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Uttarakhand

सुगम और दुर्गम का खेल

कोरोना महामारी के चलते पिछले दो वर्ष से उत्तराखण्ड में स्थानांतरण नहीं हो पाए थे। इस वर्ष राज्य सरकार ने विभागों में अनिवार्य तबादला नीति के चलते स्थानांतरण तो किए लेकिन इस दौरान शिक्षा विभाग में सुगम और दुर्गम का खेल हुआ। आरोप है कि यह पूरा खेल चहेतों को मनमाफिक जगहों में स्थानांतरण करने को लेकर किया गया। प्रभावशाली लोगों को दुर्गम क्षेत्र में स्थानांतरण से रोके जाने के लिए ही ट्रांसफर नीति में परिवर्तन किए गए हैं तो न वर्षों में प्रदेश के विकास का पहिया रिवर्स गियर में चला गया है। जो नगर स्थान तीन वर्ष पूर्व सुगम में माने जाते थे वे अब दुर्गम हो चले हैं। उत्तराखण्ड में सरकारी कर्मियों के स्थानांतरण के लिए सुगम और दुर्गम के आधार पर तबादले किए जाते हैं। जहां सुगम के मानकों में रोड़ कनैक्टीविटी, संचार सुविधाएं और स्वास्थ्य सुविधाये तथा काम करने के लिए समस्या न हो उस क्षेत्र को सुगम माना गया है जबकि दुर्गम क्षेत्र में सड़क सुविधा न होने और अन्य कनेक्टीविटी के साथ साथ स्वास्थ्य आदि की सुविधाएं न हो उन क्षेत्रों को दुर्गम की श्रेणी में रखा जाता है।

दुगर्म की श्रेणी में पिथौरागढ़ के शिक्षा संस्थान
 

इन तबादलों में एक बड़े खेल किए जाने का पर्याय बन चुका है। इसको लेकर सबसे ज्यादा विवाद शिक्षा विभाग में ही सामने आते हैं। जिसमें अब राज्य का प्राविधिक शिक्षा विभाग भी शामिल हो गया है। जन संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष रघुनाथ सिंह नेगी ने इस मामले को लेकर सरकार और प्राविधिक शिक्षा निदेशालय पर गंभीर अरोप लगाते हुए सरकार की पर्वतीय क्षेत्रों में विकास की अवधारणा पर ही सवाल खड़े किए हैं। नेगी ने तकनीकी शिक्षा सचिव रविनाथ रमन को इस प्रकरण को लेकर एक ज्ञापन भी सौंपा है जिसमें कोटीकरण को लेकर की गई मनमानी के प्रमाण दिए गए। सचिव द्वारा इस मामले का परीक्षण करवा कर कार्यवाही करने की बात भी कही गई है। फिलहाल, 2018 के कोटिकरण व्यवस्था के अनुसार ही स्थानांतरण किए जाने का आश्वासन दिया गया है।

तबादला एक्ट 2017 के अनुसार 2018-19 और 2019-20 में सुगम और दुर्गम कोटिकरण के अनुसार दस प्रतिशत शिक्षकों और कार्मिकों के तबादले किए गए थे। तीन वर्ष के बाद दुर्गम में अपनी सेवाएं दे रहे शिक्षकों और कार्मिकों को यह उम्मीद थी कि विभाग उनको दुर्गम से सुगम स्थानों पर स्थानांतरण करेगा। लेकिन विभाग ने 2018 के कोटिकरण जिसमें 26 पॉलिटेक्निक संस्थानों को सुगम और 44 संस्थानों को दुर्गम की श्रेणी में रखा था को बदल कर 18 संस्थानों को सुगम तथा 53 को दुर्गम की श्रेणी में कर दिया गया। जिससे प्रदेश के तबादले की प्रक्रिया बुरी तरह से प्रभावित हुई है।

पोड़ी जिला जो कि हर तरह से विकसित माना जाता रहा है वह जिला अचानक ही तीन सालां में इस कदर पीछे चला गया है कि इसके दो बड़े नगर अब दुर्गम की श्रेणी में आ चुके हैं। इनमें एक नगर, श्रीनगर को राज्य सरकार नगर निगम बनाने की घोषणा कर चुकी है। गौर करने वाली बात यह है कि 2018 में पौड़ी जिला सुगम की श्रेणी में माना गया था। तत्कालीन निदेशक प्राविधिक शिक्षा निदेशक पंकज कुमार पांडे द्वारा जारी कार्य ज्ञापन से साफ पता चलता हे कि पोड़ी जिला सुगम की श्रेणी में रखा गया था। राज्य का दूसरा राजकीय मेडिकल कॉलेज श्रीनगर में अवस्थित है। इसके अलावा राज्य की पहली सबसे बड़ी 125 मेगावाट की जल विद्युत परियोजना श्रीनगर में ही है। एनआईटी तक श्रीनगर से ही संचालित हो रही है। बवजूद इन सब के श्रीनगर को दुर्गम की श्रेणी में रखा गया है।

इसी तरह से पोड़ी जहां गढवाल कमिश्नरी का मुख्यालय हे और पर्यटक नगरी के नाम से पोड़ी की पहचान अविभाजित उत्तर प्रदेश से बनी हुई है को भी दुर्गम की श्रेणी में रखना अपने आप में ही हैरान करता है। मजेदार बात यह हे कि पौड़ी जिला प्रदेश में राजनीतिक तौर पर सबसे मजबूत और विकसित जिला माना जाता है। प्रदेश की राजनीति में पोड़ी जिले की धमक सदैव से देखी जाती रही है। तीन तीन मुख्यमंत्री पौड़ी जिले से रहे हैं मैजूदा सरकार में भी पौड़ी के श्रीनगर से विधायक धनसिंह रावत प्रदेश की तमाम शिक्षा व्यवस्थाओं का जिम्मा संभाले हुए हैं। इसी तरह से चौबट्टाखाल से विधायक सतपाल महाराज पर्यटन मंत्री हैं तो कोटद्वार से विधायक ऋतु भूषण खण्डूड़ी विधानसभा अध्यक्ष है।

दिलचस्प यह है 2018 में पोड़ी और श्रीनगर के पॉलिटेक्निक सुगम की श्रेणी में ही रखे गए थे लेकिन 26 मार्च 2021 को समस्त पौड़ी जिले को दुर्गम की श्रेणी में रख दिया गया। यही नहीं जिसमें राजकीय पॉलिटेेक्नक श्रीगर, पौड़ी रूद्रप्रयाग और उत्तरकाशी, नई टिहरी और नरेंद्र नगर तथा हरिद्वार, अल्मोड़ा, नैनीताल के राजकीय पॉलिटेक्निक शहरी क्षेत्रों में स्थिति है जिस कारण से इन्हें सुगम की श्रेणी में रखा गया था। इन सभी का दुर्गम श्रेणी में कर दिया गया। साथ ही 2021 में जिलो का भी कोटीकरण किया गया जिसमें देहरादून, हरिद्वार, अल्मोड़ा, उधमसिंह नगर, टिहरी और जिलों को सुगम जनपदों की श्रेणी में रखा गया और पोड़ी, चमोली, उत्तरकाशी और रूद्रप्रयाग, चम्पावत, बागेश्वर तथा पिथौरागढ़ जिलों के समस्त क्षेत्रों को दुर्गम की श्रेणी में कर दिया गया। 2022 में स्वयं प्राविधिक शिक्षा निदेशालय श्रीनगर द्वारा पौड़ी, श्रीगर, रूद्रप्रयाग और उत्तरकाशी, नई टिहरी और नरेंद्र नगर तथा हरिद्वार, अल्मोड़ा, नैनीताल के राजकीय पॉलिटेक्निक को दुर्गम की श्रेणी में कर दिया गया।

मजेदार बात यह है कि तकनीकी शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल का गृह क्षेत्र नरेंद्र नगर को भी दुर्गम में किया गया है। जबकि नरेंद्र नगर में तमाम राजकीय विभागों के अलावा बड़े-बड़े पांच सितारा होटल तथा सरकारी कर्मचारियों के केंद्र तक है। टिहरी जिले के हजारों नागरिकों के लिए इस क्षेत्र का सबसे बड़ा राजकीय संयुक्त चिकित्सालय भी नरेंद्र नगर में ही है। यही नहीं अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय में यह नगर टिहरी जिला का जिलों मुख्यालय भी होता था। बावजूद इसके प्राविधिक निदेशालय द्वारा नरेंद्र नगर को दुर्गम यानी विकास से दूर क्षेत्र माना है। बताया जा रहा है कि सरकार कई विभागों को अनिवार्य तबादला प्रक्रिया से मुक्त रखने का निर्णय ले चुकी है। इसके लिए लोक निर्माण विभाग और ग्रामीण निर्माण विभाग को तबादले से मुक्त करने के लिए तैयारी कर रही है। जिसमें प्राविधिक शिक्षा विभाग को भी शामिल किए जाने की जानकारी मिल रही है। अगर ऐसा हुआ तो कोटिकरण के विवाद के बाद जिन शिक्षकों और कर्मियों को राहत मिलने वाली थी वह राहत उनको मिल पाएगी या नहीं, इसमें संशय नजर आ रहा है।

अपने चेहेतों और रसूखदारों का दुर्गम स्थानों पर तबादला न हो सके इसके चलते प्रविधिक शिक्षा निदेशालय ने तबादला एक्ट की मूल अवधारणा को ही बदल दिया है। सबसे ज्यादा हैरानी इस बात की है कि श्रीनगर और पौड़ी जैसे बड़े शहर 2018 में सुगम थे वे 2022 में महज तीन सालों में ही दुर्गम हो गए। ऐसे ही तमाम नगरों को भी दुर्गम कर दिया गया है। यह तो अपने आप में ही राज्य सरकार के विकास के दावों को कटघरे में खड़ा कर रहा है। तीन सालों में सरकार ने जो भी विकास के कार्य किए थे या दावे किए थे उन दावो की हकीकत भी तो खुल गई है। हमने शासन को इसके लिए ज्ञापन दिया है जिस पर हमें आश्वासन दिया गया है कि 2018 के अनुसार ही दबादले किए जाएंगे।
रघुनाथ सिहं नेगी, अध्यक्ष, जन संघर्ष मोर्चा

कुछ इश्यू थे जिसके कारण नाराजगी थी, अब पहले से ही लागू नीति से ट्रांसफर किए जाएंगे, जो जिस दिन से दुर्गम में होगा उसे उसी दिन से दुर्गम में माना जाएगा, ऐसा नहीं होगा कि कुछ साल दुर्गम में काम किया और अब वह जगह सुगम हो गई है तो उसे सुगम जोड़ा जाएगा।
रविनाथ रमन, सचिव, तकनीकी शिक्षा

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