Uttarakhand

आंदोलन का अंतहीन सिलसिला

हिमालय कॉन्क्लेव में जब केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण सीमांत क्षेत्रों के लिए खास करने पर जोर दे रही थीं, तो दूसरी तरफ इन्हीं क्षेत्रों के लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए आंदोलित थे। ये लोग दुनिया से इस कदर कटे हुए हैं कि नदी पार के गांवों में पत्थर पर लपेटकर संदेश भेजते हैं
पिछले दिनों प्रदेश में आयोजित हिमालयन कॉन्क्लेव में जब केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण मंच से यह कह रही थीं कि सीमांत क्षेत्र में रहने वाले लोग देश की सुरक्षा के लिहाज से आंख व कान का काम करते हैं, इसलिए इन क्षेत्रों से पलायन रोकने के लिए विशेष प्रयासों की जरूरत है, तो मंचासीन प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत भी चेहरे पर गंभीर भाव लिये हुए थे। लेकिन ठीक उसी समय प्रदेश के सीमांत क्षेत्र के लोग बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, संचार आदि बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर डटे हुए थे। आत्मदाह करने की चेतावनी भी दे रहे थे। लेकिन विकास प्रक्रिया को आम आदमी तक पहुंचाने वाला तंत्र इन सबसे बेखबर सुविधा संपन्न हॉल में आयोजित सेमिनार में बौद्धिक विलास में मग्न था। उधर सीमांत पिथौरागढ़ के लोग सरकार एवं प्रशासन से आजिज आ व्यवस्था से मोहभंग की बातें कर रहे थे। जिले के होकरा गांव से शुरू हुआ यह सिलसिला सैणराथी गांव तक जा पहुंचा है। इन गांवों के लोगों को मिली जीत के बाद अब सीमांत के अन्य गांव भी आंदोलन करने की रणनीति बनाने में जुटे हुए हैं। यूं तो पूरा जनपद किसी न किसी मुद्दे पर आंदोलित है, लेकिन सीमांत के गांव जिस तरह एक-एक कर सड़कों पर उतर रहे हैं वह समग्र विकास की अवधरणा पर प्रश्नचिन्ह तो खड़ा कर ही रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर राज्य के दूरस्थ क्षेत्रों में विकास की किरणें पहुंची होती तो बच्चों के बेहतर भविष्य की खातिर बुजुर्गों को आंदोलन पर मजबूर नहीं होना होता। मुनस्यारी विकास खंड के सैणराथी गांव के 86 वर्षीय महेंद्र सिंह को इसीलिए भूख हड़ताल में बैठना पड़ा कि उनकी तो उम्र असुविधओं के बीच कट गई, लेकिन अब वह नहीं चाहते कि नई पीढ़ी भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में पले बढ़े। असुविधाओं की यह टीस इतनी गहरी है कि मुनस्यारी विकासखंड के सैणराथी, बेडूमहर, किमखेत गांव के दर्जन भर लोगों को भूख हड़ताल तो सैकड़ों लोगों को धरना-प्रदर्शन पर बैठना पड़ा। इन तीनों गांवों में इस समय 1557 लोग निवास करते हैं जिसमें से सैणराथी में 693, बेडूमहर में 426, किमखेत में 438 लोग निवास करते हैं। मुख्य मार्ग से 7 किमी. की दूरी में ये गांव स्थित हैं। इनका निकटवर्ती बाजार थल-मुनस्यारी मोटरमार्ग पर क्वीटी नामक कस्बा है। इन गांवों को जोड़ने वाली डोर -सैणराथी मार्ग सालों से बदहाल है। इसमें सफर करना जान जोखिम में डालना है। वर्षाकाल में सड़कों के बाधित होने पर यहां रसद सामग्री का अभाव हो जाता है। पूरा क्षेत्र देश से कट जाता है। इसके अलावा क्षेत्र का एकमात्र इंटर कॉलेज जो सैणराथी में स्थित है वहां पर प्रवक्ताओं की कमी है। स्वास्थ्य की स्थिति भी बदहाल है। संचार सुविधाओं का हाल यह है कि यहां पर मोबाइल पर सिग्नल नहीं आ पाते। जब ग्रामीणों ने सबकी संघर्ष समिति नामक संगठन बनाकर भूख हड़ताल शुरू की तो उसे युवाओं के सैणराथी युवा संगठन का भी समर्थन मिल गया। युवा संगठन ने न सिर्फ जिलाधिकारी पिथौरागढ़ को ज्ञापन सौंपा, बल्कि जनपद में सक्रिय कई संगठनों का समर्थन भी जुटा लिया। जिससे इस आंदोलन की ताकत बढ़ गई। सैणराथी, बेडूमहर एवं किमखेत के ग्रामीण चार दिन तक धरने व भूख हड़ताल पर डटे रहे। राजकीय इंटर कॉलेज में प्रवक्ताओं एवं अन्य अध्यापकों की नियुक्ति की मांग इनके केंद्र में रही।
अंततः प्रशासन को झुकना पड़ा। इंटर कॉलेज में दो प्रवक्ता, एक सहायक अध्यापक की नियुक्ति पत्र के साथ अधिकारियों को वहां पहुंचना पड़ा तब जाकर यह भूख हड़ताल खत्म हुई। इस आंदोलन से जुड़े कई ग्रामीणों का कहना था कि राज्य बनने के बाद तो स्थितियां और बदतर हो गई हैं। आखिर क्षेत्र में बिजली, सड़क, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था करना तो सरकार का काम है।
जनप्रतिनिधि बेहतर काम के नाम पर वोट तो मांगते हैं, लेकिन काम नहीं करते। अधिकारियों एवं कर्मचारियों की छवि भी जनता की नजर में अच्छी नहीं हैं। ग्रामीण कहते हैं कि अधिकारियों को नेताओं की आवभगत से ही फुर्सत नहीं है तो फिर भला इन सुदूरवर्ती क्षेत्रों के लिए वह समय कहां से निकालेंगे? ग्रामीणों का दर्द यह भी है कि केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक डिजीटल दुनिया की बात करते नहीं थकती, लेकिन यहां मोबाइल में सिग्नल तक नहीं आते। सड़कों की हालत इतनी बदतर है कि इनमें सफर करना जान जोखिम में डालने के बराबर है। कई लोगों का यह कहना भी कम महत्वपूर्ण नहीं कि सीमांत क्षेत्र में बनी सड़कों पर वही लोग आवाजाही करने से कतराते हैं जिन्होंने इन सड़कों का डिजाइन एवं निर्माण किया। इससे पूर्व शिक्षा, संचार, स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग को लेकर होकरा गांव के ग्रामीणों को भूख हड़ताल करनी पड़ी थी। यहां तक कि आत्मदाह की धमकी भी देनी पड़ी। 80 ग्रामीणों को भूख हड़ताल पर बैठना पड़ा। इस दौरान कई लोगों के स्वास्थ्य में गिरावट आई, लेकिन न तो प्रशासन न ही स्वास्थ्य विभाग समय पर उपस्थित हो पाया। बुजुर्गों की इस आंदोलन में पूरी सहभागिता रही। सात दिन तक यह आंदोलन चलता रहा। आखिरकार प्रशासन को झुकना पड़ा और गांव में जाकर ग्रामीणों से वार्ता करनी पड़ी। क्षेत्र में सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिखित आश्वासन के बाद ही ग्रामीणों ने अपना अनशन तोड़ा। यह जनता की ही ताकत थी कि होकरा गांव के लिए एएनएम की तैनाती करनी पड़ी। आंदोलन के पीछे का मूल कारण होकरा में स्थित इंटर कॉलेज रहा। इसमें 250 से अधिक विद्यार्थी अध्यनरत हैं, लेकिन यहां पर एक भी प्रवक्ता नहीं है। सवाल यह है कि क्या इसकी जानकारी शिक्षा महकमे के साथ ही सरकार के पास नहीं थी? होकरा, खोयम, गोला के इन तीन गांवों में चार हजार से अधिक आबादी निवास करती है। करीब 1900 परिवार इस क्षेत्र में निवास करते हैं, लेकिन सुविधाओं के नाम पर सब सिफर। कहां तो यहां के लोगों को अपेक्षा थी कि पर्यटन प्रदेश का नारा देने वाली सरकार इस क्षेत्र को पर्यटन क्षेत्र के रुप में विकसित करेगी। लोगों की यह अपेक्षा भी बेवजह नहीं है। गांवों के नीचे रामगंगा नदी बहती है तो पास में हीरामणि ग्लेशियर है तो वहीं आस्था की देवी हुंकारा देवी का मंदिर जहां लाखों लोग शीष नवाते हैं उसके अलावा चारों ओर बिखरा सौंदर्य किसी भी प्राकøतिक स्थली से कम नहीं है। बस, जरूरत थी तो इसे सजाने- सवांरने की। अगर यह ग्रामीणों के वश में होता तो वह शासन-प्रशासन की तरफ नहीं देखते। लेकिन सवाल है कि आंखिर शासन-प्रशासन की व्यवस्था भी तो इसीलिये की गई है कि वंचित क्षेत्रों तक विकास की रोशनी पहुंच सके?
मुनस्यारी के तल्ला जोहार के कोटा, खडिग, पंद्रहपाला, ढनार, मलौन, लौध, डोकुला, डुंगरी, पांगरधनी, समकोट, ननकाना, देवरूख, बजेता, कोलीबगड़, सेलमाली, विनाड़, भिंचना आदि गांवों की 10 हजार से भी अधिक की आबादी कई तरह की असुविधाओं के बीच जिंदगी जी रही है। सीमांत क्षेत्र की लाइफ लाइन झूला पुलों व जानलेवा गरारियों पर टिकी हुई है। बरसात में तो इस लाइफ लाइन को नुकसान पहुंचते ही क्षेत्र के गांव के गांव पूरे देश से कट जाते हैं। तब यहां पर भूखा मरने की नौबत तक आ जाती है। आवागमन के साधन बंद हो जाने से आवश्यक चीजों की भी भारी कमी हो जाती है। नेपाल व चीन से सटे इस क्षेत्र के विकास की ओर गंभीरता से कभी नहीं सोचा गया। इन दिनों गोरी व उसकी सहायक नदियां उफान पर हैं। इन नदियों के किनारे व उसके आर-पार बसे गावों का जनजीवन काफी कठोर हो गया है। नदियां इतना विकराल रूप धारण कर चुकी हैं कि मिलम से लेकर जौलजीवी तक करीब 132 किमी तक गौरी नदी के किनारे घनी बस्तियांं में रहने वाले लोग खतरे के बीच एक-दिन जैसे- तैसे काट रहे हैं। एक तरफ गांव बसे हैं, तो दूसरी तरफ गांव वालों के खेत। गर्जिया, चामी, बंगापानी के झूलापुल वर्षों पुराने जर्जर हालत में हैं तो वहीं हुड़की, आलम, फगुवा और बसंतकोट के लोग गरारी के सहारे नदी को आर-पार करने को मजबूर हैं। कमजोर हो चुकी इन गरारियों से गिरकर कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। हर साल गोरी नदी में आर-पार जाने के लिए जो कच्चे पुल बनते हैं वह मानसून की भेंट चढ़ जाते हैं। बरसात के चार महीने तो यहां के लोगों के लिए काफी कठिन होते हैं। स्कूली बच्चों के स्कूल बंद हो जाते हैं। स्कूल जाने वाले कई बच्चे नदियों व गधेरों की भेंट चढ़ जाते हैं। खाद्यान्न की कमी भूखा मरने की नौबत पैदा करती है। बलमरा, सेरा, सिरतोला, धमी गांव, छोरीबगड़, तल्ला व मल्ला मनकोट, गराड़ी, तोली, हुड़की, संगलतड़ आदि गांव गोरी नदी घाटी क्षेत्र में आती हैं, लेकिन यहां के लोगों की कठिन जिंदगी कभी भी सुविधाजनक नहीं बन पाई है।
सरकारें कितनी संवेदनशील रही हैं, इसका अंदाजा सीमावर्ती गांव क्वीरी जिमिया से लगाया जा सकता है। इस गांव में 2001 में भू-कटाव शुरू हुआ। वर्ष 2010 मेंं एक बार फिर बादल फटा तो इस गांव का भूगोल ही बदल गया। गांव के मध्य में ऐसी दरार बनी कि क्वीरी के 32 व जीमिया के 40 परिवार खाई के इधर-उधर हो गए और 11 मकान खाई में समा गए। एक गांव दो गांवों में बंट गया अब किसी का मकान क्वीरी में तो जमीन जीमिया में तो किसी की जमीन क्वीरी में तो मकान जीमिया में है। बीच में आने जाने का कोई रास्ता नहीं। जो खाई बनी वह 20 मीटर चौड़ी व 35 मीटर गहरी हो चुकी है। बरसात में ये गांव चार महीने से अधिक समय तक आपस में कट जाते हैं। इस दौरान एएनएम सेंटर, व आंगनबाड़ी केंद्र बंद हो जाता है। यह गांव आपदाग्रस्त है, लेकिन गांव के मध्य हो रहे कटाव को रोकने के लिए अभी तक कोई मजबूत काम सरकार नहीं कर पाई। हालात यह हैं कि यहां आज भी संदेश पत्थरों में बांध कर पास किए जाते हैं। जबकि यह आलू व राजमा उत्पादक गांव रहा है। लेकिन एक दशक से अधिक समय से ग्रामीण गांव में ही कैद होकर रह गए हैं। मुनस्यारी से 16 किमी दूर इस गांव में बनी खाई अब डेढ़ किमी. चौड़ी व छ सौ मीटर गहरी व आठ किमी. लंबी हो चुकी है। सरकार कहती है कि गांवों के विकास में वह अब तक करोड़ों रुपए खर्च कर चुकी है, लेकिन सीमावर्ती क्षेत्र लगातार खाली होते जा रहे हैं। 350 किमी. चीन सीमा पर बसे गांव लगातार खाली हो रहे हैं। सुरक्षा एजेंसियां भी इस पर चिंता प्रकट कर चुकी हैं। सीमा प्रहरी आईटीबीपी के लिए जानकारी की दृष्टि से गांव काफी महत्वपूर्ण रहे हैं। केंद्र सरकार ने बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट प्लान चला रखा है ताकि स्थानीय लोगों के सामाजिक, आर्थिक ढांचे को मजबूत किया जा सके। हर वर्ष 40 करोड़ से अधिक रुपया इसमें खर्च हो रहा है। स्वरोजगर से संबंधी कई परियोजनाएं इन इलाकों में चल रहे हैं। लोगों की आर्थिकी को बेहतर करने के लिए कई तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलते रहे हैं। लेकिन बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं की वजहों से पलायन हो रहा है उस पर काम नहीं हो पा रहा है। आधारभूत ढांचे की यही कमी सीमावर्ती गांव के लोगों को सड़क पर उतरने के लिए विवश कर रही है जो सोचनीय प्रश्न है?

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