राज्य की पांचों लोकसभा सीटें जीतने का दावा कर रही कांग्रेस में कलह चरम पर है। पार्टी नेता एक-दूसरे को ठिकाने लगाने की कोई कोशिश नहीं छोड़ रहे हैं। विरोधी गुटों के नेताओं को कमजोर करने के लिए उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को पार्टी में शामिल किया जा रहा है। कारोबारी मोहन काला को पार्टी में शामिल किए जाने पर गणेश गोदियाल को नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश के खिलाफ मोर्चा तक खोलना पड़ा। हरीश रावत समर्थक गोदियाल ने तीव्र विरोध जताया तो पार्टी संगठन को अपने फैसले से यू टर्न लेना पड़ा। पूर्व में भीमलाल आर्य को पार्टी में शामिल किए जाने पर भी प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष सरिता आर्य ने इंदिरा हृदयेश के खिलाफ खुलेआम नाराजगी जाहिर की थी
प्र देश की पांचां लोकसभा सीटां पर जीत हासिल करने के बड़े-बड़े दावे करने वाली कांग्रेस के हालात बेहद खराब हैं। पार्टी नेताओं की एक-दूसरे को ठिकाने लगाने की नीति के चलते आम कार्यकर्ता निराश हैं। खेमों में बंटे कांग्रेस नेता विरेधियों को घेरने के लिए अपने समर्थकों के जरिए मोर्चे खुलवा रहे हैं। वार एवं पलटवार का सिलसिला चल रहा है। ऐसे में प्रदेश संगठन इतना असहाय हो चुका है कि अपने निर्णयों से खुद ही पीछे हट रहा है। इससे कांग्रेस की जनता में साख कमजोर हो रही है। प्रदेश संगठन की ताकत पर स्वयं कांग्रेस कार्यकर्ता ही सवाल खड़े कर रहे हैं। राज्य के राजनीतिक इतिहास में शायद पहली बार कांग्रेस संगठन इतना कमजोर और असहाय दिखाई दिया है।
हाल ही में श्रीनगर के कारोबारी मोहन काला को कांग्रेस में शामिल किए जाने के प्रकरण से साफ है कि कांग्रेस पहले तो गलत निर्णय लेता है और फिर उस निर्णय को लागू करवाने में भी अक्षम साबित हो जाता है। पूर्व विधायक गणेश गोदियाल के प्रबल विरोधी और उनके खिलाफ विधानसभा चुनाव लड़ने वाले मोहन काला को कांग्रेस में शामिल किये जाने को लेकर गोदियाल इस कदर नाराज हुए कि कांग्रेस को अपने ही निर्णय से पीछे हटना पड़ा। इस पूरे प्रकरण को गहराई में देखा जाए तो इसके पीछे कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई का ही असर रहा है। दरअसल, गणेश गोदियाल हरीश रावत समर्थक माने जाते हैं। पूर्व में हरीश रावत सरकार से नाराज होकर जब 9 कांग्रेसी विधायकों ने भाजपा का दामन थामा था तो तब गोदियाल तमाम दबाब के बावजूद हरीश रावत के साथ खड़े रहे। उन्होंने कांग्रेस का दामन नहीं छोड़ा। गोदियाल के बारे में माना जाता था कि वे पूर्व कांग्रेसी नेता सतपाल महाराज खेमे के हैं। लेकिन जब महाराज भाजपा में शामिल हो गए और हरीश रावत सरकार के दौरान भाजपा व कांग्रेस के बीच संक्रमण काल चल रहा था तो तब उन्होंने कांग्रेस पर अपना विश्वास जताया। सतपाल महाराज से नाता तोड़ कर वे हरीश रावत खेमे में आ गए।
मोहन काला श्रीनगर से निर्दलीय विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं। माना जाता है कि गणेश गोदियाल को चुनाव हरवाने में मोहन काला का बड़ा हाथ था। इसी वजह से गोदियाल और काला के बीच राजनीतिक शत्रुता बनी हुई है। यह जानते हुए भी कांग्रेस ने मोहन काला को पार्टी में शामिल कर लिया। इसमें दिलचस्प यह है कि मोहन काला को देहरादून के बजाए दिल्ली में राज्य प्रभारी अनुग्रह नारायण सिंह की मौजूदगी में प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदेश ने कांग्रेस में शामिल करवाया। लेकिन इसकी गणेश गोदियाल को कोई जानकारी नहीं दी गई। यही बात गोदियाल को चुभ गई और उन्होंने तत्काल प्रदेश कांग्रेस संगठन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। गोदियाल ने अपने विरोध का पूरा  फोकस नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदेश पर रखा और उन पर कांग्रेस को खोखला करने के आरोप लगाए। उन्होंने कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं तक अपना विरोध दर्ज करवा दिया।
 गोदियाल के विरोधी तेवरों के बाद कांग्रेस पूरी तरह से बैकफुट पर आ गई। नतीजा यह हुआ कि पार्टी को बयान जारी करना पड़ा कि मोहन काला कांग्रेस में शामिल नहीं हुए हैं। उन्हें कांग्रेस में शामिल करने के लिए विचार किया जा रहा है। कुछ इसी तरह का प्रकरण पहले भी हुआ था। तब प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष सरिता आर्य के विरोधी भीम आर्य को सरिता के भारी विरोध के बावजूद पार्टी में शामिल किया गया। इस पर सरिता आर्य ने सार्वजनिक तौर पर प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ने तक की धमकी दे डाली थी। हालांकि बाद में उन्हें पार्टी ने बड़ी मुश्किल से मनाया। भीम आर्य को कांग्रेस में शामिल करवाने के पीछे भी इदिरा हृदेश का ही हाथ बताया जाता है। स्वयं सरिता आर्य का कहना है कि इंदिरा हृदेश हर हालत में भीम आर्य को कांग्रेस में शामिल करवाने के लिए जोर लगा रही थीं। लेकिन इसके लिए उनसे किसी प्रकार की सलाह नहीं ली गई। यहां तक कि जब वे कांग्रेस पार्टी के सम्मेलन में गुजरात दौरे पर जा रही थीं तब उन्होंने इंदिरा हृदेश से अनुरोध किया था कि अगर भीम आर्य को कांग्रेस में शामिल करना ही है तो उनकी मौजूदगी में किया जाए। इसके बावजूद सरिता की गैरमौजूदगी में फैसला ले लिया गया।
पूर्व में हरीश रावत सरकार के दौरान भी कांग्रेस को ऐसे ही माहौल से दो-चार होना पड़ा था। तब कांग्रेस सरकार में शामिल पीडीएफ कोटे के मंत्री हरीश चंद्र दुर्गापाल को भी एक बड़ा भव्य आयोजन करके कांग्रेस में शामिल किया गया था। लेकिन कुछ घंटे के बाद ही कांगेस ने दुर्गापाल के कांग्रेस में शामिल होने से साफ इंकार कर दिया। माना जाता है कि दुर्गापाल एक निर्दलीय विधायक थे और सरकार में कैबिनेट मंत्री थे। नियमानुसार कोई निर्दलीय विधायक जो कि सरकार में शामिल हो, वह किसी पार्टी की सदस्यता नहीं ले सकता। इसी के चलते दुर्गापाल के कांग्रेस में शामिल होने के बावजूद साफ इंकार कर दिया गया कि वे कांग्रेस में नहीं हैं।
अब इस पूरे प्रकरण के पीछे कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति की बात करें तो कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि पार्टी का प्रदेश संगठन काफी कमजोर हो गया है। इसको मजबूती प्रदान करने के बजाए हर नेता अपने-अपने हिसाब से  अपने-अपने राजनीतिक समीकरणों को साधने की नीति पर चल रहा है। भीम आर्य हों या मोहन काला, दोनां ही प्रकरणों में इंदिरा हृदेश पर उंगलियां उठ रही हैं। राजनीतिक जानकारों की मानें तो इसके पीछे इंदिरा हृदेश और हरीश रावत की आपसी राजनीतिक प्रतिद्वंदिता है। जिसके चलते हरीश रावत समर्थक नेताओं के विरोधियों को कांग्रेस में शामिल करके दबाब की रणनीति अपनाई जा रही है। हरीश रावत समर्थकों को किसी न किसी बहाने से कांग्रेस में कमजोर करने के लिए रावत विरोधियों को ताकत दी जा रही है। जिसके खिलाफ अब रावत का खेमा भी जबाब देने के लिए कमर कस चुका है। माना जाता है कि गोदियाल के तीखे तेवरों के पीछे हरीश रावत समर्थकों का भी पूरा साथ रहा है। कांग्रेस के कई हारे हुए विधायकों में संगठन के रवैये से खासी हलचल मची हुई है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में कई ऐसे नेताओं को कांग्रेस में शामिल किए जाने के संकेत मिल रहे हैं जो निर्दलीय चुनाव लड़कर अच्छे वोट हासिल कर चुके हैं। इसी के चलते कई विधायकों को अपनी राजनीतिक जमीन खिसकने का भय सता रहा है। इस भय का कितना असर है, यह इस बात से पता चल जाता है कि गणेश गोदियाल के आवास पर कई विधायकों और चुनाव हार चुके विधायकों की एक बड़ी मीटिंग तक हुई है। इस मीटिंग के बाद ही गणेश गोदियाल ने हरीश रावत द्वारा विधानसभा के सामने आयोजित उपवास कार्यक्रम में शामिल होकर मीडिया में सीधे-सीधे इंदिरा हृदेश पर गंभीर आरोप लगाए। जबकि इस कार्यक्रम में कांग्रेस पहली बार एकजुट दिखाई दी। ऐसे समय में हरीश रावत के मंच का उपयोग इंदिरा हृदेश के खिलाफ करने पर कांग्रेस के भीतर कई सवाल उठ रहे हैं। राजनीतिक जानकारों की मानें तो गोदियाल को हरीश रावत का पूरा समर्थन मिला हुआ है। जिसके चलते कांग्रेस को बैकफुट पर आना पड़ा है। अब देखना दिलचस्प होगा कि प्रदेश कांग्रेस संगठन आने वाले समय में क्या बदलाव करता है। सरिता आर्य और गणेश गोदियाल का मानना है कि उनकी रजामंदी लिए बिना उनके चुनावी विरोधियों जिनके कारण वे चुनाव हारे हैं, को पार्टी में शामिल केसे करवाया जा सकता है।
बात अपनी-अपनी
हर एक सदस्य कांग्रेस का सदस्य है। कांग्रेस एक परिवार है जिसमें सभी सदस्य मिलजुलकर काम कर रहे हैं। इसमें न कोई मेरा समर्थक है, न विरोधी। चाहे हरिद्वार हो या देहरादून सभी जगह कांग्रेस के लोग एकजुट होकर काम कर रहे हैं। सभी में मेलजोल बना हुआ है।
प्रीतम सिंह, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष
कोई विवाद नहीं था। वह सब मीडिया के कारण हुआ है। गणेश गोदियाल ने साफ कह दिया कि वह गलतफहमी थी। अब उनकी गलतफहमी दूर हो गई तो बात ही खत्म हो गई। मैं न तो मोहन काला को जानती हूं और न मेरा लेना-देना है। मोहन काला कांग्रेस के बड़े नेताओं से दिल्ली में मिला और प्रभारी जी ने कहा कि उसे कांग्रेस में शामिल कर दो। गोदियाल की आपत्ति थी तो मोहन काला को कांग्रेस में शामिल नहीं किया गया। अब वह सब बातें बेकार हैं। न तो कोई विवाद था और न है।
इंदिरा हृदयेश, नेता प्रतिपक्ष
यह मामला तो अब पुराना हो चुका है। मैंने अपना विरोध पार्टी में दर्ज करवा दिया है ओैर कांग्रेस ने मेरी बात मान भी ली है। अब बोलने के लिए कुछ नहीं है। बस यह कह सकता हूं कि मोहन काला ने मेरे खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ा था जिसके चलते कांग्रेस हार गई। मोहन काला कांग्रेस के कुछ ऐसे नेताओं के साथ मिलकर मुझे राजनीतिक चोट पहुंचाने का प्रयास कर रहा है जो कि मेरे विरोधी हैं। मैं लोकसभा चुनाव में पौड़ी सीट से दावेदार हूं। ऐसे में मेरे विरोधी को बगैर मेरी जानकारी कांग्रेस में शामिल कर रहे हैं, तो मैं चुप कैसे रह सकता हूं। इंदिरा हृदयेश जी पर मैंने जो बयान दिए वह अपनी जगह हैं। इन पर अब मैं दोबारा कोई कमेंट नहीं करना चाहता।
गणेश गोदियाल, पूर्व विधायक
मेंने सिर्फ इतना कहा था कि भीम आर्य को मेरी उपस्थिति में ही कांग्रेस में शामिल किया जाए। लेकिन उन्हें तब कांग्रेस में शामिल किया गया जब मैं गुजरात के दौरे पर थी। फिर अकेले भीम आर्य को ही कांग्रेस में शामिल किया गया। जिस आदमी का कोई जनाधार नहीं हो और वह अपने समर्थकां के बगैर ही पार्टी में शामिल हो जाए तो इसे क्या कह सकते हैं।
सरिता आर्य, प्रदेश अध्यक्ष महिला कांग्रेस

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