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Uttarakhand

तराई में बदल रही फिजा

भाजपा आलाकमान द्वारा एक युवा लेकिन अनुभवहीन विधायक को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला बड़ा चुनावी दांव था। जानकारों का दावा है कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने यह दांव महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की सलाह पर खेला। उत्तराखण्ड में भाजपा को घर-घर, गांव-गांव तक पहुंचाने वाले कोश्यारी के बेहद करीबी पुष्कर सिंह धामी का सीधे मुख्यमंत्री बन जाना पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को भले ही हजम न हो रहा हो लेकिन जनता धामी की एग्रेसिव बल्लेबाजी को सराह रही है। अब तक प्रदेश में यह होता आया है कि जनता जब दो मुख्यमंत्रियों में तुलना करती थी तो उसमें एक भाजपा का तो दूसरा कांग्रेस का सीएम होता था लेकिन इस बार देखने में यह आ रहा है कि तुलना भाजपा और कांग्रेस में नहीं, बल्कि भाजपा वर्सेज भाजपा हो रही है
‘‘हमारे प्रदेश का दुर्भाग्य रहा है कि यहां ऐसे-ऐसे लोगों को मुख्यमंत्री बना दिया जाता है जो महिलाओं की कद्र करना तक नहीं जानते हैं। कहने को तो वे जनता की फरियाद सुनने के लिए जनता दरबार लगाते थे लेकिन जब कोई फरियादी उनके सामने अपनी पीड़ा सुनाते तो वह क्रोध से भर उठते थे और किसी अहंकारी राजा की तरह अपने राजदरबार से धक्के मार कर बाहर निकाल देते थे। यह हमारी बदकिस्मती है कि ऐसे मुख्यमंत्री को हम पर भाजपा ने पूरे साढ़े चार साल थोपे रखा। बहरहाल भाजपा ने ‘देर आयद-दुरुस्त आयद’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए पुष्कर सिंह धामी जैसे युवा और संतुलित सोच वाले व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाकर अपनी गलतियों पर पर्दा डालने का काम किया है। धामी के सीएम बनने से उत्तराखण्ड के उन लोगों में आशा जगी है जो यह उम्मीद करना ही छोड़ चुके थे कि अब इस प्रदेश को आगे बढ़ाने वाली सोच का कोई सीएम मिलेगा। काश! भाजपा पुष्कर सिंह धामी को डेढ़-दो साल पहले सीएम बना देती तो आज प्रदेश का कायाकल्प हो जाता।’
यह कहना है जिला ऊधमसिंह नगर के किच्छा की निवासी अनीता पंत का। अनीता पंत अकेली ऐसी महिला नहीं हैं जो प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और भाजपा के पूर्व के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और तीरथ सिंह रावत की तुलना करते हुए धामी की कार्यशैली को सराहते हों। ‘दि संडे पोस्ट’ द्वारा कराए जा रहे एक सर्वेक्षण के दौरान यह बात सामने आई है कि नए सीएम ने भाजपा के प्रति जनता की नाराजगी को कुछ हद तक कम कर डाला है। राजनीति में बेहद कम अनुभव रखने वाले दो बार के विधायक को प्रदेश के मुखिया की गद्दी पर आसीन करना उत्तराखण्ड की राजनीति में भाजपा हाईकमान का पहला ऐसा प्रयोग है जिसमें वरिष्ठों को दरकिनार करा गया। शुरू में लग रहा था कि सियासी तराजू के पलड़ों को वह शायद ही बेैंलेस कर पाएंगे। लेकिन जैसे-जैसे समय बीत रहा है उत्तराखण्ड की सियासी फिज़ा बदली-बदली सी नजर आने लगी है। पिछले दो दशकों की बात करें तो अब तक प्रदेश में कभी कांग्रेस की तो कभी भाजपा की सरकार बनती आई है। 10 साल कांग्रेस ने प्रदेश पर राज किया और इस दौरान नारायण दत्त तिवारी से लेकर विजय बहुगुणा और हरीश रावत के नेतृत्व की सरकार रही। जबकि भाजपा ने भी दस साल तक सियासी पर अपना कब्जा बनाए रखा। कांग्रेस ने प्रदेश को जहां तीन सीएम दिए वहीं इस दौरान भाजपा ने अपने शासनकाल में 6 मुख्यमंत्रियों को सत्ता की बागडोर सौंपी। सबसे पहले नित्यानंद स्वामी तो उसके बाद भगत सिंह कोश्यारी, भुवन चंद्र खण्डूड़ी और डाॅ ़ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ आदि के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत तथा तीरथ सिंह रावत के हाथ में प्रदेश की कमान थमाई। फिलहाल भाजपा के सातवें और प्रदेश के 11वें मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार चल रही है। पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के शिष्य पुष्कर सिंह धामी के राज में जनता नए सीएम का अलग तरीके से आकलन कर रही है। अब तक प्रदेश में यह होता आया है कि जनता जब दो मुख्यमंत्रियों में तुलना करती थी तो उसमें एक भाजपा का तो दूसरा कांग्रेस का सीएम होता था लेकिन इस बार देखने में यह आ रहा है कि तुलना भाजपा और कांग्रेस में नहीं बल्कि भाजपा वर्सेज भाजपा हो रही है।
भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के 114 दिन के कार्यकाल और पुष्कर सिंह धामी के 100 दिनों की तुलना जनता की नजर में बेहद चांैकाने वाली है। सितारगंज के अजय सिंह की माने तो ‘तीरथ सिंह रावत के राजकाज में शिथिलता थी। लगने लगा था कि सिस्टम रूक सा गया है। लेकिन जैसे ही पुष्कर सिंह धामी की सरकार बनी जो सिस्टम रुक-सा गया था वह अब काम करता हुआ दिखाई दे रहा है। अब लग रहा है कि उत्तराखण्ड में कोई सरकार काम कर रही है।’
शक्ति फार्म निवासी राजेश विश्वास मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के शासनकाल की तुलना क्रिकेट से करते है। विश्वास कहते हैं कि ­­­­‘मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी एक ऐसे कप्तान के तौर पर बल्लेबाजी करने उतरे हैें जिन्हें लास्ट ओवर में क्रीज पर आने का मौका मिला है जब तेजी से रन भी बनाने है और विकेट भी बचाना है। ऐसे में जब उनकी ही टीम के खिलाड़ी मन से खेलते हुए नजर नहीं आते हैं तो बल्लेबाज के ऊपर दबाव ज्यादा रहता है। इसी दबाव को झेलते हुए उन्हें कम समय में बेहतरीन परफामेंस देनी है।’ विश्वास आगे कहते हैं कि 2017 का इतिहास दोहराने की धामी से उम्मीद सब रखते हैं। लेकिन इस बार 2017 के जैसी परिस्थितियां नहीं है। 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू कहीं ज्यादा काम कर रहा था। इस बार वह जादू कम होता नजर आ रहा है। स्वाभाविक है कि ऐसे में पुष्कर सिंह धामी के ऊपर ज्यादा जिम्मेदारी है। नानकमत्ता के बलविंदर सिंह की भाजपा की तुलना कांग्रेस से करते हुए कहते हंै कि ‘कांग्रेस में इस बार सीएम चेहरे को लेकर आपसी गुटबाजी चरम पर है। एक गुट जहां हरीश रावत को सीएम चेहरा घोषित करने की मांग समय -समय पर करता रहता है तो वहीं दूसरा गुट इसका लगातार विरोध करता रहता है।’ बलविंदर सिंह भाजपा के मुकाबले कांग्रेस की आपसी रार पर चिंतित होते कहते हैं कि ‘सीएम चेहरे के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और पूर्व विधायक रणजीत रावत की टसल पार्टी को रसातल में ले जाती हुई प्रतीत हो रही हैं आए दिन दोनों की एक दूसरे पर व्यंग्य बाण छोड़ने की प्रवृत्ति ने उत्तराखण्ड में कांग्रेस की स्थिति कमजोर कर दी है।’
उत्तराखण्ड में कांग्रेस के साथ ही भाजपा भी राज्य गठन के बाद से खेमेबाजी की शिकार रही है। पूर्व सीएम कोश्यारी, खण्डूड़ी और निशंक के मध्य हमेशा अविश्वास का रिश्ता रहा। 2012 में भाजपा ने खण्डूड़ी को आगे कर चुनाव लड़ा तो यह गुटबाजी चरम पर पहुंच स्वयं खण्डूड़ी की हार का कारण बन गई। इस हार से भाजपा ने सबक ले 2017 में सीएम चेहरा ही घोषित नहीं किया। पुष्कर सिंह धामी की विधानसभा खटीमा के निवासी सुरेश सिंह राणा आशंकित है कि कहीं 2012 जैसी पुनरावृत्ति पुष्कर सिंह धामी के साथ न हो जाए। बकौल राणा ‘अगर पुष्कर सिंह धामी खटीमा से विधानसभा चुनाव लड़ते हैं तो यहां उनकी राह में कांटा बिछाने का काम ऐसे कई भाजपाई कर सकते हैं जो उनके सीएम बनने से खफा है। भाजपा के ऐसे नेताओं को धामी फूटी आंख नहीं सुहा रहे हैं। वह 2022 में विधानसभा चुनाव में भितरघात कर धामी को हराने के लिए अभी से तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में धामी को उनकी पार्टी में मौजूद जयचंदों से सतर्क रहने की जरूरत हैं।’ काशीपुर के निवासी आनंद बिष्ट मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के बारे में कहते हैं कि ‘हम मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी को किसी मुगालते में नहीं रखना चाहते हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश के वोटरों ने भाजपा पर जो भरोसा जताया था और 70 में से 57 सीटों पर विजय दिलाई थी वह पिछले साढ़े चार साल में कहीं न कहीं दरका ही है। यही नहीं उत्तराखण्ड की डबल इंजन की सरकार बेपटरी हुई है। पुष्कर सिंह धामी के पास प्रदेश के वोटरों के खोए भरोसे को वापस लाने का शार्ट पीरियड है। कम समय में उन्हें ऐसा करिश्मा कर दिखाना है जिससे जनता उन पर तथा उनकी पार्टी पर विश्वास कर सके।’
जनता का विश्वास टूटने की बात अधिकांश जनता करती है। लेकिन यही जनता धामी को सराहने भी लगी है। बेरोजगार चुनावओं के लिए 24 हजार नौकरियों का ऐलान करते समय धामी ने आवेदन फार्म को निःशुल्क करने की घोषणा कर जनविश्वास वापस पाने की पहल की है। बेरोजगार इस बात से संतुष्ट हैं कि कम से कम इस सरकार की मंशा बेरोजगारों से ठगी कर आवेदन शुल्क के नाम पर सरकारी खजाना भरने की तो नहीं है। मुख्यमंत्री धामी फुल चुनावी मोड में हैं। उनके द्वारा ताबड़तोड़ विकास कार्यों की घोषणाएं की जा रही हैं। जनता इन घोषणाओं से खुश तो है लेकिन उन्हें शंका हैं कि कहीं ये मात्र चुनावी स्टंट तो नहीं? ऐसे में धामी के सामने एक बड़ा संकट इन घोषणाओं के लिए बजट जारी करने का है। यदि वे ऐसा कर पाते हैं तो निश्चित ही जनता का यह शक दूर हो जाएगा।
तराई की जनता का विश्वास जीतने के लिए धामी सरकार ने दो महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। रुद्रपुर का बंगाली समाज लंबे अर्से से मांग करता आ रहा था कि उनके नाम के आगे से ‘पूर्वी पाकिस्तान’ शब्द हटाया जाए। धामी ने इस बाबत आदेश जारी कर इस समाज की भावनाओं को समझा। इस आदेश का सीधा राजनीतिक लाभ स्थानीय विधायक और सरकार में मंत्री अरविंद पाण्डेय को मिलता नजर आने लगा है। इसी तरह धामी ने क्षेत्र की नजूल भूमि को फ्री होल्ड में तब्दील करने का शासनादेश भी जारी कर दिया है। इससे इलाके की बड़ी जनसंख्या को राहत पहुंची है। इस निर्णय ने जहां धामी की लोकप्रियता बढ़ाई है, वहीं स्थानीय विधायकों के प्रति जनाक्रोश भी कम होता दिखाई दे रहा हंै। धामी सरकार में मंत्री यशपाल आर्य के लिए अपनी बाजपुर विधानसभा के बीस गांवों का जमीनी विवाद सुलझा न पाना एक बड़ी मुसीबत बन चुका था। धामी ने इस विवाद का हल निकाल यशपाल की राह आसान कर डाली है। इसी तरह एक मामला किच्छा के विधायक राजेश शुक्ला के लिए गले की हड्डी बना हुआ था। वह था नगला गांव का विनियमितीकरण कराना। नंगला गांव दशकों पूर्व से बसा हुआ है। लेकिन यहां के करीब दस हजार लोगों को हटाने के आदेश कर दिए गए। कारण यहां से नेशनल हाईवे का निकलना था। इसके चलते नगला के लोग अपने आप को उजड़ने से बचाने के लिए धरना प्रदर्शन कर रहे थे। इस मामले में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने नंगला गांव को नगर पालिका के अधीन करके समाधान का रास्ता निकाल दिया। इस तरह मुख्यमंत्री ने अकेले तराई क्षेत्र के ही चार विधायकों के लिए 2022 का विधानसभा चुनाव लड़ना आसान कर दिया है।

‘हरीश रावत पोस्ट डालकर भ्रम फैला रहे’


मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से बातचीत
आप पर आरोप है कि आप अपनी ही पार्टी के विधायकों के बच्चों की नियुक्तियां कर रहे हैं। एक विधायक जो विधानसभा अध्यक्ष भी हैं के बेटे को सलाहकार बनाने वाला मामला सामने आया था?
नहीं ऐसा कोई मामला नहीं है। विधानसभा अध्यक्ष जी के पुत्र को सलाहकार नहीं बनाया गया था बल्कि उनका नाम गलती से प्रिंट हो गया था। उसको तुरंत सही कर दिया गया था। विश्वास कीजिए कोई ऐसी नियुक्ति नहीं होगी जिस पर उंगलियां उठ सके।
सुनने में आ रहा है कि कुछ वरिष्ठ मंत्री अपनी मनमानी पर उतारू हैं। वे त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार में अपनी इच्छाओं को दबाए बैठे थे लेकिन आपके सीएम बनते ही उनकी इच्छाएं कुलांचे भरने लगी है?
इच्छाएं तो सबकी होती है, लेकिन देखना यह होता है कि वह इच्छाएं स्वहित की है या जनहित की। अगर स्वहित की इच्छाएं है तो उनको दफन करना पड़ेगा। हमारी सरकार में जनहित सर्वोपरि है। मुझे पूरा विश्वास है हमारा कोई भी वरिष्ठ सहकर्मी गलत काम नहीं करेगा।
प्रदेश में अवैध खनन की खबरें आ रही है। चर्चा हैं कि ‘सिंडिकेट’ फिर से सक्रिय हो उठा है जो खनन का खेल खेलने की तैयारी में है। कई बड़ी नदियांे पर उनकी नजर है?
सिंडिकेट कोई भी हो शराब का या खनन का उसको सिर उठाने से पहले ही खत्म कर दिया जाएगा। अवैध खनन कहीं नहीं हो रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत कभी-कभी जनता के कहने पर सोशल मीडिया में पोस्ट डालकर लोगों को भ्रमित कर देते हैं। जबकि रावत जी की पोस्टों में प्रमाणिकता का कोई मानक नहीं होता है।
आप जहीं कही जा रहे हैं वहीं करोड़ों रुपए की घोषणाएं कर देते हैं। लोग आपकी घोषणाओं को शक के दायरे में लाते हुए कह रहे हंै कि चुनाव आचार संहिता लागू होने से पहले यह सभी घोषणाएं धरातल पर होंगी भी या नहीं?
यकीन मानिए आचार संहिता लागू होने से पहले ही सभी घोषणाएं जमीन पर शुरू हो जाएगी। हम पूरी-पूरी कोशिश कर रहे हैं कि हमारे शासनकाल में ही सब पूरी हो जाएं। हम घोषणाओं के साथ ही शासनादेश भी जारी कर रहे हैं। चाहे परिवहन का हो या आंदोलनकारियों के आश्रितों को राहत था फिर शिक्षा, पर्यटन इत्यादि के मसले। सभी पर शासनादेश शुरू हो चुके हैं। कैंप लगने जारी हो गए हैं। प्रदेश विकास की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा हैं।

खटीमा में गीता का दरबार

जनता दरबार: फरियादियों की समस्याएं सुनतीं गीता धामी
उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्रियों की पत्नियों के नाम कितने लोग जानते हैं, यह सवाल अगर देवभूमि की जनता से किया जाए तो शायद ही कोई प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों की पत्नी के नाम बता सके। हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और उनकी पत्नी रेणुका रावत का नाम बहुत से लोग जानते हैैं क्योंकि वह हरिद्वार से लोकसभा का चुनाव लड़ चुकी हैं। फिलहाल मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विधानसभा क्षेत्र खटीमा में गीता धामी का नाम चर्चा में है। शारदा नदी के किनारे नंगला तराई स्थित उनके आवास पर सुबह सवेरे ही भारी भीड़ जमा हो जाती है। भीड़ में वे लोग होते हैं जो अपनी किसी समस्या के समाधान की इच्छा और चेहरे पर आशंका का भाव लिए मुख्यमंत्री के घर में घुसते हैं। इनमें से अधिकांश के चेहरे पर वापसी के समय संतुष्टि का भाव नजर आता है।
‘दि संडे पोस्ट’ टीम जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नंगला तराई स्थित उनके घर पहुंची तो वहां देखा कि गीता धामी सभी लोगों से मिल रही थीं और उनकी समस्याएं ध्यान से सुन रही थीं। यही नहीं बल्कि मौके पर ही सभी लोगों की समस्याओं का निस्तारण भी करा रही थीं। जैसे ही कोई अपनी समस्या उनके सामने रखता तो वह अपने पीआरओ से तुरंत संबंधित अधिकारी को फोन मिलाने को कहती। फोन पर दूसरी तरफ अधिकारी जब गीता धामी के द्वारा बताई गई समस्या की बाबत सुनता तो तुरंत संबंधित व्यक्ति से कहता कि वह अपनी एप्लीकेशन मुख्यमंत्री आवास पर छोड़ दे या मुझे व्हाटसअप कर दें। इसके बाद समस्या का समाधान कराने का आश्वासन लेकर लोग संतुष्ट भाव से मुख्यमंत्री आवास से निकलते दिखाई देते हैं। खटीमा के अधिकारियों की काम न करने की शिकायत पर वह तुरंत उन्हें घर पर बुलाती हंै। वहां उन्हें जिस तरह गीता धामी समझाती हंै और जनता की समस्याओं की बाबत गंभीरता बरतने की बात कहती हैं उससे स्थानीय लोग प्रभावित हैं। लोग उनकी प्रशंसा करते है। इसी दौरान ‘दि संडे पोस्ट’ ने जब गीता धामी को बताया कि खटीमा में उनकी सक्रियता के चलते उनके विधानसभा चुनाव लड़ने की चर्चाएं है तो वह इसे विपक्ष का एजेंडा बताती हैं और कहती हैं कि इससे विपक्ष यह अफवाह फैलाने की कोशिश कर रहा है कि सीएम साहब खुद मैदान से हटकर अपनी पत्नी को चुनाव लड़ाना चाहते हंै। लेकिन ऐसा नहीं है। यहां से वह नहीं लड़ेगी बल्कि सीएम साहब ही चुनाव लड़ेंगे। इसके बाद गीता धामी घर से निकलकर खटीमा के दूर-दराज के गांवों की तरफ कूच कर जाती हैं। जहां वह डोर टू डोर जनता के बीच जा रही है। ऐसा नहीं है कि गीता धामी अपने पति के सीएम बनने के बाद सक्रिय हुई हैं, बल्कि इससे पहले जब पुष्कर सिंह धामी विधायक थे तो तब भी वह खटीमा की जनता के दुख-दर्द सुनने उनके बीच जाती रही हंै। फिलहाल मुख्यमंत्री पूरे प्रदेश को तो उनकी पत्नी गीता धामी खटीमा की जिम्मेदारी संभाले हुए हैं।

जनता का विश्वास टूटने की बात अधिकांश लोग करते हैं लेकिन यही लोग धामी को सराहने भी लगे हैं। बेरोजगार युवाओं के लिए 24 हजार नौकरियों का ऐलान करते समय धामी ने आवेदन फार्म को निःशुल्क करने की घोषणा कर जनविश्वास वापस पाने की पहल की है। बेरोजगार इस बात से संतुष्ट हैं कि कम से कम इस सरकार की मंशा बेरोजगारों से ठगी कर आवेदन शुल्क के नाम पर सरकारी खजाना भरने की तो नहीं है। मुख्यमंत्री धामी फुल चुनावी मोड में हैं। उनके द्वारा ताबड़-तोड़ विकास कार्यों की घोषणाएं की जा रही हैं। जनता इन घोषणाओं से खुश तो है लेकिन उन्हें शंका है कि कहीं ये मात्र चुनावी स्टंट तो नहीं? ऐसे में धामी के सामने एक बड़ा संकट इन घोषणाओं के लिए बजट जारी करने का है। यदि वे ऐसा कर पाते हैं तो निश्चित ही जनता का शक दूर हो जाएगा

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