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Uttarakhand

शिक्षा विभाग के गले की फांस

कितना हास्यास्पद है कि एक व्यक्ति प्रधानाध्यापक पद से सेवानिवृत्त हो गया और शिक्षा विभाग साबित ही नहीं कर पाया कि उसके प्रमाण पत्र फर्जी थे। हाईकोर्ट में भी विभाग मामले की ठीक से पैरवी नहीं कर पाया। नतीजतन कोर्ट का फैसला शिक्षक हरपाल सिंह यादव के पक्ष में गया। अब स्थिति यह है कि जिस शिक्षक के खिलाफ विभाग ने चार धाराओं में मामला दर्ज किया था, कोर्ट के आदेश से उसी को समस्त देयकों का भुगतान भी करना पड़ रहा है। भुगतान में हाईकोर्ट के आदेशों की अवमानना का सवाल उठा तो इससे बचने के लिए विभाग ने अपनी एक अधिकारी सुमन अग्रवाल को निलंबित कर डाला। विभाग ने एक ऐसी अधिकारी को बलि का बकरा बनाया जो पूर्व में हरपाल यादव के फर्जी प्रमाण पत्रों को लेकर मुखर रहीं। हरपाल यादव के फर्जी प्रमाण पत्रों को लेकर उनकी एक रिश्तेदार बबीता यादव आवाज बुलंद करती रही हैं

उत्तराखण्ड में सिस्टम की खामियों का आलम यह है कि यहां किसी को देखने की फुरसत नहीं होती कि कहीं कोई फर्जी प्रमाण पत्रों के बूते सरकारी नौकरी हासिल तो नहीं कर गया। कोई लगातार ड्यूटी से गायब है तो क्यों? सिस्टम की खामियों की कीमत अंततः सरकारी विभागों के साथ ही जनता को भी चुकानी पड़ती है। राज्य के हरिद्वार जिले का एक मामला पिछले लंबे समय से पूरे प्रदेशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। चर्चा का विषय इसलिए कि शिक्षा विभाग ने एक ओर तो अपने एक शिक्षक के खिलाफ फर्जीवाड़े का मामला दर्ज कराया है, लेकिन दूसरी ओर हाईकोर्ट के आदेश पर सेवानिवृत्ति के बाद उसके देयकों का भुगतान करने को भी विवश है। लोग कहते हैं कि यदि समय पर विभाग ने सक्रियता दिखाई होती, शिक्षक द्वारा फर्जी प्रमाण पत्रों के बूते नौकरी हासिल करने के मामले को गंभीरता से लिया होता तो बहुत संभव था कि माननीय हाईकोर्ट में शिक्षक के खिलाफ फैसला होता और रिटायरमेंट से पहले उससे वसूली का रास्ता भी बन सकता था। लेकिन हाईकोर्ट में पैरवी करने में विभाग का रवैया ढीला रहा और अब वह उस शिक्षक को देयकों का भुगतान करने को विवश है जिसके प्रमाण पत्रों पर संदेह किया जाता रहा है।

वर्ष 1992 में जब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी तो उस दौरान हरपाल सिंह यादव की नियुक्ति हुई थी। यादव के खिलाफ फर्जी दस्तावेजों के बूते नौकरी हासिल करने के आरोप में 20 सितंबर 2018 को विजिलेंस की रिपोर्ट के बाद उपशिक्षा अधिकारी सुमन अग्रवाल ने ज्वालापुर कोतवाली में आईपीसी की धारा 420,467, 468 तथा 471 के तहत मुकदमा दर्ज कराया। लेकिन इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। यह कहीं न कहीं सिस्टम की लापरवाही को उजागर करता है। हालांकि मामले की जांच कर रहे विशेष जांच अधिकारी उपनिरीक्षक सम्पूर्णांद का कहना है कि हरपाल सिंह यादव ने अपनी गिरफ्तारी के विरुद्ध हाईकोर्ट से स्टे ले रखा है और वर्तमान में इस मामले में जांच भी जारी है। हरपाल सिंह यादव पर लगातार ड्यूटी से नदारद रहने के आरोप भी हैं। इसलिए उनके विरुद्ध कार्रवाई भी हुई। लेकिन इस सबके बावजूद वह बड़ी आसानी से सेवानिवृत्त हो गए।

पिछले दिनों 18 अप्रैल को बाहदराबाद खंड की उपशिक्षा अधिकारी सुमन अग्रवाल को इसी प्रकरण के चलते विभाग के सचिव आर मीनाक्षी सुंदरम ने निलंबित कर दिया। उन पर विभाग ने आरोप लगाया कि उन्होंने सेवानिवृत्त शिक्षक हरपाल यादव के देयको के भुगतान में हाईकोर्ट के आदेशों का पालन नहीं किया। माना जा रहा है कि ऐसा करके विभाग ने कोर्ट के आदेश की अवमानना के भय से खुद को सुरक्षित कर लिया है। शिक्षा विभाग में इन दिनों यही चर्चा है कि विभाग ने खुद की बला टालने के लिए सुमन अग्रवाल को बलि का बकरा बना दिया।

हरपाल सिंह यादव द्वारा के प्रमाण पत्रों को फर्जी बताने में उनकी एक नजदीकी रिश्तेदार बबीता यादव ने अहम भूमिका निभाई। वे इसके लिए बाकायदा सूचना आयोग तक गई। ‘दि संडे पोस्ट’ से हुई खास बातचीत में बबीता ने हरपाल पर गंभीर आरोप लगाए। बबीता ने बताया कि हरपाल सिंह यादव की नियुक्ति सन 1992 में शिक्षक के पद पर हुई थी। पर वह कभी स्कूल ही नहीं गया। लगातार अनुपस्थित रहने के कारण दर्जनों बार उस पर अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जा चुकी है। वर्ष 2009 में शिक्षा विभाग ने उसके शैक्षिक प्रमाण पत्रों की मांग की क्योंकि विभाग के पास उसका कोई शैक्षिक प्रमाण पत्र नहीं था, परंतु हरपाल लगातार विभाग को गच्चा देता रहा। 1 अप्रैल 2011 से 6 अक्टूबर 2015 तक लगातार अनुपस्थित रहने के कारण तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी रामेंद्र कुशवाहा के आदेश पर 7 अक्टूबर 2015 को उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गई। जिसके बाद दिसंबर 2017 को हरपाल सिंह यादव ने इस बर्खास्तगी के खिलाफ हाईकोर्ट में केस किया। बबीता ने यह भी बताया कि हरपाल सिंह यादव ने कुछ उच्चस्तरीय अधिकारियों से सांठ-गांठ कर हाईकोर्ट में विभाग का पक्ष तक कमजोर करा दिया। जिसके चलते 12 मई 2017 को हाईकोर्ट ने आदेश सुनाया कि हरपाल सिंह यादव की बर्खास्तगी निरस्त की जाती है। हालांकि इस दौरान यह भी साबित हो चुका था कि हरपाल सिंह यादव जिन शैक्षिक प्रमाण पत्रों के आधार पर शिक्षा विभाग में नियुक्त हुआ था, वह फर्जी थे।

फीना बिजनौर के सार्वजनिक इंटर कॉलेज के प्रिंसीपल ने दिनांक 8 फरवरी 2018 को सूचना दी कि हरपाल सिंह ने हमारे विद्यालय में कक्षा 6 में दाखिला लिया था तथा अंतरिम रूप से वह हाईस्कूल फेल रहा। 8 जुलाई 1972 को इसी कॉलेज द्वारा जारी टीसी में भी हरपाल को स्पष्ट रूप से दसवीं फेल दिखाया गया है। आरोप है कि फर्जी प्रमाण पत्रां के आधार पर नौकरी पाने वालां में केवल हरपाल यादव ही नहीं, बल्कि उसका पूरा कुटुम्ब भी है। बबीता यादव के मुताबिक साला बिजेंद्र कुमार, भाई तथा अन्य कई सगे-संबधी इसमें शामिल हैं। अल्मोड़ा में बिजेंद्र कुमार पर फर्जी प्रमाण पत्रां के आधार पर नौकरी पाने के संबंध में मुकदमा भी दर्ज किया गया।वो तीन साल की कैद की सजा के बाद इन दिनों जमानत पर रिहा है।

बबीता यादव ने बताया कि हरपाल यादव फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी लगवाने के लिए पूरा गिरोह चलाता था तथा खुद उसका सरगना भी है। इस गिरोह से इसने इतनी सम्पत्ति अर्जित कर ली है कि हरिद्वार की सबसे मंहगी जगहों में से एक पर आलीशीन होटल भी बना लिया। अध्यापक के पद पर रहते हुए हरपाल सिंह यादव कभी स्कूल नहीं गए तो इनकी शिकायतें भी काफी हुई हैं। सजनपुर पीली गांव के ग्राम प्रधान बलवीर सिंह ने तो जिला शिक्षा अधिकारी को पत्र लिखकर ये चेतावनी भी दी थी कि यदि 15 अगस्त 2009 से पूर्व हरपाल सिंह यादव को स्कूल से नहीं हटाया गया तो ग्रामीण स्कूल पर तालेबंदी कर चाबियां डीएम साहब को सौंप देंगे।

कहते हैं कि हरपाल सिंह यादव के मामले में जो भी उसके आड़े आया उसका उसने बड़ा इलाज भी कर दिया। चर्चा है कि शिक्षा विभाग में तैनात दो बाबुओं का ट्रांसफर भी इसलिए कर दिया गया क्योंकि वो हरपाल सिंह यादव के काम को नहीं कर रहे थे। इस पूरे मामले में सबसे गंभीर सजा उपशिक्षा अधिकारी सुमन अग्रवाल को मिली जिन्हें कोर्ट की अवमानना का आरोप लगाते हुए खुद उन्हीं के विभाग ने सस्पेंड कर दिया। हाईकोर्ट ने आदेश दिए थे कि हरपाल सिंह यादव के सभी बकाया देयकों का भुगतान किया जाए। इन दिनों सस्पेंड चल सुमन अग्रवाल ने बताया कि विभाग के पास तो हरपाल सिंह यादव के कोई शैक्षिक प्रमाण पत्र ही नहीं थे तो उसकी जांच भी आगे कैसे होगी। इसने खुद अपने फर्जी शैक्षिक प्रमाण पत्र विभाग से गायब करा दिए। इस मामले में हमने हाईकोर्ट में पहले तो रिव्यू डाला फिर विशेष अपील की, लेकिन दोनां ही हाईकोर्ट ने खारिज कर दी। जिसका सबसे बड़ा कारण शायद यही था कि सरकारी वकील सही तथ्य कोर्ट के सामने पेश नहीं कर पाए। मैंने तो अंतिम समय तक भी प्रयास किया कि विभाग का पैसा बर्बाद न हो, पर फिर भी हाईकोर्ट के आदेशों के अनुपालन में मैंने अपने सस्पेंशन से पहले उसका ईपीएफ और पेंशन पत्रावली कोषागार में भेज दी थी। लेकिन उसकी स्वीकøति के आदेश नहीं आए थे। यह सूचना निदेशालय से सचिवालय नहीं पहुंच पाई जिस कारण शायद मुझे निलंबित कर दिया गया।

 

हरपाल पर भी उत्पीड़न के आरोप

हरपाल सिंह यादव के साले की पत्नी बबीता यादव ने उस पर उत्पीड़न के आरोप भी लगाए। बबीता ने बताया कि ‘हरपाल ने झूठ बोलकर मेरी शादी एक फर्जी टीचर से कराई तथा खुद बाद में मेरा शारीरिक शोषण करने का भी प्रयास किया। जिसके लिए मैं कभी राजी नहीं हुई। उसके बाद हरपाल ने अलग-अलग तरीकों से मेरा मानसिक शोषण करना शुरू कर दिया ताकि हारकर मैं उसकी बात मान लूं। यहां तक कि उसने मुझे मेरे पति के साथ भी नहीं रहने दिया। फिर भी मैं किसी तरह अपने पति के साथ 5 साल अल्मोड़ा में रही। मेरी शिक्षा विभाग में नौकरी लगने के बाद हरपाल ने शिक्षा विभाग में सेटिंग-गेटिंग कर मेरा तबादला हरिद्वार करा लिया। हरिद्वार आने के बाद हरपाल लगातार मुझे धमकी दिया करता था तथा अपने मनमाफिक काम करने के लिए दबाव बनाया करता था। बबीता के मुताबिक हरपाल उससे जबरन शारीरिक संबंध बनाना चाहता था तथा उसे अन्य अधिकारियों के सामने भी परोसना चाहता था। जिसके लिए वह किसी भी सूरत में तैयार नहीं थी। बबीता यादव दुखी मन से बनाती हैं कि हरपाल सिंह यादव ने मेरा पूरा जीवन बर्बाद कर दिया। मैं एक सैनिक की बेटी हूं इसीलिए मैंने अपने आत्मसम्मान को कभी गिरने नहीं दिया।

सुमन अग्रवाल और उसके दो विभागीय सहयोगी लिपिकों मनोज कुमार और पवन कुमार ने उस स्कूल से मेरे हाईस्कूल फेल के दस्तावेज निलकवाए और मुझे ब्लैकमेल किया। फिर वही कागज कोर्ट में पेश किए, जबकि फेल होने के बाद मैं पास भी हुआ। ऐसा इन्होंने इसलिए किया, क्योंकि मैंने इनकी रिश्वत की मांग पूरी नहीं की थी। इनके खिलाफ देहरादून के विजिलेंस थाने में जुलाई 2018 को मुकदमा भी दर्ज कराया गया है। जहां तक बात बबीता यादव की है तो वो एक सही चरित्र वाली महिला नहीं है। उसने मुझ पर 9 केस किए जिनमें से 8 का फैसला मेरे पक्ष में आया, अभी एक केस में निर्णय आना बाकी है।
हरपाल सिंह यादव, सेवानिवृत्त शिक्षक

बात अपनी-अपनी

इस मामले में अब जब कोर्ट ने आदेश दे दिया है तो हमारा इस विषय पर टीका-टिप्पणी करना ठीक नहीं। कोर्ट ने हमारी अपील, यहां तक कि विशेष अपील भी खारिज कर दी। यही नहीं हम पर दस हजार रुपये का अर्थदंड भी लगा दिया। हालांकि कोर्ट में बहस काफी हुई पर कोर्ट का कहना है कि अब रिटायरमेंट के 4 साल बाद आप यह साबित करने में जुटे हैं कि उसकी डिग्री फर्जी थी तो उसकी सर्विस के समय आप कहां थे। यह उस समय के अधिकारियों की भी चूक कह सकते हैं क्योंकि हरपाल सिंह यादव के शैक्षिक प्रमाण पत्र तो विभाग में उपलब्ध होने ही चाहिए थे।
ब्रह्मापाल सिंह सैनी, जिला शिक्षा बेसिक अधिकारी हरिद्वार

मैंने जब ये पाया कि हरपाल सिंह यादव ने फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर नौकरी पाई है तो तब मैंने विभाग के धन का दुरुपयोग होने से बचाने का प्रयास किया। हरपाल सिंह यादव पर दर्जनां बार अनुशासनात्मक कार्रवाई हो चुकी थी इसलिए उसे ईपीएफ नंबर भी बीस साल बाद जारी हुआ था। अब सारी चीजां को देखते हुए मैं कैसे भुगतान कर सकती थी। एक तरफ तो हम उसके दस्तावेजों को फर्जी मान चुके हैं और दूसरी तरफ आसानी से उसे सारा भुगतान कर देते तो समझ से परे था। वह भी वो भुगतान जिसके लिए हरपाल सिंह यादव ने कभी कोई काम ही नहीं किया। मुझे लगता है कि विभागीय अधिवक्ता सारे तथ्य अदालत से समक्ष सही रूप में नहीं रख पाए। शायद सबकी गलती की सजा मुझे ही मिलनी थी।
सुमन अग्रवाल, पूर्व उप शिक्षा अधिकारी बहादराबाद

हरपाल सिंह यादव का मेरे समय में तीन बार निलबंन हो चुका था। अंत में उसकी सेवा भी समाप्त कर दी गई थी। उसके होटल में एक बार रेड भी पड़ी थी जिसके बाद एसएसपी और डीएम कार्यालय के बीच इसके आचरण को लेकर भी पत्राचार किया गया था, पर ये विभाग की कमी है कि समय रहते ऐसे फर्जी टीचर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर पाया।
कुशला प्रसाद, सेवानिवृत्त खंड शिक्षा अधिकारी बहादराबाद

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