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उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद उम्मीदें जगी थी कि पहाड़ों पर भी उद्योग लगेंगे और युवाओं के लिए रोजगार की नई संभावनाएं बनेंगी। हालांकि वर्ष 2001 और 2003 में औद्योगिक नीतियां बनीं, लेकिन औद्योगिक वातावरण फिर भी तैयार नहीं हो सका। पुराने उद्योग एक-एक कर बंद हो रहे हैं और नए उद्योगों की संभावनाएं कहीं नजर नहीं आती। जो छोटे-मझौले उद्योग रोजगार का बेहतर जरिया बन सकते थे, वे समय के साथ-साथ बंद होते जा रहे हैं

उत्तराखण्ड में बड़े उद्योग एक के बाद एक लगातार दम तोड़ रहे हैं। दर्जनों उद्योग लंबे समय से बंद पड़े हैं, तो कई बंदी के कगार पर हैं। राज्य बनने के बाद से पहाड़ में नए उद्योग तो नहीं लग पाए, लेकिन पुराने स्थापित उद्योगों को बचाने के लिए भी काम नहीं हो पाया। औद्योगिक वातावरण बनाने में प्रदेश की सभी सरकारें फेल रही हैं। यूं तो उत्तराखण्ड में 25294 लघु औद्योगिक इकाइयां हैं, जिनमें अभी 63599 लोगों को रोजगार मिला हुआ है। इसके अलावा 54047 हस्तशिल्प उद्योग क्रियाशील हैं। अकेले कुमाऊं के छह जिलों में 28951 सूक्ष्म, लघु एवं मझौले उद्योग हैं। चंपावत में 1244, पिथौरागढ़ में 2637, बागेश्वर में 1485, नैनीताल में 13671, अल्मोड़ा में 3487, यूएसनगर में 6427 लघु एवं मझौले उद्योग हैं। यूएसनगर में 148 एवं नैनीताल में 3 बड़े उद्योग हैं। लेकिन कब तक कोई उद्योग जीवित रह पाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। देहरादून में चूना पत्थर की खदानें प्रदूषण के चलते बंद हैं, तो लैंसडाउन का इलेक्ट्राॅनिक उद्योग, अल्मोड़ा बागेश्वर का ऊनी कपड़ा, देहरादून का लकड़ी फर्नीचर एवं बेंत छड़िया उद्योग, नैनीताल के खेल खिलौनों का उद्योग, लालकुआं का कागज/पल्प, हल्द्वानी का कत्था और फर्नीचर उद्योग को संजीवनी की दरकार है। अभी भी प्रदेश में ऊधमसिंहनगर, हरिद्वार, सिडकुल तक ही औद्योगिक विस्तार है। कहने को तो राज्य में 8 जुलाई 2001 को औद्योगिक नीति फिर 2003 में नई औद्योगिक नीति बनी, लेकिन बावजूद इसके प्रदेश में औद्योगिक वातावरण नहीं बन पाया। ऐसे में अब सवाल यह उठता है कि इन बंद पड़ते उद्योगों के लिए जिम्मेदार कौन है? जबकि उत्तराखण्ड में रोजगार के अवसर बढ़ाने और आर्थिक विकास के लिहाज से सूक्ष्म, लघु एवं मझौले उद्योग बेहद महत्वपूर्ण माने गए हैं।

एचएमटी फैक्ट्री, रानीबागः किसी समय यह कुमाऊं में रोजगार का एक मुख्य केंद्र हुआ करता था। यहां 1246 कर्मचारी काम करते थे। एनडी तिवारी ने केंद्रीय उद्योग मंत्री रहते हुए वर्ष 1982 में इस फैक्ट्री को मंजूरी दी थी। वर्ष 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इसका उद्घाटन किया। 91 एकड़ क्षेत्रफल में फैक्ट्री एवं आवासीय परिसर बना। तब यहां 20 लाख घड़ियों का उत्पादन होता था। लेकिन कुप्रबंधन एवं घाटा इस फैक्ट्री को ले डूबा। 2016 में तमाम कर्मचारियों ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली। अब यह फैक्ट्री लंबे समय से बंद पड़ी है, लेकिन इसका उपयोग नहीं हो पा रहा है। इस फैक्ट्री में 500 से अधिक मशीनों में से 45 प्रतिशत मशीनों की नीलामी हो चुकी है। इसमें 41 एकड़ भूमि उद्योग मंत्रालय भारत सरकार की है, तो शेष भूमि राज्य सरकार और वन विभाग की है।

सिडकुल भीमतालः कभी भीमताल को औद्योगिक घाटी का नाम दिया गया था। यहां पर 90 हेक्टेयर जमीन लीज पर ली गई थी। तत्कालीन उद्योग मंत्री नारायण दत्त तिवारी ने 1980 में भीमताल में यूपी स्टेट इंडस्ट्रीयल काॅरपोरेशन के सहयोग से औद्योगिक घाटी की स्थापना की। 65 से अधिक औद्योगिक घरानों से उद्योग खोलने की सहमति ली गई। तब औद्योगिक घरानों ने यहां पर बड़े-बड़े प्लाॅट अपने नाम कराये। तब यहां पर हिल्ट्राॅन, ऊषा रेक्टिफायर, विकास कार्बन एक्वामाल, अपट्राॅन, सोलार्सन जैसे उद्योग खुले लेकिन अब यह सब बंद पड़े हैं। हालांकि अब सिडकुल के इन बंद पड़े उद्योगों की लीज निरस्त कर दी गई है। ऐसे में यहां पर नए उद्योग स्थापित किए जा सकते हैं।

कौसानी चाय फैक्ट्रीः सुमित्रानंदन पंत की जन्मस्थली कौसानी की पहचान यहां की चाय को लेकर भी है। लेकिन अब यहां की चाय फैक्ट्री नहीं रही और न ही इसमें काम करने वालों का रोजगार। वर्ष 1994-95 में कुमाऊं मंडल विकास निगम एवं गढ़वाल मंडल विकास निगम ने प्रदेश में चाय प्रकोष्ठ की स्थापना की। 10 किलोमीटर के दायरे में 211 हेक्टेयर जमीन का चयन चाय बागान के लिए किया गया। 50 हेक्टेयर जमीन पर चाय बागान विकसित किए गए। 2001 में व्यावसायिकता की तरफ कदम बढ़ाया। 2001 में एक निजी कंपनी गिरीराज ने यहां फैक्ट्री लगाई। इस चाय बागान से वर्ष 2002 में 70 हजार 588 किलोग्राम कच्ची पत्तियां उत्पादित हुई। जिससे करीब 13 हजार 995 किलोग्राम चाय तैयार हुई। इसे उत्तरांचल टी के नाम से बाजार में उतारा गया। इसके बाद 2004 में प्रदेश में उत्तराखण्ड चाय विकास बोर्ड का गठन हुआ। 2013 तक बोर्ड ने यहां 211 हेक्टेयर भूमि में चाय का उत्पादन किया। इससे 2.50 लाख किलो कच्ची पत्तियां उपलब्ध कराई। लेकिन 2014 में फैक्ट्री ने दम तोड़ दिया।

आल्पस फार्मास्युटिकल्सः यह कुमाऊं की सबसे बड़ी एवं पुरानी फैक्ट्री मानी जाती है। इसमें माॅरफिन, कैथेडिन, एनालफिन, नोक्नोक्विन, क्लोरोक्विन, डेरजामैथासोन, निकेथामाइट जैसे इंजेक्शनों के साथ ही विटामिन टेबलेट, कैप्सूल एवं पीसीएम टेबलेट्स का उत्पादन होता था। ऐपेसी, सल्फा, पैरासिटामोल, एंटीबायोटिक दवाएं एवं हेलेक्सिन, सिप्रोफ्रलोक्सिन कैप्सूल भी यहां तैयार होते थे। लेकिन वर्ष 2012 के बाद कुप्रंबधन के चलते यह कंपनी घाटे में जाती रही।

श्रमिकों की भविष्य निधि से उन्हें वंचित किया जाने लगा तो श्रमिक असंतोष बढ़ता चला गया। बाद में तो ऐसी स्थिति आई कि कंपनी कर्ज के बोझ तले दबती गई और इसका अपने कामगारों को वेतन देना भी दूभर हो गया। वर्ष 2017 के बाद इस दवा फैक्ट्री में ताले लग गए। उत्तर प्रदेश सरकार के समय में विशेष पर्वतीय उद्योग नीति के तहत 1970-71 में पातालदेवी में औद्योगिक क्षेत्र बनाया गया और यहां पर आल्पस की नींव रखी गई। उत्तर प्रदेश सरकार में सीएम रहे वीर बहादुर सिंह ने इस फैक्ट्री को बनाए रखने के लिए प्रयास किये थे तो अटल बिहारी सरकार के समय में भी इसे विशेष पैकेज दिया गया था। अभी इस फैक्ट्री पर 40 करोड़ का बैंक ऋण है। बताते हैं कि अगर आज के समय फिर से यह फैक्ट्री शुरू होती है तो करीब 500 लोगों को इसमें रोजगार प्राप्त हो सकता है।

सोयाबीन फैक्ट्रीः हल्दूचैड़ में स्थापित इस सोयाबीन फैक्ट्री में एक समय हजारों लोगों को रोजगार मिलता था। वर्ष 1982 में यह फैक्ट्री स्थापित हुई थी, लेकिन 1996 में यह बंद हो गई। इस फैक्ट्री के बंद होने से जहां 400 से ज्यादा कर्मचारी बेरोजगार हुए, वहीं दो हजार से अधिक ऐसे किसान भी प्रभावित हुए जिन्होंने इस फैक्ट्री में सोयाबीन उपलब्ध कराने के लिए अपने खेतों में सोयाबीन उगाया। इस फैक्ट्री को पुनर्जीवित करने के बजाय करोड़ों रुपयों की मशीनों को औने पौने दाम में बेच दिया गया।

मोहान फैक्ट्रीः अस्सी के दशक में रामनगर के निकट मोहान में जीवनरक्षक दवाएं बनाने की फैक्ट्री लगी, लेकिन धीरे-धीरे यह श्रमिक असंतोष का कारण बनती गई। प्रबंधक एवं श्रमिकों में शुरुआत से तनातनी रही। वर्ष 1982 में आयुर्वेदिक एवं यूनानी दवाएं बनाने वाली इंडियन मेडिकल फार्मास्युटिकल काॅरपोरशेन की स्थापना की गई। शुरुआत में यहां पर करीब 200 उत्पाद बनते थे। एक समय यहां पर 230 से अधिक कर्मचारी थे जिसमें से 130 नियमित थे। बाद में जब कंपनी ने आउट सोर्सेज के कर्मचारियों को रखना शुरू किया तो कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच टकराव शुरू हो गया। मजदूरों को सरकार द्वारा निर्धारित एवं न्यूनतम वेतन न देने और ठेकेदार की मनमानी से इस कंपनी की हालत खराब होती गई। जब तक फैक्ट्री जिंदा थी तब तक चुकमगांव, कुनाखेत, मोहान और सल्ट क्षेत्र के ग्रामीणों को यहां पर रोजगार मिला हुआ था। अब अधिकांश मजदूर एवं कर्मचारी बेरोजगार हैं।

पोलिस्टर फैक्ट्रीः इसी क्षेत्र के बेरीपड़ाव में खुली पोलिस्टर फिल्म बनाने वाली जलपैक इंडिया फैक्ट्री भी वर्ष 2014 में बंद हो गई। 200 से अधिक कर्मचारियों को आज तक उनका वेतन भत्ता नहीं मिल पाया है। इसके अलावा भीमताल स्थित हिल्ट्राॅन कंपनी, कुमाऊं मंडल विकास निगम द्वारा संचालित केबल फैक्ट्री भी बंद हो गई।

पटवाडांगर का एंटी रेबीजः पटवाडांगर एक समय एंटी रेबीज एवं स्माॅल पाॅक्स वैक्सीन की आपूर्ति के लिए देश-विदेश में अपनी पहचान रखता था, लेकिन सरकारी उदासीनता के कारण 2002 में यहावैक्सीन बननी बंद हो गई। इसके बाद यह जमीन पंतनगर विश्वविद्यालय को दे दी गई। इसके पीछे कारण था कि इस वेशकीमती जमीन पर विश्वविद्यालय टिश्यू कल्चर बनाएगा। पटवाडांगर की इस जमीन में से तीन एकड़ भूमि स्वास्थ्य विभाग के पास है जिसमें हास्पिटल बनना था। अब आलम यह है कि यहां न तो वैक्सीन बनती थी। न ही टिश्यू कल्चर पर कुछ हो पाया और न ही अस्पताल ही बन पाया है। पटवाडांगर की 25 एकड़ जमीन वन भूमि है। 30 एकड़ में आवासीय एवं अनावासीय भवन निर्मित हैं। 50 एकड़ भूमि में पेड़ हैं। वर्ष 1904 से 1967 तक यहां पाॅक्स वैक्सीन का निर्माण हुआ। बताते हैं कि 1965-66 में यहां पर 160 लाख डोज वैक्सीन बनने लगी। 1959 से 2002 के बीच यहां पर रेबीज वैक्सीन बनती रही। इस जमीन को कुमाऊं विश्वविद्यालय को स्थानांन्तिरत करने की बात भी चली थी। ब्रिटिश शासनकाल में 1904 से यहां पर स्माॅल वैक्सीन बनने का काम शुरू हुआ जो आजाद भारत में 1967 तक चलता रहा। यहां पर फिल्म सिटी बनाने की मांग भी उठी थी। बरहहाल जमीन का अभी कोई उपयोग नहीं हो पा रहा है।

मैग्नेसाइट फैक्ट्रीः पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर चंडाक रोड में 80 के दशक में यह फैक्ट्री स्थापित हुई। यहां निकलने वाले मैग्नेशियम कार्बोनेट को गलाकर उड़ीसा भेजा जाता था। तब यहां पर 150 से अधिक कर्मचारी एवं हजारों की संख्या में मजदूर रोजगार पा रहे थे। 1991 में उदारीकरण के बाद चीन से आने वाले मैग्नेशियम के सस्ता होने के कारण इस फैक्ट्री पर संकट के बादल मंडराने शुरू हुए। 1993 में इसमें ताले लग गए। आज भी फैक्ट्री के कर्मचारियों का प्रबंधन पर करोड़ों रुपया बाकी है। एक समय में यहां पर 400 से अधिक लोगों को रोजगार मिलता था। खानों सहित दो हजार से अधिक लोग प्रभावित हुए। यही हाल जनपद के गंगोलीहाट में चैनाला की सीमेंट फैक्ट्री, धरचूला एवं मुनस्यारी के ऊनी दस्तकारी उद्योग का भी है। प्रदेश में ऐसे और भी दर्जनों छोटे उद्योग हैं जिन्हें संजीवनी की जरूरत है।

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