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सात दशक से टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन की मांग कर रही क्षेत्रीय जनता इन दिनों फिर जिला मुख्यालय के समक्ष क्रमिक अनशन पर है। जनता का आक्रोश अब उसे दिल्ली में आंदोलन के लिए विवश कर रहा है

टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन निर्माण की मांग को लेकर विगत एक पखवाड़े से अधिक समय से बागेश्वर जिला मुख्यालय में क्षेत्रीय जनता अनिश्चित कालीन क्रमिक अनशन पर बैठी है। अनशन एवं आंदोलन की यह प्रक्रिया दशकों से चली आ रही है। जनता को लगता है कि अगर यहां पर रेल आ जाए तो यातायात की सुगम व्यवस्था होगी और क्षेत्रीय विकास भी तेजी के साथ होगा। लेकिन सच यह है कि आजादी के बाद से उत्तराखंड में रेल-रेल का शोरगुल तो खूब हुआ, लेकिन विगत सात दशक में प्रदेश में एक किमी भी रेल लाइन का निर्माण नहीं हो पाया। पिछले 71 सालों से हर रेल बजट पर लोगों की उम्मीदें टिकी रही, लेकिन सिवाय नाउम्मीदी के कुछ हाथ नहीं लगा।
प्रदेश में विगत वर्ष रेलवे विकास के लिए रेल मंत्रालय एवं सरकार के बीच संयुक्त वेंचर कंपनी गठित करने का निर्णय हुआ था। लेकिन इस तरपफ भी कोई खास पहल नहीं हो पाई।

प्रदेश के रेल विकास पर नजर डालें तो ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन एवं देहरादून-कालसी रेल लाइन के सर्वे के लिए धन आवंटन तो हुआ लेकिन टनकपुर-बागेश्वर, टनकपुर-जौलजीवी, रामनगर-चौखुटिया, हरिद्वार-कोटद्वार-रामनगर, रामनगर- चौखुटिया-गैरसैंण, ऋषिकेश-डोईवाला, टनकपुर-जागेश्वर जैसी महत्वपूर्ण रेल लाइनों के निर्माण को लेकर अभी तक सिर्फ बयानबाजी ही हुई है। सवाल यह उठ रहा है कि जब पूर्वोत्तर एवं जम्मू जैसे पर्वतीय राज्यों के साथ ही पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश में रेल लाइनों का बेहतर निर्माण हो सकता है तो फिर पर्यटन एवं सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहे उत्तराखण्ड प्रदेश में रेल लाइनों का निर्माण क्यों नहीं? इन सबके बीच टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन के निर्माण की मांग करने वालों का तर्क है कि ऋषिकेश- कर्णप्रयाग रेल लाइन के लिए बजट तो स्वीकøत हो गया लेकिन उससे पहले सन् 1882 में प्रस्तावित हुई टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन की अनदेखी क्यों की जा रही है? जबकि इस रेल लाइन का वर्ष 1912 में अंग्रेजों के समय में सर्वे हो चुका है। बताया जाता है कि वर्ष 1980 में जब तत्कालीन प्रधनमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी बागेश्वर आई थीं तो उन्होंने भी लोगों को इस रेल लाइन निर्माण का भरोसा दिलाया था। उल्लेखनीय है कि जब लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री थे तो उन्होंने इसे राष्ट्रीय महत्व का तो बताया, लेकिन इस रेल परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए काम नहीं किया।

बागेश्वर जिले में रेल लाइन के लिए अंग्रेजी शासनकाल से अब तक पांच बार सर्वे हो चुका है। वर्ष 1902 में जब इस परियोजना पर काम शुरू करने की दृष्टि से सर्वे कराया गया तो इसका दूरी 155 किमी तय कर दी गई थी। बाद में हुए सर्वे में यह दूरी 110 किमी रह गई। आजाद भारत में 2006, 2007 एवं 2010 में इसका सर्वे तो हुआ लेकिन रेल लाइन के निर्माण के लिए धनावंटन करने में केंद्र सरकार कंजूसी बरतती रही। इस रेल लाइन के लिए जब वर्ष 2007-08 में डीपीआर बनी तो उनमें यहां की मिट्टी को रेल लाइन के हिसाब से खरा नहीं बताया गया तब से यह डीपीआर फिलहाल ठंडे बस्ते में है। चंपावत, बागेश्वर, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा में जनसंपर्क के बाद स्वतंत्रता दिवस के दिन से टनकपुर-बागेश्वर, टनकपुर जौलजीवी रेल मार्ग को लेकर आंदोलन हो रहा है और जल्द ही इसको लेकर जंतर-मंतर में आंदोलन करने की तैयारी भी चल रही है। क्षेत्रीय जनता का आरोप है कि अंग्रेजों के समय में तो फिर भी काम हुआ, लेकिन आजाद भारत में इसकी घोर उपेक्षा हुई। लोग इस उम्मीद के साथ सालों-साल से अनशन एवं आंदोलन कर रहे हैं कि देर से ही सही कभी न कभी केंद्र सरकार क्षेत्र में रोजगार, पर्यटन एवं व्यापार की दृष्टि से इस रेल लाइन के निर्माण के लिए धन अवश्य आवंटित करेगी।

भारत-नेपाल सीमा से गुजर कर निकलने वाली इस प्रस्तावित रेल लाइन पर अब पंचेश्वर बांध बनने की सुगबुगाहट के बीच इसके बनने की संभावनाओं पर सवाल उठ रहे हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि इस रेल निर्माण मार्ग में काली व शारदा नदी किनारे की 67 किमी भूमि आती है जहां से इस रेल लाइन को बनना है लेकिन जो अब डूब क्षेत्र का हिस्सा है। इस रेल मार्ग के निर्माण की मांग को लेकर इधर टनकपुर में भी टनकपुर-बागेश्वर रेलपथ निर्माण संघर्ष समिति का गठन किया गया है जो इस रेल लाइन के निर्माण के साथ ही टनकपुर के विभिन्न रूटों पर चलने वाली ट्रेनों का नामकरण पूर्णागिरी एक्सप्रेस, कुमाऊं-एक्सप्रेस के नाम करने, बड़ी लाइन से ट्रेनों का संचालन करने की मांग को लेकर लगातार संघर्षरत रही है। टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन को लेकर भले ही काम नहीं हो पा रहा हो, लेकिन प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत कुमाऊं मंडल के टनकपुर से जागेश्वर धाम के लिए नई रेलवे योजना बनाने की बात अवश्य कर रहे हैं। बकायदा इसके लिए मुख्यमंत्री की तरफ से केंद्रीय रेल मंत्री को पूर्व में टनकपुर- पिथौरागढ़-बागेश्वर एवं रामनगर-चौखुटिया रेल मार्ग स्वीकøत करने के संबंध में ज्ञापन सौंपा गया है। लेकिन उत्तराखण्ड में रेल परियोजनाओं पर काम नहीं के बराबर हो पा रहा है। महत्वपूर्ण माने जाने वाली रामनगर-चौखुटिया रेल लाइन आज भी सपना बनी हुई है। रामनगर से चौखुटिया की दूरी 123 किमी है, अगर रेल मार्ग बनता है तो रेलवे की एक पूर्व सर्वे के अनुसार यह दूरी 45 किमी रह जाएगी। इस रेल मार्ग के बनने से गैरसैंण जिसे स्थाई राजधानी बनाने की बात उठती रही है तक पहुंच आसान हो जाएगी। प्रदेश के लिहाज से ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे प्रोजेक्ट से अवश्य आश जगी है। अगर समय पर इस योजना का निर्माण हो जाता है तो इससे न्यू ऋषिकेश, शिवपुरी, व्यासी, सौड़, मलेथा, श्रीनगर, धारी, तिलनी, घोलतीर, गोचर एवं सेवई जहां से इसे होकर गुजरना है कि जनता को बेहतर लाभ मिल पाएगा। लेकिन सवाल यह कि समय पर यह रेल परियोजना पूर्ण हो जाए।

 

टनकपुर-बागेश्वर रेल मार्ग की मांग पिछले तीन दशकों से अधिक समय से की जा रही है, लेकिन सरकारें इसमें ध्यान नहीं दे पा रही हैं। रेल लाइन के जुड़ने से पहाड़ों में तेजी से विकास होगा। रोजगार एवं पर्यटन को फायदा पहुंचेगा। रेल लाइन निर्माण को लेकर दशकों से चला आ रहा हमारा संघर्ष लगातार जारी रहेगा।
नीमा दफौटी, अध्यक्ष रेल संघर्ष समिति

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