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उत्तराखण्ड की सियासत वंशवाद की बेल में इस तरह उलझ गई है कि अब यहां सिद्धांतों और विचारों पर काम करने वाले लोगों के लिए राजनीति करना बेहद चुनौतीपूर्ण है

इस बार के संसदीय चुनाव में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खण्डूड़ी के पुत्र मनीष खण्डूड़ी के कांग्रेस में शामिल होने को लेकर काफी हो-हल्ला रहा। मनीष भाजपा में अपने परिवार की विरासत को आगे बढ़ाना चाहते थे, लेकिन यह संभव नहीं हो पाया तो कांग्रेस ने उन्हें हाथों हाथ ले लिया। कांग्रेस को इस सीट से वर्षों से पार्टी के लिए सेवा दे रहे कार्यकर्ताओं के बजाय अभी-अभी पार्टी में शामिल हुए मनीष बेहतर उम्मीदवार दिखाई दिए। मनीष के कद को बढ़ाने के लिए कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी भी मैदान में उतर पड़े। इस संसदीय सीट से कौन जीतेगा, कौन हारेगा यह तय होना तो अभी बाकी है, लेकिन हार-जीत से इतर यह घटनाक्रम राजनीति में प्रचलित हो चली इस कहावत को सार्थक सिद्ध करता है कि वंशवाद एक ऐसी गोंद है जो राजनीतिक दलों को मजबूती से जोड़े रहती है। राज्य बनने के बाद से प्रदेश की राजनीति में वंशवाद की बेल तेजी से बढ़ रही है। भविष्य में यह प्रदेश की राजनीति को कितना फायदा-नुकसान पहुंचाएगी यह तो भविष्य की गर्त में है, फिलहाल तो यह राजनीति में स्थापित क्षत्रपों को अपने परिवारजनों को सत्ता सौंपने की चाबी बना हुआ है जिसमें पुत्र, पुत्री, पत्नी को राजनीति में स्थापित करने के लिए वर्षों से चले आ रहे राजनीतिक सिद्धांतों एवं विचारधारा की तिलांजलि दी जा रही है। इसके लिए जिस तरह से राजनीतिक षड़यंत्र रचे जा रहे हैं, वह राजनीति की मूल अवधारणा पर तो सवाल खड़े कर ही रहा है, वहीं राजनीति को खास घरानों तक सिमटा कर योग्यतम की उत्तरजीविता जैसे अहम सवालों को भी दूर छिटका रहा है।

प्रदेश में अब राजनीतिक परिवारों की दूसरी-तीसरी पीढ़ी को स्थापित करने का काम चल रहा है। हेमवतीनंदन बहुगुणा की तीसरी पीढ़ी प्रदेश की राजनीति में है। पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कांग्रेस से अलग होने के कारण भले ही कुछ और बताए हों, लेकिन सच यह है कि वह पुत्र मोह में उस पार्टी को छोड़ने में नहीं हिचके जहां से राजनीति उनको विरासत में मिली। अपनी इसी विरासत को कांग्रेस में सुरक्षित न देख वह भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा से अपने पुत्र सौरभ बहुगुणा को टिकट दिलाने में वे सफल रहे। आज उनका पुत्र विधानसभा क्षेत्र सितारगंज से विधायक है। पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खण्डूड़ी भले ही अपने पुत्र को भाजपा में स्थापित नहीं कर पाए और बेटे को कांग्रेस का दामन थामना पड़ा, लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में वह अपनी बेटी ऋतु खण्डूड़ी को गढ़वाल की यमकेश्वर विधानसभा सीट से टिकट दिलाने में सफल रहे। आज ऋतु खण्डूडी यहां से विधायक हैं। पूर्व में कांग्रेस के एक बड़े नेता यशपाल आर्य ने भी पुत्र मोह में कांग्रेस की नीतियों को तिलांजलि दे दी और भाजपा में शामिल हो अपने पुत्र को नैनीताल विधानसभा सीट से टिकट दिलाने में सफल रहे। आज संजीव आर्य नैनीताल से विधायक हैं। वंशवाद की इस राजनीति से पूर्व दिग्गज कांग्रेसी नेता नारायण दत्त तिवारी भी नहीं बच पाए। उन्होंने अपने जीते जी अपने पुत्र को राजनीति में स्थापित करने की भरपूर कोशिश की, यह अलग बात है कि वह इसमें सफल नहीं हो पाए। पूर्व रक्षा मंत्री केसी पंत ने भी अपनी पत्नी इला पंत को नैनीताल संसदीय सीट से टिकट दिला संसद में भेजने में सफलता पाई। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अल्मोड़ा संसदीय सीट से अपनी पत्नी रेणुका रावत को टिकट दिला उन्हें राजनीति में स्थापित करने की कोशिश की थी, लेकिन वह खुद चुनाव हार गई। हालांकि वह अपने बेटे-बेटियों को अब तक सीधे तौर पर राजनीति में भले न लाए हों, लेकिन उन्हें कांग्रेस संगठन में स्थापित करने में सफल रहे हैं। रावत के पुत्र आनंद रावत प्रदेश युवा कांग्रेस के अध्यक्ष रहे, जबकि बेटी अनुपमा रावत महिला कांग्रेस की सचिव रहीं। प्रदेश की पूर्व वित्त मंत्री इंदिरा हृदयेश हल्द्वानी नगर निगम के चुनाव में अपने बेटे सुमित हृदयेश को टिकट दिला अपनी विरासत संभालने में लगी हुई हैं। एक समय उत्तर प्रदेश में मंत्री रहे स्वर्गीय गुलाब सिंह के बेटे प्रीतम सिंह और उनके परिजन भी आज राजनीति में हैं। इसी तरह पूर्व केंदीय मंत्री ब्रह्म दत्त की विरासत को उनके बेटे नवप्रभात आगे बढ़ा रहे हैं। सतपाल महाराज का रुतबा बढ़ा तो उन्होंने पत्नी अमृता रावत को भी राजनीति में आगे बढ़ाया। इसके अलावा प्रदेश के बहुत सारे मंत्री, विधायक एवं बड़े नेता राजनीति में अपने बच्चों को स्थापित करने की भरपूर कोशिशों में जुटे हुए हैं।


यूं तो परिवारवाद एवं वंशवाद भारतीय राजनीति के लिए कोई नई बात नहीं है। इस मसले पर पार्टियां एक-दूसरे पर आरोप तो लगाती हैं, लेकिन हाल यह है कि राष्ट्रीय दलों से लेकर क्षेत्रीय पार्टियां तक इसकी जकड़न में हैं। उत्तराखण्ड में उक्रांद नेता विपिन त्रिपाठी के निधन के बाद उक्रांद ने उन्हीं के पुत्र पुष्पेश त्रिपाठी को उनकी विरासत सौंपी। चुनाव चाहे लोकसभा, विधानसभा के हों या फिर नगरीय और पंचायती सत्ता में हर जगह वंशवाद की राजनीति तेजी से अपने पांव पसार रही है। लेकिन इस वंशवादी राजनीति में वह आम राजनीतिक कार्यकर्ता घुट रहा है या यूं कहें कि वह सत्ता के उन सर्वोच्च पदों से वंचित कर दिया जा रहा है जहां पर वह अपनी योग्यता को प्रदर्शित कर सकता था। कांग्रेस को वंशवाद के लिए कोसने वाली भाजपा में भी यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। प्रदेश की स्थिति को देखें तो वंशवाद यहां खूब पनप रहा है। युवाओं को राजनीति में लाने की बात कहकर राजनीतिक दल खास घरानों के युवाओं को तवज्जो दे रहे हैं। खानदान आधारित यह शासन व्यवस्था लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल अवधारणा पर एक तरह से आघात करती साबित हो रही है। प्रदेश की सत्ता के शीर्ष पदों से शुरू होकर यह पंचायती व नगरीय सत्ता में भी हावी हो चुकी है। प्रदेश की राजनीति में ऐसे परिवारों की संख्या बढ़ती जा रही है जिनकी दूसरी या तीसरी पीढ़ी बगैर संघर्ष किए राजनीति में आसानी से स्थापित हो रही है।

राजनीति में गहरी रुचि रखने वाले युवा गगन चंद्र कहते हैं कि सचिन तेंदुलकर का लड़का भारतीय क्रिकेट टीम व आईपीएल में स्थान बना पाने में इसलिए विफल रहा क्योंकि खेल के मैदान में अपने आप को साबित करना पड़ता है। अगर आप इसमें सफल नहीं होते तो फिर यहां नहीं टिक सकते, लेकिन इसके इतर यह बात राजनीति में लागू नहीं होती। यहां अगर आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनीति की है तो फिर चिंता की बात नहीं, देर-सवेर विधायक, मंत्री, सांसद आपको बन ही जाना है, न भी बने तो संगठन के बड़े पदों में आपको स्थापित हो जाना है। प्रदेश में ऐसे राजनीतिक कार्यकर्ताओं की कमी नहीं जिनके पास राजनीति को नई दिशा देने का मकसद मौजूद है, लेकिन वंशवाद का दखल इसमें रोड़े अटकाता दिख रहा है। परिवारवाद की यह प्रवृत्ति अनैतिकता एवं भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है। युवा वोटर रक्षिता पाण्डे कहती हैं कि शक्ति एवं धन का एक सीमित जगह पर संचय होना लोकतंत्र के कमजोर लक्षण को प्रदर्शित करता है। कहां तो राजनीति को राज्य हित में प्रतिस्पर्धी होनी था, लेकिन यह राजनीतिक पूंजी चंद हाथों में सिमटकर रह गई। प्रदेश की पांचों सीटों पर खड़े उम्मीदवारों का भविष्य अब ईवीएम में कैद हो गया है लेकिन इस पूरे चुनावों में स्टार प्रचारकों ने भी अपनी सभाओं में वंशवाद को लेकर सवाल खड़े किए थे। वंशवाद के सवाल पर राजनीतिक जानकार डॉ. प्रमोद कुमार कहते हैं कि क्या राजनीतिक परिवार ही बेहतर नेतृत्वकर्ता हो सकता है? विचारधारा, नेतृत्व और संगठनात्मक चीजें राजनीतिक दलों से हाशिए पर क्यों जा रही हैं? जब राजनीतिक दल खुद ही सिद्धांत विहीन हों तो वह राज्य को नई दिशा कैसे दे सकते हैं? क्या यह एक तरह से राजशाही की तरफ बढ़ते कदम नहीं हैं? राजनीति में बढ़ता परिवार मोह क्या सांमतशाही का प्रतीक नहीं है?

इस तरह के सवाल आज प्रदेश की बदलती राजनीति को लेकर उठाए जा रहे हैं। इसका दूरगामी असर क्या होगा, यह तो अभी देखना बाकी है, लेकिन तात्कालिक असर यह देखने में आ रहा है कि तमाम दलों से जुड़े कार्यकर्ता पार्टी की विचारधरा और जनता के मुद्दों से दूर अपनी निष्ठाओं को खास राजनीतिक परिवारों की तरफ मोड़ रहे हैं। 9 नवम्बर 2000 को जब उत्तराखण्ड राज्य अस्तित्व में आया तो उम्मीद थी कि यहां राजनीति एवं विकास की ऐसी पटकथा लिखी जाएगी जो पूरे देश के लिए मिसाल बनेगी। राजनीतिक विषमताओं से पटी राजनीति से दूर एक अलग तरह की राजनीति यहां देखने को मिलेगी। लेकिन पिछले 18 साल का इतिहास बताता है कि यह प्रदेश भी वंशवाद की राजनीति में ऐसा उलझ गया जहां पर योग्यतम की उत्तरजीविता के लिए कोई स्थान बाकी नहीं रह गया। राजनीतिक विश्लेषकों की यह चिंता जायज दिखती है कि प्रदेश में तेजी से पनप रही वंशवाद की यह बेल आने वाले समय में यहां के राजनीतिक परिदृश्य को इस कदर बदलेगी कि जहां राजनीति में वैचारिकता एवं सिद्धांतों से जुड़े निष्ठावान कार्यकर्ताओं के पास सिर्फ पारिवारिक निष्ठाओं को ढोने के सिवाय दूसरा कोई काम नहीं होगा। ऐसा नहीं कि राजनीतिक परिवारों से आने वाले युवाओं के अंदर प्रतिभा नहीं है या फिर वे योग्य नहीं हैं लेकिन पारिवारिक साख की वजह से वे बगैर संघर्ष किए राजनीति में स्थापित हो जाते हैं। जो वर्षों से पार्टियों से जुड़े हैं। राजनीति में कुछ कर गुजरने की महत्वाकांक्षा रखते हैं उनके लिए ऐसे वातावरण में अपना स्थान बना पाना कठिन हो जाता है। कहीं न कहीं उनके राजनीतिक भविष्य को समाप्त कर देती है।

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