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Uttarakhand

किसानों की कब्रिस्तान बनती देवभूमि

उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार किसानों की कर्जमाफी के अपने चुनावी वादे को भुला रही है। यही नहीं किसानों के हित में हाईकोर्ट के निर्देशों की भी वह अवहेलना कर देती है। ऐसे में किसान आहत हैं। कर्ज वसूली के लिए बैंकों का दबाव सहन न करने के कारण वे आत्महत्या करने को विवश हैं। उनके परिजन मानसिक तनाव के शिकार हो रहे हैं, लेकिन त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार संवेदनहीन बनी हुई है। 2017 के चुनाव में भाजपा ने किसानों की कर्ज माफी के बड़े-बड़े वादे किए थे
वर्ष 2017 में प्रदेश के विधानसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने मतदाताओं को लुभाने के लिए बड़े-बड़े वादे किए थे। किसानों को आकर्षित करने के लिए पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में उनके कर्ज माफ करने का वादा किया। देहरादून में घोषणा पत्र को जारी करते हुए केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि उनकी सरकार आई तो उत्तराखण्ड का किसान कर्जे से मुक्त होगा। लेकिन आज दो साल बाद भी उत्तराखण्ड में सत्तासीन भाजपा सरकार किसानों के कर्जे माफ करने के बजाय लॉलीपॉप थमा रही है। दूसरी तरफ मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार है, जिन्होंने सत्ता संभालने के चार दिन बाद ही किसानों को कर्जा मुक्त कर दिया। उत्तराखण्ड सरकार किसानों को कर्जे मुक्त नहीं कर पाई है। जिसके चलते प्रदेश के आधा दर्जन से अधिक किसान अपनी जिंदगी गंवा चुके हैं। उनके परिवार भी मानसिक तनाव के शिकार हैं।
गौरतलब है कि उत्तराखण्ड एक ऐसा राज्य है जहां विदर्भ और बुंदेलखंड की तरह किसानों की आत्महत्याओं की खबरें नहीं आती थी। यहां का किसान कठोर परिश्रम कर परिवार का पेट पालने के लिए जाना जाता था। लेकिन पिछले दो वर्ष से पता नहीं इस प्रदेश के किसानों को किसकी नजर लग गई है कि किसान कर्ज के आगे हिम्मत हार रहा है। कर्ज से परेशान किसान आत्महत्या जैसा आत्माघाती कदम उठाने को मजबूर हो रहा है। जबकि प्रदेश के मुखिया आत्महत्या को फैशन तक करार दे रहे हैं। मुख्यमंत्री जब यह कहते हैं कि उनके पास 11 लोगों के आत्महत्या करने के पत्र आए हैं, तो ऐसे में उनकी संवेदनहीनता को बखूबी समझा जा सकता है। किसानों के पत्र आने के बावजूद सरकार गंभीर नहीं है तो यह उसकी संवेदनहीनता ही है। यह वही भाजपा सरकार है जिसके एक मंत्री प्रकाश पंत किसानों की आत्महत्याओं पर जांच कराने के लिए एसआईटी गठित कराने का दावा करते हैं, लेकिन आज तक उसका गठन नहीं हुआ।
किसान आत्महत्या की खबर सबसे पहले पिथौरागढ़ से आई। यहां बेरीनाग तहसील के पुरानाथल गांव के सरतोला तोक निवासी सुरेंद्र सिंह (60) पुत्र राम सिंह ने 15 जून 2017 को आत्महत्या कर ली। सुरेंद्र सिंह ने पांच वर्ष पूर्व साधन सहकारी समिति पुराकायल्द से कøषि कार्य के लिए 75 हजार रुपए और ग्रामीण बैंक बेरीनाग में चार वर्ष पूर्व 50 हजार रुपए का कर्ज लिया था। किसी तरह अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे किसान सुरेंद्र पर लोन जमा करने के लिए बैंक से दबाव बनाया जा रहा था। सुरेंद्र इस उम्मीद में था कि शायद सरकार की किसी योजना में कøषि ऋण माफ हो जाएगा। लेकिन सरकार द्वारा ऐसी कोई पहल न किए जाने पर वह तनाव में था। आखिर में सुरेंद्र ने घर में ही जहरीला पदार्थ खाकर जान दे दी। सुरेंद्र  के दो बेटे हैं और दोनों बेरोजगार हैं। दोनों बेटों पर भी कøषि ऋण बताया जा रहा है। इस घटना के 10 दिन बाद ही 25 जून 2017 को ऊधमसिंह नगर जिले के कंचनपुरी के रहने वाले रामअवतार पुत्र राम प्रसाद ने पौने दो लाख रुपये का बैंक कर्ज नहीं चुकाने की वजह से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। मौत से कुछ दिन पहले ही बैंक से किसान को लोन न देने के कारण नोटिस आया था। परिजन बताते हैं कि नोटिस के बाद से ही रामअवतार परेशान चल रहा था। उसके बाद उसने आत्महत्या जैसा घातक कदम उठा लिया। रामअवतार पर बैंक ऑफ बड़ौदा की शाखा नानकमत्ता का 1 ़75 लाख और एसबीआई खटीमा शाखा का 1 ़97 लाख रुपए का कर्ज था। रामअवतार के पास केवल ढाई एकड़ जमीन है, जिससे उसके घर के दस सदस्यों की रोजी-रोटी चलती थी। 13 जुलाई 2017 को ऊधमसिंह नगर जनपद के बाजपुर में ग्राम बासाखेड़ी निवासी बलविंदर सिंह (39) पुत्र मलूक सिंह ने जहरीले पदार्थ खा लिया। उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही उसने दम तोड़ दिया। बताया गया कि  बलविंदर ने पंजाब नेशनल बैंक की ओर से जारी साढ़े सात लाख की रिकवरी के नोटिस से परेशान होकर यह कदम उठाया। इसी तरह ऊधमसिंह नगर के बिरियाभूड निवासी मस्या सिंह ने भी 28 जुलाई 2017 को कर्ज का नोटिस देखकर आत्महत्या कर ली। जिससे उसकी मौत हो गई। मस्या सिंह पर उत्तराखण्ड बैंक का 2 .25 लाख रुपया कर्ज था। हरिद्वार जिले के रुड़की में कर्ज में डूबे एक किसान सुदेश त्यागी ने गंगनहर में कूदकर जान दे दी।  सुदेश 21 दिसंबर 2017 से लापता था। 23 दिसंबर 2017 को झबरेड़ा थाने में उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवाई गई थी। करीब एक माह बाद उसका शव गौतमबुद्ध नगर (उत्तर प्रदेश) के जेवर थानांर्गत गंगनहर से बरामद हुआ। शेरपुर खेलपुर निवासी सुदेश कुमार त्यागी (35) की गांव में करीब साढ़े सात बीघा जमीन है। उसने बैंक से कृषि कार्ड पर 3 ़12 लाख रुपए का ऋण लिया था जो बढ़कर करीब चार लाख हो गया था। सुदेश के चाचा नरेश दत्त त्यागी के अनुसार 7 अप्रैल 2017 को सुदेश के घर पर किस्त जमा कराने के लिए बैंक का नोटिस आया था। तभी से वह तनाव में था। हाल में 8 जनवरी 2019 को नैनीताल जिले के कालाढूंगी में महादेवपुर गांव निवासी किसान प्यारा सिंह (45) पुत्र तारा सिंह ने जहरीला पदार्थ खाकर आत्महत्या कर ली। प्यारा सिंह पर नैनीताल बैंक की बेल पड़ाव शाखा का पांच लाख, सहकारी समिति बेल पड़ाव का एक लाख एवं सहायता समूह का भी एक लाख रुपये का कर्ज था, जबकि किसान प्यारा सिंह के पास चार एकड़ जमीन है। परिजनों के अनुसार बैंक कर्मचारी आए दिन घर पहुंचकर कर्ज चुकाने का तगादा कर रहे थे। इससे वह परेशान था। महादेवपुर के ग्राम प्रधान भगवान तिवारी की मानें तो किसान प्यारा सिंह ने बैंक कर्ज के चलते आत्महत्या की है। पिछले कुछ दिनों से बैंक कर्मचारी उसके घर रिकवरी करने आ रहे थे। जिसके चलते वह काफी समय से परेशान था।
आश्चर्यजनक यह है कि किसानों की हालत खस्ता होने के बावजूद राज्य सरकार ने कृषि बजट में कटौती कर दी। सरकार ने वित्तीय वर्ष 2017 -18 के कृषि बजट में कटौती कर 3097 ़46 करोड़ का प्रावधान रखा था। जबकि 2016-17 में कृषि बजट 37476 ़89 करोड़ रुपये था। ये पिछले बजट की तुलना में इस बार करीब 17 फीसदी कम था। वित्त मंत्री प्रकाश पंत की ओर से जारी आकड़ों के अनुसार प्रदेश के 699094 किसानों पर 1096 करोड़ रुपये का कर्ज है। कर्ज में डूबे किसानों को उम्मीद थी कि राज्य में भाजपा सरकार बनते ही उनका कर्ज माफ हो जाएगा। भारी बहुमत से सत्ता में आई त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार के दो साल पूरे हो गए हैं। लेकिन अभी तक इस दिशा में सरकार की ओर से कोई कदम नहीं उठाया गया है। कर्ज माफी के लिए किसान राज्य सरकार पर कई बार दबाव भी बना चुके हैं। लेकिन अभी तक सरकार की ओर से उम्मीद की किरण दिखाई नहीं दे रही है। अल्मोड़ा निवासी रमेश चंद किसानों की दशा पर चिंता जाहिर करते हैं कि ‘जय जवान जय किसान’ का नारा हर सरकार ने दिया है, लेकिन किसानों के बारे में कभी किसी ने नहीं सोचा। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में किसानों का कर्ज माफ किया लेकिन उत्तराखण्ड में सरकार का कहना है कि फिलहाल राज्य की स्थिति इस लायक नहीं हैं कि किसानों का कर्ज माफ किया जा सके।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी नहीं बना आयोग
26 अप्रैल 2018 को नैनीताल उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश राजीव शर्मा और शरद शर्मा की खंडपीठ ने राज्य के किसानों के हित में महत्वपूर्ण निर्देश दिए। कोर्ट ने किसानों को एमस स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों के अनुसार औसत फसल लागत का तीन गुना एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य देने, राज्य किसान आयोग गठित करने, आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को पेंशन देने की योजना बनाने, इंश्योरेंस कंपनियों से बात करके मौसमी फसल बीमा योजना बनाने आदि के निर्देश दिए थे। इस मामले में ऊधमसिंह नगर के शांतिपुरी निवासी किसान नेता गणेश उपाध्याय ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर केंद्र सरकार, राज्य सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक को पार्टी बनाते हुए राहत की मांग की थी। याचिका में कहा गया था कि राज्य में किसानों की स्थिति ब्लू व्हेल गेम से भी ज्यादा खतरनाक हो गई है। लेकिन तीन माह बीत जाने के बाद भी सरकार द्वारा निर्देश का पालन न करने पर अवमानना याचिका दायर की गई। याद रहे कि हाईकोर्ट ने सरकार को स्कीम बनाने के लिए तीन माह का समय दिया था। लेकिन समय सीमा बीत जाने के बाद भी कुछ नहीं हुआ।
बात अपनी-अपनी
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2014 में कहा था कि तुम प्रदेश में हमारी डबल इंजन सरकार बनाओ, हम किसानें का ऋण माफ करेंगे। बाद में मोदी ने कहा कि यह राज्य सरकार का काम है। त्रिवेंद्र सिंह सरकार ने धन की कमी बताकर ऋण माफ नहीं किए। तब से लेकर अब तक प्रदेश में 11 किसानों ने आत्महत्या कर ली है। किसान बद से बदतर हो गए हैं, जबकि हमारी तीन प्रदेशों में बनी सरकार ने शपथ लेते ही किसानों के कर्जे माफ कर दिए। भाजपा की कथनी करनी में अंतर स्पष्ट दिखता है।
प्रीतम सिंह, प्रदेश अध्यक्ष कांग्रेस
कांग्रेस ने सारे लोगों को टेलीफोन से कर्जे दिलवाए। उन्होंने अपने लोगों को लोन दिलवा दिए। वह पैसे वापस नहीं मिले।अजय भट्ट, प्रदेश अध्यक्ष भाजपा
हाईकोर्ट के आदेश के बाद उत्तराखण्ड सरकार ने मानसून सत्र के दौरान विधानसभा में 20 दिन के भीतर किसानों की फसलों का बकाया भुगतान कराने की घोषणा की। लेकिन वह घोषणा आज तक अधूरी है। सरकार ने उच्च न्यायालय के आदेश की भी अवमानना की। सरकार को कोर्ट ने तीन माह का समय दिया था। लेकिन कोई योजना नहीं बनी, जबकि हाईकोर्ट के निर्णय के बाद तीन किसानों ने और आत्महत्या कर ली। इन मौतों के लिए उत्तराखण्ड सरकार जिम्मेदार है।
डॉ. गणेश उपाध्याय, याचिकाकर्ता

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