उत्तराखण्ड ऐसा राज्य है जहां मुख्यमंत्री पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाते। प्रचंड बहुमत की सरकार होने के बावजूद भाजपा आलाकमान राज्य में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर तीव्रता से विचार कर रहा है। ऐसे में त्रिवेंद्र सिंह रावत का जाना लगभग तय है। सूत्रों के मुताबिक पार्टी आलाकमान ने राज्य की जनता का मन-मिजाज टटोलने के लिए हाल में एक आंतरिक सर्वे कराया। इस सर्वे की रिपोर्ट पूरी तरह मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के खिलाफ जा रही है। पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, मदन कौशिक, सतपाल महाराज और अजय भट्ट जैसे नेताओं के लिए भी यह सर्वेक्षण अच्छा संकेत नहीं दे रहा है। ऐसे में राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी या विधायक गणेश जोशी के हाथ बाजी लग सकती है

 

अभी लोकसभा चुनाव हुए 100 दिन भी नहीं बीते हैं। इस चुनाव में भाजपा की ऐसी लहर चली कि नरेंद्र मोदी प्रचंड बहुमत से दूसरी बार पीएम बने। उत्तराखण्ड राज्य की सभी पांचों सीटों पर भी भाजपा ने ही कब्जा जमाया। सूबे की जनता में मोदी का जादू सर चढ़कर बोला। लेकिन उत्तराखण्ड की मौजूदा भाजपा सरकार से जनता खुश नहीं है। खासकर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत की कार्यशैली से लोग बेहद खिन्न हैं। ऐसे में भाजपा अलाकमान का चिंतित होना स्वाभाविक है कि जनता की नाराजगी के चलते 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में कहीं यह पर्वतीय राज्य पार्टी के हाथ से खिसक न जाए। कहीं ऐसा न हो कि इस राज्य से भाजपा की उल्टी गिनती शुरू हो जाए, इसलिए समय पर डैमेज कंट्रोल कर लिया जाए।

सूत्रों के मुताबिक भाजपा आलाकमान ने उत्तराखण्ड में एक आंतरिक सर्वे कराया है। जिसमें जनता के सुर भाजपा खासकर प्रदेश के मुखिया त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ सुनाई दे रहे हैं। आलाकमान द्वारा कराए गए इस आंतरिक सर्वे की रिपोर्ट से पार्टी में बेचैनी बताई जा रही है। बैचेनी की बड़ी वजह प्रदेश के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत की कार्यशैली है। त्रिवेंद्र जनता से दिनों दिन दूर होते जा रहे हैं। उनकी सक्रियता सिर्फ प्रदेश में उद्घाटन कार्यक्रमों तक सिमटकर रह गई है, जबकि दूसरी तरफ प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत डोर टू डोर जनता से कैम्पेन कर रहे हैं। अभी पिछले दिनों कुमाऊं में उनके नशा विरोधी अभियान में उमड़े जनसैलाब से इसे समझा जा सकता है। एक तरह से देखा जाए तो हरीश रावत का यह नशा विरोधी अभियान भाजपा सरकार को हिलटाॅप शराब सहित कई शराब कारखानों की स्थापना पर कटघरे में खड़ा करता दिखाई दे रहा है।

आंतरिक सर्वे की सच्चाई सामने आने से भाजपा आलाकमान जल्द ही प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन का निर्णय लेने के मूड में बताया जा रहा है। पार्टी सूत्रों की मानें तो आगामी 2022 में भाजपा हर हालत में फिर से राज्य में सत्तासीन होने का सपना पाले बैठी है। लेकिन फिलहाल इस आंतरिक सर्वे से उसका यह सपना चकनाचूर होता दिख रहा है। गो अनुसंधान और विकास संघ, देवभूमि हिंदू वाहिनी जैसे दक्षिणपंथी विचारधारा के संगठन और राज्य आंदोलनकारी मंच जैसे संगठन तक राज्य सरकार से खुश नहीं हैं। कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय के छात्र तक राज्य सरकार के कामकाज का सेर्व कर रहे हैं। लिहाजा पार्टी आलाकमान अब सूबे के मुखिया को हटाने का मन बना चुका है। कहा जा रहा है कि प्रदेश में त्रिवेंद्र सिंह रावत अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे, यह संभव नहीं है। इससे पहले ही उनका जाता तय बताया जा रहा है।

भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की समस्या इस बात को लेकर है कि आखिर वह प्रदेश में सत्ता की चाबी किसको सौंपे जो 2022 का राजनीतिक रास्ता बना सके। त्रिवेंद्र सिंह रावत के स्थान पर आलाकमान को किसी ऐसे नेता की तलाश है जो पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खण्डूड़ी की तरह ही विधानसभा चुनाव के लिए करिश्माई हो सके। खण्डूड़ी को भी भाजपा ने अंतिम समय में 2012 के विधानसभा चुनाव के लिए फिर से सीएम बनाया था। जबकि अभी भाजपा के पास दो साल का समय शेष है। ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व की तरफ से कुछ नामों पर विचार किया जा रहा है। जिसमें फिलहाल राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी और मसूरी के विधायक गणेश जोशी पर गंभीरता से चर्चा हो रही है।

पार्टी ने अपने आंतरिक सर्वे में कई नेताओं के प्रति जनता का मन मिजाज टटोला है। सांसदों में से अनिल बलूनी के पक्ष में यह बात जा रही है कि उनकी सक्रियता और गांवों पर फोकस करने की बात को लोग पसंद कर रहे हैं। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और नैनीताल के सांसद अजय भट्ट के पक्ष में कुछ समय पहले तक सभी समीकरण थे। लेकिन लोकसभा में बंगाली समाज को आरक्षण दिये जाने का जो मुद्दा उन्होंने उठाया वह उनके लिए नुकसानदायक साबित हुआ है। सर्वे के मुताबिक इससे राज्य की बहुत बड़ी आबादी खासकर पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों को यह बात चुभी है। उन्होंने इसके विरुद्ध विरोध-प्रदर्शन भी किया। भट्ट के द्वारा लोकसभा में उठाए गए बंगाली आरक्षण के मुद्दे पर प्रदेश में इतना विरोध होगा, इसका आभास केंद्रीय नेतृत्व को भी नहीं था। बहरहाल अजय भट्ट अपनी एक छोटी सी गलती के कारण भावी मुख्यमंत्री की दौड़ में पिछड़ते नजर आ रहे हैं। सर्वे रिपोर्ट में उनके प्रति लोगों की नाराजगी बताई जा रही है। 2017 में जब प्रदेश में भाजपा पूर्ण बहुमत में आई तब आलाकमान के सामने पिथौरागढ़ के विधायक और पूर्व कैबिनेट मंत्री प्रकाश पंत का नाम भी प्रमुखता से आया था। लेकिन बाजी त्रिवेंद्र के हाथों लगी। अब जब नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट चल रही है, तो त्रिवेंद्र सिंह रावत के बाद पहला नंबर प्रकाश पंत का ही सामने आता। लेकिन पंत का चार माह पूर्व स्वर्गवास हो चुका है।

नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट के बीच प्रदेश कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज की सक्रियता बढ़ गई। महाराज के दिल्ली दौरों की संख्या में इजाफा होने से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह भी सीएम की दौड़ में अपने आपको आगे किए हुए हैं। सूत्र तो यहां तक बताते हैं कि महाराज संघ के वरिष्ठ नेताओं का विश्वास हासिल करने की कोशिशें भी करते रहे हैं, लेकिन सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक जनता महाराज के काम से भी खुश नहीं हैं।

राज्य सरकार के प्रवक्ता और सरकार में मुख्यमंत्री के बाद सबसे बड़ी हैसियत के नेता माने जा रहे मदद कौशिक को लेकर भी सर्वे रिपोर्ट अच्छी नहीं है। जनता उनके काम से संतुष्ट नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री डाॅ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को लेकर भी पार्टी का आंतरिक सर्वे अच्छा नहीं बताया जा रहा है। सर्वे रिपोर्ट में कुंभ घोटाले का उल्लेख किया जाना आज भी उनकी नेगेटिव छवि पेश कर रहा है। हालांकि निशंक के लिए राहत की बात यह है कि सिटुरजिया घोटाले का जिक्र इस सर्वे में नहीं है। सिटुरजिया को लेकर निशंक सरकार सुर्खियों में रही थी।

पार्टी सूत्रों से जो बताया जा रहा है उसके अनुसार प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री के लिए राज्यसभा सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता अनिल बलूनी पार्टी की पसंद हो सकते हैं। बलूनी की सर्वे रिपोर्ट पाॅजिटिव बताई जा रही है। इसका कारण उनके द्वारा प्रदेश में पलायन रोकने के लिए की जा रही कोशिशें बताई जा रही हैं। इसी के साथ उनके द्वारा एक दूरस्थ गांव को विकास के लिए गोद लेना और प्रदेश के लिए टेªनों और बसों का परिचालन कराने की भी जनता तारीफ कर रही है। सूत्रों के मुताबिक अनिल बलूनी अभी राज्यसभा में हैं। हो सकता है कि पार्टी उन्हें राज्य में न भेजे। ऐसे में यदि विधायकों में से किसी को चुना जाता है, तो तब पहला नाम मसूरी के विधायक गणेश जोशी का होगा। हरबंश कपूर के बाद वह ऐसे विधायक हैं जो सबसे ज्यादा बार चुनाव जीते हैं। युवा होने के नाते कपूर के मुकाबले उन पर विचार किया जाएगा। गणेश जोशी का सरल स्वभाव और उनकी जनता के बीच कार्य करने की शैली को सराहा जाता है। सर्वेक्षण आलाकमान के पास पहुंच चुका है। जिस पर गहन विचार किया जा रहा है। जोशी हालांकि कई बार विधायक जरूर रहे हैं, लेकिन उनकी प्रशासनिक क्षमताओं का परीक्षण किया जाना है। भाजपा के नए निजाम में हालांकि इसे निगेटिव नहीं माना जाता। हरियाणा में कई दिग्गजों को दरकिनार कर भाजपा आलाकमान ने अनजाने चेहरे मनोहर लाल खट्टर को सीएम बनाया था। खट्टर के मुख्यमंत्री बनने के बाद अन्य भाजपा शासित राज्यों में भी यह प्रयोग किया।

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