[gtranslate]
लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ने के दौरान चैक वाले जुम्मन चाचा की पतंग का बड़ा जिक्र सुनता था। यदा- कदा दोस्तों की गप-शप में हम कह देते थे, अब भाई, तू जुम्मन चाचा की पतंग उड़ा रहा है। लखनऊ के चैक बाजार में पतंग उड़ाने की प्रतियोगिता होती थी। चाचा जान पान की गिलोरियां चबाते-चबाते सुबह, मुंह अंधेरे ही अपनी पतंग उड़ा देते थे। जब तक पतंगबाज इक्कठा होते, चाचा की पतंग इतनी ऊंची उड़ जाती थी कि उसे काटना तो छोड़ो, पतंगबाज देख भी नहीं पाते थे।
चाचाजान हर वर्ष पतंग उड़ाते थे और हर बार उनकी पतंग का रंग बदला हुआ होता था। ऐसी ही एक ‘इन्वेस्टमेंट’ पतंग अभी-अभी देहरादून से उड़ी है। इंवेस्टमेंट की रंगीन पतंग, आलोचक कुछ भी कहें, पतंग एक लाख पच्चीस हजार फीट ऊंची उड़ गई है। लोग अंदाज लगाने में लगे हैं, इस देहरादुनिया जुम्मन का उस्ताद कौन है। छोटे जुम्मन के इर्द-गिर्द वालों ने बताया, यह और कोई नहीं है, देश के चैकीदार हैं। सचमुच देश के चैकीदार में चैक वाले जुम्मन चाचा की आत्मा अपने सभी पतंगबाजी के गुणों के साथ विराजमान है। देखते नहीं हो, चैकीदार साहब की पतंगें कितनी ऊंची-ऊंची उड़ रही हैं। तमाशबिनों का काम है सवाल उठाना, उठाते रहें, मगर देश के चाचा जुम्मन अपनी हर पतंग को ऊंची उड़ाने में लगे हैं। हर बार पतंग का रंग बदलने का भी ख्याल रखते हैं। 2014 में हर खाते में 15 लाख रुपए वाली सुनहरे रंग की पतंग उड़ाई, देखा कमाल, पतंग इतनी ऊंची उड़ाई कि लोगों की गर्दन नजरें गढ़ाए-गढ़ाए अकड़ गई और देश के चाचा ने न्यूनतम रकम वाले खातों से चुपके से इतनी रकम निकाल ली, अकड़ी गर्दन की मालीश के लिए तेल खरीदने के पैसे भी खाते में नहीं छोड़े। एक काली-काली पतंग भी उड़ाई, कालेधन वाली। वाह क्या कमाल की उड़ाई, हर हिंदुस्तानी के गाढ़े पसीने की कमाई काली दिखने लगी। पतंग ऐसी उड़ी, रिजर्व बैंक एव आदरणीय बाबा रामदेव बैंक के अनुसार सारा काला धन सफेद हो गया है। पतंग इतनी ऊंची उड़ा दी कि हम देखने वालों ने भी मान लिया है कि पतंग का रंग अब सफेद हो गया है। इन नए चाचाजान ने एक रंग- बिरंगी पतंग उड़ाई, जिसका नाम रखा, हर साल दो करोड़ नौकरी। धन्य हो, देश के नए जुम्मन चाचा। पतंग ऐसी उड़ी की नौकरी खोजने वाला चार साल से पतंग के रंग गिनने में लगा है। अब चाचाजान ने कह दिया है, 2022 के बाद यह पतंग धरती पर उतरेगी। भले ही तब तक धरती पर लैंडिग स्पेस न बचे, मगर चाचा हैं भाइयो-बहनों कहते-कहते पतंग उड़ाए जा रहे हैं। जब पतंग की डोर उनके हाथ में है, चिंता काहे की। पतंग उड़ती रहेगी। आमदनी ड्योड़ी वाली हरी-हरी पतंग को देखो न क्या चाव से उड़ाई है। बेकूफ हैं लोग, उड़ती पतंग देखने के बजाय पुलिस का डंडा खा रहे हैं। क्या बात है, यदि धान का न्यूनतम मूल्य नहीं मिल रहा है, जब तक पतंग उड़ रही है, मगन रहो। दिख नहीं रहा है क्या, अभी तक अच्छे दिन वाली स्वपनिल रंगवाली पतंग, लगातार ऊंची उड़ रही है या नहीं। क्या हुआ यदि 400 रुपए का गैस सिलेंडर 957 रुपए में खरीदना पड़ रहा है, पेट्रोल-डीजल के दाम रोज बढ़ रहे हैं या मिट्टी तेल गायब हो गया है। उज्वला का बोर्ड है, उसे देखो, पढ़ो और आसमान पर उड़ती पतंग पर नजर टिका दो। चाचा-चाचा गाते रहो, पूरा योग मुद्रा में गाओ, चिंता न करो। अपने इन देश वाले जुम्मन चाचा ने अभी पिछले साल ही मुद्रा नाम की पंतग उड़ाई है। ऐसी चमत्कारी पतंग है कि जितनी कुल मुद्रा, बैंकों ने कर्ज नहीं दी, चाचाजान ने उससे अधिक संख्या में लोगों को रोजगार दे दिया है। इसकी घोषणा कर दी है। घोषणा भी लाल किले की मोहर लगाकर की है। ये वही लाल किला है, जहां से चाचा नेहरू ने देश की आजादी की मुहर लगाई थी। चाचा नेहरू की तर्ज पर नए जुम्मन चाचा भी अपनी हर पतंग के उड़ान पर लाल किले की मोहर लगाते हैं। कुछ भटके हुए लोग कुछ भी कहते रहें, नए चाचा जुम्मन खुलेआम छप्पन इंच की छाती ठोककर पतंग उड़ा रहे हैं, राजनीतिक मोहल्ले के अपने दोस्तों एवं विरोधियों, दोनों की उपस्थिति में उड़ा रहे हैं। साल दर साल कह रहे हैं, स्टार्टअप, स्टैंडअप, ये आपकी ना समझी है यदि आप स्टार्टअप नहीं हो पा रहे हैं। चाचा तो स्टैंडअप कर चुके हैं। ये तो नादानों की नादानी है, जो अभी भी सिटडाउन मुद्रा में हैं। एक खास बात है, चाचाजान की हर पतंग मेड इन इंडिया कोटेट होती है। यदि नहीं भी है, तो आपको यह जुर्रत नहीं करनी चाहिए, उनकी पतंग को मेड इन चाईना कह दें। खबरदार, समझा करो, अपने चाचा जान मेड इन चाईना भी भारतीय स्टाइल में उड़ाते हैं। आप उनका हुनर देखिए, है न कमाल का। मांजा, डोर, पतंग सब चाईनीज मगर स्टाईल इंडियन है। ये है तजुर्बा, यूं ही चाचा के बाल व दाड़ी खिचड़ी नहीं हुई है। पूरे तजुर्बेकार हैं देश के चैकीदार चाचा जुम्मन, इसलिए अब एक नई पतंग बना रहे हैं। चाचा ने सोच लिया है, भतीजा-भतीजियां कुछ भी कहें, मैं तो अपने तर्जुर्बेकारी का पूरा डिमोन्स्ट्रेशन करवाऊंगा। दुनिया नादानों की है, पतंगें गिनने में लगे हैं, गिनते रहो। चाचाजान का नारा है, गिनते-गिनते थक जाओगे, मगर वे थकने वाले नहीं। हर साल नए रंग की पतंग, वाह चाचा, दुनिया सतरंगी है। मगर आपके तो रंग भी अनंत हैं। चाचा कहीं तो सीखे होंगे ये हुनर, सारे पतंगबाज अंदाज लगाने में लगे हैं। चैक वाले जुम्मन चाचा से काफी आगे निकल गए हैं। अभी तो और छोर का पता नहीं लग पाया है, मगर है कहीं न कहीं कोई चाचाजान का उस्ताद। कहीं एवे तो नाम नहीं है। नहीं-नहीं, वो भी इतना ऊंची पतंग नहीं उड़ा पाया है। इस नाम के व्यक्ति के तो उस्ताद, अपने ही चाचा होंगे। आंखिर ये झिलमिल रंग की पतंग कहां बन रही है। नया भारत पतंग, कहीं बने, परंतु एक बात पक्की है, जब मांजा चाचा के हाथ में है तो, यह पतंग पहले से भी ज्यादा ऊंची उड़ेगी ही उड़ेगी। एवे तो ऐसा कोई चमत्कार नहीं कर पाया, वह तो अपने भैय्या की स्टाइल में पुराना माल ही बेच रहा है। आखिर बेचने वाले से उड़ाने वाला बड़ा हुआ ना। चाचाजान शीं-शीं बहुत करते हैं। कहीं ये नए भारत वाली पतंग शी के घर में तो नहीं बन रही है। यदि ऐसा है तो, इस पतंग का रंग एवं ढंग कुछ नया ही होगा। उड़ेगी भी बहुत ऊंची। भाई-बहनों की गर्दन तो पहले से ही चाचा की उड़ाई पतंगों को देखने में अकड़ी हुई है, तौबा इस नई पतंग के साथ न जाने लोगों की गर्दन के साथ क्या-क्या होगा। चाचाजान ने कह दिया है, पुराना सारा कबाड़ है। सब पटल-अटल कबाड़ इक्ठ्ठा करते रहे हैं, अब सब नया-नया करना है। नए-नए रंग, नई उड़ानें, नई मंजिल, ‘नया भारत’ वाह क्या बात है। दूसरे मोहल्लों के उस्ताद लोग तो वाहीयात थे ही, चाचाजान के अपने ताऊजान की सोच भी कबाड़ थी। इसलिए चाचाजान ने किसी एक जगह, उनकी राख न रह जाए, उनकी राख को घड़ा दर घड़ा भर कर देश भर में बहा दिया। अब दूसरे ताऊजानों की राख का इंतजार है, पहले के घड़े बचे हुए हैं। खूंसट सोचें नये भारत की पतंग की राह में बुरे साए हैं। ऊपर वाले की मेहरबानी से सब निपटते जा रहे हैं। चाचाजान नया भारत पतंग का ढोल खूब पीट चुके हैं, बस मुर्हूत का इंतजार करो, फिर देखो चाचा का कमाल, कितनी ऊंची उड़ती है यह नई पतंग। शायद नई दुनिया तक। ठीक भी है,
चाचाजान 2019 में नई दुनिया की पतंग उड़ाएंगे, यह पक्का है। चाचाजान के हुनर को देखते समझते, इतना हम भी समझ गए हैं। चाचा की अगली पतंग नए भारत से भी ज्यादा रंग-बिरंगी होगी और उससे भी ऊंची उड़ेगी। देश के ये जुम्मन चाचाजान अपना हुनर किसी से शेयर नहीं करते। उनके खासम-खास ढोलची को भी हवा नहीं लग पाती है। खास एवं बेखास सभी ढोलची, अभी तक स्वच्छ भारत, नमामी गंगे, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ पतंगों का ढोल बजाकर आयुष्मान हो रहे हैं। चाचा तजुर्बेकार हैं, अपने बड़े से बड़े चेले को केवल रिजेक्टेट पतंग ही उड़ाने देते हैं। देखो मध्य प्रदेश के उनके छोटे भाई एवं राजस्थान वाली चचेरी बहनियां ने कुछ अपने खालिस अंदाज में पतंग उड़ाई है। बीच में कटंेगी ही कटेंगी, क्योंकि ऐसा अंदाज चाचा को बिल्कुल पसंद नहीं है। फिर भी लखनऊ वाला, सभल नहीं रहा है। बावला है। चाचाजान को अपना पड़ोसी मान रहा है। चेलेई करने के बजाय उस्ताजी दिखा रहा है। कभी रोमियो स्क्वेड पतंग, कभी बूचड़खाना पतंग, कभी रामलीला और दिवाली मंचन पतंग उड़ाता रहता है। उड़ नहीं रही, आधे में कट जा रही है। नादान की इन्वेस्टमेंट पतंग भी हवा मंें उलझी पड़ी है। नादान के समझ में ही नहीं आ रहा है, कैसे उतारूं इस इन्वेस्टमेंट पतंग को नीचे। मांजा काम ही नहीं कर रहा है, न नीचे, न ऊपर, भाई की पतंग उलझी पड़ी है। लोग हुनर पर भी सवाल करने लगे हैं। चैबे जी छौबे जी बनने चले, दुबे भी रह जाएं तो गनीमत होगी। इसलिए लखनव्वा भतीजेजान मध्यान्तर के लिए, एन्काउंटर वाली पतंग उड़ा रहे हैं। मगर डरे हुए भी हैं, कहीं इस चक्कर में पाॅलीटिकल इंकाउंटर न हो जाए। अभी-अभी बड़ी मुश्किल से बचे हैं, एक एन्काउंटरी पतंग की डोर ने लपेट लिया था।
खैर खरबूजे को देख खरबूजा रंग बदलता है। चाचाजान के लखनव्वा भतीजे की तर्ज पर देहरादून वाले ने भी खूब धूम- धड़ाके से इंवेस्टमेंट की पतंग उड़ाई है। बड़े गाढ़े-गाढ़े रंग भरे हैं। इनमें से कई रंगों के नाम तो स्वयं चेला भाई को मालूम ही नहीं हैं। मगर पतंग खूब गाजे-बाजे से उड़ाई है। देश वाले जुम्मन चाचा को भी पतंग उड़ाई आशीर्वाद समारोह में बुलाया। लगता है, चाचा को इस पतंगबाजी का अंदाज अच्छा नहीं लगा। अपने एक कारिंदे से कहलवा दिया कि इस पतंग का तो रंग ही कच्चा है। ये पतंग तो वर्ष 2019 की बरसात भी नहीं झेल पाएगी। रंग में भंग कर दिया, अब अड़ोसी-पड़ोसियों ने इस पतंगबाजी जश्न को नाटक, फिजूलखर्ची कहना शुरू कर दिया है। अड़ोसी-पड़ोसी कुछ भी कहें, यह पतंग देखने वालों के लिए नहीं उड़ाई गई है। यह पतंग घर के अंदर के सपोले मार्का तमाशाइयों के लिए उड़ाई गई है। जिस अंदाज में पतंग उड़ी है, तमाशाइयों की गर्दन कम से कम साल, छह महीने तो अकड़ी रहेगी। रंग रहे न रहे, यह बाद में देखा जाएगा, अभी तो पतंग उड़ती रहेगी। जलने वाले जलते रहें, क्या यह कम है कि बुरी नजर से बचने के लिए ही सही, इंवेस्टमेंट का काला टीका लग गया है। देश के चाचा जुम्मन भले ही अपने हुनर न सिखाएं, मगर देखा-देखी कुछ तो नकल देहरादुनिया भतीजे ने कर ली। देहरादुनियां भतीजा जुम्मन समझ गए हैं, जब देश के भाई-बहन अभी तक, देश के चाचा जुम्मन की एक भी पतंग को नहीं देख पाए हैं और पतंग- पतंग कर रहे हैं, तो कुछ नया शगल उत्तराखण्डियों के लिए उन्हें भी करना चाहिए। नया शगल है इंवेस्टमेंट की पंतग, बस उड़ा दी है। आगे देखेंगे, अभी तो चेलई पूरी हो गई है। बीच में कहने का मौका भी कम है। अभी तो जिंदगी बच गई है। जय इन्वेस्टमेंट, जय जुम्मन चाचा। देश के जुम्मन चाचा की जै-जै करते रहो और मस्त रहो। जीरो टाॅलरेंस के साथ-साथ इन्वेस्टमेंट-इन्वेस्टमेंट कहते रहो और राज्यवासियों को उड़ती पतंग दिखाते रहो।

You may also like

MERA DDDD DDD DD