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Uttarakhand

‘दुरुस्त की जा रही है कमियां’

प्रदेश की प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलां की स्थिति पर निदेशक  वंदना गर्ब्याल से हुई बातचीत के मुख्य अंशः

प्रदेश की प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों की स्थिति राज्य बनने के 22 वर्ष के बाद भी बेहतर नहीं हो पाई है। आपके स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं नहीं है। जैसे आज भी 946 स्कूलों में छात्रों के लिए शौचालय और 884 स्कूलों में छात्राओं के लिए पृथक शौचालय नहीं हैं?

स्कूली शिक्षा में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों की हालत ऐसी नहीं है जैसे आप बता रहे हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि आप बता रहे हैं कि 986 स्कूलों में छात्रों के लिए शौचालय नहीं है और 884 स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग से शौचालय नहीं है। पता नहीं आप यह डाटा कहां से लाए हैं। हमारे डाटा के अनुसार 80 स्कूल ऐसे हैं जहां छात्रों के लिए शौचालय नहीं हैं और 467 स्कूलों में बालिका शौचालय नहीं हैं। ज्यादातर में शौचालय तो हैं और उनका उपयोग हो रहा है लेकिन बालिका शौचालय के नाम से अलग चिन्हीकरण होना बाकी है। इसका प्रोपोजल बनाया हुआ है जो इसी साल हो जाएंगे।

हमें यह डाटा एससीआरटी, डायस और आपके स्कूली शिक्षा विभाग से ही मिले हैं। आपके विभागीय डाटा और डायस दोनों के डाटा में भारी अंतर है। उनका डाटा कह रहा है कि 946 स्कूलों में छात्रों के लिए शौचालय नहीं है आप कह रही हैं कि कुल 80 स्कूलों में शौचालय नहीं हैं। इतना अंतर कैसे हो सकता है?
आप जो डाटा लेकर आए हैं डायस का वह पिछले साल 2020-21 का होगा। हमलोग अपने डिपार्टमेंट से मांगते हैं वो लोग भी डिपार्टमेंट से मांगते हैं। लेकिन उसमें थोड़ा-सा डिस्फंक्शनल जॉब भी होते हैं जिसको वो अपने डाटा में दिख देते हैं। हमारे यहां डिस्फंक्शनल जॉब दिखाते तो हैं लेकिन उसे ठीक करा लेते हैं क्योंकि पोर्टल में प्रावधान ही ऐसा बना रहता है कि उनको दिखाना ही पड़ता है।

स्कूलों में पीने का पानी भी नहीं मिल रहा है। 875 स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा तक आपका विभाग नहीं दे पा रहा है?

हमारे 266 ऐसे स्कूल हैं जहां पीने का पानी नहीं हैं। इनमें कई तो ऐसे हैं कि उनमें संयोजन की समस्या है लेकिन ऐसा नहीं है। स्कूलों में पीने का पानी नहीं है। पास-पड़ोस से व्यवस्था कर रहे हैं। यह जरूर है कि स्कूल की बिल्डिंग में नहीं हो लेकिन पीने का पानी तो है। उसकी व्यवस्था भी हो जाती है। कुछ ऐसे भी हैं जिसका स्रोत ही बहुत नीचे है तो वहां दिक्कत है। पेयजल डिपार्टमेंट की तरफ से जल संयोजन का काम चल रहा है।

स्कूलों में बिजली की सुविधा की बात करें तो आज भी 1968 स्कूलां में नहीं हैं?

आप का डाटा अपडेट नहीं है। 1202 स्कूल हमारे ऐसे हें जिनमें बिजली नहीं है। पिछले साल 200 स्कूलों में समग्र शिक्षा के तहत सोलर सिस्टम की व्यवस्था की गई है। इस बार उन्होंने निविदा भी निकाल दी है जल्द ही इसमें काम शुरू हो जाएगा।

हमें जो डाटा मिला है उसके अनुसार आज भी 91 स्कूलां के अपने भवन नहीं है। लेकिन आपके अपने विभाग के डाटा में कुल 77 ही स्कूल ऐसे दिखा रहा है जिसमें भवन नहीं हैं?

भवनहीन स्कूलों में हमारे पास 77 स्कूल है। जिसमें 54 तो जनपद नैनीताल में है जो फॉरेस्ट एरिया में हैं। कुछ ऐसे हैं जिनमें सिंचाई विभाग का यूपी संग विवाद है और कुछ वन खत्तों में है। कुछ में भूमि विवाद चल रहा है। इसमें डिफरेंस है तो देखेंगे।

सरकार की नीति हर एक स्कूल में पुस्तकालय हो लेकिन आज भी 4130 स्कूलां में पुस्तकालय की सुविधा नहीं दे पाया है?

एक से आठ तक के स्कूलों मे पुस्तकालय बने हुए नहीं होते हैं। समग्र शिक्षा इसके लिए फंडिंग करता है। प्रत्येक स्कूल के लिए 5 हजार, 7 हजार, 13 हजार और 20 हजार के मानक हैं। प्राइमरी के लिए 5 हजार और यूपीएसी के लिए 7 हजार है। उसी पर हम लोगों का किताबें खरीदनी होती हैं। सेंटर गर्वमेंट के नियमों के अनुसार 80 प्रसेंट एमबीटी और एनसीआरटी की किताबें होती है और 20 प्रर्सेंट हमारे राज्य की पुस्तकें ली जाती हैं। जो बजट मिलता है उसी से लिया जाता है। इसके लिए कोई अलग से कमरा नहीं होता है।

2443 स्कूलों में इंटिग्रेट कम्प्यूटर ट्रेनिंग लैब की सुविधा और 2020 स्कूलां में कम्प्यूटर एडेड लर्निंग लैब की सुविधा नहीं हैं जबकि सरकार का फोकस छात्रों को कंप्यूटर की शिक्षा दिलाए जाने का है?

प्राइमरी और जूनियर हाईस्कूलों में कोई पर्टिकुलरी कम्पयूटर लैब नहीं दी जाती है। अभी समग्र के जरिए कुछ स्कूलों को लैब दिए गए हैं। हम कोशिश कर रहे हैं कि सारे स्कूलों में लैब उपलब्ध हो।

आपका विभाग बता रहा है कि अब तक 1245 स्कूल या तो खाली पड़े हैं या बंद हो गए हैं या एकीकरण के चलते बंद कर दिए गए हैं। जबकि आरटीई की 2015 वार्षिक रिपोर्ट में 36 सौ स्कूलों को बंद करने की बात समाने आई है। इन स्कूलों के भवन, स्कूलों के कर्मचारी अध्यापक और भोजनमाताओं का क्या हुआ। आज तक विभाग इसकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं कर पाया है?

अभी तक 300 सौ स्कूलों को समायोजित किया गया है। कुछ में न्यायिक विवाद चल रहे हैं। जो स्कूल समायोजित किए गए हैं उन स्कूलों के टीचर भी समायोजित स्कूल में चले गए हैं। फर्नीचर भी चला गया। इसके लिए शासन ने एक आदेश जारी किया था जिसमें कहा था कि जैसे हमारे अन्य डिपार्टमेंट है, जैसे आंगनबाड़ी हैं जिनको भवन की जरूरत है वे उस भवन को अपने यूज में ले सकते हैं लेकिन यह तब तक होगा जब तक हमार स्कूल दोबार नहीं खुलता है। अब हमारा स्कूल दोबारा खुल जाएगा तो वह हम वापस ले लेंगे।

आपके वार्षिक बजट में क्षेत्रीय निरीक्षण के नाम पर भी प्राथमिक स्कूली शिक्षा विभाग 13 करोड़ रुपए सालाना खर्च कर रहा है। यह खर्च केवल निरीक्षण के नाम पर हर साल किया जाता है जबकि कहा जा रहा है कि निरीक्षण के नाम पर खानापूर्ति हो रही है?

निरीक्षण का मतलब यह नहीं कि सिर्फ क्षेत्रीय निरीक्षण ही है। इसमें हमारे कार्यालय भी है जैसे डिप्टी कार्यालय, जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय है और एडी कार्यालय है। यह सब क्षेत्रीय निरीक्षण के अंतर्गत आते हैं। वहां का पूरा जैसे वेतन है, कार्यालय खर्च है मेंटेनेंस खर्च है या टीए है, उसमें खर्च होता है।

उपखंड शिक्षा, खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालयां के निर्माण में पिछले वर्ष 35 करोड़ 66 लाख रुपए का बजट रखा गया जबकि अधिकतर कार्यालय स्कूलों और सर्वशिक्षा अभियान के भवनों में ही चल रहा है। इनका निर्माण क्यों नहीं हो पाया है लेकिन बजट हर वर्ष मिल रहा है?

बहुत जगह बन गए हैं, बहुत जगह बनाए जा रहे हैं। बहुत जगह बीओ का कार्यालय है, वहीं पर शिक्षा अधिकारी का भी है। ऐसा नही है कि धन का मिस यूज किया जा रहा है।

 

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