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Uttarakhand

महिलाओं के लिए असुरक्षित होती देवभूमि

वर्ष 1993 में पहली बार कार्यस्थल पर यौन शोषण रोकने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ‘विशाखा गाइड लाइंस’ जारी की थी। 16 बरस बाद संसद ने 2013 में इस बाबत कड़ा कानून बनाया। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और सरकार द्वारा कड़ा कानून बनाने के बाद भी कार्यस्थल पर यौन शोषण की घटनाएं कम नहीं हो रही हैं। उत्तराखण्ड में तो हालात इतने खराब हैं कि पीड़ित महिलाओं की शिकायत या तो दर्ज नहीं होती हैं या फिर ऐसी शिकायतों को रफा-दफा करने का खेल खेला जा ता है। ‘दि संडे पोस्ट’ के पास दो ऐसे मामले आए हैं जिनमें तमाम प्रमाण होने के बावजूद दोषी व्यक्तियों के खिलाफ कार्यवाही से सरकार बचती नजर आ रही है

देश में हर दिन महिलाएं अपने दफ्तरों में किसी न किसी तरह से यौन उत्पीड़न का सामना करने को मजबूर होती है। ‘वुमेंस इंडियन चैंबर ऑफ कमर्स एंड इंडस्ट्री’ की एक सर्वे अनुसार भारत में 68 .7 प्रतिशत महिलाएं ऐसी हैं जिन्होंने डर कर अपने कार्यस्थल पर होने वाले यौन उत्पीड़न की लिखित या मौखिक शिकायत दर्ज नहीं कराई है। सर्वे के अनुसार कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न कामकाजी महिलाओं के लिए देश में एक बड़ी समस्या बन चुका है। देश में आए दिन किसी न किसी ऑफिस में कोई न कोई महिला इस समस्या से सामना करती है। इस सर्वे से यह भी सामने आया है कि पीड़िताओं द्वारा यौन शोषण की शिकायत न कराने का मुख्य कारण कानूनी प्रक्रिया में विश्वास की कमी, अपने करियर के प्रति चिंता और लंबी अवधि तक जांच किए जाने के बावजूद भी आरोपियों को कोई सजा नहीं मिल पाना है।

कुछ ऐसा ही हो रहा है उत्तराखण्ड की अस्थाई राजधानी देहरादून की एक युवती के साथ। यह युवती रूडकी स्थित राजकीय मुद्रणालय में कार्यरत है। युवती के साथ पिछले कई महीनों से उनका ही एक सीनियर ऑफिसर यौन शोषण का प्रयास कर रहा है। उक्त अधिकारी द्वारा युवती के साथ न केवल अश्लील हरकतें की गई बल्कि पोर्न वीडियो भी दिखाई गई और प्यार का झूठा दिखावा कर उसे प्रताड़ित किया गया। यही नहीं बल्कि आरोपी अधिकारी द्वारा युवती को घंटे तक अपने ऑफिस में जबरन बिठाए रखना और अश्लील हरकतें करने के साथ ही निजी अंगों को छूने की नापाक कोशिश की गई।

पीड़िता ने अपने इस सीनियर अधिकारी की करतूतों से तंग आकर 17 फरवरी 2021 को इस मामले की शिकायत अपने विभाग के सभी अधिकारियों से की। जिसमें पीड़िता ने आरोपी अधिकारी का नाम सर्वेश कुमार गुप्ता बताया है। गुप्ता रुड़की स्थित राजकीय मुद्रणालय में अपर निदेशक पद पर तैनात है। इस मामले को पीड़िता द्वारा कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के तहत बताते हुए अपने साथ न्याय की गुहार लगाई है। यहां यह भी बताना जरूरी है कि विशाखा गाइडलाइन के अनुसार किसी भी कार्यस्थल पर किसी कर्मचारी का उत्पीड़न होने का मामला गंभीर माना जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने देश के सभी सरकारी, अर्द्धसरकारी तथा असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे लोगों खासकर महिलाओं के यौन उत्पीड़न संबंधी शिकायतों के निपटारे के लिए विशाखा गाइडलाइन बनाई थीं। 16 बरस बाद इन गाइड लाइन पर आधारित कानून 2013 में ‘महिलाओं का यौन उत्पीड़न (निवारण, निषेद्य एवं निदान) अधिनियम संसद में पारित किया गया। हालांकि जिस तरह से इस मामले में शिकायत होने के 8 महीने बाद भी मामले को लटकाया जा रहा है उससे लगता नहीं है कि यहां विशाखा गाइडलाइन का पालन किया जा रहा है।

‘दि संडे पोस्ट’ के पास उपलब्ध जानकारी के अनुसार महीनों तक युवती के साथ उक्त आरोपी अधिकारी उत्पीड़न करता रहा। यहां तक की पीड़िता को उसने अपने कमरे में अकेले बुलाकर न केवल उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की, बल्कि उसे धमकाते हुए कहा कि उसको उसके साथ कहीं बाहर चलना पड़ेगा। आज नहीं तो 6 महीने बाद। यही नहीं बल्कि वह पीड़िता पर जबरन हां कराने को धमकाने लगा। इस पर जब पीड़िता ने हामी नहीं भरी तो उसने यह कहकर डराने की कोशिश की कि उसकी बात मानोगे तो उसको इस कार्यालय में कोई भी परेशान नहीं करेगा अन्यथा वह उसका नौकरी करना दुश्वार कर देगा। उत्पीड़ित युवती द्वारा अपने साथ हो रहे उत्पीड़न की बकायदा वीडियो भी बनाई गई है। यह वीड़ियो भी जांच अधिकारियों के समक्ष दी गई है।

यौन शोषण के इस गंभीर मामले की आधा दर्जनों से अधिक लोगों से कराई गई जांच में सीनियर ऑफिसर को आरोपी मानते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई करने की अनुशंसा की गई। विभागीय जांच में दोषी अधिकारी फिलहाल निलंबित कर दिए गए हैं। हालांकि जांच रिपोर्ट में उनको बर्खास्त किए जाने की बात कही गई लेकिन राज्य सरकार ऐसा करने से बच रही है।
पीड़िता का कहना है कि आरोपी अधिकारी अपने रसूख के बल पर मामले को लटकाए हुए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि प्रदेश के एक कैबिनेट मंत्री इस मामले पर पीड़िता को न्याय दिलाने की बजाय रफा-दफा करने की कोशिशों में जुटे हैं। सूत्रों के अनुसार विभागीय मंत्री के स्तर पर इसे मामूली घटना मानते हुए दोषी अधिकारी को ‘माइनर पेनालटी’ दिए जाने का आदेश दिया गया है। फिलहाल पीड़िता और उसका परिवार सीनियर ऑफिसर के आतंक से भयभीत हैं। पीड़िता को इस मामले में इतना मानसिक आघात पहुंचा है कि वह घटना के शुरुआत के दिनों से अब तक जान माल का भय मान कर कार्यालय जाने में असुरक्षित महसूस कर रही है। इसके चलते ही कुछ अर्से तक पीड़िता कार्यालय से अवकाश लेकर घर बैठ गई। पीड़िता इतनी परेशान हो गई है कि वह नौकरी से इस्तीफा देने या न्याय न मिलने पर आत्मदाह करने तक की बात भी कर रही है।

इस मामले में आधा दर्जन अधिकारियों द्वारा जांच की गई। यह जांच 27 मई 2021 को रुडकी के उप जिलाधिकारी द्वारा हरिद्वार जिलाधिकारी को भेज दी गई। जिसमें अधिकतर जांचकर्ताओं ने पीड़िता के पक्ष में अपनी राय दी है तथा आरोपी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही है। ‘दि संडे पोस्ट’ के पास इस मामले में की गई जांच के दस्तावेज मौजूद हैं। जिसमें कुल नौ अधिकारियों ने अपनी जांच में जो विवरण दिया है उसके अनुसार राजकीय मुद्रणालय रुडकी के डायरेक्टर सर्वेश कुमार गुप्ता पर पीड़िता द्वारा लगाए गए आरोपों को गंभीर माना गया है।
हरिद्वार के जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) इंद्रपाल बेदी ने अपनी जांच रिपोर्ट में लिखा है कि ‘मेरी राय में नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों को दृष्टिगत रखते हुए शिकायतकर्ती द्वारा प्रस्तुत वीडियो क्लिपिंग की प्रमाणिकता आदि के संबंध में वैधानिक रूप से एफएसएल द्वारा जांच कराया जाना उचित होगा। जिससे सही निष्कर्ष पर पहुंच कर उचित कार्यवाही संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध की जा सके।’

हरिद्वार की ‘संस्कार सेवा समिति‘ की अध्यक्ष कमला जोशी अपनी जांच में कहती हैं कि ‘मेरे विचार से सर्वेश गुप्ता की भूमिका इस प्रकरण में संदिग्ध है। उन्होंने पीड़िता को प्रताड़ित किया है। सर्वेश कुमार गुप्ता के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।’ हरिद्वार स्थित चौनराय महिला अस्पताल की महिला चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर कल्पना खरे की जांच रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि ‘जिस तरह की बातचीत सर्वेश गुप्ता पीड़िता के साथ करते थे वह अशोभनीय है। एक सीनियर ऑफिसर को अपनी सह महिला कर्मचारी के साथ ऐसी बातचीत नहीं करनी चाहिए।’ ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ हरिद्वार की ब्रांड एंबेसडर डॉ मनु शिवपुरी ने अपनी जांच रिपोर्ट में कहां है कि ‘इस केस में मेरी राय प्रथम दृष्टया पीड़िता द्वारा लगाए गए आरोपों को सही ठहराते हैं। जिसमें कार्यस्थल पर छेड़छाड़ एवं शोषण के मामले में पीड़िता द्वारा दिखाए गए साक्ष्यों द्वारा सत्य प्रतीत हो रहा है। सर्वेश गुप्ता द्वारा किया गया बर्ताव एक महिला कर्मचारी के लिए किसी भी दृष्टि से सही नहीं है। आरोपी जबरन एवं बहला-फुसलाकर वह समझाते हुए संबंध बनाने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं जो कानूनी रूप से सजा का प्रावधान रखता है। किसी भी स्थिति में कानून महिला कर्मचारी से इस प्रकार की बात करना एक दंडनीय अपराध मानता है। साथ ही संस्थान के अन्य कर्मचारियों के द्वारा दिए गए बयान पर सर्वेश गुप्ता का व्यवहार सभी के साथ भी खराब दिखाई दे रहा है। सबकी सी आर खराब करना, पदोन्नति रोकना, चरित्र पंजीका खराब करना, प्रत्येक कर्मचारी का उत्पीड़न करना सर्वेश गुप्ता के लिए आम बात है। तीसरी बात यह है कि पीड़िता का बार-बार घंटों तक गुप्ता के ऑफिस में बैठना या बैठा न दोनों कानूनी रूप से गलत है।’

हरिद्वार के जिला समाज कल्याण अधिकारी नरेंद्र यादव अपनी जांच में कहते हैं कि ‘पीड़िता ने स्पाई कैम से विभिन्न कारणों से अपने और गुप्ता के मध्य हुए संवाद को रिकॉर्ड किया है तथा समिति के समक्ष प्रस्तुत किया है। हालांकि इनकी सत्यता पर गुप्ता ने अपने लिखित बयान में शंका की है जो कि तकनीकी जांच का विषय है। परंतु प्रथम दृष्टया यह वीडियो ऑडियो सत्य प्रतीत होते हैं। रेडियो एवं ऑडियो में सर्वेश गुप्ता की पहचान हो चुकी है। ऐसा ही एक वीडियो समिति द्वारा सर्वेश गुप्ता को दिखाया गया। वीडियो में ‘तुम्हें मेरे साथ चलना ही पड़ेगा आज नहीं, 6 महीने बाद सही। जब सब मामला सेट हो जाएगा तब तुम्हें आज नहीं तो कल मेरी बात माननी ही पड़ेगी। ‘बटरफ्लाई तरह से करेंगे’, ‘ऊपर ऊपर से करेंगे।’ ऐसी बातें सर्वेश गुप्ता के द्वारा करते साफ-साफ सुना जा सकता है। वीडियो देखने के बाद गुप्ता ने स्पष्ट किया कि वीडियो में जो व्यक्ति है वह स्वयं है। इस तरह की बातें किसी भी स्थिति में किसी महिला से कहना और वह भी कार्यालय समय और कार्यालय कक्ष में। वह सभी प्रकार से अभद्र है और महिला कर्मचारी को प्रताड़ित करने की श्रेणी में रखा जाना उचित है।

जिला समाज कल्याण अधिकारी नरेंद्र यादव अपनी जांच में मानते हैं कि ‘सर्वेश गुप्ता प्रथम दृष्टा पीड़िता से अभद्र एवं अनर्गल भाषा का प्रयोग करने एवं एक महिला कर्मचारी के मान सम्मान को आहत करने के दोषी हैं। सर्वेश गुप्ता के विभागाध्यक्ष रहते हुए कर्मचारियों में रोष व्याप्त है तथा महिला कर्मचारियों के लिए यहां कार्य वातावरण बेचैन करने वाला है।’
जिला कार्यक्रम अधिकारी देव सिंह ने अपनी जांच रिपोर्ट में लिखा कि ‘जिन आरोपों का उल्लेख किया गया है उसका समुचित जवाब अथवा खंडन के समर्थन में सर्वेश कुमार गुप्ता द्वारा कोई भी ठोस साक्ष्य या अभिलेख समिति के सामने प्रस्तुत नहीं किया गया। सोमपाल सिंह तोमर, सीमा, पितांबर लाल, महाराज सिंह सैनी, तरुण कुमार, सपना, राजू कुमार, सचिन कुमार आदि राजकीय मुद्रणालय के कर्मचारी है। जिन्होंने लिखित रूप में यह स्वीकार किया है कि पीड़िता को सुरेश कुमार गुप्ता द्वारा अनावश्यक रूप से अपने कक्ष में बुलाकर घंटों बैठा कर रखा जाता था, जोकि शासकीय कार्य अवधि का दुरुपयोग है।’

हरिद्वार की जिला उद्योग केंद्र की महाप्रबंधक पल्लवी गुप्ता ने अपनी जांच रिपोर्ट में आरोपी अधिकारी को दोषी माना है। उन्होंने कहा है कि ‘अधिकांश कर्मचारियों जिनमें महिला कर्मचारी भी शामिल हैं, द्वारा सर्वेश कुमार गुप्ता के अभद्र व्यवहार एवं द्विअर्थी भाषा का प्रयोग करना स्वीकार किया गया है तथा यह भी महसूस किया गया है कि उनके विभागाध्यक्ष रहने से
महिलाओं के लिए कार्य स्थल पर असहजता आई है। यह कृत्य सभी प्रकार से अभद्र और महिला कार्मिकों की प्रताड़ित करने की श्रेणी में रखा जाना सर्वथा उचित है। अधिकांश कर्मचारियों में गुप्ता के प्रति रोष है इसके चलते कार्यालय में सौहार्दपूर्ण वातावरण का अभाव है।’

यहां यह भी बताना जरूरी है कि यह मामला हरिद्वार के नगर पुलिस अधीक्षक के पास 14 अप्रैल 2021 को पहुंचा। इसके बाद पुलिस के नगर अधीक्षक ने एक रिपोर्ट रुडकी के ज्वाइंट मजिस्ट्रेट को सौंपी है। जिसमें पुलिस अधीक्षक ने कहां है कि रुड़की के राजकीय मुद्रणालय में कर्मचारियों और अधिकारियों के बयान ले लिए गए हैं। यहां साक्ष्य मिलने के बाद कार्यालय विभाग के अध्यक्ष सर्वेश कुमार गुप्ता द्वारा पीड़िता को अपने कार्यालय में बुलाना और देर तक बैठाया जाना तथा कार्यालय में कार्यरत कर्मचारियों के साथ उनका आचरण प्रथम दृष्टा उचित प्रतीत नहीं हो रहा है। जिसकी पुष्टि वह मुद्रणालय के कर्मचारियों के बयान के आधार पर कर रहे हैं। इस प्रकरण में पीड़िता द्वारा एक स्पाई कैमरा के द्वारा बनाई गई ऑडियो तथा वीडियो की रिकॉर्डिंग की प्रमाणिकता को लेकर पुलिस अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं कर पाई है बल्कि उन्होंने इस स्पाई कैमरा के ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग की प्रमाणिकता को एफएसएल कराए जाने की बात कह कर मामले को लटका दिया है। हरिद्वार के पुलिस अधीक्षक ने 24 अप्रैल को इस मामले पर अपनी रिपोर्ट देते हुए कहा है कि ‘जब तक ऑडियो वीडियो की एसएसएल की प्रमाणिकता सामने नहीं आ जाती है तब तक अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सकता है।’ मतलब यह है कि पुलिस इस मामले में ऑडियो वीडियो की जांच कराए जाने के बाद ही आरोपी अधिकारी के खिलाफ
कार्रवाई कर सकेगी। लेकिन 6 महीने बाद भी पुलिस इस मामले में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ी है। पीड़ित युवती के परिजनों का कहना है कि विश्व हिंदू परिषद् से जुड़े एक वरिष्ठ नेता सुनील जी ने उनसे ‘ले-देकर’ मामला रफा-दफा करने का दबाव बनाया है।

बात अपनी-अपनी
इस मामले का हमें पता है लेकिन जो कार्यवाही के बारे में आप पूछना चाहते हैं उसके बारे में हम अभी नहीं बता पाएंगे। क्योंकि हम ऑफिस से बाहर है। प्रक्रिया कहां तक पहुंची है यह फाइल देखकर ही बता पाऊंगा।
उमेश नारायण पाण्डेय, अपर सचिव उद्योग एवं निदेशक राजकीय मुद्राणालय रुड़की

मैंने जो कुछ बोलना है वह जांच समिति के सामने बोल दिया हैं जो भी निर्णय करेगी जांच समिति ही करेगी। मामला पेंडिंग में क्यों पड़ा है यह तो अधिकारी ही बता पाएंगे।
सर्वेश गुप्ता, अपर निदेशक राजकीय मुद्राणालय रुड़की

हमारा एक कार्यकर्ता था, उन्होंने हमसे कहा तो हमने बात की थी। हमने पीड़ित पक्ष पर कोई दबाव नहीं डाला बल्कि हमने तो यह कहा कि दोनों पक्ष बैठकर बता कर लीजिए। वो लोग हमारी बात नहीं माने तो हमने आगे बात नहीं बढ़ाई। हमने सिर्फ एक बार बात की है और जिस कार्यकर्ता ने बात कराई हमें उनका नाम ध्यान नहीं आ रहा है।
सुनील जी, नेता विश्व हिंदू परिषद्

शिकायत की तो नौकरी से निकाल दिया
देहरादून में ही एक अन्य यौन शोषण का मामला प्रकाश में आया है। राजकीय महिला पॉलिटेक्निक, सुद्धोवाला में एक सुरक्षाकर्मी पिछले 8 वर्षों से कार्यरत थी। दिसंबर 2020 में इस महिला सुरक्षाकर्मी ने थाना प्रेमनगर देहरादून में पॉलिटेक्निक कॉलेज के प्रधानाचार्य प्रवीण कुमार अरोड़ा पर यौन शोषण के आरोप लगाए। इस पत्र की प्राप्ति के बाद भी थाना प्रेमनगर ने कोई कार्यवाही नहीं की, उल्टे अप्रैल 2021 में प्राचार्य द्वारा इस महिला को ही नौकरी से बाहर कर दिया गया। महिला का आरोप है कि प्राचार्य प्रवीण कुमार अरोड़ा के दुराचरण की शिकायत जब संस्थान के वार्डन से की गई तो प्राचार्य ने वार्डन को ही उनके पद से हटा डाला। इतना ही नहीं अरोड़ा ने पीड़िता को धमकाया भी कि वह अब उसके खिलाफ भी कड़ा कदम उठाएगा।
पीड़िता ने इस प्रकरण की शिकायत प्रेमनगर थाने के अतिरिक्त पुलिस मुख्यालय में भी की है लेकिन वहां से भी कोई कार्यवाही अभी तक नहीं की गई है। पीड़िता का कहना है कि उसके पास प्राचार्य अरोड़ा एवं संस्थान के सुरक्षा अधिकारी मनोज कुमार की ऑडियो रिकॉर्डिंग मौजूद है जिसके जरिए उसके द्वारा लगाए गए आरोपों को प्रमाणित किया जा सकता है। मई, 2021 में पुलिस मुख्यालय द्वारा पीड़िता की शिकायत एसएसपी, देहरादून को फॉरवर्ड की गई थी लेकिन एसएसपी स्तर से भी कोई कार्यवाही नहीं की गई है। आरटीआई से मिली जानकारी अनुसार वर्तमान में यौन उत्पीड़न के 55 मामले पुलिस के पास लंबित चल रहे हैं।

बात अपनी-अपनी
इस मामले में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है। मै। इस थाने में अभी आया हूं। मैं इस मामले की पूरी जानकारी लेने के बाद ही कुछ कह पाऊंगा।
कुलदीप पंत, थानाट्टयक्ष प्रेम नगर देहरादून

मुझे इस मामले का पता नहीं है, किसी ने मेरे पास ऐसी कोई शिकायत नहीं भेजी है। अगर शिकायत आएगी तो हम इस मामले की जांच कराएंगे।
हरि सिंह, निदेशक प्रावट्टिाक शिक्षा परिषद उत्तराखण्ड

इस मामले में प्रेम नगर की एसआई ने जून 2021 में ही अपनी जांच में क्लीन चिट दे दी है। महिला जांच अधिकारी ने स्पष्ट कहा है कि यह सब अपनी नौकरी बचाने के लिए किया गया। रही बात नौकरी से निकालने की वह युवा कल्याण मंत्रालय का काम है। वह पीआरडी जवान को हर 6 महीने में रोट्रेट करते रहते हैं। उस प्रक्रिया के तहत ही उन्हें निकाला गया। एसआई की जांच में यह भी स्पष्ट है कि चार अन्य लोगों को भी ऐसा करने के लिए दबाव दिया गया। जिस समय के आरोप है तब मेरा हार्ट का ऑपरेशन हुआ था और मैं बेड पर था।
प्रवीण कमार अरोड़ा, प्रधानाचार्य

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