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टिहरी रियासत से जनता को आजादी दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी पैन्यूली ने

देश की आजादी से पहले टिहरी रिसायत की जनता राजशाही के जुल्मों से तंग आकर स्वतंत्रता के लिए छटपटा रही थी। रियासत के लोग उस वक्त जहां एक ओर आजादी के राष्ट्रीय आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे, वहीं दूसरी तरफ राजशाही के खिलाफ आंदोलन चलाए हुए थे। आंदोलन को गति देने के लिए उस वक्त जिस ‘प्रज्ञामंडल’ की स्थापना की गई थी उसके पहले अध्यक्ष परिपूर्णानंद पैन्यूली अब जनता के बीच नहीं रहे। 97 वर्ष की आयु में उन्होंने देहरादून में जीवन की अंतिम सांस ली। वे जीवन भर जनता के प्रति समर्पित रहे। टिहरी जिले के जाखणीधार विकासखण्ड के छौल गांव में 19 नवम्बर 1924 को परिपूर्णनंद पैन्यूली का जन्म हुआ। इनके दादा राघवानंद पैन्यूली टिहरी रियासत के दीवान थे और पिता कøष्णानंद पैन्यूली सिविल इंजीनियर थे। एक राजसी और ताकतवर परिवार में जन्म लेने के बावजूद परिपूर्णानंद पैन्यूली समाजसेवा और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े।

जब देश में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ आंदोलन चरम पर था, तो परिपूर्णानंद पैन्यूली भी इस आंदेलन से जुडे़। 1942 के भारत छोड़ो आंदेलन के दौरान मेरठ बम कांड में पकड़े जाने पर पैन्यूली को जेल की सजा हुई। जेल से बाहर आने के बाद वे पूरी तरह से टिहरी रियासत के दमन और शोषण के खिलाफ उतर गए। प्रजामंडल के झण्डे तले जागरूकता पैदा करके उन्होंने रियासत के खिलाफ जनता का एक बड़ा वर्ग तैयार किया। उस वक्त राजशाही के खिलाफ भड़के किसान आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा रहे पैन्यूली को पुलिस ने पकड़ा और 1946 में उनको टिहरी जेल में डाल दिया गया। टिहरी रियासत की जेल में कैदियां पर बड़े अमानवीय जुल्म किये जाते थे। श्रीदेव सुमन को दर्दनाक यातनाएं देकर टिहरी पुलिस पहले ही अपना अमानवीय चेहरा दिखा चुकी थी। वही पुलिस अब परिपूर्णानंद पैन्यूली पर भी जुल्म कर रही थी। पैन्यूली ने उन जुल्मां के खिलाफ भूख हड़ताल की, लेकिन रियासत के कानून ने उनको राजद्रोह के आरोपों में डेढ़ वर्ष के करावास की सजा सुनाई। वे बड़े नाटकीय ढंग से टिहरी जेल से फरार हो पाने में सफल रहे और ऋषिकेश को अपनी कर्मभूमि बनाकर रियासत के जुल्मां और अंग्रेजी दासता के खिलाफ लड़ाई लड़ते रहे।

1947 में देश को अंग्रेजी दासता से स्वतंत्रता तो मिल गई, लेकिन टिहरी रियासत की जनता को अभी भी राजशाही की दासता से जूझना पड़ रहा था। पैन्यूली ने टिहरी रियासत के खिलाफ चल रहे आंदोलन को और तेज किया। जैसे ही देश आजाद हुआ वे टिहरी पहुंचे। उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। उनकी गिरफ्तारी के बाद रियासत के खिलाफ आंदेलन और भी भड़क गया जिसके चलते उन्हें जेल से रिहा करना पड़ा। लंबे संघर्ष के बाद अंततः जनता को टिहरी रियासत से स्वतंत्रता मिली।

पैन्यूली अब टिहरी रियासत को भारत में विलय करवाने के लिए आंदेलन में उतर गये। उनके ही प्रयासों से रियासत का विलय भारतीय गणतंत्र में हो पाया। विलय पत्र में जिन तीन प्रमुख प्रतिनिधियों के नाम थे उनमें से एक परिपूर्णानंद पैन्यूली का भी था। यहां तक कि हिमाचल प्रदेश की 34 पहाड़ी रियासतों को भी भारतीय गणतंत्र में विलय करवाने में पैन्यूली का बड़ा येगदान माना जाता है। टिहरी रियासत के भारत के विलय के बाद पैन्यूली आराम से नहीं बैठे। जनता में कुरीतियों और पिछड़ेपन के खिलाफ सामाजिक आंदोलनां की अलख जगाते रहे।

राजनीति में भी परिपूर्णानंद पैन्यूली ने सक्रिय भूमिका अदा की। 1971 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर टिहरी से सांसद का चुनाव लड़ा ओैर भारी मतों से जीत हासिल की। पैन्यूली के खिलाफ टिहरी राजपरिवार के महाराजा मानवेन्द्र शाह निर्दलीय खड़े थे। उनका पूरा विश्वास था कि टिहरी की जनता उनको चुनाव में जीत हासिल करवायेगी, लेकिन जनता ने पैन्यूली पर ही अपना भरोसा जताया। अपने जुझारू और जीवट स्वभाव के चलते वे राजनीति में भी समाजसेवा को सबसे ज्यादा तरजीह देते रहे। अपने संसदीय कार्यकाल में पैन्यूली पर्वतीय क्षेत्र के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए पुरजोर काम करते रहे। अनुसूचित जाति और जनजाति क्षेत्र के लिए उनका येगदान आज भी याद किया जाता है। माना जाता है कि चकराता और उत्तरकाशी के जनजातीय क्षेत्र के लिए एकीकøत जनजाति विकास समिति का गठन भी परिपूर्णनंद पैन्यूली के ही प्रयासों से हो पाया। पर्वतीय क्षेत्र के विकास के लिए मुखर रहने वाले पैन्यूली उत्तर प्रदेश हिल डेवलपमेंट कार्पोरेशन को चेयरमैन भी रहे। दलितों और शेषितों के प्रति उनका खास लगाव रहा। खासतौर पर जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा के विकास के लिए उनके काम को आज भी याद किया जाता है।

उत्तरकाशी जिले के धारी गांव में पैन्यूली ने हरिजन आश्रम की स्थापना की। इस आश्रम में दलित वर्ग के बच्चों को कक्षा आठ तक निशुल्क शिक्षा दी जाती रही। 2013 तक यह आश्रम चलता रहा, लेकिन अब यह बंद हो चला है। पैन्यूली इस आश्रम के संचालन के लिए भारत सरकार से आर्थिक सहयोग लेते थे और अपने परिचितां और मित्रां से भी आर्थिक मदद लेकर किसी तरह से इस आश्रम का संचालन करते रहे। उनके अस्वस्थ होने के बाद आश्रम की हालत खराब होती चली गई।

पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय परिपूर्णानंद पैन्यूली के खासे नजदीकी रहे हैं। उपाध्याय बीते दिनों को याद करते हुए पैन्यूली के योगदान को बताते हैं कि ‘‘आज के हालात में शायद ही ऐसा कोई नेता पैदा होगा जैसे पैन्यूली जी थे। एक ताकतवर और ब्राहमण परिवार में ंजन्म लेने के बावजूद छूआछूत को समाज के लिए बुरा मानते थे। टिहरी रियासत के जुल्मों से जनता को बचाने के लिए आंदेलन खड़ा करने में उनका येगदान अग्रणी माना जायेगा। सांसद बनने के बाद उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों के विकास के लिए हमेशा मुखर रहे। जनजाति क्षेत्रों के लिए जितना काम पैन्यूली जी ने किया शायद ही किसी राजनेता ने किया हो। किशोर उपाध्याय के शब्दों में ‘‘आज प्रदेश अपने महान नेता के बगैर हो गया है। यह खालीपन शायद ही अब भर पायेगा।’’

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