Uttarakhand

डिफाॅल्टर समूहों को सहायता की डोज

दिनेश पंत
उत्तराखण्ड में इस समय 33 हजार स्वयं सहायता समूह हैं। हर योजना-परियोजना में इनकी जरूरत महसूस की गई। इसके बावजूद न तो पलायन रुका और न ही आजीविका का स्थाई प्रबंधन हो पाया। जितनी तेजी से स्वयं सहायता समूह बने उतनी ही तेजी से खत्म भी हो गए
राज्य में आर्थिक विकास तथा स्वरोजगार के अवसर  सृजित करने में महिला समूहों की महत्वपूर्ण भूमिका मानते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने राज्य के महिला स्वयं सहायता समूहों को ब्याज रहित ऋण देने की घोषणा कर समूहों के सशक्तीकरण की तरफ अपनी सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराया तो है, लेकिन असल सवाल यह है कि प्रदेश में अब तक जिन हजारों समूहों का गठन हो चुका है उसमें से अधिकांश निष्क्रिय पड़े हैं। प्रदेश में चल रही कोई भी योजना, परियोजना ऐसी नहीं है जिसमें समूहों का गठन नहीं किया गया हो। लेकिन विडंबना यह है कि जब तक योजनाएं, परियोजनाएं चलती हैं तभी तक स्वयं सहायता समूह भी अस्तित्व में रहते हैं। इनकी अवधि समाप्त होते ही समूह भी निष्क्रिय हो जाते हैं। समूहों का गठन तो आसानी से हो जाता है लेकिन बहुत कम समूह आत्मनिर्भर हो पाते हैं। आज प्रदेश में सक्रिय समूहों की अपेक्षा निष्क्रिय समूहों की संख्या कहीं अधिक है। डिफाॅल्टर हो चुके समूहों को पुनर्जीवित करने के लिए बनी ब्याज उपादान योजना भी इन निष्क्रिय समूहों को सबल बनाने में सक्षम नहीं हो पाई। यही वजह है कि प्रदेश में आज भी महिलाएं आर्थिक रूप से अपने परिवार पर निर्भर हैं।
पूरे प्रदेश में इस समय करीब 33 हजार स्वयं सहायता समूह गठित हैं, लेकिन इसके वाबजूद न तो प्रदेश के पलायन पर रोक लगी, न ही आजीविका का स्थाई प्रबंधन हो पाया। कामकाजी
महिलाओं को छोड़ दें तो अधिकांश महिलाओं की माली हालत में कोई खास सुधार होता नहीं दिख रहा। प्रदेश में गरीबी की रेखा से नीचे निवास करने एवं अंतोदय की बढ़ती संख्या इसकी पुष्टि करने को काफी है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से प्रदेश के लोगों की आर्थिक स्थिति में बदलाव लाने और पलायन पर रोक लगाने का दावा लगभग प्रदेश की हर सरकार ने किया। पूर्ववर्ती हरीश रावत सरकार के समय प्रदेश के 33 हजार स्वयं सहायता समूहों में से 26 हजार समूहों को बैंक से लिंक कराने का दावा किया गया था। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी स्वयं सहायता समूहों को मजबूत करने के लिए एसएचजी को उनके टर्न ओवर पर बोनस देने की बात कही थी। दावा था कि निष्क्रिय समूहों को सक्रिय करने के लिए 1 से 5 लाख रुपए दिए जाएंगे। मुख्यमंत्री रहते वह लगातार यह कहते रहे कि स्वयं सहायता समूहों के जरिए ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है। इसके लिए इन समूहों को आगे बढ़ना होगा। समूहों को उत्पादों के जरिए राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय पहचान बनानी होगी। अब प्रदेश के मुख्यमंत्री भी स्वयं सहायता समूहों से आशा लगाए बैठे हैं। इसके लिए वह ब्याज रहित ऋण सहित समूहों के लिए हर संभव कोशिश करने का वादा कर रहे हैं।
प्रदेश में स्वयं सहायता समूहों की संख्या पर योजनावार नजर डालें तो मुख्यमंत्री महिला स्वयं सहायता समूह सशक्तीकरण योजना के क्रियान्वयन के तहत 10 हजार से अधिक स्वयं सहायता समूह बने हैं तो मनरेगा के अंतर्गत 4 हजार से अधिक। सामुदायिक निवेश निधि के तहत 3 हजार, इंदिरा अम्मा भोजनालय के माध्यम से 100, सीड कैपिटल के तहत 3 हजार और सहकारिता के माध्मम से लगभग 1 हजार के साथ ही उजाला मित्र योजना, दीन दयाल अंत्योदय राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, के तहत हजारों स्वयं सहायता समूहों का गठन किया है। नाबार्ड प्रदेश में 4000 गांवों में महिला स्वयं सहायता समूहों का गठन कर बैंक से जोड़ने की पहल का दावा कर रहा है। महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए देवभोग प्रसाद योजना जिसे स्वयं सहायता समूहों द्वारा तय किया जा रहा है। वर्षों पहले गरीबी दूर करने के लिए संचालित स्वर्ण जयंती स्वरोजगार योजना के तहत शुरुआती वर्षों में 19459 समूह गठित किए गए थे, लेकिन अब इन समूहों का कोई नाम लेवा नहीं है। कहने को विभिन्न योजनाओं में गठित इन योजनाओं के तहत प्रत्येक समूह को पांच प्रतिशत बोनस, बैंकों से माइक्रो क्रेडिट के तहत सुविधाएं दिए जाने से दावे किए जाते रहे हैं।
दूसरी ओर महिला स्वयं सहायता समूहों को बैंक ऋण देने में कंजूसी बरत रहे हैं। अकेले पिथौरागढ़ जिले में 500 से अधिक स्वयं सहायता समूहों के ऋण आवेदन बैकों में लटके हुए हैं। जिले में ग्राम्य विकास अभिकरण, स्वजल, नाबार्ड और ग्राम्या जैसी योजनाओं के अंतर्गत 5200 से अधिक समूह बने हैं। ऐसा नहीं है कि प्रदेश में पहली बार समूहों के माध्यम से आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाने और गरीबी उन्नमूलन करने का प्रयास हुआ हो। इससे पहले भी कई योजनाओं में समूहों का गठन हुआ, लेकिन जितनी तेजी से समूहों का गठन किया गया उतनी ही तेजी से यह बंद भी हो गए। पूर्व में गरीबी उन्नमूलन के लिए प्रदेश सरकार ने स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना चलाई, लेकिन यह योजना भी दम तोड़ गई। इसे आॅपरेशन एसएचजी का नाम दिया गया था। इसमें स्वयं सेवी संस्थाओं को भी जिम्मेदारी दी गई, लेकिन वह भी सफल नहीं हो पाई। इस योजना के तहत भी प्रदेश के गरीबी रेखा से नीचे आने वाले लोगों के स्वयं सहायता समूह बनाने थे। इससे पूर्व  वर्ष 1999 में केंद्र सरकार ने गरीबी उन्नमूलन के लिए आईआरडीपी, ट्राइसेम, ड्वाकरा योजनाएं चलाई, लेकिन यह भी बंद हो गई। बाद में इन तीनों योजनाओं को स्वर्ण जयंती ग्राम
स्वरोजगार योजनाओं में मर्ज कर दिया गया। लेकिन यह योजना भी बगैर सार्थक परिणाम दिए बंद हो गई। इस योजना के तहत जितने भी समूह बने थे एवं सभी समूह निष्क्रिय ही रहे। समूहों को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए 35 करोड़ रुपए की राशि का प्रावधान भी था, लेकिन इसका उपयोग ही नहीं हो पाया। इस योजना के तहत बकायदा एक समिति गठित की गई। जिसमें सभी जिलों से एक गैर सरकारी संगठन को शामिल किया गया। समूह का लक्ष्य था कि प्रदेश भर में चार हजार समूहों का गठन किया जाएगा। एक समूह को सक्रिय करने या फिर गठित करने के लिए एनजीओ को 10 हजार रुपए की धनराशि दी जानी थी इसके लिए 17 करोड़ का प्रावधान किया गया था। स्वर्ण जयंती ही नहीं प्रदेश में अभी जितनी भी योजनाएं परियोजनाएं चल रही हैं उन सब में समूहों का गठन हो रहा है, लेकिन अधिकांश सुस्त पड़ी हुई हैं। मजबूत निगरानी तंत्र न होने के चलते निष्क्रिय समूहों की संख्या बढ़ती चली गई। बाजार तंत्र विकसित न होने एवं टारगेट देने-दिखाने की प्रवृत्ति के चलते इस पूरे दौर में जो मानव संसाधन का श्रम खर्च होता है वह बेकार चला जाता है।
अधिकतर समूहों का गठन खानापूर्ति तक ही सीमित रहा। जबकि माना यह गया था कि स्वयं सहायता समूहों के जरिए सूक्ष्म उद्यमों को स्थापित किया जाएगा जिससे समितियों की माली हालत बेहतर होगी, लेकिन हाल- फिलहाल महिला समूहों की सक्रियता जुबानी तो दिख रही है। लेकिन धरातल पर सब शून्य है।
हां, प्रदेश में महिला उद्यमी एक उम्मीद के तौर पर उभर कर सामने आ रही हैं। प्रदेश में महिलाओं द्वारा संचालित उद्यमों की संख्या और उसमें मिल रहा रोजगार आशाएं जगाता दिख रहा है। प्रदेश की सांख्यिकी डायरी के हिसाब से उत्तरकाशी में 673, चमोली में 884, रुद्रप्रयाग में 321, टिहरी में 841, देहरादून में 5098, पौड़ी में 1354, पिथौरागढ़ में 3130, बागेश्वर में 389, अल्मोड़ा में 3721, चंपावत में 734, नैनीताल में 2850, यूएसनगर में 4847, हरिद्वार में 6577 महिलाएं उद्यमशील हैं। षष्ठम
आर्थिक गणना के अनुसार राज्य के ग्रामीण और नगरीय क्षेत्रें में 31419 महिलाएं उद्यम संचालित कर रही हैं जो लगभग 66 हजार लोगों को रोजगार दिए हुए हैं। इसके साथ ही अगर बयानबाजी से दूर धरातल पर स्वयं सहायता समूहों को सशक्त कर दिया जाए तो एक हद तक प्रदेश में महिलाओं की आर्थिकी में एक बड़ा बदलाव दिख सकता है। इन सबके वाबजूद बेशक कई महिला समूह प्रदेश में बेहतर काम कर रही हैं, लेकिन उनकी संख्या बेहद कम है। पलायन रोकने एवं आर्थिकी में बदलाव लाने के लिए निष्क्रिय समूहों को सक्रिय करने के लिए जुबानी के बजाय जमीनी कसरत करनी होगी तभी इन समूहों की सार्थकता सिद्ध हो सकती है।
महिला शक्ति राज्य की रीढ़ है। महिला
स्वावलंबन को बढ़ावा देने के साथ ही राज्य की आर्थिकी को मजबूत कर अधिकतर रोजगार मुहैया कराने मंे मदद मिलेगी। इससे पलायन पर प्रभावी अंकुश लगेगा। महिला स्वयं सहायता समूहों को पांच लाख रुपए तक ऋण बगैर ब्याज के दिया जाएगा। अब समूहों को संगठन में बदलने की जरूरत है। राज्य के आर्थिक विकास तथा
स्वरोजगार के अवसर विकसित करने में महिला समूहों की महत्वपूर्ण भूमिका है। बिना मातृशक्ति के राज्य का सर्वांगीण विकास नहीं हो सकता। महिला स्वयं सहायता समूहों को मजबूत करने में सरकार हर संभव सहायता देगी।
त्रिवेंद्र सिंह रावत, मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड

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