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Uttarakhand

धामी का न्यायशास्त्र

समान नागरिक संहिता यानी कि एक देश एक कानून। इसके तहत देश में रहने वाले सभी धर्मों के लोगों के लिए एक कानून होगा। भारत में समान नागरिक संहिता लागू नहीं है, यहां कई निजी कानून धर्म के आधार पर तय हैं। भारत में हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध के लिए एक व्यक्तिगत कानून है। वहीं मुस्लिम और ईसाई धर्मों के अपने कानून हैं। इस्लाम धर्म के लोग शरीयत या शरिया कानून को मानते हैं, जबकि अन्य धर्म के लोग भारतीय संसद द्वारा तय कानून को सर्वोपरि मानते हैं। समान नागरिक के तहत विवाह, तलाक, बच्चा गोद लेना, सम्पत्ति के बंटवारे जैसे विषय पर कानून बनने की जरूरत देश की आजादी के बाद से ही महसूस की जाने लगी थी। उत्तराखण्ड इस कानून को लागू करने वाला देश में पहला राज्य बन गया है जिससे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भाजपा के लिए तुरुप का पत्ता साबित हो चुके हैं। धामी ने देवभूमि में समान नागरिक संहिता लागू कर न्यायशास्त्र के नए कीर्तिमान गढ़ दिए हैं। राजनीतिक पंडितों की मानंे तो केंद्र सरकार राम मंदिर निर्माण के साथ ही अब ‘उत्तराखण्ड मॉडल’ के सहारे आगामी लोकसभा चुनाव में अपनी वैतरणी पार लगाएगी। माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री धामी की बनाई इस लीक पर भाजपा शासित राज्यों के चलने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। उत्तराखण्ड के बाद असम सरकार यह बिल विधानसभा में सबसे पहले पेश कर सकती है तो वहीं उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा और राजस्थान सरकार भी यूसीसी लाने का ऐलान कर चुकी है। हालांकि विपक्ष को इस बिल के लागू होने पर कई आशंकाएं हैं

भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में कहा था ‘बीजेपी का मानना है कि जब तक भारत एक समान नागरिक संहिता को नहीं अपनाता है, तब तक देश में लैंगिक समानता नहीं आ सकती है। यह देश की सभी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करता है और भाजपा एक समान नागरिक संहिता का मसौदा तैयार करने के लिए प्रतिबद्ध है, जो सर्वोत्तम परम्पराओं पर आधारित है और उन्हें आधुनिक समय के साथ सामंजस्य स्थापित करने का मौका देती है।’ पिछले साल केंद्र सरकार ने विवाह के लिए बालिकाओं की आयु बढ़ाकर 21 वर्ष करने जैसे उपाय किए हैं, जो लैंगिक समानता सुनिश्चित करने के लिए एक सराहनीय पहल कही जा सकती है। ऐसा ही एक सराहनीय कदम उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उठाया है। अब तक विश्व के नक्शे पर धार्मिक पर्यटन की पहचान रखने वाला पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड समान नागरिक सहिता लागू कर देश के लिए नजीर बन गया है। इसके वाहक बने हैं युवा सीएम पुष्कर सिंह धामी। देश में सबसे पहले धर्मांतरण कानून को लागू कर धामी भाजपा के उन युवा मुख्यमंत्रियों में पहले बागान पर हैं जिन्हें हिंदुत्व की राजनीति के नायकों के तौर पर देखा जाने लगा है। आजादी के बाद देश में पहली बार समान नागरिक संहिता को उत्तराखण्ड की विधानसभा से पास करा धामी नया न्यायशास्त्र गढ़ चुके हैं।

यूसीसी बिल पर महिलाओं द्वारा सीएम धामी का स्वागत

राजनीतिक गलियारों में इसे धामी की राजनीतिक धमक में इजाफा माना जा रहा है। यूसीसी यानी समान नागरिक संहिता को राजभवन और फिर राष्ट्रपति भवन से पास होने के बाद भाजपा के लिए इसे देश के अन्य राज्यों में लागू करने का रास्ता तैयार हो जाएगा। यूसीसी के लागू होते ही समाज में व्याप्त कुरीतियां और कुप्रथाएं अपराध की श्रेणी में आ जाएंगी और इन पर रोक लगेगी। इनमें बहु विवाह, बाल विवाह, तलाक, इद्दत, हलाला जैसी प्रथाएं शामिल हैं। दावा किया जा रहा है कि संहिता के लागू होने पर किसी की धार्मिक स्वतंत्रता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि विपक्ष इसे एक धर्म विशेष के खिलाफ बता रहा है।

समान नागरिक संहिता ब्रिटिश शासनकाल से ही एक बड़ा मुद्दा रहा है। ‘फूट डालो और शासन करो’ नीति को आधार बना अपनी सत्ता को मजबूत करने के लिए ब्रिटिश शासकों ने धर्म को आधार बना समान नागरिक संहिता को लागू करने का प्रयास नहीं किया। 1835 में बने पहले लॉ कमिशन की एक रिपोर्ट जिसे ‘लेक्स लोसी रिपोर्ट’ में संपूर्ण भारत के लिए एक प्रकार के कानून बनाए जाने की बात कही गई थी लेकिन हिंदू तथा मुस्लिम धार्मिक कानूनों को इस दायरे से बाहर रखा गया था। यह अंग्रेजों की ‘फूट डालो, शासन करो’ नीति थी। राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव में तथा वोट की राजनीति के दबाव में आजादी बाद गठित पहली सरकार लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता- ‘एक देश-एक कानून’ को लागू करने में विफल रही।

स्मरण रहे कि संविधान बनाने के लिए गठित संविधान सभा में भी एक समान नागरिक संहिता का मुद्दा उठा था। संविधान के जनक कहलाए गए डॉ. भीम राव अम्बेडकर ने संविधान सभा की बहसों के दौरान समान नागरिक संहिता की पुरजोर वकालत की थी। उन्होंने कहा था- ‘आखिर हमें यह आजादी किस लिए मिल रही है? हमें यह स्वतंत्रता अपनी
सामाजिक व्यवस्था को सुधारने के लिए मिली है, जो असमानताओं, भेदभावों और अन्य चीजों से इतनी भरी हुई है कि हमारे मौलिक अधिकारों संग टकराव करती है। इसलिए किसी के लिए भी यह कल्पना करना बिल्कुल असंभव है कि पर्सनल लॉ को राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा जाएगा।’ आजादी उपरांत देश के प्रथम कानून मंत्री बने डॉ. अम्बेडकर ने संसद में इस विषय पर बिल पेश किया था लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू उक्त बिल को लागू करने का साहस नहीं दिखा पाए। जिससे खिन्न हो डॉ. अम्बेडकर ने अपना त्याग पत्र दे दिया था।

23 नवंबर, 1948 को पहली बार संविधान सभा में यूनिफार्म सिविल कोड का मसला उठा। इसे बम्बई (अब मुम्बई) से संविधान सभा के सदस्य कांग्रेसी मीनू मसानी ने प्रस्तावित किया। आर्टिकल 35 में समान नागरिक संहिता की बात कही गई और इस मुद्दे पर संविधान सभा में जोरदार बहस छिड़ गई। अगले दिन 24 नवंबर, 1948 को टाइम्स ऑफ इंडिया ने संविधान सभा की इन बहसों को ष्ं ेमतपमे व िनिसस. इसववकमक ेचममबीमेष् (जोरदार बहसों की श्ृंखला) कहकर छापा था। देश उस समय बंटवारे की त्रासदी से गुजर रहा था। अविश्वास और कौमी हिंसा का माहौल था। तब देश में समान नागरिक संहिता लागू करना एक चुनौती थी। मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग पहले ही कहते थे कि ‘कांग्रेस के हिंदुओं की सरकार’ मुस्लमानों को इस्लाम के हिसाब से जीने नहीं देगी। उनके लिए भारत में धर्म के आधार पर भेदभाव होगा। ऐसी स्थिति में समान नागरिक संहिता को नीति निदेशक सिद्धांतों में डाल दिया गया कि कभी भविष्य में उस पर कानून बना कर लागू किया जा सकेगा। उसके बाद यूसीसी हमेशा से सियासी बहसों और चुनावी राजनीति का केंद्र बनकर रह गया। फिलहाल इस संहिता को धरातल पर उतारने का जोखिम उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने लिया। इससे उनकी चौतरफा तारीफ हो रही है।
देखा जाए तो 2022 के विधानसभा चुनाव का नतीजा आने से पहले मुख्यमंत्री धामी ने सबसे पहले यूसीसी लागू करने की बात की थी। मार्च-2022 में दूसरी बार मुख्यमंत्री की शपथ लेते ही धामी ने सबसे पहले इस कानून की वकालत की। इस दिशा में धामी ने प्रभावी कदम उठाते हुए एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाई थी। 27 मई, 2022 को सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति बनी। इस समिति में सेवानिवृत्त न्यायाधीश प्रमोद कोहली, सामाजिक कार्यकर्ता मनु गौर, सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी शत्रुघन सिंह और दून यूनिवर्सिटी की कुलपति सुरेखा डंगवाल को शामिल किया गया। इस मामले में जारी एक अधिसूचना में कहा गया है कि उत्तराखण्ड में रहने वाले नागरिकों के व्यक्तिगत् नागरिक मामलों को नियंत्रित करने वाले सभी प्रासंगिक कानूनों की जांच करने और मसौदा कानून या मौजूदा कानून में संशोधन के साथ उस पर रिपोर्ट देने के लिए समिति बनाई गई है। यह विशेषकर समिति विवाह, तलाक, संपत्ति के अधिकार, उत्तराधिकार से संबंधित लागू कानून और विरासत, गोद लेने और रख-रखाव एवं समान नागरिक संहिता के परीक्षण एवं क्रियान्वयन के लिए गवर्नर की मंजूरी से बनाई गई है। कमेटी को इसका ड्राफ्ट तैयार करने का जिम्मा सौंपा गया है। इस कमेटी ने सभी पक्षों से बात करके और उनके सुक्षावों को लेकर इसका मसौदा तैयार किया। 13 माह के कार्यकाल में 52 बैठकें हुईं और ढाई लाख से अधिक सुझाव मिले। इसके बाद यूसीसी का ड्राफ्ट 30 जून 2023 को तैयार कर सरकार को सौंप दिया गया था। तब से इसकी समीक्षा की जा रही थी। कानूनविदों और विशेषज्ञों की राय सुमारी के बाद इसे पहले
कैबिनेट में पास कराकर सदन में रखा गया। विधानसभा से पास हो जाने के बाद अब इस बिल पर राज्यपाल और राष्ट्रपति की मोहर लगने के पश्चात् यह बिल कानून का रूप ले लेगा।

धामी सरकार ने जो बिल पास किया है उसके तहत, विवाह केवल एक पुरुष और एक महिला के बीच ही होंगे। बिल में बच्चों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया है, चाहे वे वैध हों या नाजायज। विवाह की आयु लड़कों के लिए 21 वर्ष और लड़कियों के लिए 18 वर्ष निर्धारित की गई है। इसी के साथ तलाक से संबंधित मामलों में पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार होंगे। ‘हलाला’ और ‘इद्दत’ जैसी परम्पराएं खत्म हो जाएंगी। विधेयक में ‘हलाला’ करते पाए जाने वाले व्यक्ति के लिए तीन साल की कैद या 1 लाख रूपए का जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। उत्तराखण्ड में बहुविवाह प्रथा, बाल विवाह और लिव इन रिलेशनशिप के पंजीकरण पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। इससे कानून में धर्म को सामाजिक संबंधों, विवाह, उत्तराधिकार परिवार, भूमि आदि के मामले में पर्सनल कानून से अलग रखा गया है तथा हिन्दू विवाह अधिनियम 1955, हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956, हिन्दू कोड बिल, शरिया लॉ, मुस्लिम पर्सनल लॉ एप्लीकेशन एक्ट 1937 आदि धर्म के आधार पर व्यक्तिगत् कानूनों में सुधार के विवादास्पद मुद्दों का निराकरण किया गया है। इसमें यह सुनिश्चित किया गया है कि सभी भारतीयों के साथ समान रूप से व्यवहार किया जाएगा तथा लिंग समानता स्थापित की जाएगी और महिलाओं की दशा में सुधार किया जाएगा। हालांकि जन जातीय लोगों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है। संविधान के अनुच्छेद 366 व 342 में अनुसूचित जनजातियों को विशेष संरक्षण प्रदान किया गया है। बताया जा रहा है कि समान नागरिक संहिता का ड्राफ्ट तैयार करने वाली विशेषज्ञ समिति ने जब राज्य के जनजातीय समूहों से बातचीत की तो जनजातीय समाज की ओर से विभिन्न वर्गों में आपसी विमर्श व सहमति बनाने के लिए कुछ समय देने का आग्रह किया गया। हालांकि दावा किया जा रहा है कि अन्य वर्गों की तुलना में जनजातीय समुदाय में महिलाओं की स्थिति बेहतर है।

विपक्ष इस पर अपना विरोध जता रहा है। लेकिन सवाल उठता है कि एक समान नागरिक संहिता में ऐसा क्या है कि हिन्दुत्व के नेताओं को छोड़कर अन्य सभी राजनेता इसका विरोध करते हैं? इसको अल्पसंख्यक विरोधी क्यों माना जाता है? सवाल है कि यदि हिन्दू पर्सनल लॉ का आधुनिकीकरण और परम्परागत ईसाई प्रथाओं को असंवैधानिक घोषित किया जा सकता है तो फिर मुस्लिम पर्सनल लॉ को पवित्र क्यों माना जाना चाहिए? क्या राज्य धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव करता है? गत वर्षों से देखने में आ रहा है कि धर्म की विकृत व्याख्याएं की गई हैं और इसका इस्तेमाल संकीर्ण व्यक्तिगत् राजनीतिक एजेंडा और वोट बैंक के लिए किया गया है। अधिकतर लोगों का मानना है कि इससे देश का वातावरण खराब हुआ है। इस महत्वपूर्ण तथ्य की उपेक्षा की गई है कि अम्बेडकर ने वैकल्पिक एक समान नागरिक संहिता का पक्ष लिया था। उन्होंने दो टिप्पणियां की थीं कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार किया जा सकता है और यह सारे भारत में एक जैसा नहीं है।

यहां यह भी बताना जरूरी है कि भारत में गोवा एकमात्र ऐसा राज्य है जहां यूसीसी लागू है। संविधान में गोवा को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया है। इसे गोवा सिविल कोड के नाम से भी जाना जाता है। वहां हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई समेत सभी धर्म और जातियों के लिए एक ही फैमिली लॉ है। इस कानून के तहत गोवा में कोई भी तीन तलाक नहीं दे सकता है। यही नहीं बल्कि रजिस्ट्रेशन कराए बिना शादी कानूनी तौर पर मान्य नहीं होगी। शादी का रजिस्ट्रेशन होने के बाद तलाक सिर्फ कोर्ट के जरिए ही हो सकता है। सम्पत्ति पर पति-पत्नी का समान अधिकार है। इसके अलावा अभिभावकों को कम से कम आधी सम्पत्ति का मालिक अपने बच्चों को बनाना होगा, जिसमें बेटियां भी शामिल हैं। गोवा में मुस्लिमों को 4 शादियां करने का अधिकार नहीं है, जबकि कुछ शर्तों के साथ हिन्दुओं को दो शादी करने की छूट दी गई है।

दुनिया की बात करें तो समान नागरिक संहिता का पालन कई देशों में होता है। इनमें पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्की, इंडोनेशिया, सूडान, मिस्र, अमेरिका, आयरलैंड आदि शामिल हैं। इन सभी देशों में सभी धर्मों के लिए एक समान कानून है। इतिहास में समान नागरिक कानून का जिक्र पहली बार 1835 में ब्रिटिशकाल में किया गया था। उस समय ब्रिटिश सरकार की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि अपराधों, सबूतों और ठेके जैसे मुद्दों पर समान कानून लागू करने की जरूरत है।

यूसीसी के प्रति भाजपा पूरी तरह गंभीर दिखती है लेकिन यूसीसी को सिर्फ उत्तराखण्ड में प्रचारित कर रही है, जबकि इसे पूरे देश में लाना चाहिए। साथ ही भाजपा को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अगर हर राज्य में यूसीसी लागू होगा तो पहले से ही पर्सनल लॉ के कानूनों के चलते तनाव पैदा हो सकता है। संविधान कहता है कि सरकार से अपेक्षा करते हैं कि वह सहमति के आधार पर यूसीसी लाएंगे। लेकिन एक वर्ग विशेष की सहमति इसमें नहीं दिखाई देती है। राज्य में धामी सरकार के इस कदम से भाजपा को फायदा हुआ है न कि जनता को इस बिल के आने से निश्चित तौर पर धामी का कद बढ़ जाएगा। लेकिन आज भी जनता के लिए महत्वपूर्ण बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था जैसे बुनियादी सवाल पर सरकार क्या कर रही है यह जवाब नहीं दिया जा रहा है। लोकसभा चुनाव तक सरकार यूसीसी का गाना गाएगी और जनता के मुद्दों को भुलाने का प्रयास करेगी। भू-कानून जैसे मुद्दे इसी परिधि में आते हैं। सवाल यह है कि जनजातियों को इस बिल से बाहर क्यों रखा गया है। क्या वहां की महिलाओं का स्टैंडर्ड इतना ऊंचा है कि यह बिल जनजाति में लागू नहीं किया गया। भाजपा को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार राज्य अपने नागरिकों के लिए पूरे भारत में एक समान नागरिक संहिता प्रदान करने का प्रयास करेगा लेकिन जनजाति को इस बिल से दूर क्यों किया गया यह सवाल भाजपा सरकार के सामने है।
हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड

 

क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट
तीन तलाक से जुड़े 1985 के चर्चित शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अनुच्छेद 44 एक ‘मृत पत्र’ जैसा हो गया है। साथ ही कोर्ट ने देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की जरूरत पर जोर दिया था। बहु विवाह से जुड़े सरला मुद्गल बनाम भारत संघ मामले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1954 में संसद में समान नागरिक संहिता के बजाय हिंदू कोड बिल पेश किया था। इस दौरान उन्होंने बचाव करते हुए कहा था कि यूसीसी को आगे बढ़ाने की कोशिश करने का यह सही समय नहीं है।
गोवा के लोगों से जुड़े 2019 के उत्तराधिकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों की चर्चा करने वाले भाग चार के अनुच्छेद-44 में संविधान के संस्थापकों ने अपेक्षा की थी कि राज्य भारत के सभी क्षेत्रों में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने की कोशिश करेगा।

हमारे देश के यशस्वी पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जब हम 2022 के विधानसभा चुनाव में गए थे तो राज्य की जनता के सामने संकल्प लिया था कि नई सरकार के गठन के साथ ही हम यूसीसी को लागू करेंगे। आज हमारा वह संकल्प पूरा हुआ, एक वादा पूरा हुआ। यह देवभूमि को सौभाग्य मिला, जो लंबे समय की मांग थी, वह विधेयक देवभूमि उत्तराखण्ड की विधानसभा ने पारित किया है। हम इसे लेकर देवभूमि की जनता के सामने चुनाव में गए। जनता ने हमें इस पर बहुमत दिया, आशीर्वाद दिया, सरकार में आने का मौका दिया। हमने एक कानून की दिशा में इसे विधानसभा में पारित किया। देवभूमि ने इसकी शुरुआत की है। इसके लिए हमने कमेटी बनाई थी। हमारी ड्राफ्ट कमेटी दो लाख से ज्यादा लोगों तक पहुंची,10 हजार लोगों से सीधा संवाद किया, 52 बैठकें की हैं, धर्म क्षेत्र के संगठनों से बात की है, उसके बाद विधेयक पारित हुआ। यह राष्ट्रपति तक जाएगा, उनकी भी स्वीकृति हमें मिलेगी। उसके बाद राज्य के अंदर इसे कानून के रूप में लागू करेंगे। जैसे यहां से अनेकों नदियां निकलकर पूरे देश को जल और जीवन देने का काम करती हैं, वैसे ही पीएम मोदी के नेतृत्व में हमने ‘श्रेष्ठ भारत’ की कल्पना को साकार करने के लिए यह कदम उठाया है। हम चाहते हैं कि दूसरे प्रदेश भी इसे लागू करें।
पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड

बात अपनी-अपनी
जनजातीय समुदायों के रीति-रिवाजों का संरक्षण, द्विविवाह का निषेद्य, रिश्तों की निषिद्ध डिग्री में विवाह का निषेद्य और एक राज्य के भीतर लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले भागीदारों पर अपने लिव-इन रिलेशन को पंजीकृत करने का दायित्व उत्तराखण्ड के यूसीसी विधेयक की प्रमुख विशेषताएं हैं। संवैधानिक नीति निर्देश और लगातार सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने धर्मनिरपेक्ष देश में सामाजिक सुधार के एक उपकरण के रूप में यूसीसी पर जोर दिया है। गोवा नागरिक संहिता पुर्तगाली काल से 1962 में पुनः वैधता देने के बाद से लागू है और इसे ही समान नागरिक संहिता माना जाता है। गोवा में उत्तराधिकार के मामले में प्रावधान काफी हद तक प्रगतिशील हैं, जबकि जब विवाह और गोद लेने की बात आती है तो पूर्ण एकरूपता नहीं है, आम तौर पर यह देश के अन्य कानूनों की तुलना में कहीं अधिक लिंग न्यायपूर्ण है। जबकि 22वां विधि आयोग राष्ट्रव्यापी समान नागरिक संहिता के बारे में बड़े पैमाने पर जनता और मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठनों के विचारों पर मंथन कर रहा है तब उत्तराखण्ड में राज्य यूसीसी का कार्यान्वयन एक विविधतापूर्ण समाज में इसकी व्यावहारिक प्रवर्तनीयता का लिटमस परीक्षण होगा जिसका अनुपालन वर्तमान में एक बड़ी चुनौती भी है।
दुष्यंत मैनाली, वरिष्ठ अधिवक्ता हाईकोर्ट नैनीताल

बीजेपी यूसीसी का सियासत के लिए इस्तेमाल कर रही है न कि समानता के लिए। जिन लोगों के लिए इस कानून की बात की जा रही है उनकी बिना रजामंदी के ये कानून बनाया गया है। यहां तक ​​​​कि वर्ष 2020 में जो कमेटी यूसीसी के लिए उत्तराखण्ड की सरकार ने बनाई उसमें एक भी सदस्य अल्पसंख्यक समुदाय से नहीं लिया गया। हमारा संविधान हमें अपना मजहब, रस्म-ओ-रिवाज और नियम, कायदे कानूनो पर अमल करने की आजादी देता है। साथ ही हमारे देश में जो विभिन्न सभ्यताएं है उसकी भी रक्षा करता है। लेकिन बीजेपी ने सियासत के लिए हमारे देश के संविधान में ऊंच-नीच ला दी है। मैं खुद एक मुसलमान महिला हूं और वकालत के पेशे में हूं। मुझे कभी भी अपनी कायदे-कानूनों में कोई भी भेदभावपूर्ण व्यवहार महसूस नहीं हुआ। हमारे खुद के घर में हमारी अम्मी ने जायदाद को हम सब भाई-बहनों में बराबर किया है। निकाह, तलाक, विरासत जैसे और भी बेशुमार मुस्लिम नियम कानून को मीडिया, सियासी पार्टी और साथ ही कई ट्टाार्मिक नेताओं ने गलत तरीके से पेश किया है। तलाक को रजिस्टर कराने से वह व्यक्तिगत कानून में दखल अंदाजी होगी। इसके अलावा जो लिव इन रिलेशन मे है वो लोग खुद के रिलेशन को रजिस्टर करवाने के लिए आगे आने मे हिचकिचाहट महसूस करेंगे, क्योंकि इस तरह के रिलेशन को लोग निजी रखना चाहते हैं, ये लोगों की व्यक्तिगत जिंदगी में दखलअंदाजी है। इस कानून में खामियां ही खामियां है जिसे लोगों की बिना रजामंदी के जबरदस्ती लागू किया गया है।
खदीजा, अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट

बात अपनी-अपनी
अगर सदस्यों को समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक का अध्ययन करने के लिए पर्याप्त समय मिलता तो अच्छा रहता। सदन में पेश यूसीसी विधेयक पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए भाजपा नेताओं ने कहा था कि इस विधेयक को प्रस्तुत कर राज्य ने एक इतिहास बनाया है और सालों से देश में यूसीसी के लागू न हो पाने के लिए ‘तुष्टिकरण की
राजनीति’ को जिम्मेदार ठहराया जो गलत है। विधेयक में 392 धाराएं हैं, जिनका विस्तार 172 पृष्ठों में हैं और अच्छा होता कि अगर विपक्षी सदस्यों को इसे विस्तार में पढ़ने का पर्याप्त समय मिलता, जिससे सदन में इसके प्रावधानों पर सकारात्मक बहस हो पाती। इस विधेयक का मसौदा तैयार करने वाली समिति को इसमें विभिन्न धर्मों के विद्धानों की राय भी शामिल करनी चाहिए थी। भारत विविधता का देश है, जहां विभिन्न धर्मों के 10 विभिन्न नागरिक कानून हैं। विधेयक के प्रावधानों का अध्ययन करने के लिए उसे सदन की प्रवर समिति को सौंप दिया जाना चाहिए
यशपाल आर्य, नेता प्रतिपक्ष, उत्तराखण्ड

यूसीसी ठीक है लेकिन इसमें आदिवासियों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए था। खासकर उनके कस्टमरी लॉ की सुरक्षा होनी चाहिए थी। सिर्फ उधर से एक डंडा घुमा देने से देश नहीं हकेगा। इसके लिए जरूरी है कि पहले विभिन्न समूहों में रह रही उपजातियों की भी रक्षा की जानी चाहिए।
काशी सिंह ऐरी, अध्यक्ष, यूकेडी

उत्तराखण्ड में यह बिल कॉमन यानी समान रूप से लागू नहीं हो सकता, क्योंकि यह बिल सब पर लागू नहीं हो रहा है। जनजाति को इससे बाहर कर दिया गया है। इसलिए कॉमन शब्द को इसमें नहीं जोड़ सकते। इस बिल के जरिए क्रिमिनलाइजेशन किया जा रहा है वह चिंता की बात है। अगर सरकार समानता की बात करती है तो समान वेतन, समान शिक्षा और सामान स्वास्थ्य जरूर होने चाहिए जिसके लिए विधानसभा में बहस होनी चाहिए थी। लेकिन वह नहीं हुई। भाजपा सिर्फ यूसीसी के जरिए अपने चुनावी एजेंडा पर काम कर रही है। उत्तराखण्ड में इस समय भू-कानून जैसे सख्त कानून की जरूरत है लेकिन भाजपा यूसीसी के बहाने से जनता को मुद्दों से भटकाकर अपना वोट बैंक साध रही है।
पीसी तिवारी, अध्यक्ष, उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी

अंकिता भंडारी हत्याकांड, लोकायुक्त, बेरोजगारी, मूल निवास, भू-कानून जैसे मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए यूनिफार्म सिविल कोड लाया जा रहा है। इन सभी मुद्दों पर जनता लंबे समय से सड़कों पर आंदोलित है। दूसरी ओर यूसीसी के लिए कभी कोई आंदोलन तो दूर सांकेतिक धरना प्रदर्शन तक नहीं हुआ। भारतीय जनता पार्टी ने उत्तराखण्ड को हिंदुत्व की प्रयोगशाला बना दिया है। इस के अंतर्गत आने वाले अधिकांश प्रावधान पहले से ही संविधान मे प्रदत्त कानूनों की किसी न किसी धारा में आच्छादित है। यह केवल उत्तराखण्ड की जनता को हिंदू मुस्लिम में बांट कर हिंदू वोटों को ध्रुवीकृत करने का एक घटिया राजनीतिक स्टंट है।
शिवप्रसाद सेमवाल, राष्ट्रीय अध्यक्ष, राष्ट्रीय रीजनल पार्टी

यह बीजेपी का पुराना एजेंडा है। इसे लागू कर रहे हैं। लेकिन इसमें आदिवासियों को रिजेक्ट कर दिया गया है, जबकि यूसीसी का मतलब सबके साथ न्याय है। किसी वर्ग को छोड़ रहे हैं तो यह गलत है। किसी वर्ग को टारगेट कर रहे हैं यह भी गलत है। अगर किसी को रिजेक्ट कर दोगे तो वह यूनिफार्म कहां रहा। यह आपकी इंटेंशन ठीक होनी चाहिए थी जो नहीं दिख रही है। इससे संदेश यही जाएगा कि यह वोट बैंक की
पॉलिटिक्स है।
विनोद अग्निहोत्री, सलाहकार संपादक, ‘अमर उजाला’

 

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