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Uttarakhand

चम्पावत पर टिकी धामी की सत्ता

चम्पावत विधानसभा का उपचुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए चुनौती है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के राजनीतिक भविष्य के लिए यह उपचुनाव खासा महत्व रखता है। ये उपचुनाव मुख्यमंत्री धामी के लिए अगले पांच वर्षों की भूमिका भी तय करेगा। यह जीत उनके कद में इजाफा करेगी और अगर जीत का अंतर सामान्य रहता है तो मुख्यमंत्री बदलने की परम्परा की तलवार हमेशा लटकी रहेगी। दूसरी तरफ आज की तारीख में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं है। करन माहरा और यशपाल आर्या के लिए इस उपचुनाव का परिणाम बहुत ज्यादा कुछ तय करने वाला होगा ऐसा लगता नहीं। कुल मिलाकर चुनौती पुष्कर सिंह धामी के सामने ज्यादा है जिन्हें पार्टी के अंदर और बाहरी चुनौतियों से पार पाने के साथ यह भी साबित करना है कि उनकी खटीमा की हार भितरघात की कूटनीति का परिणाम थी

उत्तराखण्ड में चम्पावत विधानसभा के उपचुनाव की तारीख घोषित होते ही चम्पावत विधानसभा क्षेत्र राजनीतिक सरगर्मियों का केंद्र बन गया है। चुनाव आयोग द्वारा घोषित तारीखों के अनुसार 31 मई को मतदान और 3 जून को मतगणना का परिणाम आएगा। इस उपचुनाव में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भाजपा की तरफ से प्रत्याशी होंगे वहीं मजबूती से चुनाव लड़ने का दावा करने वाली कांग्रेस अभी तक अपना प्रत्याशी तय नहीं कर पाई है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद यह पांचवां अवसर होगा जब कोई मुख्यमंत्री उपचुनाव के जरिए विधानसभा में प्रवेश करेगा। 2002 में नारायण दत्त तिवारी रामनगर विधानसभा क्षेत्र से उपचुनाव लड़ विधानसभा पहुंचे थे वहीं 2007 में बीसी खण्डूड़ी धूमाकोट विधानसभा क्षेत्र से उपचुनाव लड़ विधानसभा के सदस्य बने थे। यह बात अलग है कि राजनीतिक शुचिता का दावा करने वाली भाजपा ने तब राजनीतिक नैतिकताओं को ताक पर रखकर धूमाकोट से चुनकर आए ले ़जनरल (सेवा निवृत्त) टीपीएस रावत, जो कांग्रेस के टिकट पर चुने गए थे, से इस्तीफा दिलवाकर बीसी खण्डूड़ी के लिए विधानसभा में जाने का रास्ता साफ करवाया था। होड सी लग गई थी। 2002 से चल रही परिपाटी से अछूती नहीं रही।

2012 की विधानसभा ने 2017 तक के अपने कार्यकाल विजय बहुगुणा और हरीश रावत के रूप में दो मुख्यमंत्री मिले। दोनों ही उपचुनाव के जरिए विधानसभा में पहुंचे। विजय बहुगुणा ने अपने रिश्ते के भाई भुवन चन्द्र खण्डूड़ी के नक्शे कदम पर चलते हुए भाजपा में ही सेंध लगा दी और सितारगंज से भाजपा विधायक किरन मंडल से इस्तीफा दिलवा उपचुनाव लड़ विधानसभा के सदस्य बने वहीं हरीश रावत 2014 मुख्यमंत्री बनने के बाद धारचूला सीट से उपचुनाव लड़ विधानसभा पहुंचे। चम्पावत विधानसभा का उपचुनाव उस पांचवें अवसर का गवाह होगा जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी उपचुनाव के जरिए विधानसभा की दहलीज पर पहुंचने के लिए चुनावी मैदान में होंगे। मुख्यमंत्री रहते 2022 का विधानसभा का चुनाव खटीमा से हार चुके पुष्कर सिंह धामी के लिए चम्पावत की सीट कैलाश गहतोड़ी ने खाली की है। विधानसभा चुनावों के परिणाम आने के तुरंत बाद पुष्कर सिंह धामी को दोबारा मुख्यमंत्री बनाने की मांग करते हुए कैलाश गहतोड़ी ने धामी के लिए अपनी सीट छोड़ने की पेशकश की थी। हालांकि उसके बाद पुष्कर सिंह धामी के लिए अपनी सीट छोड़ने की होड सी लग गई थी। चम्पावत के अलावा कपकोट, डीडीहाट और कालाढूंगी जैसी मजबूत सीटों से भी पुष्कर सिंह धामी के चुनाव लड़ने की चर्चा थी लेकिन डीडीहाट से विधायक और वरिष्ठ भाजपा नेता बिशन सिंह चुफाल द्वारा अपनी सीट मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए छोड़ने और राज्यसभा जाने की चर्चाओं का तल्खी के साथ खंडन करने चलते भाजपा नेतृत्व ने अन्य सीटों पर विचार करने का जोखिम नहीं उठाया।

अब जबकि चम्पावत विधानसभा उपचुनाव की रणभेरी बज चुकी है तो सवाल उठना लाजमी है कि यह सीट मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए सुरक्षित है भी या नहीं? इसका जवाब हां में भी हो सकता है और ना में भी। 2002 के विधानसभा चुनावों से 2022 के विधानसभा चुनावों तक के सफर में देखें तो 2002 और 2012 में कांग्रेस के हेमेश खर्कवाल, 2007 में भाजपा की बीना महाराना, 2017 और 2022 में भाजपा के कैलाश गहतोड़ी इस सीट से चुने गये। अब कैलाश गहतोड़ी के इस्तीफे के बाद खाली हुई सीट पर होने वाले 31 मई के उपचुनाव में पुष्कर सिंह धामी भाजपा की ओर से चुनाव मैदान में होंगे। ऊपरी तौर पर नजर डालें तो पुष्कर सिंह धामी के लिए सब आसान प्रतीत होता है। 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के कैलाश चन्द्र गहतोड़ी ने कांग्रेस के हेमेश खर्कवाल को 17,360 वोटों से हराया था लेकिन 2022 के चुनावों में कैलाश गहतोड़ी भले ही चुनाव जीत गये हों लेकिन इस बार उनकी जीत का अंतर महज 5,304 रह गया। ये घटता अंतर भाजपा और मुख्यमंत्री धामी की चिंता का विषय हो सकता है। हालांकि 2022 के विधानसभा चुनावों में कैलाश गहतोड़ी का भाजपा के अंदर विरोध अधिक था। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खटीमा की हार के बाद हर कदम फूंक-फूंक रख रहे हैं। पुष्कर सिंह धामी के लिए असल चुनौती पार्टी के अंदर से है क्योंकि जिस प्रकार मुख्यमंत्री रहते उन्हें खटीमा में हार का सामना करना पड़ा उससे उनका आत्म विश्वास डगमगाया हुआ बताया जाता है।

सरकार और संगठन के स्तर पर धामी उपचुनाव के लिए सारी व्यवस्थाएं चाक चौबंद कर लेना चाहते हैं। नरेन्द्र भण्डारी को चम्पावत का जिलाधिकारी और उनके विधानसभा क्षेत्र खटीमा में लंबे समय तक एसडीएम, मनीष बिष्ट को चम्पावत लाना अकारण नहीं है। इसी प्रकार कैलाश गहतोड़ी और कैलाश शर्मा को विधानसभा चुनावों का दायित्व देकर प्रदेश संगठन की भूमिका को सीमित करने का प्रयास सीएम ने किया है। स्मरण रहे कि पुष्कर सिंह धामी के खास रहे स्वामी यतीश्वरानन्द और संजय गुप्ता ने अपनी हार के लिए प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक को जिम्मेदार ठहराया है, इस चलते धामी चम्पावत में जोखिम उठाने के मूड़ में नहीं हैं। इसके बावजूद कुछ मुद्दे ऐसे जरूर है जिनसे मुख्यमंत्री का खेमा आशंकित नजर आ रहा है। खनन प्रेमी मुख्यमंत्री का तमगा और बढ़ती महंगाई के नकारात्मक असर की आशंका से मुख्यमंत्री का खेमा चिन्ति नजर आने की खबरें छनकर सामने आ रही हैं। सत्तारूढ़ दल को आशंका है कि कहीं कांग्रेस इसे बड़े स्तर पर मुद्दा बनाकर जनता के बीच चुनाव में लाभ लेने की कोशिश न करे। बताते हैं कि पुष्कर सिंह धामी के पहले कार्यकाल में खनन व पट्टों के कामों के लिए स्वच्छन्द रूप से मुख्यमंत्री आवास और मुख्यमंत्री के कार्यालय में मंडराने वाले तत्वों से इस बार धामी ने दूरी बना ली है क्योंकि इन तत्वों की निकटता का खामियाजा उन्हें खटीमा में भुगतना पड़ा था। ‘सूत्र बताते हैं कि खटीमा से अपनी हार को मुख्यमंत्री धामी मानसिक रूप से स्वीकार नहीं कर पाए हैं’ उसकी टीस वे भुला नहीं पा रहे हैं। इसी के चलते खटीमा क्षेत्रवासियों की उपेक्षा क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी है। अगर ये नकारात्मक संदेश चम्पावत विधानसभा में निचले स्तर तक पहुंच गया तो मुख्यमंत्री धामी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

जहां तक कांग्रेस का प्रश्न है उसमें दावेदारों की लंबी सूची है लेकिन ये दावेदारी सिर्फ दावेदारी जताने के लिए है या फि इसमें चुनाव लड़ने की गंभीरता है ये आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। हेमेश खर्कवाल इस बार अपनी दावेदारी में उतने गंभीर नजर नहीं आ रहे हैं। 2022 के कुछ दावेदार कांग्रेस को झटका देकर भाजपा में शामिल हो चुके हैं जिनमें चम्पावत के युवा कांग्रेस के जिलाध्यक्ष सूरज प्रहरी प्रमुख हैं। कांग्रेस के नये प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्या ने कांग्रेस के इस चुनाव में मजबूती से लड़ने का दावा जरूर किया है लेकिन सवाल है कि क्या कांग्रेस मार्च 2022 के झटके से उबर चुकी है? फिलहाल जमीनी स्थितियां कांग्रेस के उतने अनुकूल नजर नहीं आ रही हैं। राज्य बनने के बाद उपचुनाव लड़े मुख्यमंत्रियों को चुनाव में हार का सामना नहीं करना पड़ा है। मुख्यमंत्री धामी के सामने पुराना इतिहास दोहराने की चुनौती के साथ बड़े अंतर की जीत की भी चुनौती होगी। उनकी चम्पावत से बड़ी जीत खटीमा से उनकी हार के टीस को कम जरूर करेगी। नारायण दत्त तिवारी की 2002 में रामनगर उपचुनाव में जीत का अंतर तेइस हजार, 2007 में बीसी खण्डूड़ी की जीत का अंतर 14000, 2012 में सितारगंज से विजय बहुगुणा की जीत का अंतर चालीस हजार और 2014 में हरीश रावत की जीत का अंतर धारचूला में उन्नीस हजार था।

चम्पावत विधानसभा का उपचुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए चुनौती है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के राजनीतिक भविष्य के लिए यह उपचुनाव खासा महत्व रखता है। ये उपचुनाव मुख्यमंत्री धामी के लिए अगले पांच वर्षों की भूमिका भी तय करेगी। उनकी एक बड़ी जीत उनके कद में इजाफा करेगी और अगर जीत का अंतर सामान्य रहता है तो मुख्यमंत्री बदलने की परम्परा की तलवार हमेशा लटकी रहेगी। दूसरी तरफ आज की तारीख में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं है। करन माहरा और यशपाल आर्या के लिए इस उपचुनाव का परिणाम बहुत ज्यादा कुछ तय करने वाला होगा ऐसा लगता नहीं। कुल मिलाकर चुनौती पुष्कर सिंह धामी के सामने ज्यादा है जिन्हें पार्टी के अंदर और बाहरी चुनौतियों से पार पाने के साथ यह भी साबित करना है कि उनकी खटीमा की हार भितरघात की कूटनीति का परिणाम भर थी।

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