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राज्य में साइबर क्राइम के मामले बढ़ रहे हैं जागरूकता के अभाव में लोग ठगों के झांसे में आकर उन्हें व्यक्तिगत सूचनाएं साझा कर देते हैं। इस पर मिनटों में उनके खातों से मोटी रकम निकल जाती है। हालांकि देश में साइबर अपराधों को रोकने के उद्देश्य से आईटी एक्ट और आईटी सेल जैसे इंतजाम किए गए हैं। लेकिन आम आदमी कानून की जानकारी न होने के कारण पहले तो रिपोर्ट दर्ज नहीं कराता और जो लोग रिपोर्ट लिखा भी दें तो उन्हें न्याय नहीं मिल पाता। आईटी सेल के कर्मचारी जागरूक रहने की नसीहत देकर पल्ला झाड़ लेते हैं

जनपद पिथौरागढ़ के डीडीहाट निवासी राजेश कुमार गौरकेला के आईडीबीआई बैंक के एटीएम का क्लोनिंग बनाकर दिल्ली से 50 हजार रुपए निकल जाते हैं। बागेश्वर जनपद के पालनीकोट निवासी नीरज जोशी पुत्र गिरीश चन्द्र जोशी के नौकरी डॉट काम पर आनलाइन रजिस्ट्रेशन का शुल्क जमा करते ही खाते से 28999 रुपये की राशि साफ हो जाती है। पिथौरागढ़ के एक व्यापारी से पेटीएम नंबर प्राप्त करते ही उसके खाते से दो बार में 2600 रूपए की धनराशि निकाल ली जाती है। रुड़की के आईआईटी कर्मचारी सर्वेश के मोबाइल पर एटीएम कार्ड नवीनकरण करने की बात कहकर एटीएम का पासवर्ड व ओटीपी की जानकारी मांग 20 हजार की रकम उनके खाते से निकाल ली जाती है। चंपावत जनपद के टनकपुर में एक शिक्षिका के खाते से 25 हजार तो वहीं दिलदार नामक व्यक्ति के खाते से 30 हजार रुपए साइबर ठग आसानी से निकाल लेते हैं। ये चंद मामले प्रदेश में साइबर अपराधों के बढ़ते जाल की तरफ इशारा करते हैं। हालांकि प्रदेश में इस तरह के क्राइम पर रोक लगाने के लिए साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन बनाया गया है जिसे स्मार्ट पुलिस अवार्ड से सम्मानित भी किया जा चुका है। 300 से अधिक पुलिस अधिकारियों को कर्मचारियों को इसके लिए प्रशिक्षित भी किया जा रहा है। कई लोग तो जागरूकता के चलते साइबर ठगों से सूचनाएं साझा न कर बच निकलते हैं, लेकिन अधिकांश लोग इनके झांसे में आ जाते हैं। जिस तरह से मामले बढ़ रहे हैं उससे आम आदमी के बैंक खाते में रखी धनराशि सुरक्षित नहीं रह गई है। धोखाधड़ी वाले मेल के जरिये हैकर्स अहम सूचनाएं हासिल कर लोगों के पर्सनल बैंक अकाउंट तक न सिर्फ पहुंच रहे हैं, बल्कि आसानी से उससे पैसा निकालने के साथ ही ऑन लाइन शॉपिग भी कर रहे हैं। बैंकों द्वारा अपने उपभोक्ताओं को भेजे जाने वाले तमाम संदेशों के बाद भी खाताधारक साइबर ठगों के झांसे में आकर व्यक्तिगत सूचनाएं साझा कर रहा है और अपना खून पसीना एक कर बचाई गई रकम को क्षण भर में गंवा दे रहा है।

बड़ी रकम जीतने की बधाई, असाधारण रिटर्न वाले निवेश प्लान के ऑफर में भी लोग आसानी से फंस जा रहे हैं। फिशिंग (मेला) अथवा विशिंग (फोन कॉल) आधारित घोटाले साइबर ब्रॉड की दुनिया में सबसे तेजी से प्रचलित हो रहे हैं। इन अपराधों से निपटने में करोड़ों रुपयों की चपत लग रही है। हर रोज इस तरह के मेलों से लोग दो-चार हो रहे हैं। हर रोज बड़ी तादाद में लोग ठगे जा रहे हैं। ज्यादातर साइबर अपराधों का उद्देश्य पैसा कमाना होता है। जिसके चलते वित्तीय धोखधड़ी लगातार बढ़ती जा रही है। बीमा कंपनियां एवं बैंकों द्वारा ग्राहकों को शिक्षित करने के बाद भी लोग इसकी चपेट में आ रहे हैं। साइबर ठगी से दोहरा आर्थिक नुकसान हो रहा है। एक तरफ आम आदमी के खातों से पैसा निकल रहा है तो दूसरी तरफ सरकार, नियामक अधिकरणों तथा बीमा कंपनियों की ओर से इस धोखाधड़ी से बचाव के उपायों पर भी एक बड़ी धनराशि खर्च होती है। बैंकिग एवं बीमा साक्षरता के बाद भी अधिकांश खाताधारक यह नहीं समझ पा रहा है कि कोई भी असली कंपनी उनसे उनके खाते या पासवर्ड की जानकारी नहीं मांगती। न ही सिक्यूरिटी क्वेश्चंस का वैरीफिकेशन करने को कहती है। लेकिन आम ग्राहक वेरीफाई अकाउंट प्रोसेस व कीवर्ड्स जैसे शब्दों के जाल में फंस जा रहा है। साइबर जानकार कहते हैं कि साइबर क्राइम अब एक नए तरह का युद्ध है। इसमें हर रोज बड़े स्तर के खतरे उठाने पड़ रहे हैं। रोजाना भेजे जाने वाले मेल्स में से 90 प्रतिशत स्पैम मेल होते हैं। इसमें किसी लिंक को क्लिक करने को कहा जाता है। इसके जरिए हर सकेंड ऑनलाइन क्राइम या यूं कहें लाखों की ठगी होती होती रहती है।

 


सोशियल साइट में फर्जी एकाउंट बनाना, अश्लील फोटो डालना, एमएसएस करना, लॉटरी के नाम पर ठगी, नैट बैंकिंग में हेराफेरी ये आज के साइबर क्राइम का चेहरा है। बहुत दूर बैठा व्यक्ति बड़ी आसानी से लोगों को अपने जाल में फंसाकर लूट रहा है। साइबर जानकारों का कहना है कि साइबर टेररिज्म, साइबर वॉर, हैकिंग, पासवर्ड वैर्क, ईमेल स्नूफिंग, पासवर्ड कोपिंग, वाइरस एवं वॉर्म्स डालकर कम्प्यूटर को नुकसान पहुंचाने सहित 170 से अधिक तरीकों से आज के दौर में साइबर क्राइम हो रहा है। कहने को तो साइबर क्राइम को रोकने के लिए देश में वर्ष 2000 में आईटी एक्ट पास हुआ। इसमें 94 सेक्शन एवं 13 चैप्टर बनाए गए। तमाम जनपदों में आईटी सेल गठित किए गए हैं, लेकिन यह रिपोर्ट दर्ज करने तक ही सीमित हैं। साइबर अपराधी तक पहुंच पाना अब भी टेड़ी खीर साबित हो रहा है। कंप्यूटर सोर्स डाक्यूमेंट से छेड़छाड़ करना, कंप्यूटर संबधी अपराध, साइबर आतंकवाद, इंटरनेट पर आपत्तिजनक एवं अश्लील सामग्री डालना, गोपनीयता/ निजता का उल्लघंन करना जैसी श्रेणियां तो बना दी गई लेकिन अपराधी को गिरफ्त में लेने की पकड़ मजबूत नहीं बन पाई। आज भी कई लोग ऐसे हैं जो साइबर क्राइम सेल की जानकारी न होने के चलते रिपोर्ट नहीं लिखा पाते। दूसरा आईटी सेल में रिपोर्ट का ढेर लगता जा रहा है। आईटी सेल के कर्मचारी भी जागरूक रहने की नसीहत देकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं लेकिन कार्रवाही करने की तरफ कदम कम ही बढ़ पाते हैं। नंबर सर्विलांस पर लगा किस जगह से फोन आया, यह जानकारी तो पुलिस कर्मचारियों को मिल जाती है, लेकिन उसके बाद आगे को कार्रवाई नहीं होती। जहां तक अपराधियों का सवाल है वह एक बार इस्तेमाल किए सिम को दोबारा इस्तेमाल में नहीं लाते। सरकारी विभागों से मिलती-जुलती लिंक पर क्लिक करते ही कई बार लोग ठगी का शिकार हो जा रहे हैं। मोबाइल पर थर्ड पार्टी एप इनस्टाल करने के लिए जेनरेट हुआ कोड बताने से भी लोगों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।

 

ऑनलाइन शॉपिंग के नाम पर भी जमकर ठगी हो रही है। कई फेक वेबसाइट पर बैंकिंग क्रेडेंशियल डालने पर भी ठगी हो रही है। मोबाइल पर भेजे गए लिंक को आगे फॉरवर्ड करना भी लोगों को भारी पड़ रहा है। गूगल पर कस्टमर केयर नम्बर पता करने पर भी ठगी की घटनायें बढ़ रही हैं। इसके अलावा एटीएम से रुपए निकालते समय असावधानी भी कई लोगों को भारी पड़ रही है। इसी तरह ठगी के कुछ और मामले भी सामने आ रहे हैं। अब लोगों को कम दामों पर स्कूटी, मोटरसाइकिल आदि वाहन देने के विज्ञापन के नाम पर ललचाया जा रहा है। जिसमें गाड़ी के इंश्योरेंस खुद करने के नाम पर अग्रिम धनराशि मांगी जा रही है लेकिन वाहन डिलीवर नहीं किया जा रहा है। अधिकतर लोगों के पास फोन आता है कि आपका एकाउंट बंद होने वाला है। उसे चालू रखने के लिए ओटीपी बताएं या फिर एटीएम से संबधी जानकारी मांगी जाती है। थोड़ी ही देर में पता चलता है कि उसके बैंक से पैसे निकाल लिए गए हैं। बैंकों द्वारा ग्राहकों को अधिकतर जानकारी अंग्रेजी में देने के चलते कम पढ़े-लिखे लोग या फिर जिन्हें अंग्रेजी का ज्ञान नहीं होता वह इस तरह के मैसेज को समझ नहीं पाते। कम पढ़े लिखे ही नहीं, बल्कि अच्छे खासे पढ़े लिखे कामकाजी लोग भी इन साइबर ठगों की चपेट में आ जाते हैं।

अब लोगों के बैंक अकाउंट असुरक्षित हो चले हैं, लेकिन अहम सवाल यह है कि इस तरह की धोखाधड़ी को रोकने के लिए उचित कदम उठाने में बैंक व बैंकिंग नियामक विफल साबित हो रहे हैं। सवाल यह उठता है कि साइबर अपराधियों को कैसे क्रेडिट एवं डेबिट कार्ड का नंबर एवं उसके पीछे छपा तीन अंकों का सीवीवी नम्बर प्राप्त हो जाता है? बड़ी बात यह है कि प्रदेश एवं देश में अधिकांश लोग ऑनलाइन शापिंग के बारे में जानते ही नहीं, लेकिन हजारों किमी. दूर उनके कार्ड से खरीददारी हो जाती है। इस तरह की घटनाएं बताती हैं कि कहीं न कहीं बैंकों का आंतरिक डाटाबेस कमजोर है। अगर कमजोर न होता तो फिर खाताधारकों की सूचनायें ठगों तक कैसे पहुंच पाती? इससे साफ तौर पर जाहिर होता है कि कहीं न कहीं बैंकों से ही सूचनाएं लीक हो रही हैं। इस तरह की धोखाधड़ी को रोकने के लिए ग्राहकों को ही जिम्मेदार नहीं बनाया जा सकता, बल्कि इसके लिए बैंकिंग सिस्टम का डाटा मनैजमेंट एवं खाताधारकों की गोपनीय सूचनाओं को बनाए रखने के लिए एक कारगर तरीका अपनाना ही होगा। वरना बैंकों से लोगों का भरोसा उठ जाएगा। लोग बैंकों के बजाय घर पर ही पैसा रखना ज्यादा बेहतर समझेंगे। ऐसा करने से जहां कालाबाजारी बढ़ेगी वहीं डिजिटल लेन-देने भी प्रभावित होगा। आखिर बैंकों में पैसा रख क्यों लोग अपनी मेहनत की कमाई को गंवाना पंसद करेंगे।

एक ठगी ऑनलाइन हो रही है तो दूसरी कबूतरबाजी है। परदेस में या फिर विभागों में नौकरी के नाम पर युवक-युवतियों को निशाना बनाकर की जा रही है। बेरोजगार युवा भी इनके जाल में लगातार फंसते जा रहे हैं। कबूतरबाजों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। विदेश में नौकरी के नाम पर ठगे जाने के पीछे जानकारी का अभाव न होना रहा है। जबकि जो भी कंपनी नौकरी का ऑफर दे रही है उसे केंद्रीय श्रम मंत्रालय में रजिस्ट्रेशन करना होता है। एजुकेशन के लिए विदेश मंत्रालय का सार्टिफिकेट जरूरी है, लेकिन जानकारी के अभाव में कंपनी को रकम देने से पहले व्यक्ति इस तरह की जांच नहीं करता जिससे वह ठगी का शिकार हो जाता है न ही लेन-देन एवं शर्त का कोई लिखित ब्यौरा और एफिडेविट भी इनके पास नहीं आता है। साधारण परिवार के लोग बेहतर भविष्य की खातिर इन ठगों के जाल में फंस जाते हैं। कई लोग तो कर्ज लेकर इस तरह के तमाम ठगी करने वाले एजेंटों के जाल में फंस जाते हैं। प्रोफशनल कोर्स के नाम पर भी जमकर ठगी हो रही है। पहाड़ों में कबूतरबाजी का यह गोरखधंधा खूब फल-फूल रहा है। कम पढ़े तो इन कबूतरबाजों के शिकंजे में फंस ही रहे हैं, लेकिन उच्च शिक्षित व्यक्ति भी इनके जाल में फंस रहा है। ऐसी घटनाएं भी आई हैं जब किसी तरह ये लोग विदेश पहुंच जाते हैं तो वहां दस्तावेज पूरा न होने या फिर वीजा अवधि खत्म होने पर भी लोगों को जेल की सजा भी काटनी पड़ रही है। विदेश भेजने के नाम पर इस तरह की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं।

बात अपनी-अपनी

हमने साइबर क्राइम पर कंट्रोल करने के लिए हर थाने में अलग से ब्रांच बना दी है। जिसमें हमारे विशेषज्ञअधिकारी बैठते हैं। वह काफी हद तक मामलों को सॉल्व करते हैं।
अजय जोशी, आईजी कुमाऊं

साइबर क्राइम से बचने का सबसे बेहतर उपाय जागरूकता है। लालच में आए बगैर किसी भी फोन कॉल और इमेल से हमें सावधन रहना चाहिए। अपनी गोपनीय सूचनाओं को बगैर सोचे-समझे साझा नहीं करना चाहिए। खाताधारकों की सूचनाएं लीक न हों, इसके लिए बैंकिंग और बीमा कंपनियों को एक मजबूत गोपनीय सिस्टम बनाना होगा। जिसमें अपराधी सेंध न लगा सकें। सार्वजनिक स्थलों, दीवार पेंटिंग एवं तमाम उपभोक्ता वस्तुओं के रैपरों में भी इस तरह की जानकारियां प्रकाशित करनी चाहिए ताकि अधिकतर लोग वित्तीय सूचनाओं को लेकर साक्षर बन सकें।
डॉ. त्रिभुवन कुमार, साइबर जानकार

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