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प्रदेश ही राजनीति में विगत कुछ वर्षों से मीडिया का एक ऐसा वर्ग हावी हो चुका है जो कि सत्ता और शासन में अपनी गहरी पैठ बना चुका है। सचिवालय से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक ऐसे तत्वां की पैठ इस कदर हो चुकी है कि आसानी से स्टिंग ऑपरेशन को अंजाम दिया जाता रहा है। चर्चाएं तो यहां तक हैं कि प्रदेश की राजनीति और शासन में बैठे कुछ नौकरशाहों द्वारा अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए इस तरह के तत्वां का सहारा लिया जाता है। इसी तरह से प्रदेश की राजनीति में तहलका मचाने वाले उमेश शर्मा आज भले ही सरकार के निशाने पर हैं लेकिन यही उमेश शर्मा प्रदेश के लगभग हर मुख्यमंत्री और हर अधिकारी का सबसे चहेता और प्रिय रहे हैं। भाजपा की सरकार रही हो या फिर कांग्रेस की, उमेश शर्मा का जलवा हमेशा प्रदेश की रजनीति में बरकरार रहा है।

मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के समय में तो उमेश शर्मा का जलवा इतना था कि स्वंय विजय बहुगुणा अपनी सरकारी कार से उमेश शर्मा को अपने साथ ले जाया करते थे। उनकी सरकार के कार्यकाल में ही उमेश शर्मा के खिलाफ दर्ज कई मुकदमों को वापस लिया गया। हैरानी की बात यह है कि बहुगुणा सरकार को उमेश शर्मा के खिलाफ दर्ज मुकदमां को वापस लेने के लिए तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट द्वारा बकायदा एक पत्र तक लिखा गया था। जबकि उमेश शर्मा के खिलाफ अधिकतर मुकदमें भाजपा की निंशक सरकार के समय दर्ज करवाए गए थे।

राज्य बनने के बाद उमेश शर्मा की आमद उत्तराखण्ड में हुई। एक न्यूज एजेंसी और साप्ताहिक अखबार के सहारे उमेश शर्मा ने मीडिया में अपनी पैठ बनाई। कांग्रेस की तिवारी सरकार के वजूद में आने के बाद संबंध राज्य के सत्ता-प्रतिष्ठानों और शासन के उच्च पदों तक इतने बेहतर हो चले थे कि उसे हर उस जगह पर एंट्री मिल जाती थी जहां अन्य किसी को कई पापड़ बेलने पड़ते थे। तिवारी सरकार के दौरान ही उमेश शर्मा के सबसे बेहतर संबंध हरक सिंह रावत के साथ बने जो कि निरंतर प्रगाढ़ होते चले गए। हरक सिंह और उमेश शर्मा की मित्रता तब देखने को मिली जब हरीश रावत सरकार के समय कांग्रेस विधायक मदन सिंह बिष्ट का स्टिंग ऑपरेशन हुआ था। यह ऑपरेशन उमेश शर्मा के निर्देशों पर आयुष गौड़ द्वारा किया गया था जो कि आज विसिल ब्लोअर अपने आप को बता रहा है। बहरहाल नए मीडिया प्रयोग के कारण उमेश शर्मा ने जितना जल्दी प्रदेश के मीडिया में अपना एक अलग स्थान बनाया वह किसी से छुपा नहीं है। कहा जाता है कि प्रदेश में पहली बार स्टिंग ऑपरेशन का प्रयोग उमेश शर्मा द्वारा किया गया जो कि धीरे-धीरे पत्रकारिता के एक बड़े माध्यम के तौर पर सामने आता गया और इस कदर अपनी जड़ों को जमाता चला गया कि इसका असर पूरे प्रदेश में देखने को मिलने लगा। समाचार प्लस चैनल के बाद उमेश शर्मा की तूती प्रदेश के मीडिया और राजनीतिक गलियारों में इस कदर गूंजने लगी कि भाजपा की खण्डूड़ी सरकार तक में उमेश शर्मा की पैठ आरंभ होने लगी थी। हालांकि तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी खण्डूड़ी अपने स्वभाव के चलते मीडिया से ज्यादा नजदीकी नहीं रखते थे जिसके चलते उमेश शर्मा की एंट्री मुख्यमंत्री कार्यालय तक नहीं हो पाई। लेकिन शासन-प्रशासन और सचिवालय में शर्मा का जलवा बरकरार रहा।

खण्डूड़ी के बाद राज्य के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निंशक’ बने तो उमेश शर्मा की धमक निशंक सरकार के समय में फिर से होने लगी और उनका चैनल दिनों-दिन राजनीतिक गलियारों में मजबूती से जमता चला गया। सरकार से विज्ञापनों के बड़े-बड़े पैकेज और जमीनों के विवादों में प्रशासन की परोक्ष मदद मिलने से उमेश शर्मा के खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाया जाने लगा। कुछ समय के बाद निशंक सरकार के साथ उमेश शर्मा के रिश्तों में खटास आने लगी और पहली बार उमेश के खिलाफ कानूनी कार्यवाही आरंभ हुई जिसमें उन पर कई अपराधिक मुकदमे दर्ज होने लगे। इनमें अधिकतर मुकदमे भूमि के फर्जीवाड़े और धोखाधड़ी से जुड़े थे।

निशंक सरकार के समय उत्तराखण्ड पुलिस उमेश शर्मा के गजियाबाद स्थित आवास से उनको गिरफ्तार करने के लिए रातभर डेरा डाले रही। लेकिन इसके बाद जब तक निशंक उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री रहे उमेश शर्मा उत्तराखण्ड आने का साहस नहीं दिखा पाए। निशंक की मुख्यमंत्री पद से विदाई के बाद फिर से बीसी खण्डूड़ी मुख्यमंत्री बने तो उनको बधाई देने के लिए ही उमेश शर्मा उत्तराखण्ड में दिखाई दिए। जबकि उनके ऊपर कई आपराधिक मुकदमें थे और गैर जमानती बारंट तक जारी हो चुका था। बावजूद इसके फिर से उत्तराखण्ड में पहले जैसे जलवे के साथ अपनी पैठ बनाते रहे। अब उमेश शर्मा की पैठ खण्डूड़ी सरकार में भी आरंभ हो चुकी थी। खण्डूड़ी के दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद उत्तराखण्ड में फिर से अपने समाचार चैनल और इससे जुड़े कारोबार को निर्बाध रूप से संचालित करने लगे। बावजूद इसके उत्तराखण्ड पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की।

विजय बहुगुणा राज्य के मुख्यमंत्री बने तो उमेश शर्मा उनके सबसे खास व्यक्तियों में गिने जाने लगे। बहुगुणा के अलावा उनके सबसे खास सिपहसालार ओैर वर्तमान सरकार में कृषि मंत्री सुबोध उनियाल के साथ उमेश शर्मा के संबध इतने मधुर रहे कि लुकआउट नोटिस जारी होने के बावजूद प्रदेश सरकार ने उन्हें लंदन ओलंपिक में जाने के लिए एनओसी तक जारी कर दी। इसके अलावा बहुगुणा सरकार ने उमेश के खिलाफ दर्ज मुकदमों को वापस तो लिया ही साथ ही उनके चैलन को करोड़ां के विज्ञापनों से भी नवाजा।

हरीश रावत सरकार में उमेश शर्मा की ताकत और भी तेजी से बढ़ी। यहां तक कि हरीश रावत के कई मंत्रियों के साथ संबध खराब होने और सरकार को अस्थिरता के भय से दूर करने के लिए उमेश शर्मा द्वारा विचौलिए की भूमिका तक अदा की गई। इसका खुलासा स्वंय उमेश शर्मा ने हरीश रावत के स्टिंग में किया है। हरीश रावत सरकार के समय में उमेश शर्मा की प्रदेश की अंदरूनी राजनीति में इस कदर पकड़ थी कि वह एक मुख्यमंत्री को भी अपने आसरे पर राजनीति करने को मजबूर कर सकता है।

आज भाजपा उमेश शर्मा को एक ब्लैकमेलर का तमगा दे रही है लेकिन इसी भाजपा ने उनको पलक पांवड़े विछाकर ताकत दी है। हरीश रावत सरकार के समय में जिस तरह से स्टिंग ऑपरेशनों की बाढ़ सी आई और राजनीतिक अस्थिरता के समय हरीश रावत के स्टिंग राजनीति में हलचल मचाए हुए थे तब पूरी भाजपा और उसका संगठन चाहे वह केंद्रीय भाजपा संगठन हो या प्रदेश भाजपा, सभी के दुलारे उमेश शर्मा बने रहे। यह भी गौर करने वाली बात है कि तत्कालीन समय में कांग्रेस के बागी नेताओं से उमेश शर्मा के बेहद नजदीकी संबंध थे। जिनके इशारों पर हरीश रावत के स्टिंग ऑपरेशनों को अंजाम दिया गया। माना जाता है कि ये भाजपा के बड़े नेताओं की एक सोची समझी रणनीति के तहत किए गए।

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