Uttarakhand

सरकारी राजस्व पर डाका

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के विधानसभा क्षेत्र डोईवाला में खनन माफिया खुलेआम हाईकोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ाकर सरकार को करोड़ों के राजस्व का चूना लगाते आ रहे हैं। लेकिन शासन-प्रशासन और संबंधित विभाग आंख मूंदकर बैठे हुए हैं। आश्चर्यजनक तो यह है कि हाईकोर्ट के आदेश को दबाकर माफिया को खनन सामग्री लूटने की छूट दी गई। नदियों में खनन पर प्रतिबंध के बावजूद बड़ी संख्या में भंडारण और क्रेशरों के लाइसेंस बांटे गए। नियम विरुद्ध कृषि में उपयोग होने वाले टै्रक्टरों को खनन की अनुमति दे दी गई। ऐसे में संदेह उठना स्वाभाविक है कि अवैध खनन को कहीं न कहीं सरकारी संरक्षण प्राप्त है। मुख्यमंत्री के विशेष कार्याधिकारी धीरेंद्र पंवार को लोग कटघरे में खड़ा करते रहे हैं

किसी कीमती चीज को अगर कोई चुपचाप चुरा ले तो सामान्य तौर पर उसे चोरी कहा जाता है। लेकिन अगर उसी चीज को सुनियोजित मिलीभगत से चुराने का काम किया जाये तो उसे डकैती कहा जाता है। ठीक इसी तरह से मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के विधानसभा क्षेत्र डोईवाला में सरकारी राजस्व पर सुनियोजित तरीके से डकैती डाली जा रही है। इससे जहां एक ओर सरकार को करोड़ों का चूना लग रहा है, वहीं पर्यावरण को बड़ा नुकसान पहुंचाया जा रहा है। हैरत की बात यह है कि इस तरह की लूट और डकैती को शासन-प्रशासन का पूरा सहयोग मिल रहा है, जबकि राज्य में किसी भी प्रकार के अवैध और अवैज्ञानिक तरीके के खनन पर पूरी तरह से रोक है। डोईवाला में सौंग और सुसवा नदी में निरंतर अवैध खनन चल रहा है। डोईवाला मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत का विधानसभा क्षेत्र है।

राजनीतिक तौर पर डोईवाला बीआईपी विधानसभा सीट मानी जाती है। राज्य बनने के बाद त्रिवेंद्र रावत दो बार डोईवाला से विधायक रहे हैं। इसी डोईवाला में सौंग, जाखण और सुसवा नदी खनन के लिए बेहद मुफीद मानी जाती हैं। हालांकि प्रतिवर्ष लाखों घन मीटर खनन इन नदियों में किया जाता है। लेकिन वर्तमान में सुसवा नदी अवैध खनन से कराह उठी है। नदी से जमकर प्राकøतिक संसाधनों को लूटा जा रहा है। मुख्यमंत्री, प्रमुख सचिव राजस्व ओैर जिलाधिकारी देहरादून को इसकी जानकारी होने के बावजूद इस पर किसी भी तरह की रोक नहीं लगाई जा रही है। सरकारी मशीनरी की उदासीनता का आलम यहां तक है कि दिन दहाड़े टै्रक्टरों द्वारा अवैध खनन किया जा रहा है, जबकि राज्य में खनन के लिए कøषि ट्रैक्टरां पर पूरी तरह से रोक है। अधिवक्ता और पर्यावरण प्रेमी विरेंद्र पेगवाल ने डोईवाला में हो रहे अवैध खनन को लेकर मुख्यमंत्री के साथ-साथ प्रमुख सचिव राजस्व तथा जिलाधिकारी को कई बार शिकायत की, लेकिन शासन-प्रशासन ने कोई कार्यवाही नहीं की। मजबूरी में उन्होंने नैनीताल हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की।

26 अक्टूबर 2018 को हाईकोर्ट ने विरेंद्र पेगवाल की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए डोईवाला में हर प्रकार के खनन पर रोक लगाई। कोर्ट ने अवैध खनन रोकने के लिए जिलाधिकारी को आदेश दिया। हाईकोर्ट ने आपने आदेश में साफ किया कि किसी भी प्रकार का खनन होने पर जिलाधिकारी और खनन अधिकारी दोषी माने जाएंगे। कोर्ट ने किसी भी प्रकार के रिवर बैड मैटिरियल यानी आरबीएम को ट्रैक्टर में ले जाने पर भी पूरी तरह से रोक लगाई। आरबीएम ले जाते ट्रैक्टरों को सीज करने के आदेश भी जारी किए।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद डोईवाला में खनन पर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए थी, लेकिन प्रशासन ने अवैध खनन कारोबारियां के हित में एक माह तक इस आदेश को दबा दिया। विरेंद्र पेगवाल ने जिलाधिकारी को इस आदेश की कॉपी भेजी तब जाकर उन्हें खनन पर रोक लगाने के आदेश देने पड़े। इससे साफ है कि डोईवाला में अवैध खनन को शासन-प्रशासन का पूरा संरक्षण है या फिर वह इसे नजरअंदाज करता रहा।

डोईवाला क्षेत्र में सौंग नदी पर वर्ष 1999 से खनन पर रोक लगी हुई है। इसी तरह जाखण नदी का आधा हिस्सा वन क्षेत्र के अंतर्गत आता है जिस पर वन विभाग वन अधिनियम के तहत नियमित और वैज्ञानिक तरीके से खनन की अनुमति देता है। सुसवा नदी पूरी तरह वन क्षेत्र के तहत आती है। इस नदी पर खनन प्रतिबंधित है। यहां तक कि नदी पर खनन के लाइसेंस तक जारी नहीं हो सकते, लेकिन करोड़ां घन मीटर की खनन सामग्री खनन कारोबरियों को लुभाती रही है। माना जाता है कि डोईवाला क्षेत्र की नदियों की रेत और बजरी निर्माण कार्यों के लिए सबसे बेहतर है। इसके चलते इन नदियों में जमकर अवैध खनन होता रहा है। हालत यह है कि डोईवाला में सौ के करीब खनन भंडारण के लाइसेंस हुए हैं। दर्जनों क्रेशरों के लाइसेंस भी बांटे गए हैं। जबकि क्षेत्र में बहने वाले तीनों ही नदियों में खनन पर रोक लगी हुई है।

ऐसा नहीं है कि खनन पर रोक लगाए जाने के प्रयास पहली बार हुए हैं। वर्ष 1999 में विरेंद्र पेगवाल और स्थानीय जनता ने सौंग नदी पर हो रहे खनन को रोकने के लिए बड़ा भारी आंदोलन किया था। जिसके चलते तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने सौंग नदी में खनन पर पूरी तरह से रोक लगा दी। यह रोक पृथक उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद आज तक जारी है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब तीनों नदियों में खनन पर रोक लगी हुई है तो किस आधार पर शासन-प्रशासन द्वारा खनन भंडारण के लिए तकरीबन सौ लाइसेंस बांटे गए? साथ ही चार दर्जन क्रेशर के लाइसेंस भी जारी किए गए हैं। जहिर है कि भंडारण केंद्रों में इन तीनों ही नदियों से अवैध खनन करके खनन सामग्री का भंडारण किया जाता है। विरेंद्र पेगवाल का कहना है कि अगर सभी खनन कारोबारियों की सीबीआई जांच हो जाए तो वे जेलों में होंगे। कारण कि इनके द्वारा फर्जी रवन्ने बनाकर सौंग, जाखण और सुसवा नदी से अवैध खनन सामग्री का भंडारण किया जाता है। यह काम नकद में होता है और खनन विभाग रवन्ना ऑनलाईन जारी करता है जिसमें नकदी का कोई सवाल ही नहीं है। एक तरह से यह कालेधन का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है।


सूत्रों की मानें तो डोईवाला में बडै पैमाने पर अवैध खनन को राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है। पूर्ववर्ती हरीश रावत सरकार के समय में भी तीनों नदियों से जमकर अवैध खनन किया जाता रहा। जब राज्य में एक माह का राष्ट्रपति शासन लगा तब इस पर रोक लगाई जा सकी। लेकिन भाजपा सरकार के समय में तो जिस तरह से सौ के करीब खनिज और उपखनिज भंडारण के लाइसेंस बांटे गए हैं उससे यह साफ हो गया कि इस क्षेत्र में अवैध खनन कारोबारियों के हितां के लिए लाइसेंस हुए हैं।

खनन को राजनीतिक संरक्षण का आरोप कहां तक सच है, इसका तो कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है। लेकिन खनन करोबारियों को फायदा पहुंचाने में मुख्यमंत्री के ओएसडी धीरेंद्र पंवार की भूमिका पर कई सवाल खड़े होते रहे हैं। माना जाता है कि भाजपा के करीबी खनन कारोबारियां पर कार्यवाही न करने के आदेश सत्ता और शासन में बैठे कुछ लोगां द्वारा मौखिक तौर पर हुए हैं जिसके चलते आज तक डोईवाला क्षेत्र में अवैध खनन बदस्तूर जारी है।

बताया जाता है कि मुख्यमत्री त्रिवेंद्र रावत के ओएसडी धीरेंद्र पंवार द्वारा तकरीबन छह माह पूर्व कøषि कार्यों के लिए पंजीकøत ट्रैक्टरों के जरिए खनन सामग्री ले जाए जाने की अनुमति का आदेश वन निगम से जारी करवाया गया था। जबकि खेती के प्रयोग में पंजीकøत ट्रैक्टरों से किसी भी प्रकार का व्यावसायिक ढुलान प्रतिबंधित है। यहां तक कि उसमें रेता-बजरी तक नहीं ले जाया जा सकता है। इसके बावजूद धीरेंद्र पंवार के दबाब में वन निगम ने ऐसा आदेश जारी कर दिया। इससे इस आरोप को बल मिलता है कि डोईवाला में खनन के अवैध करोबार को कहीं न कहीं सरकारी सरंक्षण मिला हुआ है। वन निगम के इस आदेश का भारी विरोध हुआ तो कुछ समय के बाद इस आदेश को वापस ले लिया गया।

यह भी गौर करने वाली बात है कि भले ही वन निगम ने अपने इस आदेश को वापस ले लिया है, लेकिन आज तक इस पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है। आज भी दिन दहाड़े सुसवा नदी और अन्य स्थानों पर ट्रैक्टरां से जमकर अवैध खनन किया जा रहा है। ‘दि संडे पोस्ट’ के पास स्पष्ट साक्ष्य हैं कि सुसवा नदी में दिन दहाड़े ट्रैक्टरों के जरिए खनिज संपदा को लूटा जा रहा है। नदियां से खनन सामग्री को ट्रैक्टरों द्वारा नगर के भंडारण केंद्रों में लाया जाता है जिसको देखने की फुर्सत न तो तहसील प्रशासन को है और न पुलिस विभाग ने ही कोई प्रयास किए हैं। यहां तक कि वन विभाग तो खनन रोकने के बजाए सुसवा नदी को पार्क क्षेत्र से बाहर होने की बात कहकर अपना पल्ला झाड़ रहा है।

आज पूरे डोईवाला क्षेत्र में सौंग सुसवा और जाखण नदी को देखकर पता चल जाता है कि प्रतिबंध के बावजूद इन नदियों को किस हद तक अवैध खनन से छलनी किया जा रहा है। कई-कई फिट गहरे गढ्ढे इन नदियों में बन चुके हैं। सुसवा नदी के हालात सबसे ज्यादा खराब हैं। रेता, बजरी, पत्थरों के बाद अब नदी से मिट्टी का अवैध खनन किया जा रहा है।

अधिवक्ता और समाजसेवी विरेंद्र पेगवाल के प्रयासों से इन नदियों में खनन के काले करोबार पर हाईकोर्ट ने रोक लगाई, लेकिन शासन-प्रशासन के अलावा अन्य सक्षम अधिकारियों द्वारा एक माह तक हाईकोर्ट के आदेश को दबा के रखा गया जिससे अवैध खनन के करोबारियों को फायदा पहुंचा। विरेंद्र पेगवाल इससे खासे खिन्न हैं और वे जल्द ही इस पर हाईकोर्ट में अवमानना का वाद दायर करने वाले हैं। अगर ऐसा हुआ तो शासन- प्रशासन के कई अधिकारी इसकी जद में आ सकते हैं।


अब वन विभाग की बात करें तो विभाग अपनी जिम्मदारी से हमेशा बचता रहा है। सुसवा नदी देहरादून से दूधली गांव तक महज 15 किमी के क्षेत्र में राजाजी नेशनल पार्क की सीमा में बहती है। दूधली से डोईवाला क्षेत्र में सौंग नदी तक संगम क्षेत्र में यह नदी देहरादून वन प्रभाग के लच्छी वाला रेंज के तहत आती है। लेकिन जब जब सुसवा पर अवैध खनन की शिकायतें दी जाती हैं तो देहरादून वन प्रभाग नदी को राजाजी नेशनल पार्क के आधीन बताकर अपना पल्ला झाड़ देता है। ‘दि संडे पोस्ट’ ने राजाजी नेशनल पार्क के निदेशक सनातन से इस बारे में जानकारी ली तो उन्होंने किसी भी बात का जबाब नहीं दिया, लेकिन इतना अवश्य कहा कि सुसवा राजाजी नेशनल पार्क में नहीं आती है। यह कहकर उन्होंने टेलीफोन रख दिया। इससे संदेह हो रहा है कि सुसवा नदी पर अवैध खनन को लेकर प्रशासनिक मशीनरी में कुछ न कुछ जरूर पक रहा है। जिसकी पर्देदारी बनाई जा रही है। माना जा रहा है कि सुसवा नदी पर वर्षों से हो रहे अवैध खनन को राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है जिसके चलते राजाजी पार्क और देहरादून वन प्रभाग दोनों ही एक दूसरे के सिर ठीकरा फोड़ रहे हैं। इस संबध में देहरादून वन प्रभाग के डीएफओ से ‘दि संडे पोस्ट’ द्वारा डोईवाला में हो रहे अवैध खनन को लेकर बात करने का प्रयास किया गया। इसके लिए एक मोबाइल संदेश भी दिया गया, लेकिन डीएफओ द्वारा कोई जबाब नहीं दिया जा रहा है।

इसी तरह खनन को राजनीतिक सरंक्षण को लेकर मुख्यमंत्री के ओएसडी धीरेंद्र पंवार से उनके टेलीफोन नंबर पर पर बात की गई, तो पहले उन्होंने किसी प्रकार का अवैध खनन होने से इंकार किया। लेकिन जब उनसे खेती में पंजीकøत ट्रैक्टरों को खनन के उपयोग की अनुमति देने के बारे में पूछा गया तो उन्हांने चुप्पी साध ली। सिर्फ इतना ही कहा कि हाईकोर्ट ने उक्त आदेश पर भी रोक लगा दी है जबकि उक्त आदेश पर रोक भारी विरोध के चलते स्वयं वन निगम द्वारा लगाई गई है।

जिला प्रशासन और खनन विभाग तो डोईवाला में अवैध खनन को ही सिरे से नकार रहा है। क्षेत्रीय खनन अधिकारी कुंदन सिंह सैलाल भी किसी बात का जबाब देने से बचते रहे हैं। तहसीलदार से पूछने पर वे चुप्पी साध रहे हैं। जबकि डोईवाला में अवैध खनन जमकर हर दिन हो रहा है। रात को डोईवाला में सौंग और सुसवा नदी में अवैध खनन के कारोबारियों द्वारा जमकर मनमानी की जा रही है। 10 दिसंबर की देर रात को डोईवाला बाजार में एक अवैध खनन के डंपर से एक स्कूटी चालक की कुचल कर मौत होने के बावजूद न तो पुलिस-प्रशासन और न ही जिला प्रशासन चेत रहा है। उपजिलाधिकारी साफ कह रही हैं कि डोईवाला में कोई अवैध खनन नहीं हो रहा है। अब देखना है कि उप जिलाधिकारी एक व्यक्ति की मौत जो कि खनन के डंपर से हुई है, उस पर क्या जबाब देती हैं, क्योंकि हाईकोर्ट ने तो हर प्रकार के खनन पर पूरी तरह से रोक लगाई हुई है।

 

खनन कारोबारी को मुख्यमंत्री की चिंता

खनन के करोबारी सरकार और खास तौर पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के प्रति अपना मोह नहीं छुपा पा रहे हैं। खनन का करोबार करने वाले ऑपरेटरों की संस्था के अध्यक्ष सीधे तौर पर मुख्यमंत्री के पक्ष में कानूनी कार्यवाही करवाने की कोशिश में पीछे नहीं रहे हैं। प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत की कार्यशैली पर ‘झांपू बोड़ा’ नाम से गढ़वाली गीत रिलीज हुआ तो इससे नाराज होकर रेता-बजरी सप्लायर यूनियन के अध्यक्ष और रेता-बजरी कारोबारी अनिल पाण्डे द्वारा गीत का विरोध किया गया। उन्होंने गीत को मुख्यमंत्री को अपमानित करने का प्रयास करार दिया। इसके खिलाफ नेहरू कॉलोनी थाने में एक तहरीर तक दी गई थी। तहरीर में कहा गया कि गीत में प्रदेश के मुख्यमंत्री की फोटो लगाकर उनकी छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया। प्रदेश सरकार के खिलाफ व्यंग्य कसने वाले इस गीत में साफ तौर मुख्यमंत्री को निशाना बनाया गया। इसके बावजूद भाजपा के किसी नेता, संगठन के किसी पदाधिकारी या फिर भाजपा के आईटी विशेषज्ञों द्वारा कोई कानूनी कार्यवाही करने का कदम नहीं उठाया गया। लेकिन एक खनन करोबारी द्वारा त्वरित गति से गायक और अन्य लोगां के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के लिए थाने में तहरीर दी गई। इससे सवाल खड़े होना लाजमी है कि आखिर एक खनन करोबारी द्वारा ऐसा कदम क्यों उठाया गया?

गौर करने वाली बात यह भी है कि अप्रैल माह में सरकार ने राज्यभर में अवैध खनन पर कड़ी कार्रवाई की तो अनिल पाण्डे नामक व्यक्ति रेता-बजरी ढुलान करने वाले ट्रक ऑपरेटरों के साथ मुखर होकर सरकार को गरियाने में सबसे आगे रहा। सोशल मीडिया में अनिल पाण्डे का एक वीडियो खासा चर्चा में रहा। इसमें वह प्रदेश में अंधेरगर्दी की बात कहकर सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन करने की बात कह रहा था। लेकिन कुछ ही माह में अचानक अनिल पाण्डे का हृदय परिवर्तन हुआ और वह गायक के खिलाफ मुकदमा दायर करवाने पहुंच गया।

 

बात अपनी-अपनी

सुसवा नदी पार्क क्षेत्र से बाहर है।
सनातन, निदेशक राजाजी नेशनल पार्क

मैं आउट ऑफ स्टेशन हूं। आप तहसीलदार और एसडीएम से फोन करके पूछिए। मैं अभी इस पर कुछ नहीं बता सकता।
कुंदन सिंह सेलाल, क्षेत्रीय खनन अधिकारी डोईवाला

सुसवा नदी सिविल और ग्राम क्षेत्र में आती है जिस पर राजस्व विभाग का अधिकार है। अगर खनन हो रहा है तो इस मामले में एसडीएम प्रशासन और राजस्व विभाग से पूछें।
राजीव धीमान, प्रभागीय वन अधिकारी देहरादून वन प्रभाग

आपको किस स्थान पर खनन होता दिखाई दिया यह मैं नहीं कह सकती। हम प्रतिदिन राउंड लगाते हैं और कार्यवाही कर रहे हैं। अभी हमने कई ट्रकों को पकड़ा है। अगर कोई ऐसा मामला हमारे संज्ञान में आएगा तो कार्यवाही करेंगे।
कुसुम चौहान, उपजिलाधिकारी डोईवाला

डोईवाला में कहां खनन हो रहा है साहब, हमने तो पूरी तरह से रोक लगा दी है। खेती में उपयोग ट्रैक्टरां पर तो अब हाईकोर्ट ने भी रोक लगा दी है। कहीं कोई खनन नहीं हो रहा है। आप बता रहे हैं कि आपके पास फोटोग्राफ हैं तो मुझे भेजिए।
धीरेंद्र पंवार, ओएसडी मुख्यमंत्री

सौंग, जाखण औेर सुसवा नदी पर खनन पहले से ही प्रतिबंधित है। 1999 में हमारे प्रयासों से नदी में खनन पर रोक लगाई गई जो आज तक जारी है। जाखण में कुछ ही हिस्से में खनन होता है जो वन विभाग करवाता है। सुसवा नदी तो राजाजी पार्क में है। इन तीनों ही नदियों में कई वर्षों से निरंतर अवैध खनन चल रहा है। कांग्रेस सरकार के समय इस पर रोक भी लगी थी। लेकिन भाजपा सरकार के आते ही सौ लाइसेंस खनिज भण्डारण और क्रेशरों के दे दिए गए। जब खनन ही नहीं है तो खनिज का भंडारण कैसे हो रहा है, यह सवाल सरकार से पूछना चाहिए। खनन को सरकार और प्रशासन का पूरा संरक्षण है। जिससे रोज अवैध खनन हो रहा है। इसके लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार जिला प्रशासन, तहसीलदार और एसडीएम हैं जिनके सरंक्षण में यह काम हो रहा है। मैं जल्द ही हाईकोर्ट में इसके खिलाफ अवमानना की याचिका दायर करने वाला हूं। हाईकोर्ट तक को ये अधिकारी कुछ नहीं समझ रहे हैं। अब हाईकोर्ट ही इन पर कार्यवाही करेगा।
विरेंद्र पेगवाल, अधिवक्ता

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