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Uttarakhand

अनुशासन हुआ तार-तार, संकट में धामी सरकार

सुरक्षा बलों में अनुशासन का होना एक अनिवार्य शर्त है। भारतीय लोकतंत्र में आजादी के बाद से ही अनुशासन का कड़ाई से पालन सभी सुरक्षा बल करते आए हैं। लेकिन उत्तराखण्ड में पहली बार राजनेताओं के खोखले वायदों से त्रस्त हो राज्य पुलिस बल की रीढ़ कहलाए जाने वाले सुरक्षाकर्मी अनुशासन की लक्ष्मण रेखा लांघते नजर आ रहे हैं। ‘मित्र पुलिस’ के 2001 बैच के सैकड़ों जवान अपनी ग्रेड पे न बढ़ाए जाने को लेकर मुखर हैं। हालात इतने खराब हैं कि सोशल मीडिया में खुलकर ये जवान सरकार के खिलाफ न केवल आवाज बुलंद कर रहे हैं बल्कि मुख्यमंत्री धामी और अपने उच्च अधिकारियों पर आरोपों की बौछार करने से भी नहीं चूक रहे हैं

  • ‘अंधेर नगरी चौपट राजा, बचा-खुचा सिपाहियों का हक भी खा जा’
  • ‘इतिहास में पहली बार किसी सरकार ने पुलिस को रिश्वत दी’
  • ‘मोदी के नाम पर रक्षा कवच पहनने वाले नेताओं का पतन शुरू हो गया है’
  • ‘चाहे जो मजबूरी हो, मांग हमारी पूरी हो’
  • ‘ऐसी-हीटर छोड़ दो 4600 ग्रेड पे पर जोर दो’
  • ‘वाह रे सैनिक पुत्र! झूठ बोलना तो कोई इनसे सीखे। शहीद दिवस की घोषणा का अच्छा मजाक बनाया है। धन्य हो तुम।’
  • ‘पापा प्लीज मेरे भविष्य के लिए बीजेपी को वोट नहीं देना वरना आपका सपना पूरा नहीं होगा।’

 

सोशल मीडिया पर आजकल ग्रेड पे को लेकर पुलिसकर्मियों के परिजनों की पोस्ट बढती जा रही हैं। पोस्ट जारी करने वाले उत्तराखण्ड पुलिसकर्मी और उनके परिजन हैं। उत्तराखण्ड पुलिस के जवानों के ऐसे संदेश मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विरोध में बगावत का बिगुल बजाने की तरफ इशारा कर रहे हैं। यह वही उत्तराखण्ड पुलिस है जिसे नीति आयोग देश का नंबर वन पुलिस बल घोषित कर चुका है। लेकिन आजकल उत्तराखण्ड पुलिस के 2001 बैच के सैकड़ों जवान 4600 ग्रेड पे मुद्दे पर भाजपा सरकार के खिलाफ तन कर खड़े हो रहे हैं। विरोध स्वरूप
पुलिसकर्मियों ने अपने स्वेच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए पत्र तक भेज दिए हैं। सोशल मीडिया पर यह पत्र वायरल हो रहे हैं। पुलिसकर्मियों ने आगामी चुनाव ड्यूटी के बहिष्कार की चेतावनी भी दे डाली है। यही नहीं बल्कि पुलिसकर्मियों के परिजनों ने और रिश्तेदारों ने तो आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ मतदान न करने तक की अपील करनी शुरू कर दी है। उत्तराखण्ड में आगामी 14 फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनाव में 60 पार का नारा देने वाली भाजपा सरकार फिलहाल अपनी ही पुलिस के विरोध का शिकार बनती दिखाई दे रही है। जबकि विपक्ष के लिए यह चुनावी मुद्दा बन गया है।

क्या है मुद्दा

मुद्दा है 4600 ग्रेड पे की बढ़ोतरी का। उत्तराखण्ड पुलिस के 2001 में भर्ती हुए 1500 जवानों को यह ग्रेड पे कई साल पहले मिलना था। लेकिन तब तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इसे सरकारी कोष में कमी होने की बात कहकर 2021 तक बढ़ा दिया था। तब रावत ने कहा था कि जैसे ही उनकी सर्विस के 20 साल होंगे उन्हें 4600 ग्रेड पे दे दिया जाएगा।

क्या है ग्रेड पे

विधायक रहते ग्रेड पे के पक्ष में धामी का पत्र

वर्ष 2001 में 1500 पुलिसकर्मी विभाग में भर्ती हुए थे। उस वक्त पदोन्नति के लिए तय समय सीमा 8 , 16 और 20 साल थी। ऐसे में इनमें से जो लोग 20 साल के कार्यकाल के दौरान प्रमोशन पाकर दरोगा नहीं बने उनके कार्यकाल को अक्टूबर 2021 में 20 साल पूरे हो गए हैं। इसी कारण उनको सब-इंस्पेक्टर पद के बराबर 4600 ग्रेड पे दिया जाना था।

कब-कब दिया जाता है ग्रेड पे

कॉन्स्टेबल को 10 साल की सेवा करने के बाद हेड कॉन्स्टेबल का ग्रेड पे दिया जाता है। 20 साल में सब-इंस्पेक्टर का ग्रेड पे और 30 साल की सेवा पर इंस्पेक्टर का ग्रेड पे दिया जाता है। पुलिस विभाग में कॉन्स्टेबल के प्रमोशन की प्रक्रिया कई वर्षों से चली आ रही है। लेकिन प्रमोशन नहीं मिलने की स्थिति में 3 पदों का ग्रेड वेतनमान अनिवार्य रूप से दिया जाता है। सातवां वेतनमान आयोग में इसका संशोधन कर स्पष्ट कर दिया था कि 10 साल के संतोषजनक कार्य पर 2400 रुपये का ग्रेड पे, 20 साल की सेवा करने पर 4600 ग्रेड पे और 30 साल की संतोषजनक सेवा करने पर 4800 ग्रेड पे दिया जाएगा। कुछ दिनों पहले ही लिखित आदेश में कहा गया है कि कॉन्स्टेबल को 20 साल की संतोषजनक सेवा करने पर 2800 ग्रेड पे का वेतनमान दिया जाएगा।

ग्रेड पे होने के बाद सैलरी में होती वृद्धि

 

4600 ग्रेड पे लागू होने पर उत्तराखण्ड पुलिस के 2001 के जवानों की सैलरी में 15000 की बढ़ोतरी होती। फिलहाल, जवानों की सैलरी 40 से 50 हजार है जो सीधे 65000 हो जाएगी। लेकिन यह तब है जब 4600 ग्रेड पे लागू होगा। इसी के साथ ही पुलिसकर्मियों का हाउस रेंट जो 3100 प्रत्येक माह मिल रहा था वह 5000 हो जाएगा। 2001 बैच के पुलिसकर्मियों का सेवाकाल अभी 20 साल और आगे तक है। जिसके आगे भी प्रमोशन होने की सूरत पर ग्रेड पे बढ़ सकता है। रिटायरमेंट के समय जितनी अधिक बढ़ी हुई सैलरी होगी। उसके हिसाब से 50 फ़ीसदी पेंशन राशि का लाभ प्रत्येक पुलिसकर्मी को मिलेगा।

सरकार पर बढ़ेगा कितना बोझ

2001 बैच के 1500 पुलिस जवानों को ग्रेड पे का अगर लाभ मिलता है तो सरकार पर करोड़ों रुपए का बोझ बढ़ता है। ग्रेड पे बढ़ोतरी में सरकार के खजाने पर इस साल 4.6 करोड़ तो अगले साल 15 करोड़ का वित्तीय बोझ बढ़ेगा।

4600 ग्रेड पर पूर्व सीएम को पुष्कर सिंह धामी लिख चुके हैं पत्र

गत 16 मई 2021 को तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से पुष्कर सिंह धामी ने बाकायदा पत्र लिखकर पुलिसकर्मियो को 4600 ग्रेड पे दिए जाने की मांग की थी। तब धामी ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह से कहा था कि पुलिस विभाग में वर्ष 2001 व 2002 के आरक्षण के वेतन विसंगति में छठे वेतन आयोग की सिफारिश लागू होने के पश्चात पुलिस विभाग में 16 वर्ष की संतोषजनक सेवा पूर्ण होने पर पुलिस आरक्षियो को 4600 ग्रेड पे दिया जा रहा था। जिसे सातवें वेतन आयोग के लागू होने से पूर्व ही पूर्ववर्ती सरकार द्वारा एमएसीपीएस 2017 के आधार पर 20 वर्ष के संतोषजनक सेवा पूर्ण होने पर 4600 ग्रेड दिए दिए जाने के आदेश निर्गत किए गए थे। जो पूर्व पुलिसकर्मियों को यथावत प्रदान किया जा रहा है। लेकिन वर्ष 2001 में भर्ती पुलिसकर्मियों को वर्ष 2020 में अक्टूबर में 20 वर्ष की सेवा अवधि पूरी होने पर शासन द्वारा उक्त कर्मियों को 4600 के स्थान पर 2800 ग्रेड पे दिए जाने के आदेश निर्गत किए गए हैं जो कि अन्यायपूर्ण प्रतीत होता है। यही नहीं बल्कि खटीमा के तत्कालीन विधायक पुष्कर सिंह धामी ने पुलिसकर्मियां को 2800 ग्रेड पे दिए जाने का विरोध करते हुए कहा था कि कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी के शुरुआती दिनों से ही समस्त पुलिसकर्मी मनोबल के साथ बिना भय के अपनी सेवाएं पूर्ण निष्ठा-भाव से दे रहे हैं। ऐसी स्थिति में यदि ऐसे आदेश निर्गत किए जाएंगे जो नियमानुसार नहीं है तो समस्त पुलिसकर्मी जो इस भयावह महामारी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं उनके मनोबल एवं उत्साह में विपरीत प्रभाव पड़ेगा। इसी के साथ ही धामी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को अपने पत्र में अपील करते हुए लिखा था कि वह पुलिसकर्मियों की सेवाओं को देखते हुए 20 वर्ष के संतोषजनक सेवा के पश्चात 4600 ग्रेड पे दिए जाने का आदेश जारी करने की कृपा करेंगे।

पूर्व मुख्यमंत्री ने गठित की थी कमेटी

 

स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति तक पहुंची बात

प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पुलिसकर्मियों के 4600 ग्रेड पे मामले पर एक कमेटी का गठन किया था जिसमें कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल को नामित किया गया था। इस कमेटी की रिपोर्ट आज तक भी सार्वजनिक नहीं की गई।

शहीद दिवस पर घोषणा कर चुके हैं सीएम धामी

ग्रेड पे के बजाय अनुपालन की घोषणा

4600 ग्रेड पे पर बनाई गई कमिटी की रिपोर्ट आने से ठीक पहले त्रिवेंद्र रावत का इस्तीफा हो गया। कुछ दिनों के लिए तीरथ सिंह रावत मुख्यमंत्री रहे फिर पुष्कर धामी के हाथों में सत्ता आ गई। 21 अक्टूबर, 2021 को देहरादून के परेड मैदान में शहीद दिवस के अवसर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री धामी ने अपने वायदे पर अमल कर दिखाया। इस दिन पुलिस स्मृति दिवस परेड को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि वर्ष 2001 बैच के सिपाहियों की सेवा के 20 साल इस साल अक्टूबर में पूरे हो गए हैं। लिहाजा इन पुलिसकर्मियों का ग्रेड पे इसी माह से ही 4600 कर दिया जाएगा। पुलिसकर्मियों ने इसे दीवाली गिफ्ट बताया था।

सरकार ने थमाया दो लाख का झुनझुना

पुष्कर सिंह धामी सरकार ने आचार संहिता लगने से महज तीन घंटे पहले ही 4600 ग्रेड पे देने वाले अपने वादे को पलटते हुए 2001 बैच के पंद्रह सौ पुलिसकर्मियों को दो-दो लाख देने की घोषणा कर दी। जिसके बाद लाभान्वित होने वाले पुलिसकर्मियों और उनके परिजनों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया।

इन सिपाहियों ने मांगी स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति, सोशल मीडिया पर हो रहें हैं पत्र वायरल

ग्रेड पे की मांग के लिए प्रदर्शन करते पुलिसकर्मियों के परिजन

बागेश्वर में एसपी देवेंद्र पिंचा से स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति देने का अनुरोध करते हुए कांस्टेबल चंद्रशेखर, रमेश गिरि, प्रकाश जोशी, अशोक भंडारी, नरेंद्र राणा और राजपाल सिंह ने कहा है कि वे 2001 में आरक्षी पद पर भर्ती हुए थे। पुलिस की नियमावली के अनुसार भर्ती की तिथि से 16 वर्ष में वे 4600 रुपये ग्रेड पे के हकदार हैं। लेकिन सरकार इसका लाभ नहीं दे रही है। इससे मानसिक रूप से परेशान होने के कारण वे पुलिस की सेवा नहीं करना चाहते। जबकि अल्मोड़ा में तीन सिपाहियों ने वीआरएस मांगा है। उनमें लमगड़ा थाने में तैनात 2001 बैच के आरक्षी योगेश गोस्वामी ने वीआरएस की मांग को लेकर एसएसपी को पत्र लिखा है। मांग पत्र के अनुसार 4600 ग्रेड पे की मांग अब तक पूरी नहीं होने से वह आहत थे। उन्होंने ग्रेड पे की मांग पूरी नहीं होने पर उनका वीआरएस स्वीकार करने की गुहार लगाई है। जबकि लमगड़ा थाने के ही आरक्षी गोविंद सामंत और दन्यां थाने के एक और आरक्षी ने वीआरएस मांगा है। इन सभी के पत्र
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं।

हम पुलिस परिवार मुख्यमंत्री जी के द्वारा दिए गए दो लाख रुपये सप्रेम उनके दोनों पुत्रों को उनकी पढ़ाई के लिए भेंट करते हैं। ताकि वह प्यारे बच्चे पढ़-लिखकर कुछ अच्छा बन पाएं। नेता बिल्कुल भी ना बने जो अपनी जुबान से पलट जाता है।
रेनू नेगी, परिजन

हमने अपने कार्यकाल में पुलिसकर्मियों के लिए 4600 ग्रेड पे स्वीकृत किया था। लेकिन वर्तमान सरकार ने इसे बढ़ाने के बजाय घटा दिया। प्रश्न यह उठता है कि ग्रेड पे 4600 होने की बजाय 2800 क्यों किया गया। ऐसी चीजें बढ़ाई जाती है, घटाई नहीं जाती है। यह अनुशासित फोर्स के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। इसका परिणाम आगामी दिनों में सामने आएगा।
हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री

उत्तराखण्ड राज्य ऐसा राज्य है जिसे देव भूमि कहा जाता है। लेकिन यहां पर ऐसे नेता राज करते हैं जो राजनीति की घिनौनी चाल चलते हैं। वह अपनी राजनीति के लिए शहीदों का अपमान करते हैं। एक तरफ शहीद दिवस पर झूठी घोषणा करते हैं और उत्तराखण्ड को सैन्य धाम बनाना चाहते हैं। यह नेता केवल अपने वोटों के लिए राजनीति करते हैं और जनता को बेवकूफ बनाते हैं। ऐसे नेता हमारी दहलीज पर भीख मांगने ना आए जो देव भूमि के नाम पर राजनीति करते हैं और देव भूमि को बदनाम करते हैं।
ममता रौतेला, पुलिसकर्मी की परिजन

4600 ग्रेड पे की राजनीतिक मुहिम की शुरुआत मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उस समय की थी जब वह विधायक थे। बतौर मुख्यमंत्री उन्होंने पुलिस समारोह में इसकी घोषणा भी कर दी। इसके बाद पुलिसकर्मियों की पत्नियों जिन्हें उन्होंने बहन बनाया उनसे राखी भी बंधवाई और बहनों को ग्रेड पे का तोहफा देने का वादा भी किया। ऐसा वादा उन्होंने पुलिसकर्मियों के परिजनों को कई बार दिया। लेकिन आखिर में वह अपनी घोषणा से पलट गए। इससे तो बेहतर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ही थे जिन्होंने सच बोलने का दम दिखाया था और कहा था कि 20 साल होते ही उन्हें 4600 ग्रेड पे मिल जाएगा। लेकिन वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने तो अपनी बहनों के साथ इमोशनल अत्याचार किया है। इसका जवाब उन्हें आगामी विधानसभा चुनावों में दिया जाएगा।
श्वेता मासीवाल, सोशल एक्टिविस्ट

मेरे सभी भाई-बहनों, रिश्तेदारों-मित्रों से मेरा निवेदन है कि आगामी विधानसभा चुनाव में सोच-समझकर अपने मतदान का प्रयोग कीजिएगा। क्योंकि हमने जो चुनाव पिछली बार किया था उसका खामियाजा हम लोग आज भुगत रहे हैं। मगर हम अपनी इस गलती को इस बार जरूर सुधारेंगे और हमारी खाकी के साथ हुए अपमान का बदला अवश्य लेंगे। हमारे माननीय मुख्यमंत्री जी ने तो हमें गले लगाकर पीठ में छुरा घोंप दिया। आचार संहिता से 3 दिन पहले तक उन्होंने बोला था मेरा वादा है मेरी जुबान है और आचार संहिता से आधा घंटा पहले वह अपनी जुबान से पलट गए। बीजेपी के कुछ नेताओं को मेरी इस बात से परेशानी हो सकती है, मगर भाइयों-बहनों हमारा आपसे कोई मनमुटाव या झगड़ा नहीं है। आप लोग भी समझने की कोशिश कीजिए, इस सरकार ने हमें क्या दिया है? किसका भला कर पाई है यह सरकार? सुंदर उत्तराखण्ड को धरना धारी उत्तराखण्ड बना डाला है। झूठे वादे झूठी घोषणाओं के अलावा कुछ भी साकार नहीं किया है। रक्षाबंधन के दिन हमने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को राखी बांधी थी। तब उन्होंने कहा था कि बहनों आपकी राखी की लाज रखूंगा और वादे को पूरा करूंगा। लेकिन वह बहनों से किया गया वादा पूरा नहीं कर पाए।
मानषी गोस्वामी, पुलिसकर्मी की परिजन

दर्द को मुस्कुरा कर सहना क्या सीखा इस पुलिस फोर्स ने नेता और अधिकारियों को लगता है कि उन्हें तकलीफ नहीं होती। मुख्यमंत्री धामी जी तुम्हारी दो लाख की दवा मेरे 20 साल की बीमारी को ठीक नहीं कर सकती। धामी जी द्वारा जो धोखा इस पुलिस फोर्स के कर्मचारियों को दिया गया हम इसके लिए उन्हें दिल से धन्यवाद देते हैं कि उन्होंने अपना असली चेहरा अब हम सब को दिखाया है। पुलिसकर्मियों को जो शहीद दिवस पर घोषणा कर उससे मुकर गए इससे साफ-साफ जाहिर होता है कि धामी जी की इस बीजेपी सरकार को शहीदों के प्रति कितना आदर है। धिक्कार है ऐसे उच्च अधिकारियों को जो अपने निचले कर्मचारियों की बातों को अपने कुर्सी के स्वार्थ के लिए चुपचाप मान लेते हैं और अपने को इस पुलिस फोर्स का हितैषी अधिकारी बताते हैं। ऐसे अधिकारियों को चुल्लू भर पानी में डूब कर मर जाना चाहिए। जिसके परिवार के समान कर्मचारियों के परिवार को सड़क पर आना पड़ा और आश्वासन के बाद भी निराशा उनके हाथ में पकड़ा दी गई। कहां गए उनके वह बयान जिसमें अधिकारियों द्वारा न्याय दिलाने की बात की गई। यह उच्च अधिकारी से हम पूछना चाहते हैं कि किस मुंह से आप अपने कर्मचारियों को ईमानदारी से निस्वार्थ होकर अपने कर्तव्य को पालन करने को कहते हैं। जो अधिकारी अपने स्वार्थ के लिए अपने परिवार की अनदेखी कर सकता है, उनसे कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है।
हंसा टम्टा, परिजन

 

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