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Uttarakhand

शिलान्यास तक सिमटा विकास

बीते इक्कीस बरसों के दौरान सत्ता पर काबिज हुए राजनेताओं ने विकास के नाम पर बड़ी-बड़ी परियोजनाओं को मंजूरी देने और चुनावी फायदा लेने की नीयत से ऐसी परियोजनाओं का शिलान्यास तो कर डाला लेकिन उन्हें हकीकत में बदलने का ईमानदार प्रयास नहीं किया। जखोली सैनिक स्कूल, देवप्रयाग में एनसीसी एकेडमी, लॉ यूनिवर्सिटी, कोस्टगार्ड भर्ती सेंटर, 660 मेगावाट की किसाऊ बिजली परियोजना और सामरिक महत्व की 135 किमी. लंगी टनकपुर-जौलजीवी सड़क परियोजना आदि इसका ज्वलंत उदाहरण है

हाल ही में रक्षा मंत्रालय ने देश में जिन 21 सैनिक स्कूलों को खोलने की मंजूरी दी है उनमें से एक सैनिक स्कूल उत्तराखण्ड में भी खुलना है। इसे देहरादून के भारूवाला स्थित जीआरडी वर्ल्ड स्कूल में बनना है। अभी प्रदेश में एकमात्र सैनिक स्कूल नैनीताल जनपद के घोड़खाल में है। यह सैनिक स्कूल कब तक बन पाएगा यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन एक दशक पूर्व रूद्रप्रयाग जनपद के जखोली में जिस सैनिक स्कूल को मंजूरी मिली थी वह अभी तक अस्तित्व में नहीं आ पाया है। वर्ष 2012-13 में जखोली में सैनिक स्कूल बनाने की मंजूरी मिली थी। स्कूल के लिए जखौली ब्लॉक के थाती ग्राम सभा के लोगों ने निशुल्क जमीन भी उपलब्ध कराई। वर्ष 2013 में तत्कालीन सैनिक कल्याण मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत ने इसकी घोषण की। अगस्तमुनि में इसका शिलान्यास भी हुआ। 11 करोड़ रूपए स्वीकृत हुए। इससे भूमि समतलीकरण, सड़क निर्माण का काम शुरू हुआ। फिर यह विवादों में घिर गया। 11 करोड़ रुपए तो खर्च हो हो गए लेकिन स्कूल नहीं बन पाया। यह परियोजना पूरी तरह राजनीति की भेंट चढ़ गई। इस सैनिक स्कूल निर्माण में धन के दुरुपयोग का मामला भी सामने आया है। अभी इसमें आवासीय भवन, बहुउद्देश्यीय सभागार, चारहदीवारी, छात्रवास, प्रशासनिक भवन सहित कई काम बाकी हैं। यह सैनिक स्कूल राजनीति की भेंट चढ़ गया। अभी तक इसका दो बार शिलान्यास एवं भूमि पूजन भी हो चुका है। 1300 नाली भूमि पर बनने वाले इस सैनिक स्कूल से प्रदेशवासियों ने बड़ी उम्मीदें लगाई थी लेकिन समय के साथ वह पूरी नहीं हो पाई।

एनसीसी अकादमी की मांग को लेकर पीएम को खून से लिखा गया पत्र

इसी तरह राष्ट्रीय महत्व के कई संस्थान एवं सड़कें भी अधर में लटकी हुई हैं। जिनमें देव प्रयाग में प्रस्तावित एनसीसी एकेडमी भी है। वर्ष 2015-16 में एनसीसी एकेडमी का पूर्व सीएम हरीश रावत और तत्कालीन मंत्री मंत्रीप्रसाद नैथानी ने इसका शिलान्यास किया लेकिन यह अभी तक अस्तित्व में नहीं आ पाया है। यही हाल कोस्टगार्ड भर्ती सेंटर, लॉ यूनिवर्सिटी, ट्रिपल आईटी केंद्र आदि शामिल हैं। कोस्टगार्ड भर्ती सेंटर की बात करें तो 28 जून 2019 को तत्कालीन सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने दून के कुआंवाला में कोस्टगार्ड भर्ती सेंटर का भूमि पूजन भी किया। गांव वालों ने इसके लिए पांच बीघा जमीन भी आवंटित की। कोस्टगार्ड के तत्कालीन डीजी राजेंद्र सिंह के प्रयासों से यह स्वीकृत हुआ था। यह देश का पांचवा भर्ती सेंटर था लेकिन यह काम अधर में ही लटका है। इसी तरह 3 मार्च 2019 को डोईवाला के रानीपोखरी में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी का शिलान्यास हुआ। इसके लिए रेशम विभाग की 10 एकड़ जमीन का चयन भी हुआ। यह भी कानूनी विवादों में फंस गया। दून के बालावाला में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आईसर) की स्थापना की घोषणा हुई थी। इसके लिए 106 एकड़ जमीन भी चिÐत हुई थी लेकिन वन आपत्ति के कारण यह भी लटका हुआ है। इसी तरह पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निंशक’ ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉरमेशन की घोषणा की थी। लेकिन इसके लिए जमीन नहीं मिल रही है। इसी तरह महिला विश्वविद्यालय, इंदिरा गांधी नेशनल ट्राइबल यूनिवर्सिटी के क्षेत्रीय कार्यालय भी अमल में नहीं आ पाए हैं। यही हाल सीमांत जनपद पिथौरागढ़ एवं चंपावत के बीच बनने वाली टनकपुर- जौलजीबी सड़क का भी है। सामरिक महत्व की 135 किमी लंबी इस सड़क को 2016 में स्वीकृति मिली थी। इस सड़क के बनने से चंपावत जिले के तल्लादेश के 22 ग्राम पंचायतों को लाभ मिलना था। लेकिन 6 साल बाद भी इस सामरिक महत्व की सड़क का निर्माण कार्य आधा-अधूरा ही लटका है।

बाउंड्री वॉल तक सीमित जखोली स्थित सैनिक स्कूल

यही हाल बिजली परियोजनाओं का भी हैं ऊर्जा प्रदेश खुद बिजली को तरस रहा है। 660 मेगावट की किसाऊ परियोजना अभी तक धरातल में नहीं उतर पाई है। इस योजना की रफ्तार देखिए। वर्ष 1965 में इस प्रोजेक्ट की प्री फिजिबिलिटी रिपोर्ट तैयार हुई। उसके 33 साल बाद जाकर इसकी डीपीआर बननी शुरू हुई। उसके बाद डीपीआर की फाइल इधर से उधर दौड़नी शुरू हुई जो अभी भी जारी है। 2006 तक यह फाइल टीएचडीसी के पास रही। फिर वर्ष 2010 में यह उत्तराखण्ड जल विद्युत निगम के पास आई। वर्ष 2016 में हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखण्ड सरकार के बीच एमओयू साइन हुआ। इसी कार्य में ही अब तक 11,550 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, लेकिन योजना धरातल में उतरने से अभी भी कोसों दूर है। यही हाल अन्य बिजली परियोजनाओं का भी है। 9600 मेगावाट के 70 प्रोजेक्ट सुप्रीम कोर्ट में लटके हैं। राज्य के पास 25 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता है लेकिन उत्पादन हो रहा है मात्र 4000 मेगावाट का। ऊर्जा प्रदेश को बिजली की सुचारू आपूर्ति के लिए महंगी दरों पर बाहरी राज्यों से बिजली खरीदनी पड़ रही है।

कई अस्पताल, एनएनएम सेंटर, पंचायत भवन, बहुउद्देश्यीय पार्क सहित कई विकास के ढांचे ऐसे हैं जिनके निर्माण में लाखों-करोड़ों रुपए खर्च हो चुका है लेकिन वह जनता के नाम नहीं आ पा रहे हैं। विभागीय नियमों की जटिलताओं के कारण कई भवन हस्तांतरित न होने से खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। कुछ तब्दील होने के कगार में हैं। लाखों-करोड़ों रुपयों की यूं ही बर्बादी 2होती रहती है लेकिन ऐसा कोई मॉनीटरिंग सिस्टम नहीं है जो जनता के इस धन को बर्बाद होने से बचा ले।

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