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आज तक उत्तराखण्ड का यह इतिहास रहा है कि कोई भी मुख्यमंत्री रहते जब उपचुनाव लड़ा तो वह हारा नहीं है। इसके मद्देनजर ही कैलाश गहतोड़ी के अपनी सीट से इस्तीफा देते समय लोगों में यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि धामी का यहां से जीतना तय है। लेकिन उनके लिए यह राह जितनी आसान लग रही है उतनी है नहीं। यहां कांग्रेस का मत प्रतिशत पहले की अपेक्षा बढ़ा है। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी रहे कैलाश गहतोड़ी को जहां 62.30 प्रतिशत मत मिले थे वही 2022 के विधानसभा चुनाव में उनका मत प्रतिशत का आंकड़ा 50.26 तक सिमट गया है

दो अप्रैल को चंपावत जिले के मां पूर्णागिरि दरबार में पहली बार प्रदेश का कोई मुख्यमंत्री हाजिरी लगाने पहुंचा था। वह थे पुष्कर सिंह धामी। तब मुख्यमंत्री धामी मां पूर्णागिरि के दरबार में पहुंचे तो थे मेले का शुभारंभ करने लेकिन यह उसी दिन तय हो गया था कि अपनी पूर्व विधानसभा क्षेत्र खटीमा की हारी बाजी जीतने की तैयारी है, जिसे वह मां पूर्णागिरि की जमीन से ही शुरू करेंगे। इसके 2 सप्ताह बाद 21 अप्रैल को भाजपा विधायक कैलाश गहतोड़ी ने विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। इसके बाद ही पुष्कर धामी का विधानसभा पहुंचने का रास्ता वाया चंपावत तय हो गया है। खटीमा से चुनाव हारने के बाद भी भाजपा हाईकमान ने पुष्कर धामी पर दूसरी बार विश्वास जताया। वह मुख्यमंत्री बने तो आधा दर्जन से अधिक विधायकों ने अपनी सीट से इस्तीफा देकर उन्हें वहां से चुनाव लड़ने का निमंत्रण दिया। इसमें सबसे पहले निमंत्रण देने वाले चंपावत विधायक कैलाश गहतोड़ी थे। धामी के मुख्यमंत्री बनने के बाद छह महीने के अंदर विधानसभा सदस्य बनना जरूरी है।

आज तक उत्तराखण्ड का यह इतिहास रहा है कि कोई भी मुख्यमंत्री रहते जब उपचुनाव लड़ा तो वह हारा नहीं है। इसके मद्देनजर ही कैलाश गहतोड़ी के अपनी सीट से इस्तीफा देते समय लोगों में यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि धामी का यहां से जीतना तय है। लेकिन उनके लिए यह राह जितनी आसान लग रही है उतनी है नहीं। अगर गहतोड़ी के विधानसभा चुनाव नतीजे से पहले आए बयान को देखें तो पता चलेगा कि यह सीट भितरघात के खतरे से खाली नहीं रही। उत्तराखण्ड में 14 फरवरी को मतदान के बाद और 10 मार्च के बीच परिणाम आने तक चंपावत विधानसभा सीट को लेकर भाजपा नेताओं में एक-दूसरे को आरोपित करने का दौर खूब चला था। इसकी पहल खुद विधायक गहतोड़ी ने ही की थी। उन्होंने बकायदा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। जिसमें कहा था कि उन्हीं की पार्टी के कुछ नेताओं ने उनके साथ भितरघात किया है। उस समय ‘दि संडे पोस्ट’ ने गहतोड़ी से इस बाबत बात भी की थी। तब भितरघात के आरोपों चलते गहतोड़ी अपनी जीत को लेकर आशंकित नजर आ रहे थे। हालांकि जब 10 मार्च को परिणाम आया तो वह कांग्रेस के हेमेश खर्कवाल से जीत चुके थे। हेमेश खर्कवाल को गहतोड़ी ने 5303 वोटों से हराया।

अगर मत प्रतिशत की बात करें तो यहां कांग्रेस का मत प्रतिशत पहले की अपेक्षा बढ़ा है। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी को मिले वोट का प्रतिशत 32.30 प्रतिशत था जो 2022 के विधानसभा चुनाव में बढ़कर 42.7 प्रतिशत हो गया। इसी तरह 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी रहे कैलाश गहतोड़ी को जहां 62.30 प्रतिशत मत मिले थे वही 2022 के विधानसभा चुनाव में उनका मत प्रतिशत का आंकड़ा 50.26 तक सिमट गया है। 2017 के विधानसभा चुनाव में हेमेश
खर्कवाल को हराकर कैलाश गहतोड़ी विधायक बने थे। तब गहतोड़ी ने खर्कवाल को 17360 वोटों से हराया था। जबकि 2022 के चुनाव में खर्कवाल से गहतोड़ी महज 5303 वोटों के अंतर से जीते। 2017 के विधानसभा चुनाव में गहतोड़ी 2022 के बनिस्बत 12000 ज्यादा वोट ले गए थे। चंपावत विधानसभा सीट पुष्कर धामी की पुरानी विधानसभा सीट खटीमा से लगी हुई है। इसका फायदा भी उन्हें मिलेगा। इस सीट पर करीब 85 प्रतिशत पहाड़ी मतदाता हैं और 15 फीसदी वोटर मैदान के हैं।
यहां यह देखना भी जरूरी होगा कि कांग्रेस इस उपचुनाव में किस नेता को टिकट देती है।

पूर्व में कांग्रेस के टिकट पर यहां से 5 बार चुनाव लड़ चुके हेमेश खर्कवाल फिर छठी बार चुनाव लड़ेंगे या कांग्रेस इस बार उम्मीदवार बदलेगी। हालांकि जिस तरह चुनाव पूर्व टिकट वितरण में भाजपा नेताओं में खेमेबाजी नजर आई थी और कैलाश गहतोड़ी का टिकट तय होने के बाद उनकी खिलाफत हुई थी। इसी तरह कांग्रेस में भी एक वर्ग ऐसा है जो हेमेश खर्कवाल को स्वीकार नहीं करता है। सवाल यह भी है कि वह कांग्रेसी जो वर्षों से टिकट की चाह में आस लगाए बैठे हैं क्या एक बार फिर खर्कवाल को वह मन से चुनाव लड़ा पाएंगे।

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