़ी लोकसभा सीट के दावेदारों की लंबी लाइन लगी हुई है।
वर्तमान सांसद खण्डूड़ी का मन राजनीति से ऊब चुका है। अपनी ईमानदार कार्यप्रणाली को लेकर उत्तराखण्ड की जनता के पसंदीदा मुख्यमंत्री रहे खण्डूड़ी ने देश में पहली बार लोकायुक्त लागू करके काफी प्रशंसा बटोरी थी। लोकायुक्त को पास करने वाले देश के पहले मुख्यमंत्री की पीड़ा यह है कि उत्तराखण्ड के राज्यपाल ने लोकायुक्त बिल को 24 घंटे के भीतर ही अनुमोदित कर दिया था। लेकिन वही बिल आज तक पेंडिंग पड़ा है। जिस लोकायुक्त बिल को देश के महामहिम राष्ट्रपति ने भी मंजूरी दे दी थी उसे पहले प्रदेश की कांग्रेस सरकार और अब भाजपा सरकार ने सदन में रखना तक गंवारा नहीं समझा। खण्डूड़ी के बाद प्रदेश के मुखिया उनके ममेरे भाई विजय बहुगुणा और हरीश रावत बने। बहुगुणा और रावत विपक्षी पार्टी कांग्रेस के थे। लेकिन वर्तमान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत खण्डूड़ी की पार्टी के हैं। केंद्र और प्रदेश में डबल इंजन की सरकार भी चल रही है। ऐसे में खण्डूड़ी के कार्यकाल की महत्वपूर्ण उपलब्धि लोकायुक्त बिल को लटकाया जाना गले नहीं उतर रहा है। खण्डूड़ी के कार्यकाल में ऐसे कई काम हुए जो प्रदेश की राजनीति में मिसाल बन गए। जब वह केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में भूतल एवं परिवहन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) थे तो तब भी उन्होंने देश-प्रदेश में राष्ट्रीय राज्यमार्गों के निर्माण की एक नई इबारत लिखी। राज्य मार्गों को राष्ट्रीय मार्ग घोषित कर उनका कायाकल्प किया गया। तब चारधाम यात्रा के ऋषिकेश, गंगोत्री, धरासू फूल पट्टी, रुद्रप्रयाग, गौरीकुंड और कुमाऊं मंडल के टनकपुर-पिथौरागढ़ के राज्य हाइवे को नेशनल हाइवे का दर्जा दिलाया। अगर उस समय खण्डूड़ी इन्हें राष्ट्रीय राजमार्ग नहीं घोषित करते तो शायद आज प्रदेश के दो महत्वपूर्ण ऑलवेदर प्रोजेक्ट यहां न चल रहे होते। खण्डूड़ी के केंद्रीय मंत्री रहते ही वाजपेयी सरकार में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना जैसी महत्वपूर्ण योजना का शुभारंभ हुआ। इसके चलते प्रदेश में आज करीब 1789 गांवों को बारहमासी सड़कों से जोड़ा जा सका है। खण्डूड़ी के केंद्र  और राज्य सरकार के कार्यकाल की ऐसी कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां रही हैं जिनसे उत्तराखण्ड की जनता के वह लोकप्रिय नेता रहे। लेकिन अब भाजपा के सामने समस्या यह है कि आगामी 2019 में खण्डूड़ी के पौड़ी गढ़वाल लोकसभा सीट से चुनाव न लड़ने की स्थिति में पार्टी ऐसे किस नेता को चुनाव में उतारेगी जो पौड़ी गढ़वाल की सीट के साथ ही उत्तराखण्ड की जनता का दिल जीत सके।

फिलहाल इस सीट से दोवदारों के कई नाम सामने आ रहे हैं। टिकट पाने की दौड़ में दो लोगों की लड़ाई चर्चा में है। जिनमें एक शौर्य डोभाल और दूसरे कर्नल अजय कोठियाल हैं। प्रधानमंत्री मोदी के विश्वस्त और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के बेटे शौर्य डोभाल ने भाजपा की औपचारिक तौर पर सदस्यता भी ले ली है। शौर्य डोभाल आते ही मीडिया और सियासी दुनिया में स्थान हासिल करने में सफल हो गए। उन्होंने ‘बुलंद उत्तराखण्ड और बेमिसाल गढ़वाल’ नामक अभियान चलाकर युवाओं को नई दिशा देने का काम शुरू कर दिया है। इसी के साथ युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ना भी उनके अहम एजेंडे में है। पौड़ी जिले के घिरी गांव निवासी शौर्य डोभाल को युवा पसंद भी कर रहे हैं। दूसरी तरफ केदारनाथ आपदा के दौरान अपनी जीवटता का परिचय दे चुके कर्नल अजय कोठियाल हैं। 2013 की भीषण आपदा केदाररनाथ को एक साल के अंदर ही नया रूप-नई सज्जा देने वाले कोठियाल भी पौड़ी के गांव-गांव में प्री आर्मी कैंप लगाकर युवाओं को अपने साथ जोड़ रहे हैं। सेना में अपनी बहादुरी के बल पर क्रीति चक्र, शौर्य चक्र और विशिष्ट सेवा मेडल अपने नाम कर चुके कर्नल कोठियाल ने अपने आपको पूरी तरह पहाड़ के नवयुवकों खासकर पौड़ी गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र के प्रति समर्पित कर रखा है। कहा जा रहा है कि इस जांबाज कर्नल पर भी केंद्रीय नेतृत्व मेहरबान हो सकता है। फिलहाल उन्होंने आर्मी की सेवा से वीआरएस लेकर राजनीति का मैदान सजाना शुरू कर दिया है। पॉलीटिकल पिच पर अगर भाजपा उन्हें अपना प्लेयर नहीं बनाती है, तो वह निर्दलीय चुनाव लड़ सकते हैं।
शौर्य डोभाल और केदारनाथ के पुनर्निर्माण कार्यों में अहम भूमिका निभाने वाले नेहरू माउंटनियरिंग इंस्ट्ीयूट के पिं्रंसिपल रहे कर्नल अजय कोठियाल के बीच पौड़ी लोकसभा क्षेत्र में चुनाव पूर्व ही रोचक मुकाबला सा हो रहा है। शौर्य डोभाल ने तो बकायदा गढ़वाल क्षेत्र में अपने नाम के बैनर पोस्टर भी लगवाए हैं। लोगों को मिस कॉल के जरिए ‘बेमिसाल गढ़वाल’ अभियान से जोड़ा जा रहा है। इन दोनों के समर्थक और टीमें इस क्षेत्र के विभिन्न गांव-कस्बों में इनके कार्यक्रम रखते हुए लोगों को जोड़ने को तत्पर दिख रही हैं। कभी किसी कार्यक्रम में इन्हें अतिथि के रूप में बुलाकर तो कभी किसी शिविर में प्रतिभाग कराकर दोनों दावेदारों को लोगों के बीच संवाद करने का मौका दिया जा रहा है। माना जा रहा है कि शौर्य डोभाल और कर्नल अजय कोठियाल दोनों पौड़ी गढ़वाल सीट से लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं और उसी की तैयारी के लिए यहां लोगों से जनसंपर्क कर रहे हैं। शौर्य ने ‘बेमिसाल गढ़वाल’ अभियान के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं के लिए करियर परामर्श के साथ ही गांव-गांव पहुंचकर दवा वितरण के लिए मोबाइल क्लीनिक भी चालू किए हैं। शौर्य डोभाल उस समय चर्चा में आए थे जब वह बीते दिसंबर माह में भाजपा की उत्तराखण्ड इकाई की कार्यकारी समिति में शामिल हुए थे।
पौड़ी से दावेदारों में राज्य के कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज की पत्नी अमृता रावत का नाम भी चर्चा में है। अमृता रावत उत्तराखण्ड से तीन बार विधायक और कैबिनेट मंत्री रह चुकी हैं। सतपाल महाराज खुद वर्ष 1996 और 2009 में पौड़ी लोकसभा सीट से सांसद रह चुके हैं। यहां यह भी ध्यान रहे कि जब अमृता रावत ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा था तो उनके साथ कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए सभी नेताओं को भाजपा ने टिकट दे दिया था। लेकिन अमृता रावत को टिकट नहीं मिला था। इस लिहाज से भी अमृता रावत को इस सीट का दावेदार माना जा रहा है। प्रदेश नेतृत्व से छन-छन कर खबरें आती रहती हैं कि सतपाल महाराज सरकार से खफा हैं। दरअसल, सतपाल महाराज भी सीएम पद के प्रबल दावेदार रहे हैं, लेकिन भाजपा हाईकमान ने त्रिवेंद्र रावत को अपनी पहली पसंद बताकर मुख्यमंत्री बना दिया। तभी से सतपाल महाराज की नाराजगी सरकार के प्रति चली आ रही है। ऐसे में अगर भाजपा अमृता रावत को पौड़ी से कंडीडेट बनाती है तो एक तीर से दो निशाने साधे जा सकते हैं। मतलब अमृता के टिकट से महाराज की बेचैनी भी खत्म हो सकती है।
गौरतलब है कि पौड़ी लोकसभा क्षेत्र में कुल 14 विधानसभा सीटें आती हैं। इनमें बद्रीनाथ, थराली (अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए आरक्षित) कर्णप्रयाग, केदारनाथ, रुद्रप्रयाग, देवप्रयाग, नरेंद्रनगर, यमकेश्वर, पौड़ी, (अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए आरक्षित) श्रीनगर, लैंसडौन, कोटद्वार और रामनगर शामिल हैं। केदारनाथ को छोड़कर अन्य सभी विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है।
पौड़ी गढ़वाल लोकसभा सीट पर थलसेना अध्यक्ष जनरल विपिन रावत का नाम भी सुर्खियों में है। आगामी लोकसभा चुनाव से पहले वह रिटायर्ड भी हो जाएंगे। तब वह अपनी अगली पारी सियासत में अवश्य खेलना चाहेंगे। अगर वह जीत जाते हैं तो खण्डूड़ी की तरह केंद्र में उनका मंत्री बनना भी लगभग तय होगा।  हालांकि उनके पास सियासी अनुभव अभी नहीं है। बताया जा रहा है कि जनरल रावत पौड़ी से ताल्लुक रखते हैं और वह यहां से चुनाव लड़ने की इच्छा भी रखते हैं। इसी के साथ भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तीरथ रावत भी पौड़ी से पार्टी के उम्मीदवार हो सकते हैं। तीरथ रावत को पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खण्डूड़ी का दत्तक पुत्र कहा जाता है। तीरथ को राजनीति का रास्ता दिखाने वाले खण्डूड़ी ही थे। खण्डूड़ी के कंधे पर सवार तीरथ अविभाजित उत्तर प्रदेश में एमएलसी बने और राज्य गठन के बाद अंतरिम सरकार में शिक्षा राज्य मंत्री रहे। तीरथ ने प्रदेश में 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में पौड़ी से विजय हासिल की थी। बाद में पौड़ी सीट आरक्षित होने के कारण 2012 में तीरथ रावत चौबट्टाखाल के विधायक बने। भाजपा छत्रपां की लड़ाई में उन्हें खण्डूड़ी के खास होने का फायदा मिला और प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान हुए। हालांकि पौड़ी से चुनाव लड़ने की चर्चाएं तो खण्डूड़ी की पुत्री रितु खण्डूड़ी की भी हैं। यमकेश्वर से विधायक रितु खण्डूड़ी पिता की राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए आगे आ सकती हैं। लेकिन इसकी संभावना कम ही है। खण्डूड़ी एक ऐसे पिता भी हैं जो विधानसभा चुनाव के दौरान यमकेश्वर में एक दिन भी अपनी पुत्री के लिए वोट मांगने नहीं गए थे। भाजपा बखूबी जानती है कि खण्डूड़ी लोकसभा टिकट के लिए अपनी बेटी की सिफारिश नहीं कर सकते हैं? क्योंकि वह एक स्वाभिमानी राजनेता माने जाते हैं। शायद यही वजह है कि पार्टी खण्डूड़ी की पुत्री को विधायक तक ही सिमटाकर रखना चाहती है। पौड़ी पर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ भी नजरें गड़ाए हुए हैं, क्योंकि हरिद्वार से दोबारा प्रत्याशी बनने में निशंक के सामने प्रदेश के कद्दावर नेता और कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक बाधक बन सकते हैं। कौशिक भी हरिद्वार से अपनी मजबूत दावेदारी कर रहे हैं। ऐसे में अगर भाजपा कौशिक को हरिद्वार से सीट देती है तो निशंक पौड़ी से चुनाव मैदान में उतर सकते हैं।

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