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Uttarakhand

प्रचंड जीत की तरफ बढ़ते धामी

चंपावत उपचुनाव में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की जीत तय मानी जा रही है। कांग्रेस इस चुनाव में महज उपस्थिति दर्ज कराती नजर आती है। धामी चुनावी रैलियों में कई मंत्रियों का लाव-लश्कर लेकर चल रहे हैं तो कांग्रेस प्रत्याशी के साथ महज हरीश रावत को छोड़ कोई करिश्माई चेहरा नहीं दिखाई दे रहा है। अधिकतर कांग्रेसी भाजपा में शामिल हो चुके हैं। यहां से पांच बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े हेमेश खर्कवाल चुनावी रस्म अदायगी निभाते दिख रहे हैं। खटीमा हार से सबक लेते हुए सीएम धामी ने इस चुनाव में पार्टी के जयचंदों की एंट्री बंद करा दी हैं। चंपावत में पूर्व विधायक कैलाश गहतोड़ी के साथ उनका विरोधी गुट भी धामी की जीत की राह आसान बनाने में जुटा है

राजा अर्जुन देव की बेटी चंपावती के नाम पर बना और चंद राजा की राजधानी रहे काली कुमाऊं के नाम से प्रसिद्ध चंपावत आजकल विधानसभा उपचुनाव होने के चलते चर्चाओं में है। यहां से उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी उपचुनाव लड़ रहे हैं। चंपावत में यह चुनाव जहां भाजपा के लिए आसान नजर आ रहा है तो वही कांग्रेस यहां से अपना अस्तित्व बचाने को जूझती हुई दिखाई दे रही है। देखा जाए तो चंपावत विधानसभा का उपचुनाव कांग्रेस के लिए चुनौती बन चुका है। इस चुनाव में भाजपा प्रत्याशी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की जीत लगभग तय मानी जा रही है। इसके साथ ही यह भी कहा जाने लगा है कि कांग्रेस ने इस चुनाव में भाजपा को वॉकओवर दे दिया है। हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने चुनाव से 7 दिन पहले चंपावत पहुंचकर वॉकओवर की बातों को अफवाह करार दिया है। उन्होंने कहा है कि उनकी पार्टी भाजपा को वॉकओवर नहीं दे रही है बल्कि भाजपा प्रत्याशी पुष्कर सिंह धामी को जबरदस्त टक्कर दे रही है। लेकिन जिस तरह से चंपावत में कांग्रेस प्रत्याशी निर्मला गहतोड़ी का साथ उन्हीं की पार्टी के लोग छोड़ रहे हैं उससे वह बेहद कमजोर मानी जा रही है।

बनबसा के रवि रावत की माने तो चंपावत विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस जीतने के लिए नहीं बल्कि अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही है। उनके अनुसार इस चुनाव में भाजपा प्रत्याशी पुष्कर सिंह धामी रिकॉर्ड तोड़ मतों से जीत हासिल करेंगे। इसके पीछे का कारण बताते हुए वह कहते हैं कि यहां से पूर्व में दो बार कांग्रेस के विधायक रहे हेमेश खर्कवाल और उनके टीम के कांग्रेसी नेता चुनाव में सिर्फ औपचारिकता निभाते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसके पीछे का एक कारण यह बताया जा रहा है कि जब कांग्रेस ने चंपावत उपचुनाव में अपना प्रत्याशी चुनने के लिए मीटिंग की थी उस समय कांग्रेस के अधिकतर नेता खर्कवाल के खिलाफ थे। गत आम विधानसभा चुनावों में भी स्थानीय कांग्रेस के नेताओं ने उनका विरोध किया था। स्थानीय कांग्रेस नेताओं का कहना था कि हेमेश खर्कवाल को छोड़कर किसी अन्य को भी टिकट दिला दिया जाए। इसके बाद हेमेश खर्कवाल अपने आप को उपेक्षित महसूस करते हुए न केवल मीटिंग से चले गए बल्कि उन्होंने यह तक कह दिया कि अब वह यहां से चुनाव नहीं लड़ सकते। उनके अलावा पार्टी किसी को भी प्रत्याशी बना ले। इसके बाद कांग्रेस ने चंपावत की पूर्व जिला अध्यक्ष निर्मला गहतोड़ी पर पर दाव लगाया। निर्मला स्थानीय लोगों के लिए नया नाम तो नहीं है लेकिन अधिकतर उन्हें जनता के बीच जाकर अपनी पहचान बतानी पड़ रही है।

चंपावत चुनाव में देखने में यह आ रहा है कि कांग्रेस के जितने भी स्थानीय नेता थे उनमें से अधिकतर भाजपा में चले गए है। अगर चंपावत विधानसभा के बनबसा और टनकपुर की बात करें तो यहां कांग्रेस के पास उंगलियों पर गिनने वाले सिर्फ दो नेता बचे हैं। जिनमें एक विमला सजवान है। बिमला सजवान पूर्व जिला पंचायत सदस्य रही हैं तथा उन्हें नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य की खेमे की बताया जा रहा है। इसके अलावा टनकपुर में एकमात्र पिंकी ही कांग्रेस के पदाधिकारी रह गए हैं। पिंकी वर्तमान में टनकपुर के कांग्रेस नगर अध्यक्ष हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो चुनाव परिणाम आने से पहले ही कांग्रेस भाजपा के सामने सरेंडर करती हुई दिखाई दे रही है। यहां टनकपुर से विपिन कुमार वर्मा और बनबसा के संजय अग्रवाल भी कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो गए हैं। विपिन कुमार वर्मा व्यापारियों के वरिष्ठ नेता हैं तथा संजय अग्रवाल नगर पंचायत बनबसा के चेयरमैन रेनू अग्रवाल के पति हैं। दोनों का टनकपुर और बनबसा में खासा असर बताया जाता है। इसके अलावा कांग्रेस के ही महेश चंद्र और सुधा बिष्ट भी पार्टी छोड़ भाजपा में शामिल हो गए हैं। व्यापार मंडल के नेता सत्यनारायण गोयल और आशु गोयल भी कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम चुके हैं। सिर्फ कांग्रेस के नेता ही भाजपा में शामिल नहीं हुए हैं बल्कि आम आदमी पार्टी के भी कई नेता इस चुनाव में भाजपाई हो गए हैं। इनमें दिलीप देवल और रुचि धस्माना का नाम प्रमुखता से सामने आ रहा है।

फिलहाल की स्थिति को देखे तो चंपावत विधानसभा सीट पुष्कर सिंह धामी के लिए काफी सुरक्षित मानी जा रही है। प्रदेश के गठन के बाद चंपावत सीट पर पांच बार विधानसभा चुनाव हुए हैं। जिनमें से तीन बार भाजपा और दो बार कांग्रेस ने जीत दर्ज कराई है। हालांकि भाजपा यहां से हर बार अपना प्रत्याशी बदलती रही है। जबकि दूसरी तरफ कांग्रेस से हेमेश खर्कवाल ही पांच बार से यहां चुनाव लड़ चुके हैं। उनकी एक टीम भी है। हालांकि उनकी टीम के अधिकतर सदस्य अब भाजपा में शामिल हो गए हैं। हेमेश खर्कवाल के बारे में कहा जा रहा है कि अगर पार्टी उन्हें अपना प्रत्याशी बनाती तो यहां से भाजपा प्रत्याशी पुष्कर सिंह धामी का एक तरफा जीतना मुश्किल हो जाता। तब हेमेश खर्कवाल पुष्कर सिंह धामी को टक्कर दे सकते थे।

उत्तराखण्ड गठन के बाद पहली बार जब 2002 में चुनाव हुए तो चंपावत सीट पर कांग्रेस के हेमेश खर्कवाल विधायक बने थे, जबकि दूसरे नंबर पर निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ने वाले मदन सिंह महाराणा रहे। 2002 के इस चुनाव में भाजपा तीसरे नंबर पर रही थी। इसके बाद 2007 में भाजपा के टिकट पर वीना महाराजा विधायक बनी थी। 2012 के चुनाव में कांग्रेस के हेमेश खर्कवाल दोबारा से विधायक बने थे। 2017 में कैलाश चंद्र गहतोड़ी भाजपा के टिकट पर विधायक चुने गए। 2022 में पार्टी ने एक बार फिर कैलाश गहतोड़ी पर दांव लगाया तो वह जीत दर्ज करने में सफल रहे। चंपावत सीट को भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता है। गत विधानसभा चुनाव में यहां से भाजपा के कैलाश गहतोड़ी ने कांग्रेस के हेमेश खार्कवाल को 5304 वोटों से हराया था। इस चुनाव में कैलाश गहतोड़ी को 32547 वोट मिले थे जबकि कांग्रेस के हेमेश खर्कवाल 27243 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे जबकि खर्कवाल को 2017 के विधानसभा चुनाव में महज 19000 वोट मिले थे।

भाजपा प्रत्याशी पुष्कर सिंह धामी के मैदान में जाने के बाद से ही स्थानीय लोगों में उत्साह का भाव देखा जा रहा है। स्थानीय लोग इस बात से बेहद खुश नजर आ रहे हैं कि उनके विधानसभा क्षेत्र से मुख्यमंत्री खुद चुनाव लड़ रहे हैं। इससे उनकी कई समस्याओं का हल हो जाएगा। जब पुष्कर सिंह धामी का उप चुनाव चंपावत से लड़ना तय हुआ तो शुरुआत उन्होंने वहा के प्रसिद्ध पूजा स्थल गोरखनाथ मंदिर से पूजा अर्चना करके की थी। इसके बाद जनसभा को संबोधित करते हुए धामी ने चंपावत के लिए घोषणाओं की झड़ी लगा दी। मुख्यमंत्री ने तब घोषणा करते हुए कहा था कि चंपावत को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा। साथ ही कहा कि प्रदेशभर के युवाओं को रोजगार से जोड़ा जाएगा। यही नहीं बल्कि यहां से चितई गोलज्यू के बीच कॉरिडोर का निर्माण करने की बात भी कही और वादा किया कि प्रदेश के विकास के लिए ठोस रणनीति बनाकर कार्य किया जाएगा।

इसके अलावा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने चंपावत में एआरटीओ कार्यालय खोलने, बनबसा में मिनी स्टेडियम निर्माण, अमोड़ी में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खोलने और मंच उपतहसील में जल्द कार्य शुरू करने का एलान किया था। इसी के साथ मुख्यमंत्री धामी ने टनकपुर इंजीनियरिंग कॉलेज को आईआईटी बनाने का प्रस्ताव केंद्र को भेजने और जिले को अखिल भारतीय स्तर पर पर्यटन मानचित्र पर लाने के लिए विशेष कार्ययोजना बनाए जाने की घोषणा भी की थी। पूर्णागिरि और देवी दुर्गा मंदिर का विकास कार्य प्राथमिकता के आधार पर करने का वादा भी किया तो चंपावत गोलू देवता घोड़ाखाल गोलू देवता और चितई गोलू देवता को मिलाकर एक विशेष गोलज्यू कारिडोर बनाने की महत्वपूर्ण घोषणा भी की। उसी दौरान मुख्यमंत्री धामी ने चंपावत के चाय बागान से हिंगला देवी मंदिर तक रोप-वे बनाने के लिए शीघ्र विभाग को निर्देशित करने की बात भी कही। चंपावत से चुनाव लड़ने से पहले ही यहां के वाशिंदों के लिए धामी ने विकास के रास्ते खोल दिए। इससे स्थानीय जनता गदगद है।

चंपावत विधानसभा का आधा से ज्यादा इलाका मैदानी क्षेत्र में स्थित है। यह इलाका बनबसा और टनकपुर में है। चंपावत सीट का 40 फीसदी हिस्सा पर्वतीय क्षेत्र में आता है और 60 फीसदी मैदानी क्षेत्र में है। मैदानी क्षेत्र के लोगों की एक सबसे बड़ी समस्या यह है कि उन्हें अपने किसी भी प्रशासनिक कार्य कराने के लिए चंपावत जाना पड़ता है। अगर बनबसा का कोई व्यक्ति चंपावत जाए तो उसे 160 किलोमीटर आना जाना पड़ता है। साथ ही अगर अधिकारी न मिले तो उनका आवागमन बेकार साबित होता है। यहां तक की बनबसा और टनकपुर के लोगों को अपने ब्लॉक में भी जाने के लिए 80 किलोमीटर का सफर तय करके चंपावत जाना पड़ता है। स्थानीय लोगों को यह उम्मीद है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी उनके ब्लॉक संबंधी कार्यों के लिए चंपावत की आवाजाही खत्म करा सकते हैं। इसी तरह चुनाव लड़ने से पहले ही जब आचार संहिता भी लागू नहीं हुई थी तब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने चंपावत विधानसभा क्षेत्र के लोगों के लिए ऐसी ही समस्या का निराकरण मंच उप तहसील बनाकर किया था। मंच उप तहसील बनने से स्थानीय लोगों की समस्याएं काफी हद तक कम हुई है। हालांकि अभी मंच उप तहसील का निर्माण होना बाकी है। चंपावत विधानसभा क्षेत्र में वैसे भी टनकपुर और बनबसा के मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

फिलहाल, खटीमा हार से सबक लेते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी चंपावत उपचुनाव में फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। इसका कारण भीतरघातियों का चुनाव में उनको हराना रहा। उन्हीं की पार्टी के कई जयचंदों ने खटीमा विधानसभा चुनाव में उनकी हार की तहरीर लिखी थी। पार्टी के ऐसे नेता हालांकि सभी की नजरों के सामने हैं। पिछले दिनों पार्टी ने हार के कारणों की समीक्षा भी कराई है। जिसमें उनका भीतरघात का मामला भी सामने आ रहा है। हालांकि पार्टी ने अभी भीतरघातियों के नाम उजागर नहीं किए हैं। इसकी वजह चंपावत उप विधानसभा चुनाव बताया जा रहा है। चंपावत का चुनाव समाप्त होने के बाद ऐसे भीतरघातियों पर कार्यवाही होनी तय है।

बहरहाल, चंपावत चुनाव में यह भी देखने को मिल रहा है कि खटीमा के पार्टी के ऐसे जयचंदों की एंट्री बंद करा दी गई है। जिस तरह से खटीमा और चंपावत विधानसभा की सीमा मिलती हुई है उससे भितरघातियों का विपक्षी पार्टी के साथ मिलकर कोई नया गुल न खिलाया जा सके, इस पर भी नजर रखी जा रही है। हालांकि यहां यह भी जानना जरूरी है कि चंपावत विधानसभा सीट पर गत विधानसभा चुनावों में भाजपा के तत्कालीन प्रत्याशी कैलाश गहतोड़ी ने चुनाव हो जाने के बाद और चुनाव परिणाम आने से पहले अपनी ही पार्टी के नेताओं पर भीतरघात के आरोप लगाए थे। इसकी संभावना इस चुनाव में दिखाई नहीं दे रही है। भाजपा के ही सूत्रों की मानें तो जिन पार्टी नेताओ पर गहतोड़ी ने भीतरघात के आरोप लगाए थे वह मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के चुनाव में तन्मयता से चुनाव लड़ाने के लिए सक्रिय हैं। एक तरफ पूर्व विधायक कैलाश गहतोड़ी हैं तो दूसरी तरफ वह गुट है जो गहतोड़ी का धुर विरोधी रहे हैं, लेकिन देखने में आ रहा है कि इस चुनाव में दोनों गुट एक मंच से तथा एक मन से मुख्यमंत्री धामी की जीत की राह तैयार कर रहे हैं।

 

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