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उत्तराखण्ड पावर कॉरपोरेशन में निरंतर भ्रष्टाचार के मामले सामने आ रहे हैं। उच्च पदों पर बैठे अधिकारी निजी कंपनियों के हित में अपने ही विभाग को चूना लगा रहे हैं। हालत यह है कि घटिया सामग्री सप्लाई करने वाली एक कंपनी को लाखों रुपए का भुगतान कर दिया गया। जबकि पूर्व में प्रबंध निदेशक भुगतान पर रोक लगा चुके थे। इसी तरह जिन कंपनियों पर लाखों-करोड़ों का बिल बकाया है, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के बजाए मेहरबानी की गई। मामूली बिजली बिल भुगतान न करने पर आम लोगों और किसानों के कनेक्शन काट देने को तत्पर विभागीय अधिकारी लाखों-करोड़ों का बिल न देने वाली कंपनियों के हित साधते रहे
पीसीएल यानी उत्तराखण्ड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड एक ऐसी कंपनी है जिसका नाम उत्तराखण्ड में विद्युत वितरण के लिए जाना जाता है। लेकिन इस कंपनी में जिस तरह के मामले उजागर हो रहे हैं उससे लगता है कि जल्द ही यह भ्रष्टाचार के रिकॉर्ड कायम कर लेगी। कंपनी के उच्च अधिकारियां को लोग ऐसे जानवरों की संज्ञा तक देते हैं, जो अपने ही खेत को चटकर जाते हैं। विद्युत विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार में लिप्त ऐसे अधिकारियों के कई मामले सामने आ रहे हैं।

किस्सा एसजी इलेक्ट्रिकल्स का 

मामला मैसर्स एसजी इलेक्ट्रिकल्स नामक कंपनी का है जिसे यूपीसीएल को विद्युत सामग्री आपूर्ति करने का काम दिया गया था। आज से 7 साल पूर्व यानी 2012 में इस कंपनी की ओर से यूपीसीएल को आपूर्ति की गई विद्युत सामग्री आदि में गुणवत्ता ना मिलने के कारण इसके भुगतान आदि पर रोक लगा दी गई थी। यही नहीं  कंपनी का काम भी रोक दिया गया था। 2012 में यूपीसीएल के प्रबंध निदेशक ए के जोहरी ने अग्रिम आदेशों तक तत्काल प्रभाव से इस कंपनी के भुगतान आदि पर रोक लगा दी थी। इस बावत जोहरी से पूर्व विभाग के एमडी रहे एके जैन ने भी इस कंपनी की गुणवत्ता को उपयुक्त न मानते हुए इसके भुगतान पर रोक लगाई थी। जोहरी के बाद विभाग के एमडी एसएस यादव बनाए गए। एसएस यादव ने भी भुगतान नहीं होने दिए। लेकिन 2017 में जैसे ही बीसीके मिश्रा को विभाग का एमडी बनाया गया तो उन्होंने दो पूर्व प्रबंध निदेशकों की कार्रवाई को नजरअंदाज कर नए सिरे से भुगतान जारी करने को अमलीजामा पहनाया। इसके तहत उन्होंने बकायदा एक कमेटी का गठन किया। जिसमें कुमाऊं क्षेत्र हल्द्वानी के मुख्य अभियंता एचके गुरुरानी, हरिद्वार क्षेत्र के मुख्य अभियंता आर एस बुर्फाल, देहरादून के महाप्रबंधक विधि कंपनी आर जे मलिक, देहरादून के महाप्रबंधक (वित्त) मोहम्मद इकबाल, देहरादून के अधीक्षण अभियंता जी एस कुंवर, काशीपुर के विद्युत विवरण मंडल अधीक्षण अभियंता राजकुमार, रुड़की के विद्युत वितरण मंडल अधीक्षण अभियंता अमित कुमार शामिल थे। 13 सितंबर 2017 को कमेटी की पहली बैठक कराई गयी।जिसमें 15 दिन का समय लिया गया। इसके बाद 6 अक्टूबर 2017 को समिति ने कंपनी को 7 साल से रुके हुए भुगतान को जारी करने की संस्तुति कर दी। इसके आधार पर बीसीके मिश्रा द्वारा 52 लाख 52 हजार 930 रुपये का चेक कंपनी को जारी कर दिया गया। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विद्युत विभाग के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को सिर्फ 5 लाख के टेंडर जारी करने की पावर होती है। लेकिन बीसीके मिश्रा ने 5 लाख की पावर को 50 लाख में तब्दील कर दिया। इस कंपनी का यह एक ही मामला था जिसमें 52 लाख का चेक दिया गया। जबकि बताया गया कि ऐसे कई मामले थे जिनमें करोड़ों रुपए बीसीके मिश्रा ने जारी कर दिए हैं। खुद विभागीय कर्मचारी सवाल उठाते हैं कि क्या यह काम पूर्व के प्रबंध निदेशक नहीं कर सकते थे? लेकिन पूर्व के प्रबंध निदेशकां ने नियम कानूनों को मानते हुए विवादित कंपनी के भुगतान जारी नहीं किए, क्यांकि यह कंपनी गुणवत्ताविहीन सामग्री सप्लाई करने की आरोपी थी।

किस्सा बीटीसी इंडस्ट्रीज का

ऊधमसिंह नगर जिले के विद्युत वितरण खंड रुद्रपुर के अंतर्गत मैसर्स बीटीसी इंडस्ट्रीज का मामला भी चर्चा में है। यह रुद्रपुर से आगे किच्छा में सरिया फैक्ट्री है। यह फैक्ट्री उत्तराखण्ड प्रदेश की सबसे बड़ी बकायेदारों में शामिल है। पिछले कई सालों से इस कंपनी पर करोड़ों रुपए का बकाया है। बावजूद इसके आज भी कंपनी धड़ल्ले से बिजली आपूर्ति सुचारू किए हुए है। दूसरी तरफ ग्रामीणों और किसानों के 10 हजार तक के बिजली बिल होने पर उनके कनेक्शन काट दिए जाते हैं। यहां तक कि उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर दी जाती है। लेकिन किच्छा की मैसर्स बीटीसी इंडस्ट्रीज ने इस मामले में सबको पीछे छोड़ दिया है। इस कंपनी पर उत्तराखण्ड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड का मार्च 2018 में जो बिल था वह 9 करोड़ 5 लाख 46 हजार 876 रुपया था। जिसको यूपीसीएल द्वारा न तो वसूल किए जाने की कार्रवाई की गई और न ही कनेक्शन काटने का काम किया गया, बल्कि बंटे उसकी बकाया धनराशि की किस्त बांध दी गई। यही नहीं यह आदेश भी कर दिया गया कि उक्त कंपनी पर बकाए की राशि को 12 महीनों की बराबर किस्तों में ले लिया जाए। जिसकी समयावधि मार्च 2018 से लेकर फरवरी 2019 तक की गई। लेकिन बीटीसी कंपनी पर माह जनवरी 2019 में भी 10 करोड़ 13 लाख 1254 रुपए बाकी था। इससे स्पष्ट हो जाता है कि तय समयावधि में भी बीटीसी इंडस्ट्रीज ने अपनी किस्त जमा नहीं की हैं। उस पर कोई कार्रवाई भी नहीं की गई। हालांकि मार्च माह की क्लोजिंग से पहले कुछ राशि जमा कर दी गयी थी। इसके बावजूद वर्तमान में इस कंपनी पर माह अप्रैल 2019 में 8 करोड़ 90 लाख 75000 रुपया बाकी है। विभागीय शर्त और समयावधि के बाद भी कंपनी ने मार्च 2019 में अपना विद्युत बिल जमा नहीं किया है। इससे साबित होता है कि मैसर्स बीटीसी इंडस्ट्रीज के मालिक और यूपीसीएल के उच्चाधिकारियों में अच्छे संबंध हैं। जिसके बलबूते उसने पैसे ही जमा नहीं किए और न ही उसका कनेक्शन काटा गया। इसे सब लोग सेटिंग-गेटिंग का खेल बता रहे हैं। ठीक इसी प्रकार विद्युत वितरण खंड रुद्रपुर के ही अंतर्गत मैसर्स नैनी फ्रोजन के विद्युत बिल 44 लाख 34 हजार 939 की वसूली करने के बजाय विद्युत विभाग ने उनसे भी किस्तें बांध दी हैं, जोकि विभागीय हित में कतई नहीं है। गौरतलब है कि विद्युत बिल का भुगतान न होने पर नोटिस दिए जाते हैं। जिसमें सेक्शन 3 और सेक्शन 5 के अंतर्गत डयूज रिकवरी एक्ट 1958 के तहत कार्रवाई की जाती है। जिस पर सेक्शन 3 के बाद सेक्शन 5 नोटिस सीधे जिलाधिकारी के जरिए पहुंचता है। यही नहीं बल्कि जिला अधिकारी इस मामले में संपत्ति कुर्की के भी आदेश कर देता है। लेकिन बकाया कंपनी पर न तो कुर्की की जा रही है और न ही उनका कनेक्शन काटा जा रहा है। इसे बकायदा कंपनी और विभागीय अफसरों की सांठगांठ का नतीजा बताया जा रहा है।

कारनामा बिजली खम्भों की पुताई का 

उत्तराखण्ड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीसीएल) विद्युत आपूर्ति सुचारू कराने के लिए नहीं, बल्कि फिजूल में धनराशि खर्च करने के लिए जाना जाने लगा है। फिजूल का खर्च करके वह अपने ठेकेदारों को मालामाल करने पर तुला है। ताजा मामला बिजली के पोलों का पेंट करने का सामने आ रहा है। इसमें 1 करोड़ 24 लाख रुपए का स्टीमेट इसी बात का बना दिया गया कि रुद्रपुर क्षेत्र के 11 केवी और 33 केवी के पोल पेंट किए जाएंगे, जबकि विद्युत पोल पेंट कराने का प्रावधान उसी समय है अगर जब पोल पर जंग लग जाए अथवा वह जर्जर हो जाए।

बात अपनी-अपनी

हम इन सभी मामलों की जांच कराएंगे। अगर कहीं भी गलत पाया गया तो उसके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी।
राधिका झा, ऊर्जा सचिव उत्तराखण्ड
हमने जो भी किया, नियमानुसार किया है। बकायदा कमेटी बनाकर निस्तारण कराया गया। यदि पूर्व के अधिकारियों ने कंपनियों के बिल पेमेंट नहीं कराए तो इसमें मैं क्या कर सकता हूं।
बीसीके मिश्रा, प्रबंध निदेशक यूपीसीएल
हमारी कंपनी में घाटा चल रहा था। मैंने विद्युत विभाग से रिक्वेस्ट की, जिसको उन्होंने मान लिया। हम बिलों का भुगतान किस्तों में कर रहे हैं। कुछ बिल रुके हुए हैं तो उनका भी जल्द भुगतान कराएंगे।
तुषार अग्रवाल, चेयरमैन बीटीसी इंडस्ट्रीज लिमिटेड किच्छा

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