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घोटालों और भ्रष्टाचार का गढ़ बने उत्तराखण्ड में सरकारी जमीन की लूट का एक अनोखा और हैरतनाक मामला ‘दि संडे पोस्ट’ ने अंक 26 में ‘सरकारी जमीन की अजब-गजब लूट’ नामक शीर्षक के जरिए उजागर किया था। इस समाचार के केंद्र में गौलापार के देवला तल्ला में 50 बीघा जमीन है, जिसे बेहद शातिराना तरीके से खुर्द-बुर्द किया गया। राज्य सरकार के स्वामित्व वाली इस जमीन का वर्तमान में बाजारी मूल्य लगभग सौ करोड़ के आस-पास है। इस ‘महाघोटाले’ को अंजाम तक पहुंचाने में सरकारी तंत्र की सक्रिय भागेदारी स्पष्ट रूप से सामने आती है।

इस घोटाले को सामने लाने का श्रेय हल्द्वानी निवासी एक आरटीआई एक्टिविस्ट रविशंकर जोशी को जाता है जिन्होंने सूचना के अधिकार को हथियार बना सारे प्रमाण जुटाने और उन्हें सार्वजनिक करने की सराहनीय और जोखिम भरी पहल की है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कड़े आदेश के चलते प्रशासन हरकत में आया और जांच शुरू की गई। इस घोटाले की जांच नैनीताल के मुख्य विकास अधिकारी की अध्यक्षता में गठित तीन सदस्यीय जांच कमेटी ने की थी। जांच कमेटी ने जो तथ्य उजागर किए हैं उसके अनुसार भू-स्वामी के पास पहले से ही 13.5 एकड़ से अधिक जमीन पक्की थी। विनियमितीकरण के बाद भूस्वामी की जमीन 20.92 एकड़ हो गई। इस मामले में नजराना जमा करने के पक्के सबूत जमा नहीं किए थे। तत्कालीन एसडीएम ने शपथ पत्र लेकर उसे सच मान लिया और इसकी जांच नहीं कराई। जमीन के नियमितीकरण होने से सरकार को करोड़ों रुपये की राजस्व की हानि हुई। जांच में खुलासा हुआ कि मामले में पटवारी खेड़ा ने भी गलत रिपोर्ट दी। तत्कालीन एसडीएम ने जांच नहीं की और शपथ पत्र को आधार मान लिया गया। जांच रिपोर्ट आने के बाद नैनीताल के जिलाधिकारी धीराज गर्ब्याल ने गत् 13 दिसंबर को इस जमीन का विनियमितीकरण निरस्त कर दिया है। साथ ही जमीन को सरकार में निहित करने के आदेश भी जारी कर दिए हैं। इस घोटाले में एक पीसीएस अधिकारी के साथ ही तत्कालीन उपजिलाधिकारी, कानूनगो और पटवारी की भूमिका सवालों के घेरे में है। जबकि जमीन खरीदने वालों में राजनीति में ऊंची पहुंच रखने वाले तथा शहर के नामचीन व्यापारी शामिल रहे हैं। जिन पर कार्यवाही की तलवार लटकी हुई है।

सरकारी जमीन की इस लूट में जिला प्रशासन की भूमिका पूरी तरह संदिग्ध रही है। तमाम नियमों को दरकिनार कर उक्त भूमि के कब्जे की अवधि के भू-राजस्व का बीस गुना तथा सर्किल रेट के हिसाब से 40 प्रतिशत धनराशि का नजराना लिए बगैर और जिस जमीन पर अवैध कब्जे को खाली कराए जाने का मुकदमा चला हो, बगैर सारे तथ्य की पड़ताल कराए 2011 में तत्कालीन डीएम द्वारा जमीन को वर्ग-4 से वर्ग-1(ख) में बदलना और 2016 में तत्कालीन डीएम द्वारा उसे वर्ग-1(ख) से वर्ग-1(क) में तब्दील करना जिला प्रशासन की भूमिका पर बड़े सवाल खड़ा करता है। ठीक इसी प्रकार जिस जमीन का मालिकाना हक पाने के लिए बलवंत सिंह दशकों से जुटा रहा हो, उसको जमीन का मालिकाना अधिकार मिलते ही दान कर देना भी पूरी तरह संदिग्ध है। यह भी समझ से परे है कि क्योंकर अपने पिता द्वारा दान में दी गई जमीन के कुछ हिस्से को मात्र 40-50 दिनों के भीतर ही बेटा भारी मूल्य चुकाकर वापस खरीदता है। रजिस्ट्री में भुगतान का पूरा विवरण न होने से भी संदेह पैदा होता है कि वाकई जमीन को खरीदा गया या फिर यह केवल कागजी कार्यवाही मात्र थी। तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल के पुत्र का बतौर खरीददार नाम सामने आने से यह शंका उत्पन्न होती है कि सारा खेल हरेंद्र सिंह कुंजवाल और अन्य रसूखदार लोगों द्वारा खेला गया जिसमें जिला प्रशासन के अधिकारियों की मिलीभगत रही।

यह शंका भी जन्म लेती है कि जिस रविकांत फुलारा के नाम बलवंत सिंह ने जमीन कथित रूप से दान की क्या उस रविकांत फुलारा के पास ही यह करोड़ों की रकम बनी रही या फिर ‘मनी लॉन्ड्रिग’ के जरिए यह रकम बलवंत सिंह के पास पहुंच गई। ऐसी शंका इसलिए क्योंकि ‘दान’ में मिली जमीन को करोड़ों में बेचने वाला रविकांत आज भी आर्थिक रूप से संपन्न नहीं है और वह करोड़ों का मालिक बन जाने बाद भी ऑटो चला अपना जीवन-यापन कर रहा है। ‘दि संडे पोस्ट’ को दिए अपने बयान में फुलारा ने दावा किया है कि उसके नाम से बैंक में एक खाता बलवंत सिंह द्वारा खुलवाया गया था।

इसी खाते में जमीन की खरीद-फरोख्त की रकम का आदान-प्रदान हुआ। फुलारा की मानें तो उसके पास इस आदान-प्रदान का मात्र एक लाख रुपया आया। बाकी रकम कहां गई पूछे जाने पर रविकांत फुलारा चुप्पी साध लेते हैं। प्रदेश सरकार के मुखिया पुष्कर सिंह धामी भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का दावा करते हैं जिस पर वह जांच कराकर खरे भी उतरे हैं। लगभग 100 करोड़ मूल्य की इस जमीन को खुर्द-बुर्द किए जाने का सच प्रशासनिक जांच में सामने आने के बाद अब देखना यह होगा कि धामी सरकार इस घोटाले में संलिप्त लोगों पर कब तक सिकंजा कसेगी।

निष्पक्ष और प्रभावी जांच के लिए जिलाधिकारी महोदय सहित जांच समिति के सभी सदस्यों का धन्यवाद। उत्तराखण्ड राज्य का शायद यह प्रथम प्रकरण है जिसमें भ्रष्टाचार के प्रकरण में इतनी तीव्र और बड़ी कार्रवाई हुई है। यह प्रकरण एक नजीर स्थापित करेगा। आम जनमानस में शासन का इकबाल पुनः स्थापित करने के लिए जिलाधिकारी नैनीताल मुक्तकंठ बधाई के पात्र हैं। शासन से अनुरोध है कि लोकहित में उक्त भूमि को बेसहारा, वृद्ध गौवंश के कल्याण हेतु आवंटित करना सर्वथा उचित रहेगा। भ्रष्टाचार के विरुद्ध मेरी लड़ाई का यह एक और सुखद परिणाम है, अब यह लड़ाई और ताकत से लड़ी जाएगी।
रविशंकर जोशी, शिकायतकर्ता

 

 

इस प्रकरण में जिसने भी झूठा शपथ पत्र दिया है उसके खिलाफ कार्यवाही होगी। जिन्होंने भी जमीन खरीदी है वह भी अवैध के दायरे में है। यह जमीन जल्द ही राज्य सरकार में आ जाएगी।
दीपक रावत, आयुक्त कुमाऊं

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