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यादों का सिलसिला-पदयात्राएं/भाग-3

हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड

 

मैं आज जब कभी जागेश्वर की तरफ निकलता हूं तो मुझे दन्या से भनौली तक की पदयात्रा बहुत याद आती है। वह पदयात्रा नहीं थी, वह दौड़ थी। बार-बार मेरे मन, मस्तिष्क में वह दौड़ और वहां के लोग याद आते हैं। उन लोगों ने मुझको एक गांव के हरीश से हरीश रावत बना दिया। दन्या से भनौली तक की वह दौड़, दन्या के पराठे और बेलक के जोगा राम बरबस याद आते रहेंगे

आज जब कहीं दुर्गम रास्ता दिखाई देता है, मुझे अपनी जवानी के दिन याद आते हैं। जब चलना-चलना, पैदल चलना मेरी फितरत थी। मेरा शौक था। मेरा अभिष्ठ था। हजारों किलोमीटर की मैंने पदयात्राएं की हैं। आज भी पदयात्रा के नाम से मैं रोमांचित हो जाता हूं। एक स्थानीय क्षेत्रीय राजनीतिक कार्यकर्ता से लेकर, ब्लॉक प्रमुख, युवक कांग्रेस के जिलाध्यक्ष, कांग्रेस पार्टी के प्रचारक के तौर पर मैंने कभी पैदल चलने और लोगों से संपर्क करने में संकोच नहीं किया। मैं जानता था कि मेरी योग्यताएं सीमित हैं और उन सीमित योग्यताओं को अवसर में बदलना है तो परिश्रम करना ही एकमात्र रास्ता है। जिलाध्यक्ष युवक कांग्रेस के रूप में अविभाजित अल्मोड़ा जनपद का कोई हिस्सा ऐसा नहीं था, जहां मैं न गया हूं, जहां पैदल चलकर युवक कांग्रेस की इकाई स्थापित न की हो! 1980 में जब पार्टी ने मुझे लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए चयनित किया, उस समय मेरी भ्रमणशीलता और पैदल चलने का शौक एवं चढ़ाई चढ़ने की कुब्बत बड़े काम आई। ऐसे ही एक चुनावी मुकाम पर अल्मोड़ा से चलकर दन्या पहुंचा। दन्या में कुछ लोग मेरा इंतजार कर रहे थे। हमने पूर्व निर्धारित लक्ष्य के तौर पर भनौली पहुंचने का निश्चय किया था और उसकी सूचना भनौली क्षेत्र में दे थी। दन्या के परोठे बहुत प्रसिद्ध हैं। अल्मोड़ा में कुछ हल्का-फुल्का खाकर चले थे। दन्या के पराठों का हमने आनंद लिया। दन्या में हमारे वरिष्ठ नेतागण उपस्थित थे। हमने उनसे कहा कि आप रुकें। तीन-चार जवानों को साथ लेकर मैं दन्या से भनौली की ओर चल पड़ा। आज तो भनौली सड़क से चारों तरफ से जुड़ा हुआ है। उस समय आप केवल टांगों के बल पर ही वहां पहुंच सकते थे। यूं भनौली में उस समय भी इंटर कॉलेज था। शिक्षा के क्षेत्र में वह क्षेत्र बहुत अग्रणीय क्षेत्र था और आज भी है। स्वतंत्रता संग्राम में उस क्षेत्र का अभूतपूर्व योगदान रहा। उस क्षेत्र के ही रहने वाले बिशन सिंह जी हमारे जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी बने। अल्मोड़ा-पिथौरागढ़-चंपावत-बागेश्वर के सर्वमान्य नेता गोर्वधन तिवाड़ी जी भी भनौली क्षेत्र के रहने वाले थे। समग्र अल्मोड़ा उनका कर्मक्षेत्र था और भनौली उनका जन्म स्थान था। मैं युवक कांग्रेस के अध्यक्ष रूप में पहले से ही भनौली, दन्या इलाके के इतिहास से परिचित था। मगर उम्मीदवार के रूप में मुझे लोगों को अपना परिचय देना आवश्यक था। मैं उस समय लगभग 26-27 साल का नौजवान था। सुबह थोड़ी ठंड थी। दिसंबर का महीना था। ठंड में पैदल चलना सुखदायी लगा। हमने दन्या से पांव आगे बढ़ाए, हमारे सहयोगी दन्या में इकठ्ठा थे। उन्होंने कहा शाम को 4 बजे दन्या में मीटिंग है, समय पर आ जाना। मैंने अंदाज लगाया कि पौने दस बजे यहां से चल रहे हैं तो क्या 4 बजे दन्या वापस आ जाएंगे! लोगों को भी संदेह था, कुछ लोगों ने कहा भी मीटिंग करनी है या नहीं! मैं घबरा गया। मुझे लगा मीटिंग दन्या में करनी आवश्यक है। समय कम था और विस्तृत फैला हुआ अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र। कहां एक तरफ धारचूला-मुनस्यारी, उधर कपकोट-बदियाकोट तक, सल्ट से लेकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की कर्मभूमि सूखीढांग तक, सब जगह जाना आवश्यक था। लोगों में एक बड़ा कौतूहल था कि एक लड़के को कांग्रेस लड़ा रही है। मेरा कर्मक्षेत्र भले ही कुछ रहा हो लेकिन इतनी प्रसिद्धि नहीं थी कि पूरे संसदीय क्षेत्र में लोग मेरे नाम को अंगीकार कर लें या मेरा नाम उन तक पहुंच गया हो। भनौली जाना भी आवश्यक था और दन्या में मीटिंग करना भी आवश्यक था। मैंने और मेरे साथ के नौजवानों ने तेज कदम बढ़ाए। 4 बजे दन्या की आम सभा की डेडलाइन के साथ हम प्रारंभ से ही बहुत तेज चलकर डसीली पहुंचे। फिर चिल होकर तड़कोट पहुंचे। इन सब गांवों में लोग मिले। लोग आगे बढ़कर ‘इंदिरा लाओ-देश बचाओ’ का नारा लगाते, ‘जात पर न पात पर, मोहर लगेगी हाथ पर’ इस नारे से हमारा स्वागत करते मिले। गुणादित्य जहां भगवान सूर्य देव का मंदिर है। कोणार्क, उड़ीसा एवं कटारमल, अल्मोड़ा के साथ गुणादित्य में सूर्य देव का मंदिर है। गुणादित्य में एक बड़ा वृक्ष है। उसी वृक्ष के नीचे हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानीगण चारों तरफ से आते थे, बैठते थे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बिशन सिंह जी यहीं के रहने वाले थे। गुणादित्य में हमको दो नौजवान और मिले, श्री घनश्याम गुरुरानी एवं आनंद प्रकाश जी। हम लोग तेजी से चलकर चगेठी, डूंगरा से भनौली पहुंचे। जिस समय हम भनौली पहुंचे उस समय लगभग सवा बज रहा था। भनौली में रमेश काण्डपाल, सिजवाली जी सहित बड़ी संख्या में लोग हमारा इंतजार कर रहे थे। मैंने उनसे कहा कि मैं एक चक्कर गांव के सभी घरों को प्रणाम कर आता हूं। मैं तेजी से निकला, गांव के हर घर की चौखट को प्रणाम किया। रमेश काण्डपाल जी बहुत अच्छा बोलते हैं। उस समय बिल्कुल फड़कते हुए नौजवान थे। उन्होंने बहुत सुंदर भाषण दिया और उसके बाद समय को देखते हुए सीधे मुझे ही बुलवाया गया। मैं बोलता भी जा रहा था और सूरज की तरफ देखता भी जा रहा था। जाड़ों के दिनों में सूरज जल्दी ढल जाता है। भनौली में हवा चल रही थी और ठंड भी बढ़ गई थी। लोगों में उत्साह था, उत्सुकता भी थी। लोग मुझे देखना चाहते थे। मुझे सुनने और देखने की उत्सुकता में लोग जुट जाते थे। बड़ी अच्छी मीटिंग हुई। मीटिंग को समाप्त करके हमारे स्थानीय कांग्रेसजनों के उत्साहपूर्ण नारों के मध्य हमने दन्या की ओर लगभग दौड़ लगा दी। हम भनौली से निकलते ही गुणादित्य को नहीं गए बल्कि सीधे तड़कोट को निकल गए। तड़कोट में चाय मिली और हम दन्या की तरफ चल पड़े। चढ़ाई थी, मगर हौंसला है तो चढ़ाई भी छोटी लगती है। हौंसला था और काशी राम पंत जी का डर भी था। उतना ही डर रामचंद्र भट्ट जी का भी था। भट्ट जी धौलादेवी क्षेत्र के ब्लॉक प्रमुख थे। दन्या के करीब पहुंचे तो मैंने देखा कि 4 बजने में कुछ ही समय बाकी है। सड़क में पहुंचते-पहुंचते 4 बज गए। सभा स्थल तक जाते-जाते हमें कुछ और समय लग गया। हमारे एक साथी ने सभा स्थल में संदेश पहुंचा दिया था कि उम्मीदवार आ गये हैं। पंत जी सभा की सारी औपचारिकताएं पूरी कर रहे थे और कुछ लोगों को बुलवा भी चुके थे। मेरे सभा स्थल पहुंचने के बाद दो ही लोग बोले, एक रामचंद्र भट्ट जी, दूसरे काशी राम पंत जी बोले। फिर मुझको बुलवाया गया और मैंने 2-3 मिनट में औपचारिकाताएं पूरी की। मैं पूरी लय में बोल रहा था। एक व्यक्ति बड़े क्रोध में मेरी तरफ आए, उनके हाथ में गड़ासा था। मुझे लगा कि वो सीधे खेत से आ रहे हैं और मुझे बोलते देखकर या मेरी कोई बात उन्हें पसंद नहीं आयी होगी इसलिए गुस्से में हैं। मैंने बिना विचलित हुए अपना भाषण जारी रखा। उन्हें दन्या में मेरा बैठक करना पसंद नहीं आया। यह समझा जाता था कि दन्या भाजपा का गढ़ है। खैर गड़ासा उठाए डॉ ़मुरली मनोहर जोशी जिंदाबाद, भाजपा जिंदाबाद के नारे लगाने लगे। बहुत उत्तेजित भाव में थे। जब उन्होंने गड़ासा उठाते हुए नारा लगाया तो मेरे बगल में गांधी टोपी पहने दुबले-पतले से व्यक्ति ने अपनी लाठी, गड़ासे पर लगा दी और कहने लगे कि जब तक यह लाठी मेरे हाथ में है। तब तक कोई भी व्यक्ति कांग्रेस के ऊपर हाथ नहीं उठा सकता है। उन्होंने लाठी से उस गड़ासे को धकेल दिया और एलान किया कि जब तक बेलक वाले जिंदा हैं, कांग्रेस की मीटिंग होगी, कोई इसे रोक नहीं सकता है और उनके साथ 20-25 लोगों ने मेरे चारों तरफ घेरा बना लिया। मैंने बोलना जारी रखा। मीटिंग बाधित नहीं हुई, चलती रही। मैंने अपनी सब बातें कही जो मुझे कहनी थी, जोरदार तरीके से कही। बहुत अच्छी मीटिंग हुई। लोगों ने बड़ी प्रसंशा की। काशी राम जी एवं राम चंद्र भट्ट जी ने मेरी पीठ ठोकी और कहा ये जोगा राम हैं। मैंने कहा हां, मैं मिला था इनसे और इनका बड़ा आभारी हूं। जोगा राम जी की लाठी मुझे हमेशा याद आती है। जब कभी मैं दन्या जाता हूं तो मुझे जोगा राम जी की बहुत याद आती है। जोगा राम जी की बड़ी इच्छा थी कि बेलक में पानी आए। मुझे यह कहते हुए बड़ी खुशी है कि श्री गोविंद सिंह कुंजवाल जी के नेतृत्व में हमने चार बड़ी पेयजल योजनाएं जिन्हें मल्टी विलेज ड्रिकिंग वाटर स्कीम कहते हैं, सरयू से मंजूर की। चारों पंपिंग योजनाएं बन भी गई हैं उनसे बेलक अंडोली, दन्या सहित अड़ोस-पड़ोस के सभी गांवों को पानी मिल रहा है। जोगा राम जी, काशी राम पंत जी और रामचंद्र भट्ट जी जैसे लोग कांग्रेस की जिंदगी थे। मैं सौभाग्यशाली था कि ऐसे लोगों की उपस्थिति में मैं चुनाव लड़ा और चुनाव जीता। डॉ ़मुरली मनोहर जोशी जी के सामने मैं कुछ भी नहीं था, वो उस समय भी एक राष्ट्रीय व्यक्तित्व थे। आज भी उनके सामने मैं अपने को कहीं खड़ा नहीं पाता हूं। योग्यता और व्यक्तित्व में डॉ ़जोशी महान हैं। उस समय हरीश रावत चुनाव नहीं लड़ रहा था बल्कि इंदिरा गांधी जी लड़ रही थी। जगह-जगह एक ही नारा गूंजता था, इंदिरा लाओ-देश बचाओ। जात पर, न पात पर, मोहर लगेगी हाथ पर। दन्या-अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ मोटर मार्ग का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। उस समय अल्मोड़ा-दन्या-पिथौरागढ़ मोटर मार्ग कच्चा था, केवल शोलिंग होती थी, डामरीकरण नहीं था। गाड़ियों को पिथौरागढ़ से अल्मोड़ा आने में 7-8 घंटे लग जाते थे। लोग दन्या में खाने या नाश्ते के लिये रुकते थे। दन्या का रायता और पराठे प्रसिद्ध थे। दन्या के पराठों को खाने का लोभ मैं भी छोड़ नहीं पाया और कभी-कभी चाय के साथ पराठे खाने में बड़ा आनंद आता था। वैसे दनिया में एक छोटी बाजार भी है, जहां गांवों की दाल सब्जियां दुकानों में आकर बिकती हैं। गोविंद सिंह कुंजवाल जी ने इस क्षेत्र में बहुत काम किया है। भनौली में गोवर्धन तिवाड़ी जी ने शिक्षा की अलख जगाई थी और सारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लोग उन शिक्षण संस्थाओं से जुड़े हुए थे। लेकिन इस सबके बावजूद भी हमारा जागेश्वर का क्षेत्र बड़ा पिछड़ा हुआ था। लोग कहते थे कि कांग्रेस कहीं से भी पीछे हो जाएगी, मगर उसकी भरपाई जागेश्वर से हो जाएगी। यह सब स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और कांग्रेस के मूर्धन्य नेताओं, काशी राम पंत जी, रामचंद्र भट्ट जी जैसे लोगों की मेहनत थी। जोगा राम जी समर्पित लोगों की देन थी कि दन्या कांग्रेस की जीत के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। आज तो दनिया में या दनिया के निकटवर्तीय क्षेत्रों में पॉलिटेक्निक, आईटीआईज, डिग्री कॉलेजेज भी हैं, सड़कें, हाईस्कूल, इंटर कॉलेज सभी क्षेत्रों में है। अल्मोड़ा-दन्या-पिथौरागढ़ रोड को उस समय सेंट्रल रोड फंड से बनवाया गया। आज तो उसको और चौड़ा कर राष्ट्रीय राजमार्ग के रूप में विकसित किया जा रहा है। उस सयय डामरीकरण करना बड़ा काम था। आरा सलपड़, भनौली से पनार तक, जागेश्वर से आगे नैनी क्षेत्र, यह सब क्षेत्र सड़क से वंचित थे। आज सब जगह सड़कें पहुंच गई हैं। मैं गोविंद सिंह कुंजवाल जी को बहुत धन्यवाद देना चाहता हूं, वो एक गांधी वादी विचारधारा के निष्ठावान कांग्रेस नेता हैं और स्पीकर के तौर पर एक ऐतिहासिक निर्णय उन्होंने दल-बदल के खिलाफ दिया जो आज एक मिशाल के तौर पर न्यायालयों में पेश किया जाता है। उन्होंने यहां 3 तहसीलें खुलवाई, जैंती में पहले से डिग्री कॉलेज एवं पॉलिटेक्नि कॉलेज तो था ही, उन्होंने उसके अलावा एक तहसील लमगड़ा में खुलवाई, भनौली के नाम से एक तहसील गरूड़ाबाज में खुलवाई। एक शिल्प संस्थान जिसे हरिप्रसाद टम्टा जी के नाम से समर्पित किया गया, स्वीकृत किया गया है। सरकार परिवर्तन के बाद इसके निर्माण का काम ढीला पड़ गया है क्योंकि भाजपा की प्राथमिकता ऐसे संस्थान बनाना नहीं है। शिल्प के बिना उत्तराखण्ड की कल्पना नहीं की जा सकती है और जिस दिन हम अपने शिल्प को भूल जाएंगे, वह क्षण राज्य के लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगा। शिल्प उन्नयन के लिए इस क्षेत्र में संस्थान खोला गया, वर्तमान सरकार उसको कोई महत्व नहीं दे रही है, जिसका मुझे बहुत दुःख है। मगर हम अपनी आवाज बुलंद करते रहेंगे। मैं गोविंद सिंह कुंजवाल जी आदि से परामर्श करुंगा कि क्यों न हम एक दिन मुख्यमंत्री जी के आवास पर उपवास पर बैठें। मुंशी हरिप्रसाद जी एक रत्न नक्षत्र थे, जिन्होंने सामाजिक उन्नयन में बहुत बड़ी भूमिका अदा की। शिल्पकार नाम शिल्प समाज को उन्होंने दिया। जिसको भारत सरकार एवं राज्य सरकारों ने भी मान्यता दी है। मैंने, गोविंद सिंह जी से कहा था कि जोगा राम जी के नाम पर एक पेयजल योजना को जरूर समर्पित कर दें जो बेलक गांव को पानी पहुंचा रही है। मैं समझता हूं उन्होंने ऐसा किया होगा। काशी राम पंत जी के नाम पर भी एक योजना को समर्पित किया गया है। दन्या उत्तराखण्ड से पहले जनरल हुए जनरल बीसी जोशी, की मातृभूमि है। मैं आज जब कभी जागेश्वर की तरफ निकलता हूं तो मुझे दन्या से भनौली तक की पद-यात्रा बहुत याद आती है। वह पदयात्रा नहीं थी, वह दौड़ थी। बार-बार मेरे मन, मस्तिष्क में वह दौड़ और वहां के लोग याद आते हैं। उन लोगों ने मुझको एक गांव के हरीश से हरीश रावत बना दिया। मैं उन सभी आत्माओं को जिनमें से कई लोग आज हमारे बीच में नहीं हैं, उनको प्रणाम करता हूं। उस समय जो नौजवान मेरे साथ चले थे, आज वो भी उम्र के उसी पड़ाव में हैं, जहां मैं हूं। मैं उनको शुभकामनाएं देता हूं, उनके दीर्घ जीवन की कामना करता हूं। दन्या से भनौली तक की वह दौड़, दन्या के पराठे और बेलक के जोगा राम बरबस याद आते रहेंगे। पंडित काशी राम पंत जी, रामचंद्र भट्ट जी, टीकाराम पांडे जी, धर्म सिंह महरा जी ध्याड़ी के गैड़ा बंधु भी बहुत याद आते हैं।

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