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Uttarakhand

अदूरदर्शी निर्णयों से फजीहत में सरकार

किसी भी आपदा के संकट के दौरान राज्य सरकार के मजबूत निर्णय और ठोस कार्यवाही उस सरकार के कामकाज और छवि को दर्शाती है। इसके चलते जनता में सरकार के पक्ष में विश्वास का माहौल बनता है और जनता सरकार के हर फैसले के साथ खड़ी नजर आती है। परंतु विगत एक माह से उत्तराखण्ड में ऐसा कुछ नही देखा गया। कोरोना संकट के एक माह से भी ज्यादा समय के दौरान जिस तरह से सरकार और शासन के द्वारा जारी किये गये निर्णयो को एक के बाद एक या तो वापिस ले लिया गया या फिर उनमें संशोधन कर के नया आदेश जारी करना पड़ा है। इस तरह से अपने ही आदेशो को पर ठोस निर्णय न लेने के कारण जहां सरकार की फजीहत हो रही है वहीं सरकार पर अदूरदर्शी होने का भी आरोप लग रहा है। सोशलमीडिया में सरकार के इस तरह की कार्यशैली पर सबसे ज्यादा तंज कसे जा रहे है। कांग्रेस ओर अन्य विपक्षी दल सरकार पर कोरोना संकट से निपटने मे लापरवाही बरतने का आरोप लगा रहे है।

कोरोना संकट के चलते राज्य में लाॅकडाउन की स्थिति बनी हुई है। 25 मार्च से देश भर में लाॅकडाउन की घोषणा की गई थी। इसके चलते राज्य सरकार की मशीनरी पूरी तरह से सजग हुई और राज्य में लाॅकडाउन के संबध में सरकारी बैंको  का दौर आरम्भ किया गया। इन बैठको मे तमाम तरह के निर्णय लिये गये जिस से जनता को लाॅकडाउन के दौरान जरूरी आवश्यकताओं की आपूर्ती हो सके। इसके लिये सरकार के द्वारा कई घोषणाये की गई और आदेश जारी किये गये। हैरानी इस बात की है कि कोराना जेैसे महासंकट के बावजूद भी सरकार के कई निर्णय स्वंय सरकार को ही संशोधित करने पड़े ओैर कईयों को बदला गया यहां तक कि कई निर्णय तक सरकार के द्वारा वापिस लिये गये।

सरकार कोरोना संकट से निपटने के लिये किस कदर तैयार है यह सरकार की पहली बैठक  में ही साफ हो गया |  जब राज्य के मुख्यसचिव के द्वारा बैठक कर के सचिवालय कर्मचारीयों को काम पर न आने का अदेश जारी किया इस आदेश मे यह भी साफ किया गया कि जरूरत पड़ने पर ही उनको काम पर बुलाया जा सकता है। इस आदेश को जहां पूरे प्रदेश के सरकार विभागों में जारी करना चाहिये था वहीं सिर्फ सचिवालय के ही कर्मचारियों के लिये ही दिया गया अन्य सभी विभागों को छोड़ दिया गया। इस पर भारी हंगामा हुआ तो आदेश मे संशोधन कर के राज्य के सभी सरकारी विभागों के कार्यालयो के लिये जारी कर दिया गया।

इसी तरह से लाॅकडाउन के पहले चरण के शुरूआती दिनो में में राज्य के गृह विभाग के सचिव के द्वारा एक आदेश जारी हुआ गया जिसमें उत्तराखण्ड की सीमा में किसी भी देशी या विदेशी नागरिको के प्रेवश पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया था। सरकार के इस आदेश कर जमकर विरोध होने लगाा क्योकि  कई उत्तराखण्ड के प्रवासी लोग लाॅकडाउन के चलते उत्तराखण्ड में आ रहे थे जिनको रोका जाने लगा। इस के बाद फिर से नया आदेश जारी किया गया जिसमें यह कहा गया कि उत्तराखण्ड में आने पर रोक नही है लेकिन रूकने पर रोक लगा दी गई।

सबसे ज्यादा फजीहत उत्तरखण्ड सरकार के द्वारा 31 मार्च को राज्य में लाॅकडाउन में छूट दिये जाने के आदेश को लेकर हुई जिसमें राज्य में प्रातः छ बजे से लेकर सात बजे तक वाहनो को राज्य की भीतरी सीमा में चलने की अनुमति दी गई। इस के लिये यक तर्क दिया गया कि राज्य में लाॅकडाउन के चलते हजारो लेाग अलग अलग स्थानो में फंसे हुये है  उनको अपने अपने घरो में चहुंचाने के लिये यह छूट दी गई है।

सरकार के इस फैसले से बेहद गहमागहमी बढ़ गई और हजारो लोगो के द्वारा पास के लिये आवेदन करा आरम्भ कर दिया। जबकि सरकार के इस निर्णय से जनता और जगरूक लेागो में भारी बैचैनी और नाराजगी पेैदा हो गई। कोरोना संक्रमण को इस फैसले से रोकने में समस्या आ सकती थी लेकिन सरकार के अदूरदर्शी निर्णय से राज्य भर मे ंविकट स्थिति पैदो होने के आसार बन गये थे। सोशल मीडिया में जमकर सरकार ओैर खास तोर पर मुख्यमंत्री को लेकर नारजगी जताई जाने लगी।

हैरानी की बात यह है कि केन्द्र सरकार के द्वारा इस तरह की कोई घोषणा तक नही की गई थी। पूरे देश में लाॅकडाउन पर एक जेैसी ही गाईडलाईन दी गई थी जिसके अनुसार ही सभी प्रदेशों को इसका पालन करना जरूरी था। बावजूद इसके राज्य सरकार ने केन्द्र सरकार की गाईडलाईन का उलंघ्न करते हुये राज्य सरकार स्तर से यह निर्णय ले लिया।

इस पूरे मामले मे एक बात यह भी देखने को मिली कि सरकार के इस निर्णय को मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत के अति दूरदर्शी और जनहित में लिया गया निर्णय बता कर सोलशमीडिया में मुख्यमंत्री के पक्ष में जम कर कसीदे पढ़े जाने लगे। मुख्यमंत्री को उत्तराखण्ड की जनता का सबसे बड़ा हितैषी साबित किया जाने लगा लेकिन दूसरी और सोशल मीडिया में मुख्यमंत्री को राज्य को कोरोना संकट की ओर धकेलने का प्रयास करने के लिये भी कोसा जाने लगा। एक तरह से पूरा सोशल मीडिया मुख्यमंत्री के पक्ष और विपक्ष में बंटा नजर आने लगा।

प्रदेश सरकार के इस अदूरदर्शी निर्णय की आंच केंद्र सरकार तक पहुंची तो गृह मंत्रालय के द्वारा राज्य सरकार को फटकार लगाते हुये लाकडाउन के लिये दी गई गाईडलाईन का पालन करने को कहा गया। केन्द्र सरकार की फटकार के बाद राज्य सरकार ने अपने निर्णय वापिस लिया लेकिन इस दैरान पूरे प्रदेश कर जनता में खासी बैचैनी और अनिश्चितता का माहौल पेैदा हो चुका था।लॉकडाउन का समय सितंबर महीने तक बढ़ा सकती है सरकार

इसी तरह से 25 अप्रैल को प्रदेश में लाॅकडाउन में बड़ी छूट दिये जाने का आदेश जारी किया गया जिसमें प्रातः 7 बजे से लेकर सांय 6 बजे तक राज्य के ग्रीन जोन जिलो में लाॅकडाउन में छूट दी गई। जिसमें जरूरी आवश्यकताओं के अलावा अन्य जरूरी वस्तुओें के व्यापार जो कि पहले से चले आ रहे लाॅकडाउन में प्रतिबंधित किये गये थे को खोलने और करोबार करने की छूट दी गई। सरकार के इस निर्णय को भी जम कर कोसा गया। जबकि सरकार के द्वारा ग्रीन जोन में अर्थिक स्थिति को बेहतर करने की दिश में इसे बड़ा कदम बताया गया। हांलाकी अगले ही दिन 26 तारीक को सरकार के द्वारा अपने इस निर्णय को भी पहले के ही निर्णयों की तरह वापिस ले लिया गया और पूर्व की ही भांती लाॅकडाउन की छूट को ही बहाल किया गया।

राज्य सरकार और उसकी मशीनरी किस कदर प्रदेश की जनता को राहत देने का काम कर रही है यह सरकार के प्राईवेट स्कूलो के फीस के मामले मे ंदेखने को मिल चुका है। इसमें सरकार के अनिश्चय के कदम की खूब आलोचना तक हो रही है। राज्य के प्राईवेट स्कूलो के द्वारा अभिभावको को फीस लिये जाने का दबाब बनाया जाने लगा तो शिक्षा सचिव के द्वारा आदेश जारी किया गया कि लाॅकडाउन क चलते स्कूल बंद है जिसके कारण स्कूल फीस के लिये दबाब नही बना सकते। हैरानी की बात यह है कि दो दिनो के बाद ही सचिव शिक्षा के द्वारा यह आदेश जारी किया गया कि स्कूलों की माली हालत खराब है जिसके चलते वे एक माह की फीस ले सकते है।

सरकार के इस कदम से जनता में भारी नारजगी पैदा हो गइ्र ओैर जमकर सरकार को कोसा जाने लगा। इसके बाद फिर से नया अदेश जारी किया गया कि स्कूल किसी भी छात्र और अभिभावका को फीस  के लिये दबाब नही बना सकते अगर ऐसा किया गया तो कड़ी कार्यवाही की जा सकती है। हैरानी इस बात की है कि सरकार अच्छी तरह से जानती है कि राज्य मे सभी स्कूल लाॅकडाउन के कारण पूरी तरह से बंद है तो फिर किस आधार पर प्राईवेट स्कूल फीस लेने का दबाब बना रहे है।

वैसे इस पूरे मामले मे सरकार पर प्राईवेट स्कूलो के साथ मिलीभगत का अरोप भी लग रहा है। कुछ दिन पूर्व राज्य के प्राईवेट स्कूलों  के प्रिसंपल एसोशिएसन के द्वारा मुख्यमंत्री राहत कोष में 50 लााख रूपये चंदे के तौर पर दिये गये थे। इसी चंदे को लेकर सरकार और प्राईवेट स्कूलों के बीच सांठगाठ का अंदेशा जताया जा रहा है। माना जा रहा हैे कि प्राईवेट स्कूलों के द्वारा सरकार को चंदा देकर फीस लेने के लिये ही असान रास्ता बनाया है।

देश में कोरोना संकट के चलते लाॅकडाउन का दूसरा चरण चल रहा है। 3 मई को दूसरा चरण पूरा हो जायेगा लेकिन जिस तरह से पूरे देश  से यह संकेत मिल रहे है कि लाॅकडाउन का तीसरा चरण होना अवश्यंभावी है। इसके चलते प्रदेश की जनता में भारी बैचैनी बनी हुई है। जैसे जैसे लाॅकडाउन का समाप्त होने का समय नजदीक आ रहा है वैसे वैसे लाॅकडाउन के तोड़े जाने की घटनाये भी सामने आ रही है। पुलिय के आंकड़ो को देखे तो बड़े पैमाने पर पुलिस के द्वारा लाॅकडाउन तोड़ने वाले के खिलाफ कार्यवाही की है सैकड़ो के खिलाफ मुकदमा आदी भी दर्ज किया गया है।

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