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नैनीताल में बसपा 1989 के बाद कभी भी त्रिकोणीय मुकाबले में नहीं आ पाई। इस बार भी कांग्रेस प्रत्याशी हरीश रावत और भाजपा प्रत्याशी अजय भट्ट के बीच सीधा मुकाबला है। दोनों दिग्गजों के सामने कठिन चुनौतियां हैं। अजय भट्ट को भाजपा आलाकमान के भरोसे पर खरा उतरना है। दूसरी तरफ हरीश रावत को फिर से अपना वजूद साबित करना होगा

नए रण की तैयारी में रावत

नैनीताल में भी राजनीतिक दलों ने अपने को चुनाव में झोंक दिया है। राज्य की हाइप्रोफाइल बन चुकी नैनीताल-ऊधमसिंह नगर संसदीय सीट पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट एवं कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हरीश रावत के बीच दिलचस्प मुकाबले का मंच सज चुका है। सीट पर कांग्रेस ने हरीश रावत और भारतीय जनता पार्टी ने अजय भट्ट पर अपना दांव लगाया है। ये दोनों दिग्गज रानीखेत विधानसभा क्षेत्र के निवासी हैं। बहुजन समाज पार्टी ने नवनीत प्रकाश अग्रवाल तथा भाकपा (माले) ने कैलाश चंद्र पाण्डे को अपना उम्मीदवार बनाया है। लेकिन मुख्य मुकाबले में कांग्रेस के हरीश रावत और भारतीय जनता पार्टी के अजय भट्ट ही हैं हालांकि कभी तराई में कभी बसपा अच्छा- खासा जनाधार रखने वाली पार्टी रही है। लेकिन 1989 के बाद के लोकसभा चुनावों में वह कभी त्रिकोणीय मुकाबले में नहीं रही है। मुख्य मुकाबला भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के मध्य ही रहा है।

नैनीताल जिले के हल्द्वानी, नैनीताल, भीमताल, लालकुआं, कालाढूंगी तथा ऊधमसिंह नगर की खटीमा, सितारगंज, नानकमत्ता, रूद्रपुर, किच्छा, गदरपुर, बाजपुर, काशीपुर, जसपुर विधानसभाओं को लेकर बना नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा क्षेत्र दो दिग्गजों के मैदान में आ जाने से दिलचस्प हो गया है। हरीश रावत को जहां केंद्र की राजनीति का लंबा अनुभव है, वहीं अजय भट्ट के लिए दिल्ली की राजनीति करने के लिए बेहतर अवसर आया है। पर्वतीय व मैदानी क्षेत्रों के समन्वय से बनी नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा सीट को अगर जातिगत समीरणों के हिसाब से देखें तो इस लोकसभा क्षेत्र में 27 प्रतिशत ठाकुर, 17 प्रतिशत ब्राह्मण, 16 प्रतिशत मुस्लिम, अनुसूचित जनजाति के 14 प्रतिशत और सिख -बंगाली 4 प्रतिशत हैं। सिख तराई की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस चुनाव में दलित मतदाताओं की भूमिका अहम होगी। अगर इस लोकसभा क्षेत्र को जिले के हिसाब से बांटकर देखें तो दलित मतदाताओं का प्रतिशत नैनीताल जिले में 20 प्रतिशत है। अनुसूचित जनजाति के 1 प्रतिशत मतदाता हैं। जबकि ऊधमसिंह नगर में अनुसूचित जाति के 14 प्रतिशत व अनुसूचित जनजाति के 7.5 प्रतिशत मतदाता हैं। इस बार के चुनाव में युवा मतदाताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। इस लोकसभा सीट पर साढ़े पांच लाख से अधिक युवा मतदाता हैं। केसी पंत, नारायण दत्त तिवारी, बलराज पासी, महेंद्रपाल सिंह, केसी सिंह बाबा, भारत भूषण सरीखे लोग इस लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। आजादी के बाद यह पहला ऐसा चुनाव है जो नारायण दत्त तिवारी की अनुपस्थिति में लड़ा जा रहा है।

हरीश रावत और अजय भट्ट के लिए चुनाव से पहले टिकट पाना जितना चुनौतीपूर्ण था उतना ही चुनौतीपूर्ण पार्टी के अंदर व जनता के बीच समीकरणों को साधना है। दोनों के लिए पार्टी का टिकट पाना आसान नहीं रहा। मौजूदा सांसद भगत सिंह कोश्यारी के चुनाव न लड़ने की घोषणा ने भाजपा के अंदर कई दावेदार पैदा कर दिए थे। बताया जाता है युवा चेहरे की पैरवी करने वाले भगत सिंह कोश्यारी की भाजपा उम्मीदवार के रूप में खटीमा के विधायक पुष्कर सिंह धामी पहली पसंद थे। वहीं नारायण दत्त तिवारी के प्रधानमंत्री बनने में रोड़ा बने और 1991 में चुनाव जीते बलराज पासी इस बार भी टिकट की बाट जोहते रह गए। पिछले एक वर्ष में तराई से लेकर पहाड़ तक सक्रियता दिखाने वाले बलराज पासी इस बार भी पार्टी की नजर में खरे नहीं उतरे। परिवहन व समाज कल्याण मंत्री यशपाल आर्य भी मजबूत दावेदारी में थे। कालाढूंगी से विधायक वंशीधर भगत, मंडी परिषद् के अध्यक्ष व प्रदेश महामंत्री गजराज बिष्ट ने भी अपनी दावेदारी पेश की थी। लेकिन अजय भट्ट पर ही पार्टी हाईकमान ने विश्वास जताया।

इस सीट पर 21 सालों बाद राष्ट्रीय पार्टी से कोई ब्राह्मण प्रत्याशी मैदान में है। अजय भट्ट के सामने पार्टी के भीतर एवं बाहर कई चुनौतियां हैं। पिछले चुनाव में कुशल संगठनकर्ता भगत सिंह कोश्यारी मोदी लहर के चलते भारी मतों से जीते थे। इस बार भाजपा को मोदी के करिश्मे पर फिर भरोसा है। हालांकि सांगठिनक तौर पर देखा जाए तो भाजपा बेहतर स्थिति में दिखाई देती है। पूरे लोकसभा क्षेत्र की तेरह विधानसभा सीटों में जसपुर एवं हल्द्वानी को छोड़कर सभी विधानसभा सीटों में भाजपा का कब्जा है। काशीपुर, रुद्रपुर और हल्द्वानी के नगर निगमों में भाजपा के मेयर हैं। बलराज पासी और उनके शिष्य शिक्षा मंत्री अरविंद पाण्डे की बेरुखी अजय भट्ट की परेशानी का सबब बन सकती है। जहां तक हरीश रावत का प्रश्न है, उत्तराखण्ड की राजनीति में उनके कद-काठी का नेता कोई नहीं है। पिछले विधानसभा चुनाव में वे भले ही किच्छा एवं हरिद्वार ग्रामीण सीट से चुनाव हार गए, लेकिन उन्होंने इस पराजय की निराशा को खुद पर हावी नहीं होने दिया। नैनीताल लोकसभा क्षेत्र के लिए टिकट पाना उनके लिए आसान नहीं था। पूर्व में लोकसभा सांसद रहे महेंद्रपाल ने पूरी गंभीरता से अपनी दावेदारी की थी। क्षेत्र की प्रभावशाली नेता व नेता प्रतिपक्ष डॉ इंदिरा हृदयेश भी मजबूती के साथ महेंद्रपाल के साथ खड़ी थीं। प्रदेश की राजनीति में हरीश रावत और इंदिरा हृदयेश की अदावत किसी से छिपी नहीं है। खासकर नगर निगम चुनावों में इंदिरा हृदयेश के पुत्र सुमित हृदयेश के मेयर चुनाव में हरीश रावत का सहयोग न मिलने की टीस इंदिरा हृदयेश को है। हरीश रावत के नैनीताल से टिकट का विरोध भी इसका एक कारण रहा था।

डॉ इंदिरा हृदयेश नाराजगी की बात को इंकार करते हुए कहती हैं जब पार्टी ने हरीश रावत को प्रत्याशी घोषित किया है तो अब विरोध की बात कहां है? पूरे उत्तराखण्ड में पांचों कांग्रेस प्रत्याशी भारी बहुमत से जीतेंगे। सुमित हृदयेश का भी कहना है कि ये समय नाराजगी व्यक्त करने का नहीं है, बल्कि राष्ट्र व पार्टी का प्रश्न है। पार्टी एक है। हम मजबूती से हरीश रावत व अन्य कांग्रेस प्रत्याशियों के साथ हैं। जहां तक पूरे संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस का प्रश्न है, इसकी सांगठिनक क्षमता का इम्तहान है। उसकी लड़ाई भाजपा के उस संगठन से है जो जमीन पर हमेशा सक्रिय रहता है। तराई में पूर्व मंत्री तिलकराज बेहड़ व जसपुर के विधायक आदेश चौहान मजबूती से हरीश रावत के साथ हैं। तराई में भी कांग्रेस के स्थापित नेता पार्टी के लिए काम करते दिख रहे हैं। फिलहाल असंतोष जैसी कोई बात नजर नहीं आती।

सपा-बसपा गठबंधन के तहत नैनीताल लोकसभा सीट बसपा के खाते में आई है। यहां से बसपा ने नवनीत प्रकाश अग्रवाल को अपना प्रत्याशी बनाया है, परंतु बसपा ने बीते सालों में यहां अपना जनाधार खोया है। कहा जाता है कि दलित मतदाताओं का रुझान कांग्रेस की मजबूती के साथ उसकी ओर ही ज्यादा है। ऐसे में कांग्रेस के लिए दलित व मुस्लिम मतदाताओं का रुख काफी महत्वपूर्ण साबित होगा। इन चुनावों में हरीश रावत को एक और चुनौती से जूझना होगा। मोदी लहर है या नहीं ये मतदान के दिन ही पता चलेगा, मगर मोदी लहर को हरीश रावत कितना रोक पाते हैं ये भी उनके लिए चुनौती होगी। ये वक्त हरीश रावत की राजनीति का कठिन दौर जरूर है। लेकिन ऐसी चुनौतियों से वे पूर्व में भी सफलतापूर्वक निकल चुके हैं।

हरीश रावत और अजय भट्ट दोनों ही रानीखेत क्षेत्र से आते हैं इसलिए बाहरी होना कोई मुद्दा नहीं है। दोनों ही अपने राजनीतिक जीवन के उस चुनौतीपूर्ण समय में हैं जिसमें दोनों का बहुत कुछ दांव पर लगा है। अजय भट्ट व हरीश रावत को ये सिद्ध करना है कि पिछले विधानसभा चुनाव की हार महज इत्तेफाक थी। अब जब चुनाव की तिथि नजदीक आती जा रही है, दोनों के सामने चुनौतियां बढ़ती जाएंगी। अजय भट्ट के सामने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के भरोसे पर खरा उतरने की चुनौती है, वहीं हरीश रावत के लिए अपने कद को फिर से साबित करने की चुनौती है। फिलहाल उत्तराखण्ड की इस हाइप्रोफाइल सीट पर पूरे राज्य और देश की निगाहें हैं। यह सीट 2022 के विधानसभा चुनाव के राजनीतिक समीकरणों की दिशा भी तय करेगी।

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