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Uttarakhand

सवालों के घेरे में कुटुम्बदारी

दो माह बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार का दो साल पूरा हो जाएगा। कायदे से इस मौके पर सरकार के कामकाज को लेकर चर्चाएं होनी चाहिए थी। लेकिन इसके विपरीत राजनीतिक गलियारों में मुख्यमंत्री के परिजनों और स्टाफ के विवादास्पद मामले चर्चा में हैं। सबसे ज्यादा चर्चा मुख्यमंत्री की शिक्षिका पत्नी द्वारा पूर्व में नियम-विरुद्ध खरीदे गए करोड़ों रुपए के भूखंडों की है। उनके भाई और मित्र के स्टिंग प्रकरणों को भी चटखारे लेकर सुनाया जाता है। मुख्यमंत्री के विशेष कार्याधिकारियों और सलाहकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे होने की वजह से राजनीतिक गलियारों की सुर्खियों में हैं
मु ख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के सत्ता संभालने के बाद से उनके करीबियों के खिलाफ एक के बाद एक कई मामले सामने आ रहे हैं। हालांकि राजनीति में शुचिता की बात करने वाले मुख्यमंत्री और उनका खेमा इन मामलों को विरोधियों की एक बड़ी साजिश करार देते हैं। 22 माह की सरकार के कार्यकाल में कई बार मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े अधिकारियों और निजी स्टाफ पर कोई न कोई आरोप लगता ही रहा है। हाल ही में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के सबसे खास और चहेते ओएसडी जेसी खुल्बे के खिलाफ देहरादून के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मनिंद्र मोहन पांडे की अदालत ने परिवाद दर्ज करने का आदेश जारी किया। हालांकि यह मामला चार वर्ष पूर्व का बताया जा रहा है लेकिन जिस तरह से यह मामला सामने आया है, उससे मुख्यमंत्री कार्यालय और उनके निजी स्टाफ सवालों के घेरे में है। साथ ही सरकार द्वारा भ्रष्टाचार को संरक्षण देने के विपक्षियों के आरोंपों को बल मिल रहा है।
ऐसा नहीं है कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के निजी स्टाफ के खिलाफ पहली बार इस तरह के मामले सामने आये हैं।  मुख्यमंत्री के विशेष कार्याधिकारियों की हनक और नियमों को ताक पर रखने से मुख्यमंत्री कार्यालय की कार्यशैली पर पहले भी सवाल खड़े हुए हैं। खनन कारोबारियों के हितों में शासनादेश जारी करवाने, स्थानांतरण एक्ट के विपरीत अपने परिजनां का स्थानांतरण हो या अपने परिजनां का सरकारी हैलीकॉप्टर में सैर करवाने जैसे मामले कहीं न कहीं मुख्यमंत्री के विशेष कार्याधिकारियों से जुड़े रहे हैं। इसके अलावा स्वयं मुख्यमंत्री की पत्नी के शैक्षिक प्रमाण पत्रों पर संदेह का मामला हो या मुख्यमंत्री के पारिवार के और नजदीकी लोगों के स्टिंग प्रकरण में नाम सामने आने का मामला हो इन सभी मामलां में मुख्यमंत्री कार्यालय घेरे में रहा है।
अब मुख्यमंत्री के निजी सहायकों और स्टाफ के खिलाफ हुए विवादों की बात करें तो सबसे ताजा मामला ओएसडी जगदीश चंद्र खुल्बे का समाने आया है। खुल्बे वर्ष 2015 में कøषि विभाग में भूमि संरक्षण अधिकारी के पद पर तैनात थे। इन पर आरोप है कि इन्होंने एक षडयंत्र रच कर देहरादून के चकराता और कालसी क्षेत्र में समेकित जलागम प्रबंध योजना में तकरबीन 70 लाख के सरकारी धन का दुरुपयोग और गबन किया है। इस मामले में देहरादून के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मनिंद्र मोहन पांडे की अदालत ने परिवाद दर्ज करने के आदेश जारी किया है।
जगदीश चंद्र खुल्बे मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के सबसे खास और चहेते अधिकारियों में माने जाते हैं। भाजपा सरकार के समय त्रिवेंद्र रावत कøषिमंत्री थे तब यही जगदीश चंद्र खुल्बे उनके ओएसडी के पद पर भी नियुक्त थे। गौर करने वाली बात यह है कि तत्कालीन समय में कøषि विभाग में करोड़ों का ढैंचा बीज घोटाला हुआ था। जानकारां का मानना है कि जेसी खुल्बे और मुख्यमंत्री की आपसी टयूनिंग इतनी मजबूत रही है कि मुख्यमंत्री बनते ही त्रिवेंद्र रावत द्वारा अपने स्टाफ में सबसे पहली नियुक्ति इन्हीं जेसी खुल्बे की विशेषकार्याधिकारी के तोर पर हुई। हालांकि खुल्बे को विभागीय जांच में क्लीन चिट दिए जाने की चर्चा है। कहा जा रहा है कि कøषि विभाग के द्वारा करवाई गई विभागीय जांच में जेसी खुल्बे पर कोई भी आरोप साबित नहीं हो पाया है।
मुख्यमंत्री के दूसरे और एक समय में चर्चित ओएडी रहे उर्वादत्त भट्ट पर भी कई सवाल खड़े हो चुके हैं। उर्वादत्त भट्ट पर आरोप है कि मुख्यमंत्री के ओएसडी बनते ही उन्होंने अपनी पत्नी का देहरादून में प्रतिनियुक्ति के नाम पर स्थानांतरण करवाया। हालांकि उर्वादत्त भट्ट की पत्नी पहले से ही सुगम में यानी हरिद्वार के ज्वालापुर में राजकीय इंटर कॉलेज में प्रवक्ता के पद पर कार्यरत थी। बावजूद इसके उर्वादत्त भट्ट ने अपनी धर्म पत्नी को देहरादून में स्थानांतरण करवाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। असफल रहने पर इसके लिए प्रतिनियुक्ति का सहारा लिया गया। वे देहरादून में संस्कøत शिक्षा निदेशालय में सहायक निदेशक के पद पर अपनी पत्नी को राजधानी का सुख देने में पूरी तरह से सफल रहे हैं।
इसके अलावा उर्वादत्त भट्ट तब सुर्खियों में आये थे जब उनके परिजनों को सरकारी हैलीकॉप्टर पर भ्रमण करवाया गया था। मामला सामने आने पर सरकार की खूब किरकिरी हुई और सोशल मीडिया में इस हवाई यात्रा को लेकर खासे तंज कसे गए। तब सरकार माननीयों के हैलीकॉप्टर भ्रमण के खर्चे को मुख्यमंत्री के विवेकाधीन कोष से करने के आदेश जारी किए  गए। इससे यह साफ हो गया कि मुख्यमंत्री का स्टाफ भी मुख्यमंत्री से कम नहीं है।
भाजपा कार्यालय में जनता दरबार के दौरान जहर खाकर आने वाले व्यापारी के मामले में भी उर्वादत्त पर गंभीर आरोप लग चुका है। उर्वादत्त भट्ट पर उक्त  व्यापारी को बीपीएल का राशन कार्ड लाने और उसको मुख्यमंत्री राहत कोष से 50 हजार रुपए की आर्थिक सहायता दिलवाने का वादा करने के आरोप लग चुके हैं। जबकि व्यापारी न तो निर्धन था और न ही वह बीपीएल श्रेणी का था। इसके बावजूद उर्वादत्त भट्ट एक तरह से व्यपारी को फर्जी तरीके से बीपीएल राशन कार्ड बनवाने और उसके आधार पर आर्थिक सहायता दिलवाने की बात कर रहे थे।
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के तीसरे ओएसडी धीरेंद्र पंवार पर डोईवाला में अवैध खनन कारोबारियों के हितां के लिए काम करने का आरोप लग चुका है। वन विकास निगम से खनन के करोबार में खेती के लिए प्रयुक्त ट्रैक्टर को खनन के लिए उपयोग करने के आदेश जारी किए गए थे, जबकि राज्य में खेती के लिए प्रयुक्त ट्रैक्टरां पर पूरी तरह से रोक लगाई हुई है। साथ ही हाईकोर्ट द्वारा भी इस पर रोक लगी है। चर्चा है कि इस आदेश को जारी करवाने के लिए मुख्यमंत्री के ओएसडी धीरेंद्र पवांर का ही दबाब रहा है। हालांकि एक माह के बाद यह आदेश निरस्त कर दिया गया, लेकिन तब तक सरकार की मंशा पर सवाल खड़े हो गए थे।
इसी तरह से मुख्यमंत्री के प्रमुख निजी सचिव सुरेश जोशी का नाम भी एक विवाद से चर्चा में आ चुका है। डोईवाला की एक युवती ने सुरेश जोशी पर यौन शोषण का आरोप लगाया है। हालांकि यह विवाद ज्यादा तूल नहीं पकड़ सका, क्योंकि न तो उक्त युवती का कोई अता-पता चल पाया और न ही इस तरह के आरोप लगाए जाने के कारणों का पता चला है। बावजूद यह मामला सोशल मीडिया पर खूब छाया रहा, जिससे मुख्यमंत्री कार्यालय और मुख्यमंत्री के स्टाफ की छवि खराब हुईं। स्वयं सुरेश जोशी ने पुलिस को इस मामले में अपनी छवि खराब करने के प्रयास की तहरीर दी है। इस मामले की जांच भी चल रही है। लेकिन सोशल मीडिया में सुरेश जोशी की छवि को जरूर धक्का लगा है।
अब मुख्यमंत्री के परिजनों को लेकर हुए विवादों को देखें तो मुख्यमंत्री के भाई और उनके खास मित्र का नाम उमेश शर्मा स्टिंग प्रकरण में सामने आ चुका है। पोर्टल मीडिया और सोशल मीडिया में मुख्यमंत्री के भाई और मित्र संजय गुप्ता का एक स्टिंग खूब वायरल हो चुका है। इस स्टिंग में मुख्यमंत्री के मित्र एक बड़ी रकम लेते हुए दिखाई दे रहे हैं। ऐसा ही स्टिंग स्वयं मुख्यमंत्री के भाई का भी सामने आया है। इस मामले में हाईकोर्ट ने भी संज्ञान लिया और नोटिस जारी किया है।
होटल व्यवसायी संजय गुप्ता के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के साथ खासे नजदीकी रिश्ते रहे हैं। संजय गुप्ता के परिजनां के साथ मुख्यमंत्री के परिवारजनों ने भूखंड तक खरीदे हैं। हालांकि अभी उक्त स्टिंग की सत्यता की जांच नहीं हो पाई है। मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है, लेकिन इतना तो साफ हो चुका है कि मुख्यमंत्री के कार्यालय और नीजी स्टाफ की कार्यशैली विवादां में है।
मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव ओमप्रकाश का स्टिंग प्रकरण में नाम आ चुका है। ओमप्रकाश मुख्यमंत्री के सबसे खास और चहेते नौकरशाहों में गिने जाते हैं। ओमप्रकाश की कार्यशैली पर स्वयं भाजपा के कई नेता और विधायक सवाल उठा चुके हैं। बावजूद इसके ओमप्रकाश का रसूख मुख्यमंत्री दरबार में कम होने के बजाय तेजी से बढ़ता रहा है। स्टिंग प्रकरण में मुख्यमंत्री के कार्यालय के प्रमुख सचिव का नाम आने से सरकार की कार्यशैली पर गम्भीर सवाल खड़े हो चुके हैं।
स्वयं मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी शिक्षिका सुनीता रावत का नाम भी विवादों में आ चुका है। उत्तरा पंत बहुगुणा के प्रकरण में यह साफ हो गया कि मुख्यमंत्री की पत्नी कई वर्षों से देहरादून में ही कार्यरत है और उनको किसी दुर्गम में सेवाऐ देने के लिए भेजा ही नहीं गया। इससे सरकार की स्थानांतरण नीति का पता चला था। इसके अलावा शैक्षिक प्रमाण-पत्रों पर सवालों के मामले में भी कोई कार्यवाही समाने नहीं आ पाई है। विदित हो कि पूर्व भाजपा नेता और समाजसेवी सुभाष शर्मा ने मुख्यमंत्री की पत्नी के शैक्षिक प्रमाण पत्रों पर सवाल खड़े किए थे जिस पर जांच की गई। समाचारों में यह जरूर प्रकाशित हुआ कि समस्त शैक्षिक प्रमाण पत्र सही हैं लेकिन सुभाष शर्मा के खिलाफ सुनीता रावत की छवि को खराब करने पर कोई कानूनी कार्यवाही न होना अपने आप में ही एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
इसके अलावा मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी सुनीता रावत का नाम देहरादून में करोड़ों के भूखण्डां की खरीद के मामले में भी सामने आया। दरअसल जन संर्घष मोर्चा के संयोजक और पूर्व भाजपा सरकार में राज्यमंत्री रहे रघुनाथ सिंह नेगी ने मुख्यमंत्री पर अपनी पत्नी के नाम देहरादून में करोड़ों के पांच भूखंड खरीदने के आरोप लगाए हैं। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की धर्मपत्नी सहायक अध्यापिका के तौर पर कार्यरत हैं। इन्होंने वर्ष 2010 में तीन भूखंड और वर्ष 2012 में दो भूखंड खरीदे गए हैं। भूखंडों की खरीद के मामले में रघुनाथ सिंह नेगी का आरोप है कि उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली 1956 का अनुपालन नहीं किया गया। एक सरकारी कर्मचारी द्वारा किसी भी तरह की चल-अचल सम्पति की खरीद-फरोख्त के लिए अपने विभाग को सूचित करने और अनुमित लेना नियमावली के अनुसार बेहद जरूरी है, जबकि इस मामले में इसका पालन नहीं किया गया।
उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली 1956 में राजाज्ञा सं0 957/ कार्मिक -1/1998 लखनऊ दिनांक 17 अक्टूबर 1998 द्वारा संशोधित आचरण नियमावली में पूरी तरह से स्पष्ट किया गया है कि ‘कोई सरकारी कर्मचारी सिवाय उस दशा में जबकि संबधित अधिकारी को इसकी पूर्ण जानकारी हो या स्वयं अपने नाम से या अपने परिवार के किसी भी सदस्य के नाम से पट्टा, रहन-सहन क्रय- विक्रय या भेंट द्वारा न तो कोई अचल संपति अर्जित करेगा और न ही बेचेगा।
जन संघर्ष मोर्चा के मीडिया प्रभारी ने सूचना के अधिकार के तहत शिक्षा विभाग के उपशिक्षा अधिकारी रायपुर खण्ड से सूचना मांगी तो सूचना में ख्ुलासा हुआ है कि सुनीता रावत की ओर से कोई भी सूचना विभाग के अधिकारियों को नहीं दी गई। सूचना में सूचनाधारित नहीं होने की बात कही गई है। स्पष्ट है कि सुनीता रावत ने सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली का उलंघन किया है।
निर्वाचन आयोग को दिए गए पत्र में त्रिवेंद्र रावत ने अपनी पत्नी की वार्षिक आय आयकर रिटर्न 2013-14 में 3 लाख 6 हजार 308 रुपए का ही उल्लेख किया है। अब सवाल उठता है कि महज 3 लाख 6 हजार की वार्षिक आय से किस आधार पर 833 वर्ग मीटर का भूखंड खरीदा गया है। यही नहीं 27 जुलाई 2012 को 0 0-101 हेक्टेयर तथा 30 नवंबर 2012 को 0-126 हेक्टेयर यानी तकरीबन 3 बीघा भूमि भी सुनीता रावत धर्मपत्नी त्रिवेंद्र रावत द्वारा खरीदी गई है। इससे साफ है कि सुनीता रावत जिनकी वार्षिक आय टैक्स रिटर्न वर्ष 2013-14 के आधार पर महज 3 लाख 6 हजार थी, वे करोड़ों के भूखंड खरीद रही थीं।
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के करीबियों और परिवारजनों के खिलाफ उठ रहे विवादां के चलते मुख्यमंत्री का ख्ेमा खासा असहज है। मुख्यमंत्री के निजी सलाहकारां, ओएसडीओं पर एक के बाद एक नए विवादां के चलते मुख्यमंत्री की कार्यशैली और नीति पर गंभीर सवाल खड़े होना, मौजूदा राजनीतिक हालात में ठीक नहीं है। दो माह के बाद सरकार की दूसरी वर्षगांठ मनाई जाने वाली है और इन दो वर्षों में सरकार द्वारा किए गए कामों ने बजाय मुख्यमंत्री कार्यालय के स्टाफ की चर्चाऐ ज्यादा होना शुभ संकेत नहीं है। अब देखना दिलचस्प होगा कि किस तरह से मुख्यमंत्री कार्यालय इन विवादां के छींटे अपने दामन से हटाता है।
चर्चा में अधिकारी-नौकरशाही
विवादों में रहने को अभिशप्त मुख्यमंत्री कार्यालय में कई स्वच्छ छवि के अधिकारी भी मौजूद हैं जो विवादों से दूर रह अपना काम कर रहे हैं। अभय सिंह रावत का नाम ऐसे अधिकारियों में लिया जा सकता है
ऐसा नहीं है कि पहली बार किसी मुख्यमंत्री के कार्यालय और निजी स्टाफ पर सवाल उठे हो। अगर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास को देखें तो तकरीबन हर मुख्यमंत्री के कार्यालय और उनका स्टाफ हमेशा ही चर्चाओं में रहा है। मीडिया में तकरीबन सभी सरकारों के मुख्यमंत्रियों के निजी स्टाफ पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। राज्य की पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री स्व नारायण दत्त तिवारी के समय मुख्यमंत्री कार्यालय में आर्येन्द्र शर्मा औेर कैलाश पंत की कार्यशैली खूब चर्चाओं में रही। स्व तिवारी के तत्कालीन ओएसडी कैलाश पंत की लखनऊ में रहस्यमयी ढंग से मृत पाए गए थे। जिसकी राजनीतिक गलियारों में खूब चर्चा हुई।।
भाजपा शासन के समय में भी बीसी खण्डूड़ी के प्रमुख सचिव प्रभात कुमार सारंगी का नाम सबसे ज्यादा चर्चाओं में रहा  निश्ांक के कार्यकाल में उनके निजी सहायकों और ओएसडियां की कार्यशैली के किस्से राजनीतिक गलियारों में सुनाई देते रहे। मुख्यमंत्री दरबार के अधिकारियां द्वारा मीडिया को साधने और सरकार के विरोध में समाचार प्रकाशनों के कई मामले में सामने आ चुके हैं। स्वास्थ्य विभाग में हुए करोड़ों के फर्जी टैक्सी बिल घोटाले में तत्कालीन मुख्यमंत्री निशंक के स्टाफ की संलिप्तता सामने आ चुकी है। कांग्रेस की विजय बहुगुणा सरकार के समय में तो मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारियों का नाम कई विवादां में रहा है। ऋषिकेश के आमबाग जमीन प्रकरण में मुख्यमंत्री कार्यलय के निजी सचिव का नाम इस प्रकरण से जोड़ा गया था। यही नहीं स्वास्थ्य विभाग के फर्जी टैक्सी बिल घोटाले में बहुगुणा सरकार के समय उनके ओएसडी का नाम खूब उछला है। जांच में भी आरोपां की पुष्टि हो चुकी है।
हरीश रावत सरकार के समय में भी मुख्यमंत्री के निजी स्टाफ और ओएसडियों पर कई सवाल खडें हो चुके हैं। विभागीय योजना में टेंडर और कमीशन के मामले में मुख्यमंत्री कार्यालय का स्टाफ चर्चाओं में रहा है। स्वयं हरीश रावत के औद्योगिक सलाहकार रणजीत रावत और प्रमुख सचिव की कार्यशैली के किस्से आज तक राजनीतिक गलियारों में सुनाई पड़ते हैं। कहा जाता था कि हरीश रावत के कार्यकाल में मुख्यमंत्री निवास या कार्यालय में उतनी भीड़ नहीं दिखाई देती थी जितनी उनके सलाहकार रणजीत रावत के कार्यालय में दिखाई देती थी।
मौजूदा सरकार के समय में भी मुख्यमंत्री कार्यालय के स्टाफ खासतौर पर ओएसडियों पर सवाल खड़े होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। शायद यह उत्तराखण्ड राज्य की राजनीतिक नियति में ही लिखा गया है कि चाहे कोई भी मुख्यमंत्री हो उनके स्टाफ पर सवाल खड़े होना एक तय नियम बना हुआ है। तीन-तीन ओएसडीयों की कार्यशैली पर चर्चाएं होना गंभीर विषय है। हालांकि यह नहीं कहा जा सकता कि सभी स्टाफ की शैली सवालों में है। कई ऐसे अधिकारी हैं जिन पर आज तक कोई विवाद सामने नहीं आया है। ऐसा ही सीएम के ओएसडी अभय सिंह रावत का नाम लिया जा सकता है जिनकी कार्यशैली पर कोई भी विवाद या चर्चाएं सामने नहीं आई है।

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