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Uttarakhand

तीसरी ताकत के समक्ष वजूद का संकट

साल 2018 में हुए निकाय चुनावों में प्रदेश के मतदाताओं ने भाजपा ओैर कांग्रेस पर विश्वास जताया है। निर्दलयों पर भी अपनी नियामत बरसाने में कमी नहीं की, लेकिन क्षेत्रीय दलों को एक बार फिर से हाशिये पर ही रखा है। ऐसे में क्षेत्रीय दलों के समक्ष अपने वजूद का अहम सवाल है।

राज्य का प्रमुख घोषित क्षेत्रीय दल उक्रांद अपनी नीतियों और नेताओं की सत्ता लोलुपता के चलते आज राज्य की राजनीति में हाशिए पर है। उक्रांद नेताओं के आपसी मतभेद और मनभेद के चलते यह दल अपने वजूद के लिये संघर्ष करता दिखाई दे रहा है। एक समय पृथक राज्य के लिए बड़ा आंदोलन खड़ा करने वाले उक्रांद नेता वर्ष 2018 में जनता की समस्याओं को लेकर कोई बड़ा धरना-प्रदर्शन करते तो संभव था कि निकाय चुनाव में दल की दुगर्ति नहीं होती। नए राज्य में चार विधायकों के साथ अपना दमखम रखने वाला उक्रांद आज अपनी पहचान को ही तरस रहा है।

वर्तमान में एक बार फिर से उक्रांद प्रदेश की राजनीति में वजूद तलाशने को उत्सुक है। लेकिन जानकारों का मनना है कि यह काफी कठिन है। आज भी उक्रांद का नेतृत्व उन्हीं लोगों के हाथों में है जिन पर हमेशा से सत्ता और सरकार की छाया बनने के आरोप लगते रहे हैं। जिस तरह से निकाय चुनाव में प्रदेश की जनता ने उक्रांद को नकारा है उससे नहीं लगता कि आने वाले समय में उक्रांद प्रदेश की राजनीति में अपनी पहचान स्थापित करने में कामयाब होगा।

उक्रांद के बाद उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी का नाम लिया जा सकता है। पत्रकार और जनआंदोलनां से जुड़े पी सी तिवारी ने इस दल की स्थापना की। जनता में जागरूकता अभियान के साथ अपनी राजनीतिक पारी आरंभ करने वाली उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी प्रदेश के हर मुद्दे पर अपना पक्ष मजबूती से रखती रही है, लेकिन आज भी इस दल की विश्वसनीयता प्रदेश के मतदाताओं में नहीं बन पाई है। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव हों या नगर निकाय चुनाव हर क्षेत्र में उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी लड़ी लेकिन नाकामयाब रही। हाल ही में सम्पन्न नगर निकाय चुनावों में उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी का एक भी उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत पाया।

समाजवादी पार्टी की बात करें तो अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय चकराता से मुन्ना सिंह चौहान पृथक राज्य बनने के बाद हरिद्वार से राजेंद्र बाडी सांसद चुने गए। लेकिन निकाय चुनावों में उसे भी निराशा ही हाथ लगी। तराई और हरिद्वार में भी उसका जनाधार कम हुआ है। बहुजन समाज पार्टी तीसरी ताकत के रूप में अपने वजूद का अहसास करती रही है। कुमाऊं के तराई और हरिद्वार क्षेत्र में बसपा का एक बड़ा वोट बैंक और जनाधार है। त्रिस्तर पंचायत और निकाय चुनाव में बसपा ने अपनी ताकत कई बार दिखाई है। 2018 में ंहुये निकाय चुनाव में एक नगर पालिका में बसपा ने जीत दर्ज की है।

बसपा का जनाधार अगर मैदानी क्षेत्रों में छोड़ दें तो पर्वतीय क्षेत्र में न के बाराबर है। बावजूद इसके बसपा प्रदेश की राजनीति में भारी दखल रखने वाली पार्टी के तौर पर भी पहचान बना चुकी है। कभी बसपा के 7 विधायक चुनाव जीत कर सदन में पहुंचे थे। लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा का एक भी विधायक चुनाव नहीं जीत पाया। माना जाता है कि इसी तरह से आम आदमी पार्टी भी प्रदेश में अपना दखल देने के लिए संघर्ष करती रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव में पांचों सीटों पर चुनाव लड़ने वाली आप आज भी अपना बजूद तलाश रही है लेकिन मतदाताओं में न तो साख पैदा कर पाई है और न ही नेतृत्व खड़ा कर पाई है। साल 2018 के निकाय चुनाव में आप को प्रदेश की जनता ने पूरी तरह से नकार दिया।

अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय टिहरी और उत्तरकाशी में वामपंथियों का खासा असर था। सीपीआई के लोग टिहरी और देवप्रयाग से विधायक भी रहे, लेकिन साल 2018 के निकाय चुनाव बताते हैं कि वामपंथ सिमट रहा है।

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